Monday, 29 February 2016

बजट : अर्थ और भारत में प्रक्रिया

बजट शब्द की उत्पति -
यह अंग्रेजी शब्द बोगेट से बना हुआ है। बोगेट की व्युत्पत्ति फ्रांसीसी शब्द बौउगेट से हुयी है। इसका आशय चमड़े की थैली से है। 

साधारणतः अर्थ - 
अगर सरल शब्दों में कहा जाए तो यह भविष्य में किये जाने वाले खर्च का हिसाब है जिसे हम वर्तमान में बनाते हैं। इसमें सरकार की नीतियों का स्पष्ट संकेत मिलता है। 

बजट का भारत में प्रक्रिया - 
भारत में सितंबर के महीना में प्रक्रिया की शुरुआत हो जाती है और इसके साथ ही केंद्रीय मंत्रालय के बजट विभाग के पास केंद्रीय केंद्रीय मंत्रालयों,राज्यों एवं स्वायत निकायों के खर्चे और आमदनी की जानकारी भेजी जाती है। 

संबंधित विभाग के मंत्री बजट की प्रमुख नीतियों को तय करते हैं,जैसे कि कहाँ रियायत देनी है,कहाँ लगाम लगानी है। साथ में ब्याज दरों व मूल्य व्यवस्था पर भी दिशानिर्देश तय होते हैं। 

जनवरी में विभिन्न राजनीतिक दलों,उद्योगों व संगठनों के साथ संबंधित मंत्रालय बात करता है। इसके बाद संबंधित विभाग के मंत्री अपने अधिकारियों के साथ बजट की नीतियों पर चर्चा करते हैं। 

बजट बनाने की प्रक्रिया अति गोपनीय होती है। बजट भाषण पूरा होने के सात दिन पहले से बजट से जुड़ी सभी अधिकारी और कर्मचारियों का बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं रहता है। 

बजट पेश किये जाने से दो दिन पहले प्रेस सूचना कार्यालय के अधिकारी विज्ञप्तियां बनाते है। संसद में बजट पेश किये से 10 मिनट पहले कैबिनेट को इसका संक्षिप्त रूप दिखाया जाता है। 

बजट का इतिहास - फास्ट फैक्ट 

- सात अप्रैल,1860 - भारत में पहली बार बजट पेश किया गया(अंग्रेज सरकार द्वारा)

- जवाहर लाल नेहरू बजट पेश करने वाले पहले प्रधानमंत्री बने,उन्होंने 1958-59 में बजट पेश किया। 

- आजाद भारत का पहला बजट पहले वित्तमंत्री षणमुखम चेट्टी ने 26 नवंबर,1947 को पेश किया। 

- सर्वाधिक दस बार बजट पेश करने का रिकॉर्ड मोरारजी देसाई को है। 

- भारतीय गणतंत्र का पहला बजट 28 फरवरी,1950 को जॉन मथाई ने पेश किया। 

- 2001 तक बजट शाम पांच बजे पेश किया जाता था,लेकिन यशवंत सिन्हा ने 2001 का बजट पेश करने के दौरान बजट भाषण का नया सुबह 11 बजे निर्धारित किया। 

(इस आलेख में बजट का अर्थ,प्रक्रिया और इससे संबंधित उन तमाम बातों को बताया गया है जो बजट पेश होने का आधार है,वर्तमान पेश बजट से संबंधित सभी विश्लेषण आगे के अन्य आलेख में किया जाएगा।)

Thursday, 25 February 2016

जेएनयू की घटनाओं का जम्मू काश्मीर में सरकार से तुलना कैसे ?

       एक महत्वपूर्ण सवाल जो आज कुछ लोगों के जुबान पर तैर रहा है,वह कि जो पार्टी अफजल को शहीद मानती है,उसी के साथ भाजपा का सत्ता सुख और जेएनयू में इसी से सबंधित नारा देश विरोधी कैसे ?

      चर्चित कहावत है कौन व्यक्ति कितना विद्वान है,उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह किस प्रकार का सवाल पूछता है। कभी-कभी तो रवीश कुमार जैसे 'वरिष्ठ पत्रकार' पर भी शक होने लगता है कि वह किसी गंभीर पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं।


इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि जम्मू-काश्मीर तथा जेएनयू का सन्दर्भ क्या है ?

अगर कोई दोनों जगह का तुलना करने का कोशिश करता है तो वह उसकी मूर्खता का पराकाष्टा है। दोनों जगह की परिस्थियाँ अलग है। जे & के एक ऐसा राज्य है जो प्रारंभ से ही संवेदनशीलता धारण किये हुए है,कई देशों से सीमाएं लगाने के कारण इसका महत्व और अधिक हो जाता है।

इस स्थिति में वहाँ एक सरकार की जरुरत थी जो राज्य के क़ानून व्यवस्था का स्थायित्व प्रदान कर सके,भाजपा द्वारा राज्य में इसी साध्य को पाने का एक प्रयास किया गया,जो अभी तक सफल होता हुआ दिखाई दे रहा है।

अगर कोई पार्टी अपने विचारधारा से समझौता कर ठीक अपने से विपरीत पार्टी से साथ गठबंधन की सरकार बनाती है,ताकि राज्य में घटने वाली खतरनाक घटनाओं पर काबू पाया जा सके जैसे कि अलगाववादी सक्रिय न हों,पाकिस्तान परस्त राजनीति अपना सर न उठाये,घाटी में काश्मीरी पंडितों को फिर से पुनर्वासित किया जा सके तो यह दूरदर्शिता का प्रतीक है,साथ ही राष्ट्रवादिता का पराकाष्टा है।

उन लोगों को समझना चाहिए जो वहाँ की घटनाओं का तुलना हाल में ही घटी जेएनयू की घटना से कर रहे हैं कि काश्मीर समस्या आज भारत के लिए प्रतिष्ठा का विषय बन गया है,साथ ही भारतीय विदेश नीति का यह एक विफलता रहा है कि आजादी के इतने दिनों बाद तक हम पाकिस्तान को ये बात नहीं समझा पाये कि काश्मीर भारत का ही अंग है। अगर सरकार के अभाव में वहाँ कोई भी ऐसी घटना घटित होती है जो केंद्र सरकार के नियंत्रण में नहीं तो यह भारत का अंतर्राष्ट्रीय साख को धूमिल करने जैसा होगा। 

भौगोलिक परिस्थिति और जनसांख्यिकी स्थिति को देखते हुए किसी एक पार्टी को विधानसभा में बहुमत मिलना मौजूदा समय में असंभव नहीं तो कठिन जरूर है,ऐसे में राज्य को सरकार विहीन नहीं रखा जा सकता था,फलस्वरूप भाजपा और पीडीपी दोनों को अपनी विचारधारा से समझौता करना पड़ा।

इसकारण कोई ऐसा सवाल ही नहीं बनता कि जेएनयू की घटना से तुलना किया जाए।

वहाँ बनी गठबंधन के सरकार को मई एक दूसरे नजरिये से भी देखता हूँ,जो है भाजपा काश्मीर में गठबन्धित सरकार के बदौलत अपनी पैठ पुरे राज्य में बनाने की कोशिश में है ताकि पर्याप्त बहुमत लाकर राज्य का स्थाई समाधान कर सके। ये अब देखने वाली बात होगी कि वह इसमें कितना सफल होती है। ऐसी परिस्थिति में आलोचना करना तो उस नासमझ की नासमझी है जो समझ नहीं पा रहे हैं। 

Tuesday, 23 February 2016

भाजपा का आलोचना कितना सही ?

पिछले लगभग एक साल से कई सवाल सुनकर कान पाक गए हैं;जैसे कि संघ अपनी विचारधारा को थोप रहा है;सत्ता परिवर्तन फासिस्म के उदय का प्रतीक है;धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है आदि।


ये कोई पहली बार नहीं है कि उपर्युक्त सवाल को उठाया गया हो। जब बाजपेयी की सरकार केंद्र में थी तो उस समय भी ऐसा ही सवाल उठाया जा रहा था। मैंने मंथन किया,विश्लेषण किया और समीक्षात्मक अध्ययन किया तो एक ही बात निकलकर सामने आयी,वह कि इतने सालों से वामपंथी विचारधारा वाले लोगों जिनका कब्जा देश के कई बड़े संस्थानों पर बना हुआ था,पुरानी सभी सरकारें उनको हथेली पर उठायी हुयी थी,लेकिन नई सरकार अपने नए एजेंडा के साथ इनके विचारों को ठुकरा दिया। जब संस्थानों में नई कमान दी गयी तो विचारधारा को थोपने का हवाला दिया गया। लेकिन इतने सालों तक जो इन संस्थानों पर कायम रहे वे क्या कर रहे थे ?

