Thursday, 25 February 2016

जेएनयू की घटनाओं का जम्मू काश्मीर में सरकार से तुलना कैसे ?

       एक महत्वपूर्ण सवाल जो आज कुछ लोगों के जुबान पर तैर रहा है,वह कि जो पार्टी अफजल को शहीद मानती है,उसी के साथ भाजपा का सत्ता सुख और जेएनयू में इसी से सबंधित नारा देश विरोधी कैसे ?

      चर्चित कहावत है कौन व्यक्ति कितना विद्वान है,उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह किस प्रकार का सवाल पूछता है। कभी-कभी तो रवीश कुमार जैसे 'वरिष्ठ पत्रकार' पर भी शक होने लगता है कि वह किसी गंभीर पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं।


इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि जम्मू-काश्मीर तथा जेएनयू का सन्दर्भ क्या है ?

अगर कोई दोनों जगह का तुलना करने का कोशिश करता है तो वह उसकी मूर्खता का पराकाष्टा है। दोनों जगह की परिस्थियाँ अलग है। जे & के एक ऐसा राज्य है जो प्रारंभ से ही संवेदनशीलता धारण किये हुए है,कई देशों से सीमाएं लगाने के कारण इसका महत्व और अधिक हो जाता है।

इस स्थिति में वहाँ एक सरकार की जरुरत थी जो राज्य के क़ानून व्यवस्था का स्थायित्व प्रदान कर सके,भाजपा द्वारा राज्य में इसी साध्य को पाने का एक प्रयास किया गया,जो अभी तक सफल होता हुआ दिखाई दे रहा है।

अगर कोई पार्टी अपने विचारधारा से समझौता कर ठीक अपने से विपरीत पार्टी से साथ गठबंधन की सरकार बनाती है,ताकि राज्य में घटने वाली खतरनाक घटनाओं पर काबू पाया जा सके जैसे कि अलगाववादी सक्रिय न हों,पाकिस्तान परस्त राजनीति अपना सर न उठाये,घाटी में काश्मीरी पंडितों को फिर से पुनर्वासित किया जा सके तो यह दूरदर्शिता का प्रतीक है,साथ ही राष्ट्रवादिता का पराकाष्टा है।

उन लोगों को समझना चाहिए जो वहाँ की घटनाओं का तुलना हाल में ही घटी जेएनयू की घटना से कर रहे हैं कि काश्मीर समस्या आज भारत के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है,साथ ही भारतीय विदेश नीति का यह एक विफलता रहा है कि आजादी के इतने दिनों बाद तक हम पाकिस्तान को ये बात नहीं समझा पाये कि काश्मीर भारत का ही अंग है। अगर सरकार के अभाव में वहाँ कोई भी ऐसी घटना घटित होती है जो केंद्र सरकार के नियंत्रण में नहीं तो यह भारत का अंतर्राष्ट्रीय साख को धूमिल करने जैसा होगा। 

भौगोलिक परिस्थिति और जनसांख्यिकी स्थिति को देखते हुए किसी एक पार्टी को विधानसभा में बहुमत मिलना मौजूदा समय में असंभव नहीं तो कठिन जरूर है,ऐसे में राज्य को सरकार विहीन नहीं रखा जा सकता था,फलस्वरूप भाजपा और पीडीपी दोनों को अपनी विचारधारा से समझौता करना पड़ा।

इसकारण कोई ऐसा सवाल ही नहीं बनता कि जेएनयू की घटना से तुलना किया जाए।

वहाँ बनी गठबंधन के सरकार को मई एक दूसरे नजरिये से भी देखता हूँ,जो है भाजपा काश्मीर में गठबन्धित सरकार के बदौलत अपनी पैठ पुरे राज्य में बनाने की कोशिश में है ताकि पर्याप्त बहुमत लाकर राज्य का स्थाई समाधान कर सके। ये अब देखने वाली बात होगी कि वह इसमें कितना सफल होती है। ऐसी परिस्थिति में आलोचना करना तो उस नासमझ की नासमझी है जो समझ नहीं पा रहे हैं।