Friday, 22 January 2016

वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

यह लेख दैनिक जागरण(राष्ट्रीय संस्करण) में संपादकीय पेज पर प्रकाशित हो चुका है। (22 जनवरी।2016)

       दुनिया के सभी देशों का सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक आदि के आधार पर एक-दूसरे से जुड़ने की प्रक्रिया वैश्वीकरण का मोटे तैर पर अर्थ है। डेविड हेल्ड इसका परिभाषा परस्पर निर्भरता के रूप में करते हैं,क्योंकि सामाजिक और आर्थिक संबंधों ने दुनिया को बाँध दिया है। आज विश्व में वैश्वीकरण के प्रति कई दृष्टिकोण हैं,जो इसके स्वरुप,परिणाम और प्रभाव का विशद् विवेचना करते हैं। इन परिप्रेक्ष्यों के माध्यम से हम वैश्वीकरण के अर्थ को सही मायने में जान पाएंगे। इनमें से एक दृष्टिकोण के. ओहमी जैसे अति भूमण्डलवादी विचारकों का है। जिनके अनुसार बहुराष्ट्रीय निगम और अंतर्राष्ट्रीय बाजार शक्तिशाली हो चुके हैं तथा अव्यक्तिक ताकतें विश्व को नियंत्रित करते हैं।
      परन्तु संशयवादी भूमंडलीकरण को एक मिथक मानते हैं। इनका कहना है कि 19वीं सदी में व्यापार में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि हुयी,श्रमिकों का संख्या तेजी से बढ़ा और अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के रूप में राज्यों के एकीकरण का अपेक्षाकृत उच्च स्तर पर आर्थिक अंतर-निर्भरता बढ़ी। साथ ही एडम स्मिथ के तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत का प्रचार हुआ,आज हम जो अनुभव कर रहे हैं,वह इन प्रक्रियाओं का बढ़ता हुआ स्तर है। अति भूमण्डलवादी के विपरीत संशयवादी आर्थिक शक्ति के बजाय राजनीतिक शक्ति को ज्यादा महत्त्व देते हैं। इनका मानना है कि बाजार शासन नहीं करता है बल्कि राज्य सभी आर्थिक कार्यकलापों का नियमन करता है।
      तीसरा और सबसे संतुलित दृष्टिकोण परिवर्तनवादियों द्वारा दिया जाता है,जिनका विश्वास है कि भूमंडलीकरण दुनिया में परिवर्तन ला रहा है अर्थात सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को लाने में यह एक प्रमुख शक्ति है।
        नव-मार्क्सवादियों द्वारा भूमंडलीकरण की उत्पत्ति और स्वरुप के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जाता है-जो ये मानते हैं कि वैश्वीकरण सम्राज्यवाद का एक नया रूप है और यह उदारवादी संकीर्ण नीतियों का विस्तार है। इनका यह भी मानना है कि विकसित पश्चिमी देश इसका इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि अपनी अर्थव्यवस्था को भविष्य के संकट से बचाया जा सके। इससे एकतरफा फायदा केवल विकसित देशों को ही मिलेगा। उदारवादी आर्थिक संस्थायें(विश्व बैंक,आईएमएफ आदि) किसी देश को ऋण तभी देते हैं जब वह उसके शर्तों को मान ले। 1991 में अपनाया गया भारतीय आर्थिक सुधार इसका उदाहरण है। 1982 में मैक्सिको को भी इसी अनुभव से गुजरना पड़ा था।
        भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन वैश्वीकरण को ऐतिहासिक प्रक्रिया मानते हुए कहते हैं कि यह अनिवार्य रूप से पश्चिमी नहीं है। साथ ही ये इसके सुधार की आवश्यकता पर बल देते हैं। वहीं जगदीश भगवती मुक्त व्यापार के समर्थक हैं,इनका मानना है कि मुक्त व्यापार ने अर्थव्यवस्था के विकास में व्यापक रूप से मदद की है।
       वैश्वीकरण से चीन और भारत जैसे कई विकासशील देशों ने फायदा उठाया है तो वहीँ अफ्रीका के अल्पविकसित देशों को खामियाजा भी भुगतना पड़ा है।