वामपंथियों के फासीवाद का मतलब है भाजपा,आरएसएस और नरेंद्र मोदी। उनके लिए स्कूलों में योग की शिक्षा फासीवाद है,सरस्वती वंदना भी फासीवाद है,उनके लिए अकादमीयों या सरकारी पदों से हटाया जाना फासीवाद है। दरअसल उनके लिए वामपंथी चौहद्दी से बाहर किसी भी तरह का कार्य फासीवाद है। लेकिन यह उनकी अपनी रोटी सेकने का जरिया है।

द्वितीय युद्ध के बाद फासीवाद और नाजीवादी ताकतों के हार के बाद मित्र राष्ट्रों द्वारा और वामपंथियों दवरा 'फासीवादी दर्शन' को जिस तरह से पेश किया गया,बताया गया और साथ ही उसके अच्छाइयों को नजरअंदाज कर केवल एक-दो मुद्दे पर ही बुराइयों को उजागर किया गया,और इसके गलत पृष्टभूमि को लिख दिया गया क्योंकि विजेता ताकतों को अपनी बात थोपने की शक्ति होती है उन्होंने अपने उपनिवेश में इसका गलत प्रचार किया और वैश्वीकरण के कारण एक बुरा परसेप्शन फासीवाद के खिलाफ हावी हो गया।

(अगला ब्लॉग जरूर पढ़े - हिटलर उतना बुरा नहीं था )

अगर इतिहास पर गौर करें तो 1942 से पूर्व रूस और वामपंथियों के लिए फासीवाद शक्तियां जर्मनी और इटली मित्र हुआ करती थी। द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों के खिलाफ इन्होने मिलकर युद्ध किया,लेकिन जब अचानक पुरे यूरोप को जितने के बाद जर्मनी ने 1942 में रूस पर हमला किया तो उसके बाद फासीवादी इनके लिए बुराई का प्रतीक हो गयी। इनके जैसा मौक़ा-परस्तों को अब क्या कहा जाए ?

ध्यान देने वाली बात है कि फासीवाद तानाशाही का ही प्रतीक है जिसका तुलना भारत में वर्तमान सरकार से करना नासमझी का हद है। इस हिसाब से साम्यवादी राज्यों को कल्याणकारी राज्य नहीं कह सकते,चीन और रुस आज के जमाने में एक नमूना है। अगर वहाँ इस तरह के देश विरोधी नारे लगाए गए होते इनका क्या हश्र होता बताने की जरुरत नहीं है।

धार्मिक असहिष्णुता बढ़ने की बात तो एक कोरी कल्पना था,चुकी इसपर मैं बहुत लिख चूका हूँ इसलिए यहां वर्णन करना जरूरी नहीं समझाता।

कुल मिलाकर कहा जाए तो भाजपा की आलोचना निराधार है,एक बनावटी बात है और अपनी सियासी बढ़त बनाने का एक जरिया है। 

Monday, 22 February 2016

मोदी जी 56 इंची छाती दिखाने का वक्त आ गया है

       आरक्षण को लेकर गुजरात का पटेल आंदोलन एक संकेत था,अब हरियाणा में जब जाटों ने उग्र रुख अख्तियार किया तो खतरे की घंटी है कि नौजवान के अंदर वह क्रोध उबल रहा है,जो बर्षों से अपने अंदर पाल रहे थे कि रोजगार को लेकर हमारे समकक्ष के जातियों की तुलना में भेदभाव किया जा रहा है। मोदी जी जेएनयू में दस-बारह लड़कों की राजद्रोह वाली हरकत थी लेकिन हरियाणा में तो असंख्य नौजवान है,क्या हार्दिक पटेल जैसा इनपर पर राजद्रोह का मुकदमा करेंगे ?

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       आपने जो जाटों के आरक्षण देने संबंधी पांच सदस्ययीय कमेटी बनायी है,अगर इसका फैसला हाँ में आता है तो पटेलों को क्यों नहीं दिया जा सकता ? क्या वे इतने उग्र नहीं हैं ? अगर ऐसा हो जाता है तो कामा,गुर्जर,मराठा,रेड्डी,भूमिहार आदि क्या चुप बैठेंगे ? शायद इनको भी जेल में डालने के लिए बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ेगा ताकि जेलों का आधारभूत ढांचा तैयार किया जा सके।

       परन्तु मुख्य सवाल है कि क्यों लोग आरक्षण को ताकत के बल पर लेना चाहते हैं,जो असहाय लोगों के उत्थान का एक जरिया है। तफ्तीश जरूरी है। ऐसे तो मैंने इसका व्याख्या कई आलेखों में किया है,लेकिन आज एक बार फिर करता हूँ।

      'आरक्षण' एक ऐसा शब्द है जो लेने वालों के लिए वरदान और नहीं लेने वालों के लिए अभिशाप जैसे विशेषणों के रूप में अपनी साख बना चुका है,जबकि संवैधानिक प्रावधान कुछ और ही कहता है,जो है - 'सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन'। इस संबंध में संविधान यह भी स्पष्ट करता है है कि आरक्षण को 'अनुच्छेद 16(4)-अवसर की समानता' का उल्लंघन नहीं माना जाएगा। लेकिन स्थितियाँ उलट हो गयी है।

जाट आंदोलन का एक दृश्य

      किसानी पर आश्रित जाति भूमिहार,पटेल,जाट,गुर्जर और कर्मकांड कराने वाले ब्राह्मण समुदाय के लोगों से भी आवाज उठाने लगी है। उच्च वर्ग जिन्हें दोषी बनाया गया है,आरक्षण प्राप्त वर्गों के पिछड़ेपन का,जबकि सामाजिक व्यावहारिकता बतलाता है कि आज के तत्कालीन युग में इनकी भी स्थिति बदतर हो गई है क्योंकि किसानी फायदे का सौदा नहीं रहा और समाज के टूटने के कारण कर्मकांड से आय का ब्राह्मणों के लिए वह साख नहीं रहा। काशीनाथ सिंह का उपन्यास 'काशी का अस्सी' एक सारगर्भित विश्लेषण करता है।

       एक तरह से कहा जाए तो पटेलों का आंदोलन,जाटों का आंदोलन आरक्षण लेने को लेकर नहीं है,क्योंकि इन्हें भी पता है कि उन्हें ओबीसी कोटे में शामिल नहीं किया जा सकता है,सुप्रीम कोर्ट का आदेश है और सरकार भी असहाय है। इसलिए इनका मूल मुद्दा है - आरक्षण देने की व्यवस्था का पुनर्गठन करने का,उसका समीक्षा करने का तथा उन वर्गों को बाहर निकालने का जो इसके हकदार नहीं है।

       दूसरे शब्दों में इसे इस रूप में देखा जा सकता है - गाँव का 'जाट बनाम यादव';'पटेल बनाम कुर्मी';'मराठा बनाम वंजारा';'जाट बनाम गुर्जर' की न सामाजिक हैसियत में फर्क है और न ही आर्थिक हैसियत में। फिर भी एक को आरक्षण और दूसरे को नहीं तो गाँव का नौजवान भड़केगा ही।
जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान की गयी आगजनी

         अतः आरक्षण के पैरोकारों नीतीश कुमार,लालू यादव,मायावती,मुलायम सिंह यादव सभी से गुजारिश है कि कुछ अन्य नेताओं जैसे नरेंद्र मोदी,राहुल गांधी,अरविंद केजरीवाल से मिलकर आरक्षण से संबंधित एक व्यवस्था बनाइये जिससे बार-बार उठने वाली उबाल को रोका जा सके।

         मोदी जी अभी तो कमेटियां और आयोग बनाने से कुछ हद तक संकट कम हुआ है,लेकिन उबाल जल्द आएगा अन्य वर्गों में भी। जो आपकी और आपकी पार्टी की चुनावी मजबूरी है उसे कुछ देर के किये नजरअंदाज करें,समाज को टूटने से बचाएं,नहीं तो समाज का हर जाति एक-दूसरे का दुश्मन बन जाएगा और महान व्यक्तिवादी विचारक हॉब्स के प्राकृतिक अवस्था जैसी स्थिति बन जायेगी,लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो जाएंगे जैसे - हरियाणा में सैनी और जाट समुदायों के बीच हो रहा है;फिर मजबूरी में 'लेवियाथन' का कॉन्सेप्ट लागू करना पड़ेगा और दमन पर उतरना पड़ेगा जो टिकाऊ नहीं है।

हरियाणा का जाट आंदोलन का एक दृश्य

         मोदी जी यहीं वह समय है कि आप अपनी 56 इंची छाती का कमाल दिखाएँ,तात्कालिक लाभ के लिए सामाजिक एकता को तोड़ने से बचाएँ और जो उहापोह की स्थिति बनी हुयी है कि उत्तर-प्रदेश के 2017 में होने वाली विधान सभा चुनाव में पश्चिमी यू.पी. के जाट के वोट से स्थति सुधरेगी,लेकिन ये भी ध्यान रखें कि हरियाणा की सरकार गैर जाटों की वोटों से ही चल रही है और वहाँ 'जाट बनाम गैर-जाट' का मुद्दा भी बन गया है।

        आपसे गुजारिश है,जो ओबीसी वाली आरक्षण की व्यवस्था है उसका पुनर्गठन किया जाए क्योकि उसमें अन्य जातियों को ठूंसा नहीं जा सकता,इसकारण आपके पास सिर्फ यहीं रास्ता है -
- गैर-दलित के लिए पुरे आरक्षण में कसौटी सिर्फ गरीबी की हो,जो गरीब है उसी को आरक्षण। सिर्फ गरीब के आरक्षण का फॉर्मूला ही मनोवैज्ञानिक,भावनात्मक तौर पर सभी के लिए स्वीरोक्तिपूर्ण होगी। इससे जातियों में न तो दुश्मनी बनेगी और न ही भेदभाव की स्थिति।
जहाँ तक अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान है उसे एक या दो पीढ़ी के लिए सीमित कर दिया जाए कि जो इसका फायदा उठा चुके हैं वो इसका अब लाभ पाने के हकदार नहीं हैं।
लेकिन इस सोच के लिए कलेजा चाहिए,राजनीतिक हिम्मत चाहिए। आखिर कब काम आएगी आपके 56 इंची छाती और उसमें धड़कता कलेजा ?   

