Sunday, 7 February 2016

भारत में अफ्रीकियों के साथ किया जाने वाला व्यवहार,शुभ संकेत नहीं

'डेढ़ घंटे तक दौड़ा-दौड़ा कर पीटती रही भीड़' यह कहना है उस तंजानियाई महिला का जिसके साथ यह घटना बेंगलुरु में हुयी। इसके बाद वह अपने दर्द को कुछ इस प्रकार बयां करती है,

"तंजानिया के ही तीन मित्रों के साथ जब मैंने डिनर का प्लान बनाया, तब जरा भी अंदाजा नहीं था कि मुझ पर क्या मुसीबत आने वाली है। रविवार की रात थी। सो मेरे सप्तगिरी स्थित घर के आस-पास कुछ ही दुकानें खुली थीं। ऐसे में हमने अपने दोस्त की लाल वैगन-आर से कहीं और जाने का फैसला किया। साढ़े सात बजे का समय था। हम आचार्य इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट की ओर बढ़े। कार चला रहे मेरे दोस्त ने सड़क पर एक अफ्रीकी युवक को भीड़ के हाथों पिटते देखा। उसने कार धीमी कर दी। जानना चाहा कि हो क्या रहा है? बस उसी समय मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। हमारी गलती इतनी थी कि कार भगा लेने के बजाय रुक गए। भीड़ के गुस्से को देखकर हमारे दो दोस्त भागने में कामयाब रहे। लेकिन हशीम और मैं इतनी भाग्यशाली नहीं थी। उग्र भीड़ ने हशीम को पकड़ कर घसीटना शुरू कर दिया। मैंने देखा कि लोग कार पर कुछ डाल रहे हैं। फिर एक ने कार पर जलती माचिस की तीली फेंकी। वैगन-आर धू-धू कर जलने लगी।बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि मैंने रिपोर्ट दर्ज कराने में इतनी देर क्यों की। दरअसल, उस रात मैं बेहद डरी हुए थी। अगले दिन सोमवार को जब रिपोर्ट दर्ज कराने की कोशिश की तो थाने में पुलिस वाले ने हम लोगों को रिपोर्ट लिखाने के लिए भागदौड़ करने के बजाय आराम करने को कहा। फिर मंगलवार को भी हमने कोशिश की। तब कहा कि रिपोर्ट दर्ज करने का उनके पास समय नहीं है, क्योंकि भीड़ अभी भी सड़कों पर है। जब यह खबर मीडिया में आई तब बुधवार को मेरी रिपोर्ट दर्ज की गई।"
      परन्तु यह घटना अपने तरह का पहला मामला नहीं है कि भीड़ द्वारा ऐसा हरकत किया गया है,इससे पहले दीमापुर में बलात्कार के एक आरोपी को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था,उसके बाद ऐसा ही बिहार के नालंदा में हुआ जब दो बच्चों का शव एक गढ्ढे में मिलने के बाद भीड़ ने स्कूल के प्रधानाचार्य को मार डाला। मैंने एक पुराने आलेख में इसका विश्लेषण किया था,जिसका कुछ अंश मैं यहाँ भी रख रहा हूँ,
"पुरी व्यवस्था और कानून से लोगों की आस्था तो नहीं डगमगा गया है?अगर ऐसा है तो देश के सामने बड़ी चुनौती पैदा होने वाली है,अभी यह 'आरोपी लोगों' तक ही सीमित है,हो सकता है आने वाले दिनों में यह अपनी सीमा लांघकर बुद्धिजीवी वर्ग,संसद और अदालत आदि के दरवाजों पर दस्तक दे दे। हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का विडियो,पोस्ट और इससे संबंधित आलेख का वायरल होना यह स्पष्ट कर देता है कि समाज की सोच तेजी से उस ओर आकर्षित हो रही है जो सभ्य समाज को प्रतिविंबित नहीं करती है। जरुरत है इसपर गंभीर समाजशास्त्रीय शोध की ताकि इसके कारणों को जानकर निराकरण किया जा सके।"      


       ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि हम भारतीय अफ्रीकियों को लेकर इतने संकुचित क्यों हैं? जब अंग्रेजों द्वारा हमें काला कहकर बुलाया जाता था और कुत्तों से तुलना किया जाता था तो हम अपने प्रति होने वाले भेदभाव को उजागर करते थे,समानता की बात करते थे,लेकिन आज हमें जब आजादी मिल गयी है,संविधान सभी को अधिकार दे दिया है तो भी हम अफ्रीकियों से केवल इस कारण नफ़रत कर रहे हैं कि वे हमसे ज्यादा काले हैं?

