Friday, 29 January 2016

सर्बानंद सोनोवाल,असम में भाजपा की नैया पार कर पायेंगे...?

       अमित शाह के दोबारा अध्यक्ष चुने जाने के बाद केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल को असम में मुख्यमंत्री का चेहरा भाजपा की ओर से बनाया गया है। केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद यह दूसरा मौका है,जब किसी राज्य के चुनाव में भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किया,इससे पहले दिल्ली में किरण बेदी थी।




      126 सदस्यीय असम विधानसभा के लिए इस साल अप्रैल-मई में चुनाव होने की संभावना है। इस समय सोनोवाल खेल एवं युवा मामलों के मंत्री है,जो 2011 में भाजपा में शामिल हुए थे। इनका मंत्रीमंडल से इस्तीफ़ा देने की अटकलें भी तेज हो गयी है।

       असम का चुनाव जीतना भाजपा के लिए बहुत जरूरी है,ताकि गिरती चुनावी ग्राफ को ठीक किया जा सके। साल 2015 के शुरुआत में दिल्ली चुनाव के झटकों से पार्टी अभी उबर भी नहीं पायी थी कि बिहार का चुनाव मानो इसके लिए आपदा सिद्ध हो गया। इसके उपरांत अमित शाह को लेकर आलोचनाओं का दौर तेज हुआ,साथ ही 'नरेंद्र मोदी की चमक कुंद हो गयी है' का आरोप भी लगने लगा। राजनीतिक गलियारों में ये बहस भी तेज हो गयी कि 'ब्रांड मोदी' अब धूमिल पड़ गया है।

      वहीं कांग्रेस के लिए असम चुनाव जीतना उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक है। लोकसभा चुनाव(2014) के बाद उसे कई राज्यों में पटखनी खानी पड़ी है।

       असम में मुख्य रूप से मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है,लेकिन AIUDF,असम गण परिषद,बोडो पीपुल्स फ्रंट जैसे क्षेत्रीय दल सत्ता में हिस्सेदारी या किंगमेकर वाली भूमिका निभाने के लिए अपनी स्थिति सुधारने का कोशिश करेंगे। वहीं निवर्तमान मुख्यमंत्री गोगोई की वर्तमान सरकार को बिहार में मिले अच्छे परिणाम से मनोबल का लाभ भी प्राप्त है।

       अगर भौगोलिक और जनसांख्यिकी के हिसाब से असम के राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण करें तो कई मुद्दे निकल कर सामने आते हैं -
       इस दृष्टि से पुरे असम को तीन हिस्सों में बाँट सकते हैं-ब्रह्मपुत्र घाटी,बराक घाटी और आदिवासी स्वायत्त क्षेत्र। ब्रह्मपुत्र घाटी में अधिकतर असमिया बोलने वालों की आबादी है। आदिवासी स्वायत क्षेत्र की अपनी अलग संस्कृति है। बांग्ला बोलने वाले लोग मुख्यतः बराक घाटी में रहते हैं।
       असम में ऐसे तो हिन्दुओं की आबादी सबसे बड़ी है,लेकिन 2011 की जनगणनां में गिरावट देखने को मिली है। 1971 में जो 72 फीसदी हिन्दू असम की जनसंख्या के भाग थे वहीं 2011 में घटकर 61.5 फीसदी हो गए। दूसरी तरफ मुसलामानों की आबादी में 1971 के मुकाबले 2011 में 24 फीसदी से 34.2 फीसदी तक वृद्धि हो गयी है। और सात जिलों में मुस्लिम वोट निर्णायक हो गए हैं।
       बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF मुस्लिम वोटरों,ख़ास तौर से बांग्लादेशी मुस्लिम अप्रवासियों पर लगभग पूर्ण नियंत्रण रखती है। इस तरह एक मूल मुद्दा असम के लोगों में 'देशज' और 'अप्रवासी' को लेकर है।