Sunday, 21 February 2016

अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन लगाना कितना उचित था ?

अरुणाचल प्रदेश में नई सरकार बन चुकी है और कालीखो पूल राज्य के नए मुख्यमंत्री का शपथ लिए हैं जिन्होंने कांग्रेस के बागी विधायकों का नेतृत्व किया था। वहाँ राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को लेकर मामला अदालत में भी गया,हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने यथा स्थिति बनाये रखने के रुख में परिवर्तन करते हुए नए सरकार बनाने का आदेश दिया। 


परन्तु मुख्य सवाल जो उभर कर सामने आया है वह कि राष्ट्रपति शासन लगाना कितना उचित था ? सबसे पहले 1994 के बोम्मई केस का बात करते हैं जिसमें सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच अपने फैसले में केंद्र की ओर से अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग की बात का जिक्र किया था। उस केस में अदालत ने निम्न बातें कही थीं-
- पहला,राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 356 (1) के तहत किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा की वैधता न्यायिक समीक्षा के दायरे में है।   
- दूसरा,अनुच्छेद 74 (2) उन तथ्यों की जांच परख करने की राह में बाधक नहीं है जिसके आधार पर राष्ट्रपति किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा करने के लिए स्वयं संतुष्ट हुए थे।
- तीसरा,जब तक संसद के दोनों सदन राष्ट्रपति शासन की घोषणा को मंजूरी न दे दें तब तक अनुच्छेद 356 के खंड-1 के उपखंड (अ), (ब) और (स) के तहत राष्ट्रपति को यह अधिकार नहीं होगा कि वह अपनी शक्तियों का उपयोग कर कोई अपरिवर्तनीय कार्रवाई करें। इसी कारण से जब तक संसद के दोनों सदन राष्ट्रपति शासन की घोषणा को मंजूरी नहीं दे देते तब तक राष्ट्रपति राज्यपाल द्वारा विधानसभा भंग करने के कदम को वाजिब नहीं ठहरा सकते।
- चौथा,यदि राष्ट्रपति शासन लगाने की घोषणा को अवैध-अनुचित पाया जाता है तब संसद के दोनों सदनों की मंजूरी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। उसके बाद मामला कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में चला जाएगा। कोर्ट को अधिकार होगा कि वह राज्य में राष्ट्रपति शासन की घोषणा के पूर्व की स्थिति को बहाल करे। 
-पांचवा,अदालत के पास राष्ट्रपति शासन की घोषणा की वैधता को दी गई चुनौती के अप्रासंगिक होने और न्यायिक समीक्षा के व्यर्थ चले जाने से रोकने के लिए मामले की सुनवाई के दौरान राज्य में नए चुनाव पर रोक लगाने के लिए अंतरिम निषेधाज्ञा लागू करने का अधिकार होगा। 
- छठा,यथास्थिति बहाल करने के दौरान यह कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में होगा कि वह राहत की सीमा सुनिश्चित करे। 
-सातवां,सेक्युलरिज्म संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है। यदि किसी राज्य सरकार के आचरण से संविधान में निहित सेक्युलरिज्म की भावना चोटिल होती है तो यह विधिवत रूप से माना जाएगा कि राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार नहीं चल सकती है। 

अनुच्छेद 74 (2) जो कि राष्ट्रपति को दी गई सलाह की न्यायिक परीक्षण से रक्षा करता है, का अरुणाचल के मामले में आंशिक रूप से उल्लंघन किया गया।
क्या राजयपाल विधानसभा की बैठक बिना कैबिनेट की सलाह के बुला सकते थे? हमें कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए। 

कुतर्क कर लोग अपने को तार्किक कहने लगे हैं

लोगों को जब से अपना मत रखने का खुला मंच मिला है,अधकचरे ज्ञान और अल्प बुद्धि वाले भी राष्ट्रीय महत्व के विषयों,राष्ट्रीय मुद्दों पर ज्ञान बांटने लगे हैं,और लोगों को भड़काने लगे हैं। ऐसा तब से देखने को मिल रहा है,जब से सोशल मीडिया की पहुँच लोगों तक हुयी है। खैर आम जनता,साधारण नागरिक के लिए तो यह बात समझ से परे होती है,लेकिन जब पार्टियों के प्रवक्ता ऐसा करने लगे तो देश के लिए खतरा की घंटी तो है ही,साथ में लोगों को अवसाद पूर्ण करने का परिचायक भी है।

कुछ दिन पहले एक टीवी डिबेट में जदयू के प्रवक्ता कह रहे थे कि जब आतंकी हेडली के बातों पर यह भरोसा किया जा सकता है कि इशरत जहां आतंकी थी तो आजम खां के बातों पर क्यों नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब नवाज शरीफ से मिले तो वहाँ दाऊद भी था। अब इन मूर्ख शिरोमणी को कौन समझाए कि प्रमाण का सबसे बड़ा तकाजा होता है कि आरोपी जहां से ताल्लुक रखता है उसकी प्रमाणिकता वहाँ के किसी व्यक्ति द्वारा ही तय किया जाता है।

एक ऐसा ही इण्डिया न्यूज के एक शो जिसका होस्टिंग दीपक चौरसिया कर रहे थे,उसे मैं देख रहा था,यह शो उस समय का था जब नौ फरवरी को जेएनयू में देश-विरोधी नारे लगाए गए थे। अनिर्बन भट्टाचार्या नाम का एक व्यक्ति जो उस सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजकों में से एक था,जिसने कहा कि आंबेडकर ने जम्मू-काश्मीर के जनमत संग्रह का बात किये थे,क्या वे देशद्रोही हैं ?

परन्तु इनको समझना चाहिए कि भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता का वकालत किये थे,लेकिन जब चीन के समय युद्ध के दौरान मार्क्सवादी खेमा भारत पर ही अंगुली उठाने लगा तो उनके द्वारा संविधान का 16वां संशोधन देश की एकता और अखंडता को बनाये रखने के लिए लिया गया।

ऐसे-ऐसे कुतर्क तो भरा पड़ा है,गिनाने पर एक किताब ही लिखा जा सकेगा। ऐसी बातें करके ये लोग अपने को तार्किक इंसान को श्रेणी में रखने लगे हैं।

एनडीटीवी जो अपने आप को पिछड़ों का समर्थक और मानवाधिकार का झंडाबरदार बताता है साथ ही यह भी दावा करता है कि वह निष्पक्ष रिपोर्टिंग करता है। निधी कुलपति एनडीटीवी से संबंधित हैं,मैं इनका एक प्रोग्राम तब देखा जब एबीवीपी से जुड़े कुछ छात्र नेताओं ने इस्तीफ़ा दे दिया,वे उनमें से एक का साक्षात्कार कर रही थी,बार-बार एक सवाल दोहरा रही थी ताकि एबीवीपी के कुछ बुराई निकलकर सामने आ जाए,बीच में उन्होंने उस नेता का जाती भी पूछ लिया। परन्तु उस नेता ने ऐसा कोई बात नहीं कहा जिसमें एबीवीपी का गलती हो तो मन मसोसकर रह गयी। जाति के सवाल पर इस नेता का जवाब था कि संघ जाति के बारे में नहीं पूछता और अपनी जाति बताने को भी मना करता है।

अपनी राय व्यक्त करना कोई गुनाह नहीं है,लेकिन अच्छे तर्क देकर अपनी बातों को प्रमाणित तरीके से रखना,कई अलग-अलग परिस्थितियों की घटनाओं को एक में मिलाकर और एक-दूसरे से तुलना करना डिबेट और बहस के आत्मा को मार देता है;यह न तो कोई सीख दे पाता है और न ही समाज को शिक्षित कर पाता है,बल्कि गुमराह कर गर्त में ले जाता है।    

Wednesday, 17 February 2016

124A - राजद्रोह : निहितार्थ

आईपीसी की धारा 124A क्या है ? 
अपनी सुनवाई के दौरान डॉ. विनायक सेन ने यहीं सवाल जज से पूछा था,जवाब में जज ने कहा,"राजद्रोह,संविधान द्वारा स्थापित सत्ता के विरुद्ध भड़काव,दूसरे शब्दों में देशद्रोह है।"हालांकि बाद में इन्हें बरी कर दिया गया। 

राजद्रोह को लेकर फिर से एक नया बहस देश में चल रहा है जिसके केंद्र में जेएनयू के छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार है जिनपर देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया गया है और फिलहाल ये न्यायिक हिरासत में हैं। 


इस हालिया वाकया ने यह प्रश्न फिर से उठा दिया है कि धारा 124A का आज के समय में क्या प्रासंगिकता रह गयी है,जो उपनिवेशवादी शासन द्वारा 1860 में लागू 'भारतीय दंड संहिता' में प्रावधानित है,जिसका उद्देश्य आजादी के लड़ रहे स्वतंत्रता सेनानियों को अंकुश करना था। 

ब्रिटिश शासन के समय महात्मा गांधी को भी 1922 में इस धारा के तहत दोषी ठहराया जा चुका है। इस क़ानून के बारे में उन्होंने कहा था,"यह नागरिक के आजादी को दबाने का एक यंत्र है।"

124A के मुखालफत करने वालों द्वारा जोरदार तरीके से यह आवाज उठाया जा रहा है कि जब संविधान में अनुच्छेद 19(1) के तहत मिली आजादी पर अंकुश लगाने के लिए अनुच्छेद 19(2) उपलब्ध है तो आईपीसी की धारा 124A का क्या जरुरत है ? इनके अनुसार यह धारा राज्य को एक शक्ति दे देता है ताकि विचारों को दबा सके। 


दो जुदा विचार -

वहीं मानवाधिकार कार्यकर्त्ता गौतम नवलाखा का मानना है कि हिंसा का वकालत करना नहीं बल्कि उसे भड़काना देशद्रोह है। इस संबंध में वे एक उदाहरण देते हैं - पंजाब प्रांत के बलवंत सिंह नाम के एक शख्स का जिसने 'खालिस्तान जिन्दावाद' का नारा लगाया था लेकिन कोर्ट ने उसे यह कहकर बरी कर दिया कि उसके खिलाफ देशद्रोह का मामला बनता ही नहीं है। 

उधर भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और सुप्रीम कोर्ट में वकालत कर रहे अमिताभ सिन्हा का कहना है,"जिसे अदालत के फैसले के बाद फांसी हुयी,उसकी बरसी पर भारत विरोधी नारे लगे हैं,सरकार के विरोध में नारे लगाना और यह कहना कि कश्मीर भारत से अलग होना चाहिए,यह सीधे राष्ट्रद्रोह का मामला है।"


क्या कहता है धारा 124 क ?

