Tuesday, 9 February 2016

लोग फिर बिल से निकलने लगे

        कुछ दिन पहले दादरी में एक घटना हुई थी,जिसमें एक मुसलमान को गौमांस के नाम पर भीड़ द्वारा मार दिया गया। इसे मामला बनाकर कई साहित्यकार,लेखक,वैज्ञानिक और छद्म वामपंथी धर्मनिरपेक्ष विचारक अपने अवार्ड को लौटाकर नए सिरे से सदियों से चले आ रहे सहिष्णु भारत की तस्वीर को असहिष्णु करार दिया। ताज्जुब तब हुआ जब कुछ फ़िल्म स्टार इस कतार में आकर खड़े हो गए,किसी के बीबी को डर लगने लगा तो किसी को कुछ और।


        इस बात का अभी विश्लेषण नहीं हो पाया है कि क्या यह सुनियोजित था या एक द्वारा शुरुआत करने के बाद लोग धीरे-धीरे जुड़ते चले गए। उस दौरान होने वाली पूरी प्रक्रिया को देखकर उसे सुनियोजित तो नहीं माना जा सकता है लेकिन एक बात जिसपर सभी लोग सहमत होंगे वह कि हम अधिकांश भारतीयों में एक प्रवृति तेजी से पनप रही है,वह है भेड़चाल की प्रवृति जिसके तहत अगर एक भेड़ कुआं में गिरता है तो उसका अनुसरण कर सभी गिरते चले जाते हैं।

       वह एक ऐसा दौर था जब केंद्र की वर्तमान सरकार नए सिरे से देश के विकास की परिभाषा गढ़ रही थी,लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ रहा था अगर कोई कथित नकारात्मक बात निकल कर सामने आती तो मीडिया द्वारा उसे सनसनीखेज खबरों जैसा दिखाया जाता,इसी का फायदा उठाकर सभी अपने को सुर्ख़ियों में लाने का प्रयास किये। आज हममें से बहुत लोग उन लेखकों,कवियों और छद्म वामपंथियों,छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों के नाम जान गए,शायद जिसे आने वाले वर्षों तक नहीं जान पाते।

       ठीक इसी तरह का घटना हैदराबाद में भी हुआ,एक कथित दलित छात्र ने खुदखुशी कर ली तो मीडिया द्वारा एक टैग लाइन  प्रारंभ हुआ, 'एक दलित छात्र का मर जाना'। इस मुद्दे को जितना उछाला गया,जितना प्रचार किया गया और जितना संवेदनशील बनाकर पेश किया गया,वह अपने आप में ही घातक है,खतरनाक है और देशतोड़क है। परन्तु इसका कारण भी स्पष्ट है कि इसे भाजपा के एक नेता और संघ के छात्र संघ जोड़कर देखना शुरू किया गया। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी था जिसे जाने बिना हम पुरे मामले को नहीं समझ सकते। विश्लेषण केवल भाजपा और संघ के परिप्रेक्ष्य में किया गया और उस बात को नजरअंदाज कर दिया गया जिसमें आत्महत्या करने वाला कथित दलित रोहित वेमुला का कहना था कि आतंकी याकूब हर घर में पैदा होगा।

       अशोक वाजपेयी ने इसे लेकर फिर अपना एक डिग्री लौटा दिया अगर मजाकिया लिहाज में कहा जाए तो पूर्व की दादरी घटना की तुलना में इन्होंने बाजी मार ली। कई दलित भी अपनी उत्पीड़न की पुरानी कहानी लेकर सामने आ गए। इनमें से एक तो भाजपा से जुड़े नेता हैं और दूसरा यूजीसी के सुखदेव थोराट। अन्य कई हैं जिसके बयान को मीडिया ने ब्रेकिंग न्यूज़ बना दिया। इस पुरे मामले को दलित बनाम सवर्ण कर राजनीतिकरण किया गया और फायदा उठाने की जबर्दस्त कोशिश की गयी।

      समाजशास्त्रीय तरीके से देखने से आज यह लगने लगा है कि जो खाई दलितों और सवर्ण के बीच मिटटी नजर आ रही थी वह फिर से चौड़ी हो गयी है। जिस तरह का व्याख्या दलितों द्वारा किया गया उसे लेकर समाज का हर वर्ग अपनी स्थिति के बारे में सोचने के लिए मजबूर हो गया है। अब लड़ाई धीरे-धीरे आरक्षण की तरफ भी चला गया है। पुरे दलित की आलोचना लोग 'आरक्षण की वैशाखी' और 'दलित तमगा' वाला कहकर करने लगे हैं। कइयों द्वारा कहा गया कि इस तरह का रोना छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौंटे, जो सशक्त समाज के लिए एक सही संकेत है।