      2011 के चुनाव में मुख्यमंत्री गोगोई ने बांग्लादेशी हिन्दुओं को लेकर अपना रुख बदल दिया था। उन्हें अवैध अप्रवासी के जगह शरणार्थी कह कर हिन्दू वोट के बल पर चुनाव जीत लिया। उस चुनाव में 126 सीटों में से कांग्रेस को 78 और AIUDF को 18 सीटें मिली। भाजपा का ऐसा हाल हुआ कि 27 में से 23 जिलों में खाता भी नहीं खुल सका।
     
       लेकिन जब से नरेंद्र मोदी ने कमान संभाली है,भाजपा के लिए स्थितियां बदल गयी है। 2014 के आम चुनाव में 14 में से 7 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की। फरवरी,2015 में हुए शहरी स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस को बुरी तरह पराजित किया।
       वहाँ की अच्छी-खासी जनसंख्या वाली बोडो जनजाति चाहती है कि असम में ऐसी पार्टी का सरकार बने जो गैर-मुस्लिम देशों से सहानभूति रखने वाली हो। भाजपा इस भावना को भुना सकती है।
        इधर नीतीश कुमार भी असम में बिहार की तरह का महागठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर गैर-भाजपा दल इस तरह का गठबंधन बनाते हैं तो भाजपा के लिए एक गंभीर चुनौती होगी। लेकिन ये भी सही है कि हवा का रुख भाजपा की तरफ है और बदली परिस्थितियों का लाभ मिलेगा। 

Monday, 25 January 2016

Politics - अमित शाह का भाजपा अध्यक्ष चुना जाना।

 यह आलेख संवाददाता डॉट कॉम पर प्रकाशित हो चुका है।


भाजपा को विश्व का सबसे राजनीतिक दल बनाने वाले अमित शाह को पार्टी ने एक बार फिर अपना अध्यक्ष चुन लिया। इस मौके पर नरेंद्र मोदी ने कहा,"अमित भाई के पास जमीनी स्तर पर काम करने के अलावा संगठन का भी अपार अनुभव है। पार्टी को इसका बहुत ज्यादा लाभ मिलेगा।"

अमित शाह को तीन साल के लिए पार्टी की कमान सौंपी गयी है हालांकि औपचारिक रूप से यह उनका पहला कार्यकाल है। अब तब वे राजनाथ सिंह के बचे हुए कार्यकाल का जिम्मेवारी संभाल रहे थे। ऐसा संभावना है कि अगले कार्यकाल के लिए भी इनका दरवाजा खुल गया है क्योंकि वर्तमान कार्यकाल जनवरी 2019 तक होगा और उसी साल लोकसभा चुनाव होंगे। सामान्यतः चुनाव के वक्त अध्यक्ष नहीं बदला जाता। 

भाजपा के अध्यक्ष चुनाव के दौरान वरिष्ट नेता दूर रहे। ये इससे पहले बिहार चुनाव के दौरान भी अपनी नाराजगी जताए थे। कहा जा रहा है कि शाह का चुनाव निर्विरोध हुआ है,लेकिन मार्गदर्शक मंडल के सदस्यों को न शामिल होना प्रश्न-चिह्न लगा देता है। 

अगर सारी बहसों को हटाकर निष्पक्ष रूप से इनका विश्लेषण किया जाए तो शाह ने अपने 18 महीने के कार्यकाल में पार्टी को काफी ऊंचाइयां दी। 

लोकसभा चुनाव के दौरान जब शाह ने उत्तर प्रदेश में 73 सीटें जितायी तो ऐसा माना गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ नजदीकी का इनाम पहले अध्यक्ष के दौरान मिला। कुछ सच्चाई भी होगी लेकिन सफलता अपने साथ कुछ तो लाती है। 

लोकसभा चुनाव के बाद भी इनके सामने कठिन चुनौतियां थी। महाराष्ट्र,हरियाणा,जम्मू-काश्मीर और झारखंड में भाजपा का झंडा लहराकर अपनी क्षमता को फिर से साबित कर दिया। 2015 की शुरुआत में दिल्ली में करारी हार और साल के अंत में बिहार के चुनाव में ऐतिहासिक हार के बाद इनको कई आलोचनाओं सामना भी करना पड़ा क्योंकि बिहार चुनाव भाजपा और मोदी के प्रतिष्ठा का विषय था और साथ ही माइक्रो स्तर से तैयारी और बागडोर इन्होंने अपने हाथों में लिया था। 