राजद्रोह - जो कोई बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यप्रस्तुति द्वारा या अन्यथा भारत में विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमान पैदा करेगा, या पैदा करने का प्रयत्न करेगा, या असंतोष उत्तेजित करेगा या उत्तेजित करने का प्रयत्न करेगा वह आजीवन कारावास से, जिस में जुर्माना भी जोड़ा जा सकेगा या तीन वर्ष तक के कारावास से जिस में जुर्माना जोड़ा जा सकेगा, या जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा।"

धारा में वर्णित शब्द 'अवमान'(DISAFFECTION) का संबंध 'वफादारी न होने' से है और द्वेष के सभी भावनाओं से है। सुप्रीम कोर्ट ने 'श्रेया सिंघल वर्सेज भारत सरकार मामला' में  66 A पर अपने फैसले के तहत ADVOCACY(किसी का समर्थन) और INCITEMENT(उकसाना) में भी अंतर किया है।

धारा '124 क' को बाद में आये सुप्रीम कोर्ट के फैसले से बेहतर तरीके से समझा जा सकता है,इस संबंध सबसे पहला मामला जो ध्यान में आता है,वह है - 1962 का केदारनाथ सिंह बनाम बिहार राज्य का मामला,जिसमें शीर्ष अदालत के पांच जजों के पीठ ने कहा था,"देशद्रोह के तहत तभी सजा दिया जाएगा जब हिंसा के लिए भड़काया जा रहा हो या लोक अव्यवस्था हो गयी हो।" कुछ इसी तरह का 'इंद्रा दास बनाम असम राज्य मामला' में भी कहा।


निष्कर्ष -

अगर ताजा मामला को देखा जाए जिसका केंद्र जेएनयू में कुछ छात्रों द्वारा एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाना है और उसमें आपत्तिजनक नारे लगाए गए हैं जैसे - अफजल तेरे कातिल जिन्दा हैं,भारत के कई टुकड़े करेंगे आदि। इसे देखते हुए यहीं लगता है कि वहाँ उपस्थित भीड़ को उकसाने की कोशिश की जा रही है और यहां देशद्रोह का स्पष्ट मामला बनता है।     

Monday, 15 February 2016

सवर्ण और दलित को एक-दूसरे से नफ़रत क्यों है ?

        मैं इसका विश्लेषण एक वाकया से शुरू करता हूँ - बात उस समय की है,जब मैं अपनी दादी के मौत के बाद सामूहिक भोज के समय गाँव गया हुआ था,सभी भोज कर रहे थे। सवर्णों के साथ कुछ अवर्ण भी थे। मैंने देखा कि दुसाध जाति के कई व्यक्ति हमारे सामने राजपूत और ब्राह्मण के साथ बैठकर खाना खाए। एक क्षण के लिए लगने लगा कि पुरानी जाति-व्यवस्था टूट रही है।

       मैं एक ब्राह्मण जाति से ताल्लुक रखता हूँ और चुकि मेरे घर का यह कार्यक्रम था,इसलिए मैं और कुछ लोग मिलकर उन्हें खाना खिला रहे थे। सब कुछ सामान्य चल रहा था तभी कुछ समय उपरांत एक ऐसा व्यक्ति आता है जो मुझसे खाना का मांग करता है और वहाँ से गुजरने वाली सड़क पर ही बैठ जाता है मालूम नहीं क्यों वह छोटी नाली को पारकर मेरे द्वार पर नहीं आ रहा था ?

        मैं उससे उठने को बोलता हूँ और सभी के साथ खाने का आग्रह करता हूँ,वह तैयार भी हो जाता है और जाने के लिए उठता है,तभी गाँव का एक सदस्य वहाँ आते हैं और उस व्यक्ति को वहीं बैठने के लिए कहते हैं,साथ ही दबे शब्दों में मुझसे पूछते हैं - उसे छुआ तो नहीं,मैंने हाँ में जवाब दिया तो उन्होंने कहा तुम नहाकर आओ। तब मैंने पूछा कि क्यों ? तो उनका जवाब था - वह 'चमार' है। उसके बाद मैंने स्नान किया और सामूहिक भोज से दूरी बना ली।

        गाँव में अकसर ऐसी घटनाएँ होती रहती है,यह कोई नयी बात नहीं थी। अस्पृश्यता के खिलाफ कानून तो हमारे देश में उपलब्ध है,लेकिन उसे ग्राउंड लेबल तक लागू नहीं किया जा सका है जो एक अनावश्यक बुराई है।

        उस घटना के काफी दिनों बाद मैंने इसका विश्लेषण करने का मन बनाया कि क्या कारण है सवर्ण और अवर्ण का एक दूसरे से नफ़रत का ?

- पहला कारण जो बरबस ही ध्यान आ जाता है,वह है ऐतिहासिक जिसे अधिकांश दलित आज भी स्वीकार करते हैं जिसकी बू 'श्रम-विभाजन' पर आधारित उस 'वर्ण-व्यवस्था' से आती है जब शूद्र का प्रावधान किया गया था और उन्हें ऐसे कार्य करने के लिए नामांकित किया गया,जिसे अन्य वर्ग नहीं करते थे,जैसे - चमड़ा का काम,सेवा का काम,माली का काम,मैला साफ़ करने का काम।
हो सकता है कि ऐसा करने के लिए उन्हें प्राचीन समाज का प्रभु वर्ग(डोमिनेंट क्लास) मजबूर किया होगा ताकि उन्हें सस्ता और मुफ्त श्रम मिलता रहे और उन्हें बना-बनाये रोजगार। लेकिन समय के साथ यह व्यवस्था जड़ बन गयी और यथार्थ बन गयी,जिसका घिनौना रूप आज भी देखने को मिलता है। ऐतिहासिकता की आड़ में दलित अपनी आज की स्थिति का दोष सवर्णों को ही देते हैं।

- दूसरा कारण है,इनका रहन-सहन,जो आज के युग में काफी ज्यादा सामाजिक घटनाक्रम को प्रभावित कर रहा है। इनमें से एक है - बोलने की शैली,जैसे कि अरे बखोरना,अरे लटुआ आदि;एक उपयुक्त नाम होने के बावजूद भी ऐसे उपनाम से संबोधित करना वो भी असभ्य तरीके से चिल्लाकर,जिसकारण एक स्टैण्डर्ड स्थापित कर चुका सवर्ण इनसे नफ़रत करता है,दूर रहता है ताकि उनका प्रभाव उनके बच्चों पर न पड़े। यह यथार्थ भी है और सच्चाई भी।

किसी व्यक्ति के रहन सहन का चित्रण,उसके बोलने का शैली और भोजन पर निर्भर करता है। आज भी अधिकांश दलित और अवर्ण वर्ग का व्यक्ति अपने खाने में सूअर का सेवन धड़ल्ले से करता है साथ में मदिरा पान करके अजीब तरह का गालियाँ निकालता है। यह दूसरा वजह है क्योंकि अधिकांश सवर्ण सुअर से घृणा करता है और समाज में स्थापित अपनी जाति और प्रतिष्ठा के खिलाफ मानता है। इसी कारण डॉ आंबेडकर द्वारा भी इसे छोड़ने की सलाह दी गयी थी।

- तीसरा,सबसे ज्वलंत मुद्दा आरक्षण का है - जब कम योग्यता वाला वह स्थान ले जाता है तो ज्यादा योग्यता वाले को लगता है कि उसका हक़ मारा जा रहा है। यह समाजिक अलगाव से अलग का मसला है। दलित और आरक्षण प्राप्त लोग इसे आज जन्मसिद्ध अधिकार तक मानने लगे हैं। जो एक-दूसरे(सवर्ण और अवर्ण) के लिए नफरत का मैदान तैयार कर दिया है।

- चौथा और अंतिम कारण जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,वह है - दलितों द्वारा एक ही साथ सभी सवर्णों का विरोध मनुस्मृति की आड़ में करना,जबकि वास्तविकता यह है कि आज बहुत ऐसे सवर्ण हैं जो उनकी उत्थान और तरक्की के लिए जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं। दलितों द्वारा ऐसा करना उनके मन में खटास पैदा कर रहा है कि जिनके लिए हम काम कर रहे हैं वहीं हमें गाली दे रहे हैं जो अन्य सवर्णों को भी आगे आने से हतोत्साहित कर रहा है।     

Sunday, 14 February 2016

क्यों जेएनयू कैंपस में इस तरह की घातक राजनीति को पनाह मिली है ?