      अब हम वैश्वीकरण के स्वरुप को जान चुके हैं,तो सवाल आता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है?
       1991 में आर्थिक सुधार को अपनाकर भारतीय अर्थवतावस्था में कई सुधार किये गए और बाधाओं को हटाकर अर्थव्यवस्था को विश्व के लिए खोला गया। यह सुधार अपने में तीन अवयवों को समेटा हुआ है-वैश्वीकरण,उदारीकरण और निजीकरण।
        अर्थव्यवस्था के विकास के दर को बढ़ाना,अतीत में प्राप्त लाभों का समायोजन करना,उत्पादन इकाइयों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाना इसके मुख्य उद्देश्य रहे हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कई प्रमुख परिवर्तन किये गए,जैसे कि लाइसेंस व्यवस्था की समाप्ति,निजी निवेश के लिए एमएनसी को प्रोत्साहन,विदेशी विनिमय पर लगी रुकावटों को समाप्त करना,कीमत तथा वितरण संबंधी सारे रुकावटों को हटाना और एमआरटीपी अधिनियम को समाप्त करना आदि। इस तरह इस आर्थिक नीति को पुरानी आर्थिक नीति का यू-टर्न का संज्ञा दिया जा सकता है।
        संक्षेप में उपर्युक्त तीनों शब्दों के अर्थ को इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं-आर्थिक उदारीकरण में सभी व्यक्तियों को अपनी आवश्यकतानुसार निजी आर्थिक निर्णय लेने की आजादी होती है। निजीकरण उदारीकरण से ही जुड़ा हुआ प्रक्रिया है। वैश्वीकरण के तहत देशों के व्याप्त आर्थिक दूरियाँ धीरे-धीरे कम हो जाती है और आवागमन की सभी तरह की रुकावटें हटा ली जाती है।
       
        इन सुधारों के फलस्वरूप,जहाँ विकास की दर 1951 से 1991 तक 4% के वार्षिक औसत से बढ़ती रही थी वहीं 1991 के बाद यह 2002-03 को छोड़कर 5.5% से अधिक रही। अगर प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो यह 1991 से पहले 2% के दर से बढी वहीं बाद में 3.5% हो गया।
         सकल राष्ट्रीय उत्पाद(जीडीपी) की संरचना में भी बदलाव देखने को मिला। 1990-91 में कृषि का योगदान 34.9 % था जो अब घटकर 21% के आस-पास आ गया है। इस दौरान सेवा क्षेत्र में काफी वृद्धि हुयी है। सकल उत्पाद में सेवा क्षेत्र के योगदान को देखते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था विकसित देशों के अर्थव्यवस्था जैसा लगने लगा है लेकिन एक विपरीत प्रभाव जो भारत पर पड़ा है,वह है कि जिस रफ़्तार से सेवा क्षेत्र अपना योगदान सकल उत्पाद में दे रहा है उसी रफ़्तार से रोजगार का अवसर मुहैया नहीं करा पा रहा है अर्थात आज भी दो-तिहाई लोगों की निर्भरता कृषि पर बना हुआ है।
       अगर हम बात औद्योगिक विकास का करें तो 1990-91 में जो 4.3% के आस-पास रहता था अब 9% को पार कर गया है। बचत का दर बढ़ा है। अगर निष्कर्षतः कहा जाए तो हमने वैश्वीकरण के जरिये आर्थिक संवृद्धि तो जरूर किया है,लेकिन विकास के उस लक्ष्य को नहीं पा सके जो गुणात्मकता का प्रतीक होती है।
         आर्थिक सुधार के 20 सालों बाद आज भी हम कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। जैसे-गरीबी,किसानों की मजबूर दशा,बेरोजगारी,मानव-पूंजी निर्माण और ग्रामीण-विकास आदि। इन सभी के स्तर पर उस लक्ष्य को नहीं पाया जा सका है जिसका कल्पना हम किये थे।
           इस कारण जरुरत है समावेशी विकास का ताकि अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्रक का बराबर विकास हो सके,समाज के हर तबके को लाभ का समुचित बँटवारा हो सके। इसके लिए हमें सरकार पर इस बात का दबाव बनाना चाहिए कि वे ऐसी नीतियों को मंजूरी दे जिससे हर उस शख्स का भी विकास हो सके,जिसकी पहुँच सीमित है। ऐसा संभव है अगर हम सभी मिलकर एक सचेत और तार्किक जनमत की तरह विकास मुद्दे को लेकर आंदोलन करें और दबाव समूह के माध्यम से सरकार को बाध्य करें।