लेकिन मेरा मानना बिलकुल ही अलग है,इस बार शाह को साहस और क्षमता का इनाम मिला है। राजनीति में हार-जीत का सिलसिला तो चलते रहता है। ऐसा बात नहीं है कि शाह की रणनीतियाँ कुंद हो चली है,जैसा कि आलोचक कह रहे हैं। शाह को मालुम है कि पार्टी को असली चुनौती उत्तर-प्रदेश,उत्तराखंड,पंजाब और गुजरात में मिलेगी,जहां इनका संगठन क्षमता एक बार फिर दाव पर होगी। 

उल्लेखनीय है कि सफलता के समय लोग डुगडुगी बजाना शुरू कर देते हैं और असफलता के वक्त अपने भी चेहरा मोड़ लेते हैं।  तो भविष्य बताएगा कि इतने सारे अनुभव लेने के बाद शाह की रणनीति आगामी चुनाव में कहाँ टिकती है?   

Friday, 22 January 2016

वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

यह लेख दैनिक जागरण(राष्ट्रीय संस्करण) में संपादकीय पेज पर प्रकाशित हो चुका है। (22 जनवरी।2016)

       दुनिया के सभी देशों का सामाजिक,आर्थिक,सांस्कृतिक आदि के आधार पर एक-दूसरे से जुड़ने की प्रक्रिया वैश्वीकरण का मोटे तैर पर अर्थ है। डेविड हेल्ड इसका परिभाषा परस्पर निर्भरता के रूप में करते हैं,क्योंकि सामाजिक और आर्थिक संबंधों ने दुनिया को बाँध दिया है। आज विश्व में वैश्वीकरण के प्रति कई दृष्टिकोण हैं,जो इसके स्वरुप,परिणाम और प्रभाव का विशद् विवेचना करते हैं। इन परिप्रेक्ष्यों के माध्यम से हम वैश्वीकरण के अर्थ को सही मायने में जान पाएंगे। इनमें से एक दृष्टिकोण के. ओहमी जैसे अति भूमण्डलवादी विचारकों का है। जिनके अनुसार बहुराष्ट्रीय निगम और अंतर्राष्ट्रीय बाजार शक्तिशाली हो चुके हैं तथा अव्यक्तिक ताकतें विश्व को नियंत्रित करते हैं।
      परन्तु संशयवादी भूमंडलीकरण को एक मिथक मानते हैं। इनका कहना है कि 19वीं सदी में व्यापार में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि हुयी,श्रमिकों का संख्या तेजी से बढ़ा और अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के रूप में राज्यों के एकीकरण का अपेक्षाकृत उच्च स्तर पर आर्थिक अंतर-निर्भरता बढ़ी। साथ ही एडम स्मिथ के तुलनात्मक लाभ के सिद्धांत का प्रचार हुआ,आज हम जो अनुभव कर रहे हैं,वह इन प्रक्रियाओं का बढ़ता हुआ स्तर है। अति भूमण्डलवादी के विपरीत संशयवादी आर्थिक शक्ति के बजाय राजनीतिक शक्ति को ज्यादा महत्त्व देते हैं। इनका मानना है कि बाजार शासन नहीं करता है बल्कि राज्य सभी आर्थिक कार्यकलापों का नियमन करता है।
      तीसरा और सबसे संतुलित दृष्टिकोण परिवर्तनवादियों द्वारा दिया जाता है,जिनका विश्वास है कि भूमंडलीकरण दुनिया में परिवर्तन ला रहा है अर्थात सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तनों को लाने में यह एक प्रमुख शक्ति है।
        नव-मार्क्सवादियों द्वारा भूमंडलीकरण की उत्पत्ति और स्वरुप के बारे में एक भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जाता है-जो ये मानते हैं कि वैश्वीकरण सम्राज्यवाद का एक नया रूप है और यह उदारवादी संकीर्ण नीतियों का विस्तार है। इनका यह भी मानना है कि विकसित पश्चिमी देश इसका इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि अपनी अर्थव्यवस्था को भविष्य के संकट से बचाया जा सके। इससे एकतरफा फायदा केवल विकसित देशों को ही मिलेगा। उदारवादी आर्थिक संस्थायें(विश्व बैंक,आईएमएफ आदि) किसी देश को ऋण तभी देते हैं जब वह उसके शर्तों को मान ले। 1991 में अपनाया गया भारतीय आर्थिक सुधार इसका उदाहरण है। 1982 में मैक्सिको को भी इसी अनुभव से गुजरना पड़ा था।
        भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन वैश्वीकरण को ऐतिहासिक प्रक्रिया मानते हुए कहते हैं कि यह अनिवार्य रूप से पश्चिमी नहीं है। साथ ही ये इसके सुधार की आवश्यकता पर बल देते हैं। वहीं जगदीश भगवती मुक्त व्यापार के समर्थक हैं,इनका मानना है कि मुक्त व्यापार ने अर्थव्यवस्था के विकास में व्यापक रूप से मदद की है।
       वैश्वीकरण से चीन और भारत जैसे कई विकासशील देशों ने फायदा उठाया है तो वहीँ अफ्रीका के अल्पविकसित देशों को खामियाजा भी भुगतना पड़ा है।