यह सवाल जो आज सभी भारतीय जुबान पर चहक कर बोल रहा है,परन्तु जवाब नहीं आ रहा है खासकर उनलोगों से जो ऐसा देशविरोधी हरकत कर रहे हैं। 


शिक्षण संस्थान को हम राजनीति का अड्डा नहीं बनने देंगे,ऐसा हमेशा सुनने में आता है,लेकिन क्या क्या शिक्षण संस्थान को राजनीति से अलग रखा जा सकता है ? जवाब है - नहीं। क्योकिं कोई इंसान कभी राजनीति से अलग हो ही नहीं सकता। महान विचारक अरस्तु का प्रसिद्ध वाक्य - मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है,इसी का पुष्टि करता है,जबकि वास्तविकता यह थी वहाँ राजनीति और सामाजिक घटनाएं आपस में इतना घुली-मिली थी कि अरस्तु के अनुसार समाज और राजनीति एक ही था।

अगर सिलसिलेवार तरीके से देखें तो जेएनयू में ऐसा नापाक हरकत होने की कई वजहें हैं -

- जेएनयू में 'राजनीतिक एक्टिविज्म' वहाँ के पाठ्यक्रम में शामिल है,यहीं कारण है कि वहाँ ऐसे तत्वों को फ़ौरन जमीन मिल जाती है।
- पुराने वामपंथी प्रोफेसरों ने वहाँ राजनीतिक प्रोपगैंडा को अकादमिक योगदान में बदल कर रख दिया है।
देश भर से आने वाले भोले-भाले अबोध युवा यह नहीं समझ पाते और वे समाज विभाजक,देश-विरोधी प्रोपगैंडा से सजे सिलेबस,साहित्य आदि को उच्च शिक्षा मानकर आत्मसात कर लेते हैं। यहीं है वहाँ यह विष फैलाने का रहस्य(एस.जयशंकर का आलेख,दैनिक जागरण)
- इसकी पुष्टि हाल में ही प्रकाशित के के मोहम्मद की आत्मकथा से भी हो जाती है कि जेएनयू के मार्क्सवादी इतिहास प्रोफेसरों ने देश को कितनी गहरी हानी की है।
- हमारे देश में स्वार्थी अज्ञानी नेताओं की गैर-जिम्मेदारी के कारण यह सब छिपा रहा,लेकिन वर्तमान सरकार ने जब इस सारे वाकये को उजागर किया और आज कठोर कार्रवाई करने का बात कर रही है तो उलटे चोर कोतवाल को डाँटे वाली कहानी नजर आ रही है।
नौकरी का खोज यहाँ का प्रमुख सेक्यूलर कार्य है तो हिन्दू विरोधी राजनीति प्रमुख मजहबी कार्य;जो आये दिनों देखने को मिलता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है,
"पड़ताल इस बात की होनी चाहिए कि जब से गैर सरकारी संगठनों की फंडिंग पर भारत सरकार ने सख्ती दिखाई है तब से ही इस तरह के वाकयात क्यों सामने आ रहे हैं। यह पूरा मसला हिन्दू या मुसलमान का नहीं है,बल्कि ये मसला राष्ट्रवादी और देशद्रोहियों के बीच का है।"  

बौद्धिक कोमा जल्द हावी हो जाएगा

      इसे क्या कहा जाए - अभिव्यक्ति की आजादी या इसके आड़ में देश की संप्रभुता की चुनौती ? जब देश की राजधानी का एक विश्वविद्यालय जहां हर तरह के देशी-विदेशी भारत निंदकों को सम्मानपूर्वक मंच मिलता है,किन्तु भारत के गृहमंत्री(पी. चिदंबरम) को बोलने नहीं दिया जाता है और इनके खिलाफ कैंपस में आंदोलन होता है,वहीं दूसरी ओर लेनिन,स्टालिन,माओ,अफजाल,याकूब,मकबूल के समर्थक में नारे लगाए जाते हैं।


      इससे पहले कुछ सवालों को जान लेना बहुत जरूरी है - भारत में बुद्धिजीवी किसे माना जाए ? दादरी पर विरोध और मालदा पर एक ही लोगों का चुप्पी कितना उचित ? एक दलित की आत्महत्या का राष्ट्रीय मुद्दा बनाना और कुछ लोगों द्वारा देश विरोधी नारों का समर्थन करना क्या संकेत करता है ?

       किसी देश की राजनीतिक और सामाजिक परिपक्वता,इस बात की ओर स्पष्ट रूप से संकेत कर देती है कि वह बुद्धिजीवी किसे मान रही है? भारत में एक आम धारणा प्रचलित हो गयी है कि बुद्धिजीवी वह है जो सरकार के हर काम का आलोचना करता है। यह धारणा कितना उचित है,इस सन्दर्भ में हमें नहीं पड़ना है क्योंकि यह अपरिपक्वता का ही संकेत देता है।

      दादरी में एक मुसलमान के ह्त्या के बाद जिस तरीके से साहित्य अकादमी समेत कई सरकार प्रदत्त पुरस्कारें लौटाई गयी और कुछ वामपंथियों,कुछ दलितों और कुछ अल्पसंख्यकों द्वारा फेसबुक समेत कई सोशल मीडिया के माध्यम से,इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से ऐसा मुहीम चलाया गया कि भारत में धार्मिक असहिष्णुता चरम पर है,इसके विरोध में जिसने भी आवाज उठाये या तो संघी करार दिया गया या सांप्रदायिक कहके तीखी आलोचना की गयी। परन्तु सच्चाई आज हमलोगों के सामने है कि हम भारतीय कितने सहिष्णु और उदार है कि सरकार के खिलाफ इतने विरोध के बावजूद भी सरकार और संघ जैसे संगठन ने संयम का काम लिया।

      एक सारगर्भित परिभाषा जो बुद्धिजीवी वर्ग की ओर इंगित करती है,वह सिविल सोसाइटी के रूप में दिया जा सकता है। डॉक्टर,इंजीनियर,वकील,जज,विचारक,शिक्षक,प्रोफेसर,वैज्ञानिक,समाजशास्त्री,राजनीतिवेत्ता आदि सभी ही बुद्धिजीवी वर्ग से संबंधित है। अगर इनमें से इका-दुका धार्मिक असहिष्णुता होने का बात करता है तो उसकी बातों में कितना सच्चाई है इसका पता लगाने का सबसे आसान तरीका है,उसकी पृष्टभूमि का पता लगाया जाए। साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि इनमें से कुछ द्वारा विरोध सहिष्णु भारत के अच्छे तस्वीर का चित्रण नहीं करता। एक तरह से इनकी बातें,इनके बयान और इनके अवार्ड वापसी रद्दी के टोकरी के अलावा कुछ नहीं है।

       जब मैंने भी सतही रूप से देखा और उस दौरान के घटनाओं को सुना तो लगाने लगा था कि सहिष्णु भारत की तस्वीर कुछ धूमिल हुयी है,लेकिन यह बात बहुत जल्द स्पष्ट हो गई कि सदियों से जिस सहिष्णुता रुपी  विरासत को संजोकर हमारे पुरखों ने हमें दिया है,वह जस का तस है,जिसका प्रमाण हमें मालदा में होने वाली घटना दे देती है कि दादरी के समय होने वाला घटनाक्रम कितना बनावटी और दिग्भ्रमित करने वाला था।

      ठीक ऐसा ही रूप हमें रोहित वेमुला नामक एक दलित के आत्महत्या के दौरान देखने को मिला। तमाम लोगों ने अपना खुद का पहचान छुपाकर अपना प्रोफाइल पिक तक बदल डाला और सवर्णों को निशाना बनाना शुरू कर दिया और समाज को कई स्तरों में बांटना शुरू कर दिया।

      ये संकीर्ण और नकारा लोग कितने मौकापरस्त होते हैं और कितने नमकहराम,मुझे तब मालूम चला जब जेएनयू में कुछ छात्रों द्वारा देश विरोधी नारे लगाए गए और देश की एकता और अखंडता को चुनौती दी गयी,तब या तो सभी जो दादरी और दलित आत्महत्या के दौरान सक्रिय नजर आ रहे थे उनमें से किसी ने विरोध में आवाज नहीं उठाया और जिसने उठाया भी तो अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन में।

      अगर ऐसा ही परिस्थिति बना रहा तो वह दिन दूर नहीं जब सीधे-सीधे भारत की एकता को चुनौती दी जाने लगेगी,कई तरह के वामपंथ उग्रवाद पनपने लगेंगे और साथ ही आतंकी संगठनों का सक्रियता इन लोगों के माध्यम से होने लगेगा। तब न हम सुरक्षित रहेंगे और न ही हमारी आने वाली पीढ़ी। या तो हम बर्बाद हो जाएंगे या सीरिया जैसे खतरनाक गृहयुद्धों में फंस जाएंगे।

       यहीं वह समय है जब सख्ती से निपटा जाए,राष्ट्रवाद का परचम लहराया जाए और एक सशक्त भारत का निर्माण किया जाए।

       इसके लिए भारत सरकार को चाहे जो भी तरीका अपनाना पड़े - वह जेल की सजा देकर हो या कुछ और,कोई फर्क नहीं पड़ता।

