Tuesday, 19 January 2016

केजरीवाल पर स्याही फेंका जाना,कहीं करनी का फल तो नहीं...?

   यह आलेख संवाददाता डॉट कॉम पर प्रकाशित हो चुका है.
 'आम आदमी पार्टी' के जन्म का आधार अन्ना आंदोलन में खोजा जा सकता है,जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आवाजें एक साथ बुलंद हुयी थी। 'आप' एक ऐसी पार्टी बनकर उभरी जिसमें बुद्धिजीवियों का एक जमावड़ा था चाहे वे योगेन्द्र यादव हों या प्रोफ़ेसर आनंद कुमार। लेकिन समय ने ऐसी पलटी मारी कि इस पार्टी से लगभग बुद्धिजीवियों का नाता तो टूट ही गया और जो लोग राजनीति को साफ़-सुथरा करने और नैतिकता की कसौटी पर कसने आये थे,साथ ही अपने लिए आप को एक बेहतरीन मंच मानते थे अपने को अलग कर लिया।

       विचारक कार्ल-मार्क्स का महत्वपूर्ण वाक्य,शायद केजरीवाल याद कर लेते कि इतिहास अपने आप को दोहराता है,तो फ्रांस के राब्सिपियर जैसा हश्र होने की संभावना नहीं बनता। राब्स्पियर,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था जिसमें उसने सबसे पहले अपने साथियों को निशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया.महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली। जिन आदर्शों को लेकर आप चली थी उसका मटियामेट कर दिया गया है।

      बीते रविवार,आम आदमी सेना से संबंधित भावना अरोड़ा ने छत्रशाल स्टेडियम में केजरीवाल पर स्याही फेंकी और दिल्ली सरकार पर सीएनजी स्टीकर आवंटन में घोटाले का आरोप लगायी और इसे साबित करने का दावा भी की। ये तो वक्त बताएगा की इस दावे में सच्चाई का अंश कितना है?

       जरनैल सिंह नाम के एक व्यक्ति द्वारा तात्कालीन वित्तमंत्री पी. चितंबरम पर जूता फेंका गया था तो केजरीवाल और उनकी टीम ने उसका महिमामंडन किया था,बाद में आप द्वारा विधानसभा उम्मीदवारी भी दे दी गयी थी, लेकिन जब ऐसा ही वारदात केजरीवाल साथ हुआ तो मनीष सिसोदिया और  इनका बयान दोहरे मापदंड की ओर इंगित करता है कि इसमें भाजपाइयों का हाथ है।

      इतने कम समय में पर्याप्त सोहरत हासिल करने,राजनीति का नया मानदंड देने की बात करने,कई आदर्शों  पर आधारित पार्टी से संस्थापक सदस्यों का निकाला जाना,कुछ अपने से निकल जाना,अपने ही लोगों द्वारा विरोध झेलना,ये सभी इसके खामियों की ओर ही इशारा करता है।