      अब हम वैश्वीकरण के स्वरुप को जान चुके हैं,तो सवाल आता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है?
       1991 में आर्थिक सुधार को अपनाकर भारतीय अर्थवतावस्था में कई सुधार किये गए और बाधाओं को हटाकर अर्थव्यवस्था को विश्व के लिए खोला गया। यह सुधार अपने में तीन अवयवों को समेटा हुआ है-वैश्वीकरण,उदारीकरण और निजीकरण।
        अर्थव्यवस्था के विकास के दर को बढ़ाना,अतीत में प्राप्त लाभों का समायोजन करना,उत्पादन इकाइयों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को बढ़ाना इसके मुख्य उद्देश्य रहे हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कई प्रमुख परिवर्तन किये गए,जैसे कि लाइसेंस व्यवस्था की समाप्ति,निजी निवेश के लिए एमएनसी को प्रोत्साहन,विदेशी विनिमय पर लगी रुकावटों को समाप्त करना,कीमत तथा वितरण संबंधी सारे रुकावटों को हटाना और एमआरटीपी अधिनियम को समाप्त करना आदि। इस तरह इस आर्थिक नीति को पुरानी आर्थिक नीति का यू-टर्न का संज्ञा दिया जा सकता है।
        संक्षेप में उपर्युक्त तीनों शब्दों के अर्थ को इस प्रकार व्यक्त कर सकते हैं-आर्थिक उदारीकरण में सभी व्यक्तियों को अपनी आवश्यकतानुसार निजी आर्थिक निर्णय लेने की आजादी होती है। निजीकरण उदारीकरण से ही जुड़ा हुआ प्रक्रिया है। वैश्वीकरण के तहत देशों के व्याप्त आर्थिक दूरियाँ धीरे-धीरे कम हो जाती है और आवागमन की सभी तरह की रुकावटें हटा ली जाती है।
       