      फासिस्म का मतलब समझाने का सही वक्त है,इनलोगों को बताना जरूरी है कि अगर भारत में सच में फासिस्म रहता तो इनका सर कलम कर दिया जाता और ये आज खुली हवा में सांस नहीं ले रहे होते और जेल का हवा खाते।

       जो लोग इसका बढावा दे रहे हैं उनको सीधा संकेत है कि इस तरह की गलती न करें देश की एकता और अखंण्डता को चुनौती नहीं दे,नहीं तो यह उन्हें एक दुर्भाग्यशाली अंत की ओर ले जाएगा। 

Tuesday, 9 February 2016

लोग फिर बिल से निकलने लगे

        कुछ दिन पहले दादरी में एक घटना हुई थी,जिसमें एक मुसलमान को गौमांस के नाम पर भीड़ द्वारा मार दिया गया। इसे मामला बनाकर कई साहित्यकार,लेखक,वैज्ञानिक और छद्म वामपंथी धर्मनिरपेक्ष विचारक अपने अवार्ड को लौटाकर नए सिरे से सदियों से चले आ रहे सहिष्णु भारत की तस्वीर को असहिष्णु करार दिया। ताज्जुब तब हुआ जब कुछ फ़िल्म स्टार इस कतार में आकर खड़े हो गए,किसी के बीबी को डर लगने लगा तो किसी को कुछ और।


        इस बात का अभी विश्लेषण नहीं हो पाया है कि क्या यह सुनियोजित था या एक द्वारा शुरुआत करने के बाद लोग धीरे-धीरे जुड़ते चले गए। उस दौरान होने वाली पूरी प्रक्रिया को देखकर उसे सुनियोजित तो नहीं माना जा सकता है लेकिन एक बात जिसपर सभी लोग सहमत होंगे वह कि हम अधिकांश भारतीयों में एक प्रवृति तेजी से पनप रही है,वह है भेड़चाल की प्रवृति जिसके तहत अगर एक भेड़ कुआं में गिरता है तो उसका अनुसरण कर सभी गिरते चले जाते हैं।

       वह एक ऐसा दौर था जब केंद्र की वर्तमान सरकार नए सिरे से देश के विकास की परिभाषा गढ़ रही थी,लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ रहा था अगर कोई कथित नकारात्मक बात निकल कर सामने आती तो मीडिया द्वारा उसे सनसनीखेज खबरों जैसा दिखाया जाता,इसी का फायदा उठाकर सभी अपने को सुर्ख़ियों में लाने का प्रयास किये। आज हममें से बहुत लोग उन लेखकों,कवियों और छद्म वामपंथियों,छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों के नाम जान गए,शायद जिसे आने वाले वर्षों तक नहीं जान पाते।

       ठीक इसी तरह का घटना हैदराबाद में भी हुआ,एक कथित दलित छात्र ने खुदखुशी कर ली तो मीडिया द्वारा एक टैग लाइन  प्रारंभ हुआ, 'एक दलित छात्र का मर जाना'। इस मुद्दे को जितना उछाला गया,जितना प्रचार किया गया और जितना संवेदनशील बनाकर पेश किया गया,वह अपने आप में ही घातक है,खतरनाक है और देशतोड़क है। परन्तु इसका कारण भी स्पष्ट है कि इसे भाजपा के एक नेता और संघ के छात्र संघ जोड़कर देखना शुरू किया गया। लेकिन इसका दूसरा पहलू भी था जिसे जाने बिना हम पुरे मामले को नहीं समझ सकते। विश्लेषण केवल भाजपा और संघ के परिप्रेक्ष्य में किया गया और उस बात को नजरअंदाज कर दिया गया जिसमें आत्महत्या करने वाला कथित दलित रोहित वेमुला का कहना था कि आतंकी याकूब हर घर में पैदा होगा।

       अशोक वाजपेयी ने इसे लेकर फिर अपना एक डिग्री लौटा दिया अगर मजाकिया लिहाज में कहा जाए तो पूर्व की दादरी घटना की तुलना में इन्होंने बाजी मार ली। कई दलित भी अपनी उत्पीड़न की पुरानी कहानी लेकर सामने आ गए। इनमें से एक तो भाजपा से जुड़े नेता हैं और दूसरा यूजीसी के सुखदेव थोराट। अन्य कई हैं जिसके बयान को मीडिया ने ब्रेकिंग न्यूज़ बना दिया। इस पुरे मामले को दलित बनाम सवर्ण कर राजनीतिकरण किया गया और फायदा उठाने की जबर्दस्त कोशिश की गयी।

      समाजशास्त्रीय तरीके से देखने से आज यह लगने लगा है कि जो खाई दलितों और सवर्ण के बीच मिटटी नजर आ रही थी वह फिर से चौड़ी हो गयी है। जिस तरह का व्याख्या दलितों द्वारा किया गया उसे लेकर समाज का हर वर्ग अपनी स्थिति के बारे में सोचने के लिए मजबूर हो गया है। अब लड़ाई धीरे-धीरे आरक्षण की तरफ भी चला गया है। पुरे दलित की आलोचना लोग 'आरक्षण की वैशाखी' और 'दलित तमगा' वाला कहकर करने लगे हैं। कइयों द्वारा कहा गया कि इस तरह का रोना छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौंटे, जो सशक्त समाज के लिए एक सही संकेत है।      

Sunday, 7 February 2016

भारत में अफ्रीकियों के साथ किया जाने वाला व्यवहार,शुभ संकेत नहीं

'डेढ़ घंटे तक दौड़ा-दौड़ा कर पीटती रही भीड़' यह कहना है उस तंजानियाई महिला का जिसके साथ यह घटना बेंगलुरु में हुयी। इसके बाद वह अपने दर्द को कुछ इस प्रकार बयां करती है,

"तंजानिया के ही तीन मित्रों के साथ जब मैंने डिनर का प्लान बनाया, तब जरा भी अंदाजा नहीं था कि मुझ पर क्या मुसीबत आने वाली है। रविवार की रात थी। सो मेरे सप्तगिरी स्थित घर के आस-पास कुछ ही दुकानें खुली थीं। ऐसे में हमने अपने दोस्त की लाल वैगन-आर से कहीं और जाने का फैसला किया। साढ़े सात बजे का समय था। हम आचार्य इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूट की ओर बढ़े। कार चला रहे मेरे दोस्त ने सड़क पर एक अफ्रीकी युवक को भीड़ के हाथों पिटते देखा। उसने कार धीमी कर दी। जानना चाहा कि हो क्या रहा है? बस उसी समय मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। हमारी गलती इतनी थी कि कार भगा लेने के बजाय रुक गए। भीड़ के गुस्से को देखकर हमारे दो दोस्त भागने में कामयाब रहे। लेकिन हशीम और मैं इतनी भाग्यशाली नहीं थी। उग्र भीड़ ने हशीम को पकड़ कर घसीटना शुरू कर दिया। मैंने देखा कि लोग कार पर कुछ डाल रहे हैं। फिर एक ने कार पर जलती माचिस की तीली फेंकी। वैगन-आर धू-धू कर जलने लगी।बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं कि मैंने रिपोर्ट दर्ज कराने में इतनी देर क्यों की। दरअसल, उस रात मैं बेहद डरी हुए थी। अगले दिन सोमवार को जब रिपोर्ट दर्ज कराने की कोशिश की तो थाने में पुलिस वाले ने हम लोगों को रिपोर्ट लिखाने के लिए भागदौड़ करने के बजाय आराम करने को कहा। फिर मंगलवार को भी हमने कोशिश की। तब कहा कि रिपोर्ट दर्ज करने का उनके पास समय नहीं है, क्योंकि भीड़ अभी भी सड़कों पर है। जब यह खबर मीडिया में आई तब बुधवार को मेरी रिपोर्ट दर्ज की गई।"
      परन्तु यह घटना अपने तरह का पहला मामला नहीं है कि भीड़ द्वारा ऐसा हरकत किया गया है,इससे पहले दीमापुर में बलात्कार के एक आरोपी को भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला था,उसके बाद ऐसा ही बिहार के नालंदा में हुआ जब दो बच्चों का शव एक गढ्ढे में मिलने के बाद भीड़ ने स्कूल के प्रधानाचार्य को मार डाला। मैंने एक पुराने आलेख में इसका विश्लेषण किया था,जिसका कुछ अंश मैं यहाँ भी रख रहा हूँ,
"पुरी व्यवस्था और कानून से लोगों की आस्था तो नहीं डगमगा गया है?अगर ऐसा है तो देश के सामने बड़ी चुनौती पैदा होने वाली है,अभी यह 'आरोपी लोगों' तक ही सीमित है,हो सकता है आने वाले दिनों में यह अपनी सीमा लांघकर बुद्धिजीवी वर्ग,संसद और अदालत आदि के दरवाजों पर दस्तक दे दे। हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का विडियो,पोस्ट और इससे संबंधित आलेख का वायरल होना यह स्पष्ट कर देता है कि समाज की सोच तेजी से उस ओर आकर्षित हो रही है जो सभ्य समाज को प्रतिविंबित नहीं करती है। जरुरत है इसपर गंभीर समाजशास्त्रीय शोध की ताकि इसके कारणों को जानकर निराकरण किया जा सके।"      


       ध्यान देने वाली महत्वपूर्ण बात यह है कि हम भारतीय अफ्रीकियों को लेकर इतने संकुचित क्यों हैं? जब अंग्रेजों द्वारा हमें काला कहकर बुलाया जाता था और कुत्तों से तुलना किया जाता था तो हम अपने प्रति होने वाले भेदभाव को उजागर करते थे,समानता की बात करते थे,लेकिन आज हमें जब आजादी मिल गयी है,संविधान सभी को अधिकार दे दिया है तो भी हम अफ्रीकियों से केवल इस कारण नफ़रत कर रहे हैं कि वे हमसे ज्यादा काले हैं?

