Saturday, 9 January 2016

दक्षिणपंथ और वामपंथ का समझ

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
       विचारधाराएँ तो विश्व में हमेशा से रही है। इन विचारधाराओं,सिद्धांतों,व्यक्तियों,नीतियों तथा कार्यप्रणालियों को एक विशेष प्रारूप के तहत विभाजित करने का सिलसिला 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी के प्रारंभ में शुरू हुआ,जो वामपंथ,दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग पर आधारित है। इन शब्दों का सही अर्थ हम तभी समझ सकते हैं जब सारे पूर्वाग्रह को मन से हटा दिया जाए और ऐसा मानकर चला जाए कि समाज एक ऐसा उपक्रम है,जहाँ विचारों की गतिशीलता और तर्क-वितर्क का दौर हमेशा चलते रहता है।
        इनमें से वामपंथ एक ऐसा प्रारूप है,जिसमें वे सभी विचारधाराएँ आ जाती है जिनमें परिवर्तन,निरंतर परिवर्तन तथा अतीत एवं परंपरा से भविष्य की ओर जाने का आग्रह रहता है। इनका विश्वास है कि इसे एक सफल क्रान्ति द्वारा ही पाया जा सकता है। इस तरह हम समाजवाद और साम्यवाद को इसके ज्यादा नजदीक पाते हैं,जो आजकल अति प्रसिद्धि प्राप्त किये हुए है।
        एक अन्य प्रारूप मध्यमार्गियों का है,जो परिवर्तन की प्रक्रिया को स्वीकार तो करता है,लेकिन इसकी कोशिश यह रहती है कि परिवर्तन की गति को धीमा ही रखा जाए। साथ ही यह अतिवाद से डरता है और क्रांतिकारी नहीं होना चाहता। यूरोप में हुआ  19वीं सदी का उदारवादी आंदोलन  को इससे संबंधित माना जाता है,क्योंकि उस समय विश्व(खासकर यूरोप) में समाजवाद वाम की ओर झुका हुआ था,और क्रान्ति के जरिये बदलाव की पुरजोर कोशिश कर रहा था। परन्तु इस बात को ध्यान रखना होगा कि समाजवाद के पहले के दिनों अर्थात 1830 के दशक में उदारवादी भी उसी तर्क के आधार पर क्रांतिकारी अथवा वामपंथी हो सकते थे जिस तर्क से समाजवादी थे।
       एक उदाहरण लेकर हम इसे समझ सकते हैं-विचारधारा के स्तर पर फ्रांसीसी क्रान्ति के अग्रदाता भी उदारवादी थे,समाजवादी नहीं। कई विचारकों का कहना है कि अगर रुसो नहीं होता तो 1789 का क्रांति नहीं होता जिसके किताब 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' के पढने के बाद नहीं लगता कि उसका विचार वामपंथी जैसा था। इस क्रांति में उदारवादियों का चरित्र क्रांतिकारी था क्योंकि उद्देश्य परंपरा को उखाड़ फेंकना था,इसकारण ये वामपंथी जैसे ही होंगे।

      इन दोनों वामपंथ और मध्यममार्ग के विपरीत एक अन्य प्रारूप दक्षिणपंथ का है,जिसका मुख्य उद्देश्य क्रांति को रोकना है तथा जो कुछ भी अस्तित्व में आ चुका है,उसे मजबूत करना है। इसका कोशिश रहता है कि परंपरा का इस्तेमाल किया जाए,सुधारा जाए,एक-एक कर बदला जाए,लेकिन उखाड़ कर फेंका न जाए जैसा कि वामपंथ करना चाहता है अधिकांश मध्यमार्ग भी करने को तैयार है।
      दक्षिणपंथ के अंतर्गत ब्रिटेन के पुरानी टोरी पार्टी को रख सकते हैं और भारत में संघ,भाजपा आदि इसके समीप नजर आते हैं। सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण अनुदारवादियों का है हालांकि इनका कोई निर्धारित दृष्टिकोण नहीं है,इसने वामपंथ और मध्यमार्ग के सापेक्ष अपने को परिभाषित किया। इसने फ्रांसीसी क्रान्ति तथा अन्य परिवर्तनों को स्वीकार किया,लेकिन आशा बंधाये रखा कि आगे के किसी भी क्रान्ति को रोका जाएगा।
       अगर निष्कर्ष के रूप में कहें तो,
"अनुदारपंथ उस अतीत को विकसित करने का चेष्टा करता है,जो वर्तमान में रह जाता है,समाजवाद उस भविष्य को विकसित करने का चेष्टा करता है,जो वर्तमान में अंतर्निहित है और मध्यमार्ग वर्तमान को ही यशमान करने का चेष्टा करता है।" 
       उपर्युक्त विश्लेषण के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी संगठन,व्यक्ति,पार्टी और समूह आदि किसी प्रारूप का पूर्णतः अनुसरण नहीं करते। समय-समय पर उनकी नीति वामपंथी,दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी हो सकती है। भारत में कांग्रेस की नीतियां इसके उदाहरण हैं।

        वैसे दक्षिणपंथ एक अतिवादी दृष्टिकोण की ओर झुका हुआ है। इसका मूल उद्देश्य रहा है कि क्रान्ति के विचार को रद्द किया जाये। परन्तु इस उद्देश्य के पूर्ति के लिए इसने पुनः अतीत की ओर रुख नहीं किया बल्कि हर उस आधुनिक चीज पर प्रहार किया जो क्रांतियों द्वारा रची गयी थी। यहीं दक्षिणपंथ का प्रतिक्रान्ति था।
        इन दिनों कुछ विचारक ये भी कहते नजर आ रहे हैं कि दक्षिणपंथ स्वाभाविक रूप से अपने आप को अपने ही नकारात्मकता में धूमिल कर लिया है। परन्तु मुझे इसमें सच्चाई का अंश न के बराबर दिखता है।
         20वीं सदी में दक्षिणपंथ के सर्वोत्तम प्रतीक फासीवाद और राष्ट्रीय समाजवाद थे। भारत में संघ,विहिप और कई मौकों पर भाजपा को इसके समीप माना जाता है।

        परन्तु अगर हम आधुनिक काल का बात करें तो इन प्रारूपों को सापेक्ष दृष्टिकोणों के माध्यम से ही समझा जा सकता है-आजकल वामपंथ की धारणा को श्रमिक वर्ग के या उनके समानतावादी आन्दोलनों से जोड़कर देखा गया है,जबकि मध्यमार्गी राजनीति का संबंध अधिकतर बुर्जुआ वर्ग से माना गया है जो व्यक्तिगत अधिकारों की तो बात करात है लेकिन सामाजिक एकता का नहीं। वहीं दक्षिणपंथ राजनीति ने कई रूप ले लिया है,जिनमें विभिन्न प्रकार के नवजागरण आंदोलन से लेकर धर्मनिरपेक्ष तानाशाही तथा फासीवादी राज्य आते हैं।

      अवलोकनात्मक रूप में कहे तो,
"द्वितीय विश्वयुद्ध उदारवाद तथा दक्षिणपंथ के बीच लड़ा गया। 1945 के बाद यह वहीं वामपंथ और मध्यमार्ग के बीच शीतयुद्ध में बदल गया और 1991 में सोवियत संघ के बिखरने के बाद कथित उत्तर आधुनिक काल में मध्यमार्ग का नियंत्रण बना रहा।" 

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