        इन सुधारों के फलस्वरूप,जहाँ विकास की दर 1951 से 1991 तक 4% के वार्षिक औसत से बढ़ती रही थी वहीं 1991 के बाद यह 2002-03 को छोड़कर 5.5% से अधिक रही। अगर प्रति व्यक्ति आय की बात करें तो यह 1991 से पहले 2% के दर से बढी वहीं बाद में 3.5% हो गया।
         सकल राष्ट्रीय उत्पाद(जीडीपी) की संरचना में भी बदलाव देखने को मिला। 1990-91 में कृषि का योगदान 34.9 % था जो अब घटकर 21% के आस-पास आ गया है। इस दौरान सेवा क्षेत्र में काफी वृद्धि हुयी है। सकल उत्पाद में सेवा क्षेत्र के योगदान को देखते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था विकसित देशों के अर्थव्यवस्था जैसा लगने लगा है लेकिन एक विपरीत प्रभाव जो भारत पर पड़ा है,वह है कि जिस रफ़्तार से सेवा क्षेत्र अपना योगदान सकल उत्पाद में दे रहा है उसी रफ़्तार से रोजगार का अवसर मुहैया नहीं करा पा रहा है अर्थात आज भी दो-तिहाई लोगों की निर्भरता कृषि पर बना हुआ है।
       अगर हम बात औद्योगिक विकास का करें तो 1990-91 में जो 4.3% के आस-पास रहता था अब 9% को पार कर गया है। बचत का दर बढ़ा है। अगर निष्कर्षतः कहा जाए तो हमने वैश्वीकरण के जरिये आर्थिक संवृद्धि तो जरूर किया है,लेकिन विकास के उस लक्ष्य को नहीं पा सके जो गुणात्मकता का प्रतीक होती है।
         आर्थिक सुधार के 20 सालों बाद आज भी हम कई चुनौतियों से जूझ रहे हैं। जैसे-गरीबी,किसानों की मजबूर दशा,बेरोजगारी,मानव-पूंजी निर्माण और ग्रामीण-विकास आदि। इन सभी के स्तर पर उस लक्ष्य को नहीं पाया जा सका है जिसका कल्पना हम किये थे।
           इस कारण जरुरत है समावेशी विकास का ताकि अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्रक का बराबर विकास हो सके,समाज के हर तबके को लाभ का समुचित बँटवारा हो सके। इसके लिए हमें सरकार पर इस बात का दबाव बनाना चाहिए कि वे ऐसी नीतियों को मंजूरी दे जिससे हर उस शख्स का भी विकास हो सके,जिसकी पहुँच सीमित है। ऐसा संभव है अगर हम सभी मिलकर एक सचेत और तार्किक जनमत की तरह विकास मुद्दे को लेकर आंदोलन करें और दबाव समूह के माध्यम से सरकार को बाध्य करें।
                                                                       

Tuesday, 19 January 2016

केजरीवाल पर स्याही फेंका जाना,कहीं करनी का फल तो नहीं...?

   यह आलेख संवाददाता डॉट कॉम पर प्रकाशित हो चुका है.
 'आम आदमी पार्टी' के जन्म का आधार अन्ना आंदोलन में खोजा जा सकता है,जब देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कई आवाजें एक साथ बुलंद हुयी थी। 'आप' एक ऐसी पार्टी बनकर उभरी जिसमें बुद्धिजीवियों का एक जमावड़ा था चाहे वे योगेन्द्र यादव हों या प्रोफ़ेसर आनंद कुमार। लेकिन समय ने ऐसी पलटी मारी कि इस पार्टी से लगभग बुद्धिजीवियों का नाता तो टूट ही गया और जो लोग राजनीति को साफ़-सुथरा करने और नैतिकता की कसौटी पर कसने आये थे,साथ ही अपने लिए आप को एक बेहतरीन मंच मानते थे अपने को अलग कर लिया।

       विचारक कार्ल-मार्क्स का महत्वपूर्ण वाक्य,शायद केजरीवाल याद कर लेते कि इतिहास अपने आप को दोहराता है,तो फ्रांस के राब्सिपियर जैसा हश्र होने की संभावना नहीं बनता। राब्स्पियर,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था जिसमें उसने सबसे पहले अपने साथियों को निशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया.महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली। जिन आदर्शों को लेकर आप चली थी उसका मटियामेट कर दिया गया है।

      बीते रविवार,आम आदमी सेना से संबंधित भावना अरोड़ा ने छत्रशाल स्टेडियम में केजरीवाल पर स्याही फेंकी और दिल्ली सरकार पर सीएनजी स्टीकर आवंटन में घोटाले का आरोप लगायी और इसे साबित करने का दावा भी की। ये तो वक्त बताएगा की इस दावे में सच्चाई का अंश कितना है?