     मुझे याद है,जब पेरिस में आतंकी हमला होता है,एक कथित दलित छात्र आत्महत्या कर लेता है,अमेरिका में गोरे पुलिस द्वारा काले को गोली मार दी जाती है,उसके विरोध की धमक दिल्ली तक सुनाई देती है और लोग कैंडल मार्च निकालते हैं;जंतर-मंतर,इंडिया गेट पर मोमबत्तियाँ जलाकर सदभावना व्यक्त करते हैं,लेकिन हम सभी ऐसा क्यों नहीं करते जब भारत में किसी अफ़्रीकी मूल के लोगों के साथ बदसलूकी होता है?
       मैं यहां इसका विश्लेषण तो नहीं करूँगा क्योंकि आलेख का विस्तार काफी ज्यादा हो जाएगा,लेकिन एक बात जरूर ध्यान दिलाना चाहूंगा कि भारत में सामाजिक भेदभाव के अधिकांस मुद्दे राजनीतिक पार्टियों,सामाजिक संगठनों द्वारा तभी उठाये जाते हैं,जब उसका सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक फायदे दिख रहे हों,समय-समय पर इसे महशूश किया गया है। आज एक पार्टी के लाडले मरे हुए कथित दलित के जन्मदिन मनाने चले जाते हैं,कुछ दलित विचारक समाज को नए खाँचों में बांटना शुरू कर देते हैं,भारत के परिप्रेक्ष्य में संकीर्ण वामपंथी लोग छोटी सी घटना को तिल का ताड़ बना देते हैं क्योंकि इसके लाभ मिलने होते हैं। दादरी घटना पर हुयी राजनीतिक प्रोपगैंडा इसी का एक उदाहरण है,लेकिन मालदा तो सभी जनता को फिर से नया संकेत दे दिया कि ये लोग कितने मौकापरस्त और पूर्वाग्रह से पीड़ित हैं। खैर,नहीं कहते-कहते बहुत कुछ कह दिया।

      भारत,जिसके प्रति अफ्रीकियों के मन में गाँधीजी के कारण भारी आस्था और श्रद्धा है। हाल के दिनों में होने वाली घटनाएँ जैसे कि राजीव चौक मेट्रो स्टेशन पर तीन अफ़्रीकी छात्रों के साथ मार-पीट,गोआ में जब एक नाइजीरियाई नागरिक की हत्या के बाद कुछ नाइजीरियाई नागरिकों ने उत्पात मचाया तो पुलिस ने इन्हें गिरफ्तार कर लिया फिर सभी को कुछ देर बाद रिहा कर दिया गया जिनकी संख्या 52 बतायी गयी थी। तो गोआ सरकार का कहना था कि इनको जेल भेजा जाना चाहिए था,इसके चलते अफ़्रीकी संबंध काफी कटु हो गये थे। इसी तरह का एक घटना राजधानी में ही आम आदमी पार्टी के पहली सरकार के दौर में घटा- जब एक मंत्री सोमनाथ भारती ने युगांडा की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया था तो अफ्रीकियों के मन में गांधी के भारत को लेकर शंका पैदा करेगा।
      अगर ऐसा ही होता रहा तो इन घटनाओं के चलते भारत और अफ्रीका संबंधों में दरार पड़ सकता है,साथ ही व्यापार पर भी असर पड़ सकता है,इन दिनों अफ्रीका भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बना हुआ है। खासकर ऐसे समय में जब भारतीय कंपनियाँ टाटा,भारती,महिंद्रा आदि अफ्रीका  देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। साथ ही अफ्रीका बड़े पैमाने पर भारत को तेल की आपूर्ति भी करता है और इसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी नाइजीरिया का ही है।

     अफ्रीका को लेकर मीडिया का रुख ठंडा ही रहा है। भारत-अफ्रीका समिट को मीडिया ने ख़ास तवज्जो नहीं दी थी,यह हाल तब का है जब इस सम्मलेन में 50 से ज्यादा राष्ट्राध्यक्षों ने भाग लिया था। यह मीडिया के मौकापरस्ती का नमूना ही पेश करता है कि टीआरपी के चक्कर में कितना असंवेदनशील हो गयी है।

      अगर इन सब कमियों,लोगों के नजरिया को जल्द ठीक करने का प्रयास नहीं किया गया तो रिश्ते की डोर नकारात्मक दिशा की ओर जाते देर नहीं लगेगा।  

Saturday, 6 February 2016

मनरेगा का दस साल


दो फरवरी,2006 को लागू होने के बाद महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी क़ानून यानी मनरेगा ने अपना दस साल का सफर पूरा कर लिया है। यह एक ऐसा क़ानून था जो समाज के सभी वर्गों और सभी विचारधाराओं के लोगों को किसी-न-किसी रूप में प्रभावित किया। पीआईबी के एक खबर पर गौर करें तो अब तक मनरेगा का व्यापक प्रसार हुआ है,जिसे संक्षेपतः इस प्रकार कहा जा सकता है,

"इस कार्यक्रम की शुरुआत से अब तक इस पर 3,13,844.55 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसमें से 71 प्रतिशत राशि श्रमिकों को पारिश्रमिक देने में खर्च हुई है। श्रमिकों में से अनुसूचित जाति के श्रमिकों की संख्या 20 प्रतिशत बढ़ी है। जबिक अनुसूचित जनजाति के श्रमिकों की संख्या में 17 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस तरह 1980.01 करोड़ रुपये के मानव दिवस सृजित किए गए। इसमें से महिला श्रमिकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। यह संवैधानिक न्यूनतम संख्या से 33 प्रतिशत अधिक है।"
        आज जब मनरेगा को लागू किये एक दशक का समय पूरा हो गया है तो हमें तीन सवालों का जवाब तलाशने का कोशिश करना चाहिए।
पहला,जिस उद्देश्य के लिए मनरेगा क़ानून को लाया गया था,क्या इसने अपनी भूमिका निभाई ?
दूसरा,मनरेगा को लेकर सरकार का रवैया कैसा है ? और
तीसर,क्या हमें अभी भी इस क़ानून की जरुरत है ?

       हम मनरेगा के प्रदर्शन का दो तरह से मूल्यांकन कर सकते हैं। एक,क्या इसने ग्रामीण परिवारों के आजीविका को बढ़ाया ? और दूसरी,क्या इसके जरिये ग्रामीण सशक्तिकरण हो पाया ?

       आंकड़ों पर गौर करें तो यह योजना हर साल एक चौथाई परिवारों को 40-50 दिनों तक रोजगार उपलब्ध कराती है। लेकिन दूसरी तरफ ग्रामीण सशक्तिकरण को लेकर लोगों का मत बंटा हुआ है क्योकि इसके क्रियान्वयन को लेकर अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न तरीका है। फिर भी इसके मुख्य सफलता जिस पर अधिकांश लोग सहमत है;वह है कि इसके चलते ग्रामीण मजदूरी में बढ़ोतरी हुयी है,ये मजदूर अपने अधिकारों को समझने लगे हैं और काम के घंटों का विशेष ध्यान रखने लगे हैं जो एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
       एक अन्य उपलब्धि जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,वह है - इसने महिलाओं को काम का महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराया है और लैंगिक समानता को बढ़ावा दिया है। इसके अभाव में ये अधिकांस बेरोजगार थी।

        ताजा तरीन आंकड़ें स्पष्ट करते हैं कि मनरेगा ने गाँवों से शहरों की ओर पलायन की गति को भी धीमा किया है। ग्रामीण परिदृश्य को बदला है;जल-संरक्षण,भूमि विकास के कामों के जरिये इसने प्राकृतिक संसाधनों को नया रूप दिया है\ गरीबी को काफी ज्यादा कम किया है। एक सर्वे में बताया गया है कि इसके बदौलत दलितों में 38% और आदिवासियों में 28% गरीबी में कमी आयी है। ये सभी मनरेगा की अन्य उपलब्धियाँ हैं।

आज मनरेगा किस हालत में है ?
         इसके उपलब्धियों को देखते हुए इस सवाल का समीक्षा करना बेहद जरूरी हो जाता है। रोजगार के कुल श्रम दिवसों की संख्या वित्तवर्ष 2013-14 में 220 करोड़ की तुलना में 2014-15 में घटकर 166 करोड़ हो गई। वर्तमान सरकार इसके प्रति ढुलमुल रवैया अपनाये हुए है। 2014-15 के योजना में इसके बजट को कम कर दिया गया। जो इस क़ानून के मूल उद्देश्य को प्रभावित कर सकता है।
राज्यों की स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि जनवरी,2016 तक 14 राज्यों के फंड बैलेंस नकारात्मक दर्शा रहे हैं। कुल मिलाकर कहा जाए तो इसे लागू करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति और क़ानून पर विश्वास क्षीण हुआ है।

मनरेगा की आलोचना
         मनरेगा की आलोचना मूल रूप से दो बातों के लिए की जाती है। एक,इस योजना में भारी पैमाने पर रिसाव है यानी हर स्तर पर भ्रष्टाचार तथा दूसरी,इसमें काम के नाम पर गढ्ढे खोदे जाते हैं और भरे जाते हैं,जो एक हद तक सही भी हो सकता है।
       लेकिन पूर्ववर्ती सरकार द्वारा लाया गया डीबीटी और वर्तमान सरकार का महत्वाकांक्षी जन धन योजना रिसाव को तो कम कर दिया है। लेकिन दूसरी आलोचना,जिसकी सच्चाई पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता,इस क़ानून की उपयोगिता को देखते हुए सुधार की तत्काल जरुरत है।

अंततः,भारत में बेरोजगारी का स्तर,गरीबी की स्थिति और भूमिहीन मजदूरों,सीमांत किसानों की दशा को देखते हुए,यह जरूरी है कि इसका परिचालन पुरे राजनैतिक इच्छाशक्ति और क़ानून पर विश्वास रखके किया जाए। तभी मूल उद्देश्य को पाया जा सकेगा।       

Tuesday, 2 February 2016

'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' कितना कारगर...?

