Thursday, 29 December 2016

पत्रकारिता का इतना भद्दा मजाक शायद किसी ने नहीं देखा होगा।


(जी न्यूज सही कारणों के कारण मीडिया का साख बचाने के युद्ध के रणभूमि में अकेला पड़ता हुआ नजर आ रहा है।)

एक वेबसाइट है - मीडियाविजिल,जिसने अपना टैगलाइन दिया है," मीडियाविजिल नाम की यह वेबसाइट समाचार माध्‍यमों की विसंगतियों को सामने लाने और सही संदर्भ में सही सूचना को सामने रखने का एक सामूहिक व अलाभकारी प्रयास है।"

यह बात तो सही है कि ऐसा प्रयास होना चाहिए। हर एक के बुराइयों और अच्छाइयों के पहलू और परिप्रेक्ष्य को सलीके से उठाया जाना चाहिए। लेकिन क्या यह वेबसाइट या इसके जैसे अन्य वेबसाइट इसे सही तरीके से अंजाम दे रहे हैं?
 
ऐसे तो इसतरह के कई वेबसाइट हैं जिसकी विश्वसनीयता संदेहों के घेरे में है,जैसे कि हिंदुत्व.इंफो,जनवरी.कॉम,जनता का रिपोर्टर आदि। फिर भी मीडियाविजिल को एक अच्छा मंच माना जा सकता था कि इसके आधार तथ्यों से परिपूर्ण था,हालाँकि इसकी लोकप्रियता तो उतनी नहीं है,जो अभी मात्र 2700 के आँकड़ों को ही छू पाया है।

ज़ी न्यूज पर मैं अपनी कंमेंट्री जारी करूँ, इससे पहले आपसभी को इस वेबसाइट की कुछ ख़बरों से अवगत करा देता हूँ -  मधु किश्वर जी, तैमूर ने लाखों मुसलमानों का सिर काट कर साम्राज्य बनाया था ! नफ़रत न फैलाएँ !; BBC को किसने बताया कि सैफ़-करीना के बच्चे का नाम तैमूर लंग पर है ?; मालिक नहीं चाहते कि पत्रकार लिखें मन की बात ! BBC में भी है रोक ! आदि।

स्क्रीन काला करने वाले चैनल पर लगे प्रतिबंध के बारे में लिखता है - रवीश के श्लेष में जकड़ गया ‘पीएम 2.5’.. बाग़ों में बहार है..!(इस पूरे शो को ही अपलोड कर दिया गया है।)

अब तो आपसभी समझ ही गए होंगे कि ऐसे हजारों फर्जी वेबसाइट हैं जो किसी एक बेकार पड़ चुकी विचारधारा के अभिव्यक्ति,आपातकाल की आहट आदि के नाम पर स्वामीभक्ति के लिए फंड लेकर झंडाबरदार रहे हैं। जबकि सच्चाई सबके सामने है कि टैगलाइन कुछ और रहता है और काम बिल्कुल अलग।

ज़ी न्यूज पर हुए मुकदमे पर यह वेबसाइट लिखता है,"क्या ज़ी को सिर्फ़ इसलिए पत्रकारिता के मोर्चे का सिपाही मान लेना चाहिए क्योंकि उसके पास ख़बर दिखाने का लाइसेंस है? आज ज़ी को पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब समझ में आ रहा है, लेकिन अभी दो महीने भी नहीं हुए जब ज़ी के मालिक और बीजेपी के सांसद सुभाषचंद्रा ने एनडीटीवी पर आजीवन प्रतिबंध की वक़ालत की थी। तब यह चैनल कहाँ खड़ा था? तब वह एनडीटीवी को उसी तरह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा बता रहा था जैसे कि आज उसे सांप्रदायिक सद्भाव की राह का रोड़ा कहा जा रहा है।"

(अब इस मूढ़ को कौन समझाए कि राष्ट्रीय सुरक्षा की कोई तुलना आंतरिक मामलों की रिपोर्टिंग से नहीं की जा सकती। मतलब NDTV के समर्थन में यह खुलकर सामने आया है और जैसा को तैसा करने का वकालत कर रहा है।)