       जरनैल सिंह नाम के एक व्यक्ति द्वारा तात्कालीन वित्तमंत्री पी. चितंबरम पर जूता फेंका गया था तो केजरीवाल और उनकी टीम ने उसका महिमामंडन किया था,बाद में आप द्वारा विधानसभा उम्मीदवारी भी दे दी गयी थी, लेकिन जब ऐसा ही वारदात केजरीवाल साथ हुआ तो मनीष सिसोदिया और  इनका बयान दोहरे मापदंड की ओर इंगित करता है कि इसमें भाजपाइयों का हाथ है।

      इतने कम समय में पर्याप्त सोहरत हासिल करने,राजनीति का नया मानदंड देने की बात करने,कई आदर्शों  पर आधारित पार्टी से संस्थापक सदस्यों का निकाला जाना,कुछ अपने से निकल जाना,अपने ही लोगों द्वारा विरोध झेलना,ये सभी इसके खामियों की ओर ही इशारा करता है।         

Saturday, 9 January 2016

दक्षिणपंथ और वामपंथ का समझ

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
       विचारधाराएँ तो विश्व में हमेशा से रही है। इन विचारधाराओं,सिद्धांतों,व्यक्तियों,नीतियों तथा कार्यप्रणालियों को एक विशेष प्रारूप के तहत विभाजित करने का सिलसिला 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी के प्रारंभ में शुरू हुआ,जो वामपंथ,दक्षिणपंथ और मध्यमार्ग पर आधारित है। इन शब्दों का सही अर्थ हम तभी समझ सकते हैं जब सारे पूर्वाग्रह को मन से हटा दिया जाए और ऐसा मानकर चला जाए कि समाज एक ऐसा उपक्रम है,जहाँ विचारों की गतिशीलता और तर्क-वितर्क का दौर हमेशा चलते रहता है।
        इनमें से वामपंथ एक ऐसा प्रारूप है,जिसमें वे सभी विचारधाराएँ आ जाती है जिनमें परिवर्तन,निरंतर परिवर्तन तथा अतीत एवं परंपरा से भविष्य की ओर जाने का आग्रह रहता है। इनका विश्वास है कि इसे एक सफल क्रान्ति द्वारा ही पाया जा सकता है। इस तरह हम समाजवाद और साम्यवाद को इसके ज्यादा नजदीक पाते हैं,जो आजकल अति प्रसिद्धि प्राप्त किये हुए है।
        एक अन्य प्रारूप मध्यमार्गियों का है,जो परिवर्तन की प्रक्रिया को स्वीकार तो करता है,लेकिन इसकी कोशिश यह रहती है कि परिवर्तन की गति को धीमा ही रखा जाए। साथ ही यह अतिवाद से डरता है और क्रांतिकारी नहीं होना चाहता। यूरोप में हुआ  19वीं सदी का उदारवादी आंदोलन  को इससे संबंधित माना जाता है,क्योंकि उस समय विश्व(खासकर यूरोप) में समाजवाद वाम की ओर झुका हुआ था,और क्रान्ति के जरिये बदलाव की पुरजोर कोशिश कर रहा था। परन्तु इस बात को ध्यान रखना होगा कि समाजवाद के पहले के दिनों अर्थात 1830 के दशक में उदारवादी भी उसी तर्क के आधार पर क्रांतिकारी अथवा वामपंथी हो सकते थे जिस तर्क से समाजवादी थे।
       एक उदाहरण लेकर हम इसे समझ सकते हैं-विचारधारा के स्तर पर फ्रांसीसी क्रान्ति के अग्रदाता भी उदारवादी थे,समाजवादी नहीं। कई विचारकों का कहना है कि अगर रुसो नहीं होता तो 1789 का क्रांति नहीं होता जिसके किताब 'सोशल कॉन्ट्रैक्ट' के पढने के बाद नहीं लगता कि उसका विचार वामपंथी जैसा था। इस क्रांति में उदारवादियों का चरित्र क्रांतिकारी था क्योंकि उद्देश्य परंपरा को उखाड़ फेंकना था,इसकारण ये वामपंथी जैसे ही होंगे।

