Sunday, 21 February 2016

कुतर्क कर लोग अपने को तार्किक कहने लगे हैं

लोगों को जब से अपना मत रखने का खुला मंच मिला है,अधकचरे ज्ञान और अल्प बुद्धि वाले भी राष्ट्रीय महत्व के विषयों,राष्ट्रीय मुद्दों पर ज्ञान बांटने लगे हैं,और लोगों को भड़काने लगे हैं। ऐसा तब से देखने को मिल रहा है,जब से सोशल मीडिया की पहुँच लोगों तक हुयी है। खैर आम जनता,साधारण नागरिक के लिए तो यह बात समझ से परे होती है,लेकिन जब पार्टियों के प्रवक्ता ऐसा करने लगे तो देश के लिए खतरा की घंटी तो है ही,साथ में लोगों को अवसाद पूर्ण करने का परिचायक भी है।

कुछ दिन पहले एक टीवी डिबेट में जदयू के प्रवक्ता कह रहे थे कि जब आतंकी हेडली के बातों पर यह भरोसा किया जा सकता है कि इशरत जहां आतंकी थी तो आजम खां के बातों पर क्यों नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब नवाज शरीफ से मिले तो वहाँ दाऊद भी था। अब इन मूर्ख शिरोमणी को कौन समझाए कि प्रमाण का सबसे बड़ा तकाजा होता है कि आरोपी जहां से ताल्लुक रखता है उसकी प्रमाणिकता वहाँ के किसी व्यक्ति द्वारा ही तय किया जाता है।

एक ऐसा ही इण्डिया न्यूज के एक शो जिसका होस्टिंग दीपक चौरसिया कर रहे थे,उसे मैं देख रहा था,यह शो उस समय का था जब नौ फरवरी को जेएनयू में देश-विरोधी नारे लगाए गए थे। अनिर्बन भट्टाचार्या नाम का एक व्यक्ति जो उस सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजकों में से एक था,जिसने कहा कि आंबेडकर ने जम्मू-काश्मीर के जनमत संग्रह का बात किये थे,क्या वे देशद्रोही हैं ?

परन्तु इनको समझना चाहिए कि भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता का वकालत किये थे,लेकिन जब चीन के समय युद्ध के दौरान मार्क्सवादी खेमा भारत पर ही अंगुली उठाने लगा तो उनके द्वारा संविधान का 16वां संशोधन देश की एकता और अखंडता को बनाये रखने के लिए लिया गया।

ऐसे-ऐसे कुतर्क तो भरा पड़ा है,गिनाने पर एक किताब ही लिखा जा सकेगा। ऐसी बातें करके ये लोग अपने को तार्किक इंसान को श्रेणी में रखने लगे हैं।

एनडीटीवी जो अपने आप को पिछड़ों का समर्थक और मानवाधिकार का झंडाबरदार बताता है साथ ही यह भी दावा करता है कि वह निष्पक्ष रिपोर्टिंग करता है। निधी कुलपति एनडीटीवी से संबंधित हैं,मैं इनका एक प्रोग्राम तब देखा जब एबीवीपी से जुड़े कुछ छात्र नेताओं ने इस्तीफ़ा दे दिया,वे उनमें से एक का साक्षात्कार कर रही थी,बार-बार एक सवाल दोहरा रही थी ताकि एबीवीपी के कुछ बुराई निकलकर सामने आ जाए,बीच में उन्होंने उस नेता का जाती भी पूछ लिया। परन्तु उस नेता ने ऐसा कोई बात नहीं कहा जिसमें एबीवीपी का गलती हो तो मन मसोसकर रह गयी। जाति के सवाल पर इस नेता का जवाब था कि संघ जाति के बारे में नहीं पूछता और अपनी जाति बताने को भी मना करता है।

अपनी राय व्यक्त करना कोई गुनाह नहीं है,लेकिन अच्छे तर्क देकर अपनी बातों को प्रमाणित तरीके से रखना,कई अलग-अलग परिस्थितियों की घटनाओं को एक में मिलाकर और एक-दूसरे से तुलना करना डिबेट और बहस के आत्मा को मार देता है;यह न तो कोई सीख दे पाता है और न ही समाज को शिक्षित कर पाता है,बल्कि गुमराह कर गर्त में ले जाता है।