Friday, 29 January 2016

सर्बानंद सोनोवाल,असम में भाजपा की नैया पार कर पायेंगे...?

       अमित शाह के दोबारा अध्यक्ष चुने जाने के बाद केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल को असम में मुख्यमंत्री का चेहरा भाजपा की ओर से बनाया गया है। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद यह दूसरा मौका है,जब किसी राज्य के चुनाव में भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया,इससे पहले दिल्ली में किरण बेदी थी।




      126 सदस्यीय असम विधानसभा के लिए इस साल अप्रैल-मई में चुनाव होने की संभावना है। इस समय सोनोवाल खेल एवं युवा मामलों के मंत्री है,जो 2011 में भाजपा में शामिल हुए थे। इनका मंत्रीमंडल से इस्तीफ़ा देने की अटकलें भी तेज हो गयी है।

       असम का चुनाव जीतना भाजपा के लिए बहुत जरूरी है,ताकि गिरती चुनावी ग्राफ को ठीक किया जा सके। साल 2015 के शुरुआत में दिल्ली चुनाव के झटकों से पार्टी अभी उबर भी नहीं पायी थी कि बिहार का चुनाव मानो इसके लिए आपदा सिद्ध हो गया। इसके उपरांत अमित शाह को लेकर आलोचनाओं का दौर तेज हुआ,साथ ही 'नरेंद्र मोदी की चमक कुंद हो गयी है' का आरोप भी लगने लगा। राजनीतिक गलियारों में ये बहस भी तेज हो गयी कि 'ब्रांड मोदी' अब धूमिल पड़ गया है।

      वहीं कांग्रेस के लिए असम चुनाव जीतना उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक है। लोकसभा चुनाव(2014) के बाद उसे कई राज्यों में पटखनी खानी पड़ी है।

       असम में मुख्य रूप से मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है,लेकिन AIUDF,असम गण परिषद,बोडो पीपुल्स फ्रंट जैसे क्षेत्रीय दल सत्ता में हिस्सेदारी या किंगमेकर वाली भूमिका निभाने के लिए अपनी स्थिति सुधारने का कोशिश करेंगे। वहीं निवर्तमान मुख्यमंत्री गोगोई की वर्तमान सरकार को बिहार में मिले अच्छे परिणाम से मनोबल का लाभ भी प्राप्त है।

       अगर भौगोलिक और जनसांख्यिकी के हिसाब से असम के राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण करें तो कई मुद्दे निकल कर सामने आते हैं -
       इस दृष्टि से पुरे असम को तीन हिस्सों में बाँट सकते हैं-ब्रह्मपुत्र घाटी,बराक घाटी और आदिवासी स्वायत्त क्षेत्र। ब्रह्मपुत्र घाटी में अधिकतर असमिया बोलने वालों की आबादी है। आदिवासी स्वायत क्षेत्र की अपनी अलग संस्कृति है। बांग्ला बोलने वाले लोग मुख्यतः बराक घाटी में रहते हैं।
       असम में ऐसे तो हिन्दुओं की आबादी सबसे बड़ी है,लेकिन 2011 की जनगणनां में गिरावट देखने को मिली है। 1971 में जो 72 फीसदी हिन्दू असम की जनसंख्या के भाग थे वहीं 2011 में घटकर 61.5 फीसदी हो गए। दूसरी तरफ मुसलामानों की आबादी में 1971 के मुकाबले 2011 में 24 फीसदी से 34.2 फीसदी तक वृद्धि हो गयी है। और सात जिलों में मुस्लिम वोट निर्णायक हो गए हैं।
       बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF मुस्लिम वोटरों,ख़ास तौर से बांग्लादेशी मुस्लिम अप्रवासियों पर लगभग पूर्ण नियंत्रण रखती है। इस तरह एक मूल मुद्दा असम के लोगों में 'देशज' और 'अप्रवासी' को लेकर है।

      2011 के चुनाव में मुख्यमंत्री गोगोई ने बांग्लादेशी हिन्दुओं को लेकर अपना रुख बदल दिया था। उन्हें अवैध अप्रवासी के जगह शरणार्थी कह कर हिन्दू वोट के बल पर चुनाव जीत लिया। उस चुनाव में 126 सीटों में से कांग्रेस को 78 और AIUDF को 18 सीटें मिली। भाजपा का ऐसा हाल हुआ कि 27 में से 23 जिलों में खाता भी नहीं खुल सका।
     
       लेकिन जब से नरेंद्र मोदी ने कमान संभाली है,भाजपा के लिए स्थितियां बदल गयी है। 2014 के आम चुनाव में 14 में से 7 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की। फरवरी,2015 में हुए शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस को बुरी तरह पराजित किया।
       वहाँ की अच्छी-खासी जनसंख्या वाली बोडो जनजाति चाहती है कि असम में ऐसी पार्टी का सरकार बने जो गैर-मुस्लिम देशों से सहानभूति रखने वाली हो। भाजपा इस भावना को भुना सकती है।
        इधर नीतीश कुमार भी असम में बिहार की तरह का महागठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर गैर-भाजपा दल इस तरह का गठबंधन बनाते हैं तो भाजपा के लिए एक गंभीर चुनौती होगी। लेकिन ये भी सही है कि हवा का रुख भाजपा की तरफ है और बदली परिस्थितियों का लाभ मिलेगा।