Saturday, 6 February 2016

मनरेगा का दस साल


दो फरवरी,2006 को लागू होने के बाद महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी क़ानून यानी मनरेगा ने अपना दस साल का सफर पूरा कर लिया है। यह एक ऐसा क़ानून था जो समाज के सभी वर्गों और सभी विचारधाराओं के लोगों को किसी-न-किसी रूप में प्रभावित किया। पीआईबी के एक खबर पर गौर करें तो अब तक मनरेगा का व्यापक प्रसार हुआ है,जिसे संक्षेपतः इस प्रकार कहा जा सकता है,

"इस कार्यक्रम की शुरुआत से अब तक इस पर 3,13,844.55 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसमें से 71 प्रतिशत राशि श्रमिकों को पारिश्रमिक देने में खर्च हुई है। श्रमिकों में से अनुसूचित जाति के श्रमिकों की संख्या 20 प्रतिशत बढ़ी है। जबिक अनुसूचित जनजाति के श्रमिकों की संख्या में 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस तरह 1980.01 करोड़ रुपये के मानव दिवस सृजित किए गए। इसमें से महिला श्रमिकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। यह संवैधानिक न्यूनतम संख्या से 33 प्रतिशत अधिक है।"
        आज जब मनरेगा को लागू किये एक दशक का समय पूरा हो गया है तो हमें तीन सवालों का जवाब तलाशने का कोशिश करना चाहिए।
पहला,जिस उद्देश्य के लिए मनरेगा क़ानून को लाया गया था,क्या इसने अपनी भूमिका निभाई ?
दूसरा,मनरेगा को लेकर सरकार का रवैया कैसा है ? और
तीसर,क्या हमें अभी भी इस क़ानून की जरुरत है ?

       हम मनरेगा के प्रदर्शन का दो तरह से मूल्यांकन कर सकते हैं। एक,क्या इसने ग्रामीण परिवारों के आजीविका को बढ़ाया ? और दूसरी,क्या इसके जरिये ग्रामीण सशक्तिकरण हो पाया ?

       आंकड़ों पर गौर करें तो यह योजना हर साल एक चौथाई परिवारों को 40-50 दिनों तक रोजगार उपलब्ध कराती है। लेकिन दूसरी तरफ ग्रामीण सशक्तिकरण को लेकर लोगों का मत बंटा हुआ है क्योकि इसके क्रियान्वयन को लेकर अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न तरीका है। फिर भी इसके मुख्य सफलता जिस पर अधिकांश लोग सहमत है;वह है कि इसके चलते ग्रामीण मजदूरी में बढ़ोतरी हुयी है,ये मजदूर अपने अधिकारों को समझने लगे हैं और काम के घंटों का विशेष ध्यान रखने लगे हैं जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
       एक अन्य उपलब्धि जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,वह है - इसने महिलाओं को काम का महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराया है और लैंगिक समानता को बढ़ावा दिया है। इसके अभाव में ये अधिकांस बेरोजगार थी।

        ताजा तरीन आंकड़ें स्पष्ट करते हैं कि मनरेगा ने गाँवों से शहरों की ओर पलायन की गति को भी धीमा किया है। ग्रामीण परिदृश्य को बदला है;जल-संरक्षण,भूमि विकास के कामों के जरिये इसने प्राकृतिक संसाधनों को नया रूप दिया है\ गरीबी को काफी ज्यादा कम किया है। एक सर्वे में बताया गया है कि इसके बदौलत दलितों में 38% और आदिवासियों में 28% गरीबी में कमी आयी है। ये सभी मनरेगा की अन्य उपलब्धियाँ हैं।

आज मनरेगा किस हालत में है ?
         इसके उपलब्धियों को देखते हुए इस सवाल का समीक्षा करना बेहद जरूरी हो जाता है। रोजगार के कुल श्रम दिवसों की संख्या वित्तवर्ष 2013-14 में 220 करोड़ की तुलना में 2014-15 में घटकर 166 करोड़ हो गई। वर्तमान सरकार इसके प्रति ढुलमुल रवैया अपनाये हुए है। 2014-15 के योजना में इसके बजट को कम कर दिया गया। जो इस क़ानून के मूल उद्देश्य को प्रभावित कर सकता है।
राज्यों की स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि जनवरी,2016 तक 14 राज्यों के फंड बैलेंस नकारात्मक दर्शा रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो इसे लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति और क़ानून पर विश्वास क्षीण हुआ है।

मनरेगा की आलोचना
         मनरेगा की आलोचना मूल रूप से दो बातों के लिए की जाती है। एक,इस योजना में भारी पैमाने पर रिसाव है यानी हर स्तर पर भ्रष्टाचार तथा दूसरी,इसमें काम के नाम पर गढ्ढे खोदे जाते हैं और भरे जाते हैं,जो एक हद तक सही भी हो सकता है।
       लेकिन पूर्ववर्ती सरकार द्वारा लाया गया डीबीटी और वर्तमान सरकार का महत्वाकांक्षी जन धन योजना रिसाव को तो कम कर दिया है। लेकिन दूसरी आलोचना,जिसकी सच्चाई पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता,इस क़ानून की उपयोगिता को देखते हुए सुधार की तत्काल जरुरत है।

अंततः,भारत में बेरोजगारी का स्तर,गरीबी की स्थिति और भूमिहीन मजदूरों,सीमांत किसानों की दशा को देखते हुए,यह जरूरी है कि इसका परिचालन पुरे राजनैतिक इच्छाशक्ति और क़ानून पर विश्वास रखके किया जाए। तभी मूल उद्देश्य को पाया जा सकेगा।