Monday, 15 February 2016

सवर्ण और दलित को एक-दूसरे से नफ़रत क्यों है ?

        मैं इसका विश्लेषण एक वाकया से शुरू करता हूँ - बात उस समय की है,जब मैं अपनी दादी के मौत के बाद सामूहिक भोज के समय गाँव गया हुआ था,सभी भोज कर रहे थे। सवर्णों के साथ कुछ अवर्ण भी थे। मैंने देखा कि दुसाध जाति के कई व्यक्ति हमारे सामने राजपूत और ब्राह्मण के साथ बैठकर खाना खाए। एक क्षण के लिए लगने लगा कि पुरानी जाति-व्यवस्था टूट रही है।

       मैं एक ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखता हूँ और चुकि मेरे घर का यह कार्यक्रम था,इसलिए मैं और कुछ लोग मिलकर उन्हें खाना खिला रहे थे। सब कुछ सामान्य चल रहा था तभी कुछ समय उपरांत एक ऐसा व्यक्ति आता है जो मुझसे खाना का मांग करता है और वहाँ से गुजरने वाली सड़क पर ही बैठ जाता है मालूम नहीं क्यों वह छोटी नाली को पारकर मेरे द्वार पर नहीं आ रहा था ?

        मैं उससे उठने को बोलता हूँ और सभी के साथ खाने का आग्रह करता हूँ,वह तैयार भी हो जाता है और जाने के लिए उठता है,तभी गाँव का एक सदस्य वहाँ आते हैं और उस व्यक्ति को वहीं बैठने के लिए कहते हैं,साथ ही दबे शब्दों में मुझसे पूछते हैं - उसे छुआ तो नहीं,मैंने हाँ में जवाब दिया तो उन्होंने कहा तुम नहाकर आओ। तब मैंने पूछा कि क्यों ? तो उनका जवाब था - वह 'चमार' है। उसके बाद मैंने स्नान किया और सामूहिक भोज से दूरी बना ली।

        गाँव में अकसर ऐसी घटनाएँ होती रहती है,यह कोई नयी बात नहीं थी। अस्पृश्यता के खिलाफ कानून तो हमारे देश में उपलब्ध है,लेकिन उसे ग्राउंड लेबल तक लागू नहीं किया जा सका है जो एक अनावश्यक बुराई है।

        उस घटना के काफी दिनों बाद मैंने इसका विश्लेषण करने का मन बनाया कि क्या कारण है सवर्ण और अवर्ण का एक दूसरे से नफ़रत का ?

- पहला कारण जो बरबस ही ध्यान आ जाता है,वह है ऐतिहासिक जिसे अधिकांश दलित आज भी स्वीकार करते हैं जिसकी बू 'श्रम-विभाजन' पर आधारित उस 'वर्ण-व्यवस्था' से आती है जब शूद्र का प्रावधान किया गया था और उन्हें ऐसे कार्य करने के लिए नामांकित किया गया,जिसे अन्य वर्ग नहीं करते थे,जैसे - चमड़ा का काम,सेवा का काम,माली का काम,मैला साफ़ करने का काम।
हो सकता है कि ऐसा करने के लिए उन्हें प्राचीन समाज का प्रभु वर्ग(डोमिनेंट क्लास) मजबूर किया होगा ताकि उन्हें सस्ता और मुफ्त श्रम मिलता रहे और उन्हें बना-बनाये रोजगार। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था जड़ बन गयी और यथार्थ बन गयी,जिसका घिनौना रूप आज भी देखने को मिलता है। ऐतिहासिकता की आड़ में दलित अपनी आज की स्थिति का दोष सवर्णों को ही देते हैं।

- दूसरा कारण है,इनका रहन-सहन,जो आज के युग में काफी ज्यादा सामाजिक घटनाक्रम को प्रभावित कर रहा है। इनमें से एक है - बोलने की शैली,जैसे कि अरे बखोरना,अरे लटुआ आदि;एक उपयुक्त नाम होने के बावजूद भी ऐसे उपनाम से संबोधित करना वो भी असभ्य तरीके से चिल्लाकर,जिसकारण एक स्टैण्डर्ड स्थापित कर चुका सवर्ण इनसे नफ़रत करता है,दूर रहता है ताकि उनका प्रभाव उनके बच्चों पर न पड़े। यह यथार्थ भी है और सच्चाई भी।

किसी व्यक्ति के रहन सहन का चित्रण,उसके बोलने का शैली और भोजन पर निर्भर करता है। आज भी अधिकांश दलित और अवर्ण वर्ग का व्यक्ति अपने खाने में सूअर का सेवन धड़ल्ले से करता है साथ में मदिरा पान करके अजीब तरह का गालियाँ निकालता है। यह दूसरा वजह है क्योंकि अधिकांश सवर्ण सुअर से घृणा करता है और समाज में स्थापित अपनी जाति और प्रतिष्ठा के खिलाफ मानता है। इसी कारण डॉ आंबेडकर द्वारा भी इसे छोड़ने की सलाह दी गयी थी।

- तीसरा,सबसे ज्वलंत मुद्दा आरक्षण का है - जब कम योग्यता वाला वह स्थान ले जाता है तो ज्यादा योग्यता वाले को लगता है कि उसका हक़ मारा जा रहा है। यह समाजिक अलगाव से अलग का मसला है। दलित और आरक्षण प्राप्त लोग इसे आज जन्मसिद्ध अधिकार तक मानने लगे हैं। जो एक-दूसरे(सवर्ण और अवर्ण) के लिए नफरत का मैदान तैयार कर दिया है।

- चौथा और अंतिम कारण जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,वह है - दलितों द्वारा एक ही साथ सभी सवर्णों का विरोध मनुस्मृति की आड़ में करना,जबकि वास्तविकता यह है कि आज बहुत ऐसे सवर्ण हैं जो उनकी उत्थान और तरक्की के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं। दलितों द्वारा ऐसा करना उनके मन में खटास पैदा कर रहा है कि जिनके लिए हम काम कर रहे हैं वहीं हमें गाली दे रहे हैं जो अन्य सवर्णों को भी आगे आने से हतोत्साहित कर रहा है।