      इन दोनों वामपंथ और मध्यममार्ग के विपरीत एक अन्य प्रारूप दक्षिणपंथ का है,जिसका मुख्य उद्देश्य क्रांति को रोकना है तथा जो कुछ भी अस्तित्व में आ चुका है,उसे मजबूत करना है। इसका कोशिश रहता है कि परंपरा का इस्तेमाल किया जाए,सुधारा जाए,एक-एक कर बदला जाए,लेकिन उखाड़ कर फेंका न जाए जैसा कि वामपंथ करना चाहता है अधिकांश मध्यमार्ग भी करने को तैयार है।
      दक्षिणपंथ के अंतर्गत ब्रिटेन के पुरानी टोरी पार्टी को रख सकते हैं और भारत में संघ,भाजपा आदि इसके समीप नजर आते हैं। सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण अनुदारवादियों का है हालांकि इनका कोई निर्धारित दृष्टिकोण नहीं है,इसने वामपंथ और मध्यमार्ग के सापेक्ष अपने को परिभाषित किया। इसने फ्रांसीसी क्रान्ति तथा अन्य परिवर्तनों को स्वीकार किया,लेकिन आशा बंधाये रखा कि आगे के किसी भी क्रान्ति को रोका जाएगा।
       अगर निष्कर्ष के रूप में कहें तो,
"अनुदारपंथ उस अतीत को विकसित करने का चेष्टा करता है,जो वर्तमान में रह जाता है,समाजवाद उस भविष्य को विकसित करने का चेष्टा करता है,जो वर्तमान में अंतर्निहित है और मध्यमार्ग वर्तमान को ही यशमान करने का चेष्टा करता है।" 
       उपर्युक्त विश्लेषण के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी संगठन,व्यक्ति,पार्टी और समूह आदि किसी प्रारूप का पूर्णतः अनुसरण नहीं करते। समय-समय पर उनकी नीति वामपंथी,दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी हो सकती है। भारत में कांग्रेस की नीतियां इसके उदाहरण हैं।

        वैसे दक्षिणपंथ एक अतिवादी दृष्टिकोण की ओर झुका हुआ है। इसका मूल उद्देश्य रहा है कि क्रान्ति के विचार को रद्द किया जाये। परन्तु इस उद्देश्य के पूर्ति के लिए इसने पुनः अतीत की ओर रुख नहीं किया बल्कि हर उस आधुनिक चीज पर प्रहार किया जो क्रांतियों द्वारा रची गयी थी। यहीं दक्षिणपंथ का प्रतिक्रान्ति था।
        इन दिनों कुछ विचारक ये भी कहते नजर आ रहे हैं कि दक्षिणपंथ स्वाभाविक रूप से अपने आप को अपने ही नकारात्मकता में धूमिल कर लिया है। परन्तु मुझे इसमें सच्चाई का अंश न के बराबर दिखता है।
         20वीं सदी में दक्षिणपंथ के सर्वोत्तम प्रतीक फासीवाद और राष्ट्रीय समाजवाद थे। भारत में संघ,विहिप और कई मौकों पर भाजपा को इसके समीप माना जाता है।

        परन्तु अगर हम आधुनिक काल का बात करें तो इन प्रारूपों को सापेक्ष दृष्टिकोणों के माध्यम से ही समझा जा सकता है-आजकल वामपंथ की धारणा को श्रमिक वर्ग के या उनके समानतावादी आन्दोलनों से जोड़कर देखा गया है,जबकि मध्यमार्गी राजनीति का संबंध अधिकतर बुर्जुआ वर्ग से माना गया है जो व्यक्तिगत अधिकारों की तो बात करात है लेकिन सामाजिक एकता का नहीं। वहीं दक्षिणपंथ राजनीति ने कई रूप ले लिया है,जिनमें विभिन्न प्रकार के नवजागरण आंदोलन से लेकर धर्मनिरपेक्ष तानाशाही तथा फासीवादी राज्य आते हैं।

      अवलोकनात्मक रूप में कहे तो,
"द्वितीय विश्वयुद्ध उदारवाद तथा दक्षिणपंथ के बीच लड़ा गया। 1945 के बाद यह वहीं वामपंथ और मध्यमार्ग के बीच शीतयुद्ध में बदल गया और 1991 में सोवियत संघ के बिखरने के बाद कथित उत्तर आधुनिक काल में मध्यमार्ग का नियंत्रण बना रहा।" 

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