यह बिज़नेस सन्देश मैगज़ीन के जनवरी एडिशन में प्रकाशित हो चूका है। 



           किसानों के कल्याण के लिए मोदी सरकार का यह एक महत्वाकांक्षी योजना है। सरकार द्वारा ऐसा दावा किया जा रहा है कि इस नए फसल बीमा में पुरानी सभी योजनाओं के अच्छे पहलू को शामिल किया गया है साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि उन योजनाओं में जो खामियां रह गयी थी उसे दूर करने का प्रयास किया गया है। इसके आने के साथ ही यह बहस का विषय बन गया है,और कई लोग इस योजना को राजनीति से प्रेरित मान रहे हैं लेकिन राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाए तो जानकारों का मानना है,असल में यह एक कारगर योजना साबित होगी अगर इसके पहलुओं को उचित तरीके से लागू किया जाए।

         परन्तु सवाल जो उभरकर सामने आ रहे हैं,वह है कि मौजूदा समय में फसल बीमा की पहुँच मात्र 23% है,जिसे 50% किसानों तक पहुंचाया जा सकेगा? जो इस नए बीमा योजना का मुख्य लक्ष्य भी है। खासकर वैसी स्थिति में जब किसानों में से अधिकांस सीमान्त और काफी गरीब तबके से ताल्लुक रखते हैं,ये लगभग किसी भी फसल मौसम चाहे वह रबी हो,या खरीफ हो,या जायद,में समयानुसार बीज-उर्वरक आदि का खरीददारी नहीं कर पाते हैं और जो महाजनों से कर्ज लेकर ऐसा कर भी लेते हैं,तो उनके पास बीमा कराने के लिए पर्याप्त धन नहीं बचता,जो एक अनावश्यक बुराई है।

         इस योजना को खरीफ 2016 से लागू किया जाना है,इस समयावधि को देखते हुए हमलोगों और सरकार के पास अभी पर्याप्त समय है। इस समय का इस्तेमाल एक महत्वपूर्ण हथियार के रूप में किया जा सकता है। किसानो की पहुँच इस नयी फसल बीमा योजना तक पहुंचाने,इसपर विश्वास करने तथा किसानों के कल्याण के लिए उन्हें रास्ता दिखाने का जो चिर-परिचित माध्यम हमारे सामने है,वह है-एटीच्यूड चेंज अर्थात अभिवृत्ति बदलाव। यहीं वह माध्यम है,जिसके बदौलत 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' से किसानों की दुर्दशा को ठीक स्तर पर लाया जा सकेगा। एटीच्यूड चेंज कोई नया माध्यम नहीं है बल्कि इसका इस्तेमाल पहले भी किया जा चुका है और समाज में कई तरह के बदलाव को लाया गया है और कई को लाने का प्रयास भी किया जा रहा है। इसे हम कई उदाहरणों से समझ सकते है। प्राचीन काल से हम सभी भारतीय खुले में शौच करते आ रहे हैं,जिसकारण हमारी अभिवृत्ति ऐसी हो गयी है कि शौचालय होते हुए भी हम उसका उपयोग नहीं करते। सीधे नज़रों से देखने से तो ऐसा लगता है कि इनलोगों की इसप्रकार की मानसिकता बदलेगी काफी मुश्किल है,लेकिन जब सरकार द्वारा कई सेलिब्रिटी जैसे-विद्या बालन,अमिताभ बच्चन,सचिन तेंदुलकर आदि के माध्यम से इसके होने वाले नुकसान और फायदे को उजागर कराया गया तो बाहर शौच जाने वाले लोगों में आश्चर्यजनक कमी देखने को मिली। एक दूसरा उदाहरण 'गिव इट अप' स्कीम का है,जो मार्च 2015 में लागू हुआ था। इस स्कीम का मुख्य मकसद स्वेक्षा से एलपीजी उपभोक्ताओं के सब्सिडी को छोड़वाना था,जो बिना सब्सिडी के बदौलत ही उपयोग करने में सक्षम हैं। टेलीविजन,रेडिओ,मन की बात आदि के माध्यम से सरकार द्वारा लोगों की अभिवृत्ति बदलने का जोरदार प्रयास किया गया। 'अगर आप सब्सिडी छोड़ देते हैं,तो सरकार इन पैसों का उपयोग उनलोगों के लिए करेगी जो आज भी धुँआ में खाना बनाने को मजबूर हैं।' यह वाक्य लोगों पर जादुई असर किया और आज 57 लाख एलपीजी उपभोक्ताओं ने अपनी सब्सिडी स्वेक्षा से छोड़ दी है,जिससे सरकार का 940 करोड़ रुपये का राजस्व बचा है। तीसरा उदाहरण मिड-डे-मिल का ले सकते हैं,इस योजना के तहत सभी समुदाय के बच्चे एक साथ खाना खाते हैं। कहीं दलित रसोइया खाना बनाकर ब्राह्मण,राजपूत जैसे सवर्ण जातियों के बच्चों को खाना खिलाती है। जब प्रारंभ से ही बच्चों में इस तरह के मूल्य का विकास करके अभिवृत्ति को बदला जा रहा है कि सभी बराबर है। जो सरकार का दूरदर्शिता है,जिससे आने वाले दिनों में समाज के अंदर के जाति-व्यवस्था का पतन होगा और एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण होगा।

      ठीक इसी प्रकार का अभियान सरकार द्वारा चलाने की जरुरत है। किसानों को इस बीमा योजना के फायदे को इंगित कराने की आवश्यकता है। इस स्कीम से होने वाले लाभों जैसे कि खरीफ फसलों पर प्रीमियम 2% और रबी पर प्रीमियम 1.5% है,जो पहले के अपेक्षा काफी कम है;प्राकृतिक आपदा हो या स्थानीय आपदा,सभी से हुए नुकसान पर दावा हासिल किया जा सकेगा;कटाई के 14 दिन तक हुए नुकसान का भी दावा हासिल किया जा सकेगा;इन सभी नुक्सान का आकलन तकनीक प्रयोग द्वारा किया जायेगा,स्मार्ट फोन के माध्यम से आंकड़ों को अपलोड किया जाएगा जिससे गलती होने की संभावना कम होगी आदि को कई विज्ञापनों के माध्यम से,सेलिब्रेटियों के माध्यम से,भारत सरकार अपने चैनल के माध्यम से ,अखबारों में इस्तेहार देकर और स्थानीय स्तर-ब्लॉक,गाँवों,जिला स्तर पर पोस्टर लगवाकर,जिलाधिकारियों को यह निर्देश देकर कि लाउडस्पीकर के माध्यम से हर किसान तक इसका जानकारी पहुंचाया जाए। अगर उपर्युक्त सभी उपायों का इस्तेमाल किया जाएगा तो निश्चित रूप से किसानों की अभिवृत्ति को सरकार बदल देगी। जो किसान कर्ज लेकर खेती करते होंगे वे ज्यादा कर्ज लेंगे ताकि बीमा कराकर फसल बर्बादी के बाद कर्ज की चंगुल में फंसने से बच सके। अंततः इस योजना को कारगर बनाया जा सकेगा और किसानों तक पहुंचाया जा सकेगा।
   
      'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' का पूरा विश्लेषण करने का प्रयास किया जाए तो,इससे कई पहलू निकलकर सामने आते हैं। यह योजना आत्महत्या को लेकर मजबूर किसानों को मदद पहुंचाएगी। कैपिंग जैसे विवादास्पद प्रावधान को इस योजना से पूरी तरह हटा दिया गया है, जिससे किसानों को फ़ायदा होगा जबकि पहले इसके चलते बीमित राशि कम हो जाती थी। 
      इस नयी योजना में फसलों की बुआई से लेकर खलिहान तक को समेट लिया गया है,जो इसे अपने आप में अनोखा बनाता है। अब लंबे समय तक क्लेम को लेकर इन्तेजार नहीं करना होगा,प्राकृतिक आपदा के बाद 25% क्लेम सीधे संबंधित किसानों के खाते में चला जाएगा। 
       इस पूरी योजना को लागू करने में केंद्र और राज्य दोनों को बराबर हिस्सेदार बनाया गया है। निष्पक्ष रूप से कहा जाए तो  'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' पूरी तरह किसानों के पक्ष में है,जो उनके कल्याण के लिए रामवाण साबित होगी। 

अगर सरकार फसल बीमा के क्षेत्र में दीपक मोहंती समिति के सिफारिश को मान लेती है,जो है-फसल बीमा को छोटे और माध्यम किसानों के लिए अनिवार्य बनाया जाए,तो किसानों की तकदीर और तस्वीर दोनों बदली जा सकेगी।