     मुझे याद है,जब पेरिस में आतंकी हमला होता है,एक कथित दलित छात्र आत्महत्या कर लेता है,अमेरिका में गोरे पुलिस द्वारा काले को गोली मार दी जाती है,उसके विरोध की धमक दिल्ली तक सुनाई देती है और लोग कैंडल मार्च निकालते हैं;जंतर-मंतर,इंडिया गेट पर मोमबत्तियाँ जलाकर सदभावना व्यक्त करते हैं,लेकिन हम सभी ऐसा क्यों नहीं करते जब भारत में किसी अफ़्रीकी मूल के लोगों के साथ बदसलूकी होता है?
       मैं यहां इसका विश्लेषण तो नहीं करूँगा क्योंकि आलेख का विस्तार काफी ज्यादा हो जाएगा,लेकिन एक बात जरूर ध्यान दिलाना चाहूंगा कि भारत में सामाजिक भेदभाव के अधिकांस मुद्दे राजनीतिक पार्टियों,सामाजिक संगठनों द्वारा तभी उठाये जाते हैं,जब उसका सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक फायदे दिख रहे हों,समय-समय पर इसे महशूश किया गया है। आज एक पार्टी के लाडले मरे हुए कथित दलित के जन्मदिन मनाने चले जाते हैं,कुछ दलित विचारक समाज को नए खाँचों में बांटना शुरू कर देते हैं,भारत के परिप्रेक्ष्य में संकीर्ण वामपंथी लोग छोटी सी घटना को तिल का ताड़ बना देते हैं क्योंकि इसके लाभ मिलने होते हैं। दादरी घटना पर हुयी राजनीतिक प्रोपगैंडा इसी का एक उदाहरण है,लेकिन मालदा तो सभी जनता को फिर से नया संकेत दे दिया कि ये लोग कितने मौकापरस्त और पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं। खैर,नहीं कहते-कहते बहुत कुछ कह दिया।

      भारत,जिसके प्रति अफ्रीकियों के मन में गाँधीजी के कारण भारी आस्था और श्रद्धा है। हाल के दिनों में होने वाली घटनाएँ जैसे कि राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर तीन अफ़्रीकी छात्रों के साथ मार-पीट,गोआ में जब एक नाइजीरियाई नागरिक की हत्या के बाद कुछ नाइजीरियाई नागरिकों ने उत्पात मचाया तो पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया फिर सभी को कुछ देर बाद रिहा कर दिया गया जिनकी संख्या 52 बतायी गयी थी। तो गोआ सरकार का कहना था कि इनको जेल भेजा जाना चाहिए था,इसके चलते अफ़्रीकी संबंध काफी कटु हो गये थे। इसी तरह का एक घटना राजधानी में ही आम आदमी पार्टी के पहली सरकार के दौर में घटा- जब एक मंत्री सोमनाथ भारती ने युगांडा की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया था तो अफ्रीकियों के मन में गांधी के भारत को लेकर शंका पैदा करेगा।
      अगर ऐसा ही होता रहा तो इन घटनाओं के चलते भारत और अफ्रीका संबंधों में दरार पड़ सकता है,साथ ही व्यापार पर भी असर पड़ सकता है,इन दिनों अफ्रीका भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बना हुआ है। खासकर ऐसे समय में जब भारतीय कंपनियाँ टाटा,भारती,महिंद्रा आदि अफ्रीका  देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। साथ ही अफ्रीका बड़े पैमाने पर भारत को तेल की आपूर्ति भी करता है और इसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी नाइजीरिया का ही है।

     अफ्रीका को लेकर मीडिया का रुख ठंडा ही रहा है। भारत-अफ्रीका समिट को मीडिया ने ख़ास तवज्जो नहीं दी थी,यह हाल तब का है जब इस सम्मलेन में 50 से ज्यादा राष्ट्राध्यक्षों ने भाग लिया था। यह मीडिया के मौकापरस्ती का नमूना ही पेश करता है कि टीआरपी के चक्कर में कितना असंवेदनशील हो गयी है।

      अगर इन सब कमियों,लोगों के नजरिया को जल्द ठीक करने का प्रयास नहीं किया गया तो रिश्ते की डोर नकारात्मक दिशा की ओर जाते देर नहीं लगेगा।