Sunday, 14 February 2016

क्यों जेएनयू कैंपस में इस तरह की घातक राजनीति को पनाह मिली है ?

यह सवाल जो आज सभी भारतीय जुबान पर चहक कर बोल रहा है,परन्तु जवाब नहीं आ रहा है खासकर उनलोगों से जो ऐसा देशविरोधी हरकत कर रहे हैं। 


शिक्षण संस्थान को हम राजनीति का अड्डा नहीं बनने देंगे,ऐसा हमेशा सुनने में आता है,लेकिन क्या क्या शिक्षण संस्थान को राजनीति से अलग रखा जा सकता है ? जवाब है - नहीं। क्योकिं कोई इंसान कभी राजनीति से अलग हो ही नहीं सकता। महान विचारक अरस्तु का प्रसिद्ध वाक्य - मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,इसी का पुष्टि करता है,जबकि वास्तविकता यह थी वहाँ राजनीति और सामाजिक घटनाएं आपस में इतना घुली-मिली थी कि अरस्तु के अनुसार समाज और राजनीति एक ही था।

अगर सिलसिलेवार तरीके से देखें तो जेएनयू में ऐसा नापाक हरकत होने की कई वजहें हैं -

- जेएनयू में 'राजनीतिक एक्टिविज्म' वहाँ के पाठ्यक्रम में शामिल है,यहीं कारण है कि वहाँ ऐसे तत्वों को फ़ौरन जमीन मिल जाती है।
- पुराने वामपंथी प्रोफेसरों ने वहाँ राजनीतिक प्रोपगैंडा को अकादमिक योगदान में बदल कर रख दिया है।
देश भर से आने वाले भोले-भाले अबोध युवा यह नहीं समझ पाते और वे समाज विभाजक,देश-विरोधी प्रोपगैंडा से सजे सिलेबस,साहित्य आदि को उच्च शिक्षा मानकर आत्मसात कर लेते हैं। यहीं है वहाँ यह विष फैलाने का रहस्य(एस.जयशंकर का आलेख,दैनिक जागरण)
- इसकी पुष्टि हाल में ही प्रकाशित के के मोहम्मद की आत्मकथा से भी हो जाती है कि जेएनयू के मार्क्सवादी इतिहास प्रोफेसरों ने देश को कितनी गहरी हानी की है।
- हमारे देश में स्वार्थी अज्ञानी नेताओं की गैर-जिम्मेदारी के कारण यह सब छिपा रहा,लेकिन वर्तमान सरकार ने जब इस सारे वाकये को उजागर किया और आज कठोर कार्रवाई करने का बात कर रही है तो उलटे चोर कोतवाल को डाँटे वाली कहानी नजर आ रही है।
नौकरी का खोज यहाँ का प्रमुख सेक्यूलर कार्य है तो हिन्दू विरोधी राजनीति प्रमुख मजहबी कार्य;जो आये दिनों देखने को मिलता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है,
"पड़ताल इस बात की होनी चाहिए कि जब से गैर सरकारी संगठनों की फंडिंग पर भारत सरकार ने सख्ती दिखाई है तब से ही इस तरह के वाकयात क्यों सामने आ रहे हैं। यह पूरा मसला हिन्दू या मुसलमान का नहीं है,बल्कि ये मसला राष्ट्रवादी और देशद्रोहियों के बीच का है।"