Sunday, 14 February 2016

बौद्धिक कोमा जल्द हावी हो जाएगा

      इसे क्या कहा जाए - अभिव्यक्ति की आजादी या इसके आड़ में देश की संप्रभुता की चुनौती ? जब देश की राजधानी का एक विश्वविद्यालय जहां हर तरह के देशी-विदेशी भारत निंदकों को सम्मानपूर्वक मंच मिलता है,किन्तु भारत के गृहमंत्री(पी. चिदंबरम) को बोलने नहीं दिया जाता है और इनके खिलाफ कैंपस में आंदोलन होता है,वहीं दूसरी ओर लेनिन,स्टालिन,माओ,अफजाल,याकूब,मकबूल के समर्थक में नारे लगाए जाते हैं।


      इससे पहले कुछ सवालों को जान लेना बहुत जरूरी है - भारत में बुद्धिजीवी किसे माना जाए ? दादरी पर विरोध और मालदा पर एक ही लोगों का चुप्पी कितना उचित ? एक दलित की आत्महत्या का राष्ट्रीय मुद्दा बनाना और कुछ लोगों द्वारा देश विरोधी नारों का समर्थन करना क्या संकेत करता है ?

       किसी देश की राजनीतिक और सामाजिक परिपक्वता,इस बात की ओर स्पष्ट रूप से संकेत कर देती है कि वह बुद्धिजीवी किसे मान रही है? भारत में एक आम धारणा प्रचलित हो गयी है कि बुद्धिजीवी वह है जो सरकार के हर काम का आलोचना करता है। यह धारणा कितना उचित है,इस सन्दर्भ में हमें नहीं पड़ना है क्योंकि यह अपरिपक्वता का ही संकेत देता है।

      दादरी में एक मुसलमान के ह्त्या के बाद जिस तरीके से साहित्य अकादमी समेत कई सरकार प्रदत्त पुरस्कारें लौटाई गयी और कुछ वामपंथियों,कुछ दलितों और कुछ अल्पसंख्यकों द्वारा फेसबुक समेत कई सोशल मीडिया के माध्यम से,इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से ऐसा मुहीम चलाया गया कि भारत में धार्मिक असहिष्णुता चरम पर है,इसके विरोध में जिसने भी आवाज उठाये या तो संघी करार दिया गया या सांप्रदायिक कहके तीखी आलोचना की गयी। परन्तु सच्चाई आज हमलोगों के सामने है कि हम भारतीय कितने सहिष्णु और उदार है कि सरकार के खिलाफ इतने विरोध के बावजूद भी सरकार और संघ जैसे संगठन ने संयम का काम लिया।

      एक सारगर्भित परिभाषा जो बुद्धिजीवी वर्ग की ओर इंगित करती है,वह सिविल सोसाइटी के रूप में दिया जा सकता है। डॉक्टर,इंजीनियर,वकील,जज,विचारक,शिक्षक,प्रोफेसर,वैज्ञानिक,समाजशास्त्री,राजनीतिवेत्ता आदि सभी ही बुद्धिजीवी वर्ग से संबंधित है। अगर इनमें से इका-दुका धार्मिक असहिष्णुता होने का बात करता है तो उसकी बातों में कितना सच्चाई है इसका पता लगाने का सबसे आसान तरीका है,उसकी पृष्टभूमि का पता लगाया जाए। साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि इनमें से कुछ द्वारा विरोध सहिष्णु भारत के अच्छे तस्वीर का चित्रण नहीं करता। एक तरह से इनकी बातें,इनके बयान और इनके अवार्ड वापसी रद्दी के टोकरी के अलावा कुछ नहीं है।

       जब मैंने भी सतही रूप से देखा और उस दौरान के घटनाओं को सुना तो लगाने लगा था कि सहिष्णु भारत की तस्वीर कुछ धूमिल हुयी है,लेकिन यह बात बहुत जल्द स्पष्ट हो गई कि सदियों से जिस सहिष्णुता रुपी  विरासत को संजोकर हमारे पुरखों ने हमें दिया है,वह जस का तस है,जिसका प्रमाण हमें मालदा में होने वाली घटना दे देती है कि दादरी के समय होने वाला घटनाक्रम कितना बनावटी और दिग्भ्रमित करने वाला था।

      ठीक ऐसा ही रूप हमें रोहित वेमुला नामक एक दलित के आत्महत्या के दौरान देखने को मिला। तमाम लोगों ने अपना खुद का पहचान छुपाकर अपना प्रोफाइल पिक तक बदल डाला और सवर्णों को निशाना बनाना शुरू कर दिया और समाज को कई स्तरों में बांटना शुरू कर दिया।

      ये संकीर्ण और नकारा लोग कितने मौकापरस्त होते हैं और कितने नमकहराम,मुझे तब मालूम चला जब जेएनयू में कुछ छात्रों द्वारा देश विरोधी नारे लगाए गए और देश की एकता और अखंडता को चुनौती दी गयी,तब या तो सभी जो दादरी और दलित आत्महत्या के दौरान सक्रिय नजर आ रहे थे उनमें से किसी ने विरोध में आवाज नहीं उठाया और जिसने उठाया भी तो अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन में।

      अगर ऐसा ही परिस्थिति बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सीधे-सीधे भारत की एकता को चुनौती दी जाने लगेगी,कई तरह के वामपंथ उग्रवाद पनपने लगेंगे और साथ ही आतंकी संगठनों का सक्रियता इन लोगों के माध्यम से होने लगेगा। तब न हम सुरक्षित रहेंगे और न ही हमारी आने वाली पीढ़ी। या तो हम बर्बाद हो जाएंगे या सीरिया जैसे खतरनाक गृहयुद्धों में फंस जाएंगे।

       यहीं वह समय है जब सख्ती से निपटा जाए,राष्ट्रवाद का परचम लहराया जाए और एक सशक्त भारत का निर्माण किया जाए।

       इसके लिए भारत सरकार को चाहे जो भी तरीका अपनाना पड़े - वह जेल की सजा देकर हो या कुछ और,कोई फर्क नहीं पड़ता।

      फासिस्म का मतलब समझाने का सही वक्त है,इनलोगों को बताना जरूरी है कि अगर भारत में सच में फासिस्म रहता तो इनका सर कलम कर दिया जाता और ये आज खुली हवा में सांस नहीं ले रहे होते और जेल का हवा खाते।

       जो लोग इसका बढावा दे रहे हैं उनको सीधा संकेत है कि इस तरह की गलती न करें देश की एकता और अखंण्डता को चुनौती नहीं दे,नहीं तो यह उन्हें एक दुर्भाग्यशाली अंत की ओर ले जाएगा।