यह आगे लिखता है,"वैसे ख़ुद ज़ी के संपादक सुधीर चौधरी अपने एक संपादकीय सहयोगी के साथ तिहाड़ जेल की हवा खा चुके हैं और मसला किसी ख़बर दिखाने का नहीं, एक उद्योग समूह से सौ करोड़ से ज़्यादा की उगाही का था। ज़ी की ओर से तब भी इमरजेंसी की दुहाई दी गई थी, जैसे अब दी जा रही है।"

(ये सब इतने बेशर्म होते हैं कि अपने पर आती है तो शोर मचाकर अदालत की दुहाई देने लगते हैं कि अदालत का फैसला आना बाकी है,लेकिन सुधीर चौधरी के मामले में आरोप लगने के बाद हुए पुलिस रूटीन प्रक्रिया को ही शाश्वत सत्य मान बैठे हैं जबकि फैसला आना तो अभी बाकी है।)

जब जेएनयू को बदनाम करने के लिए फ़र्ज़ी वीडियो गढ़े गए तब भी सुधीर चौधरी को कुछ ग़लत नहीं लगा ! ज़ी के ही एक प्रोड्यूसर विश्वदीपक ने नौकरी से इस्तीफ़़ा देकर बताया था कि न्यूज़रूम का माहौल किस कदर सांप्रदायिक और घुटन भरा है। कैसे जेएनयू को बदनाम करने के लिए ख़बरों का खिलवाड़ किया गया था।

(अब इसबात का कोई मतलब ही नहीं रह गया है कि वीडियो सही थे या गलत? क्योंकि सभी वीडियो जांच में सही पाए गए हैं। जिस पत्रकार के इस्तीफे की दुहाई दी गयी है कि उसकी विश्वनीयता क्या है? हो सकता है संस्था को बदनाम करने के लिए इसे खरीद लिया गया हो। एक सच्चाई यह भी है कि ये सब वामपंथी रुझान वाले चाहे बुद्धिजीवी हो या पत्रकार या नेता सभी पहुँचे हुए अव्वल दर्जे के भाई-भतीजावादी होते है,जो अपने बेकार लेखों और हरकतों को भी एक-दूसरे से प्रशंशा करवाकर महान बन जाते हैं।)

उस दंगे के बारे में जो बात लिखा जा रहा है या लिखा गया है,वह काफी ही आधारहीन है,"यह सही है कि धूलागढ़ की घटना पर पश्चिम बंगाल या बाक़ी देश के मीडिया ने तूल नहीं दिया या कहें कि संयम दिखाया। इरादा इस आग को फैलने से रोकना था। बहरहाल ज़ी को यह हक़ था कि वह रिपोर्टिंग करे। लेकिन उसने जो दिखाया वह इसके इरादे के खोट को ज़ाहिर कर रहा था। उसने बताया कि "पश्चिम बंगाल में हिंदुओं का हाल वैसा ही है जैसे कि पाकिस्तान में है" और धूलागढ़ में हिंदुओं पर एकतरफ़ा हमला हुआ और उन्हें अपना घर छोड़कर भागना पड़ा। हक़ीक़त यह है कि वहाँ हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों ही एक दूसरे पर हमलावर हुए और दोनों ही समुदाय के लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा है।"

(यह सवाल तो भारत में हुए अन्य दंगों को लेकर भी उठाया जा सकता है,लेकिन इस सवाल का जवाब कोई भी मीडिया संस्थान नहीं देगी क्योंकि विचारधारात्मक पूर्वाग्रह तो सभी को ज्ञात है। याद रखें,अगर यहीं घटना किसी दक्षिणपंथी शासित राज्यों में हो जाता तो,आज जो तर्क दिया जा रहा है,वह दिया जाता कि मीडिया द्वारा संयम बरता गया?)

अंततः अब तो अदालत में ही अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी,जो कठिन कार्य नहीं होगा। लेकिन यह भी याद रखें कि गुजरात दंगों के दौरान किसतरह बरखा दत्त ने कहना शुरू कर दिया था कि मुसलमानों को चुन-चुनकर मारा जा रहा है। उस खबर में और इसमें  क्या अंतर है? लेकिन फिर भी सेकुलरिज्म और अल्पसंख्यक हित के नाम पर दोनों खबरों का विभेदीकरण कर दिया जाता है और दूसरे को सही ठहराने का प्रयास किया जाता रहा है।

Wednesday, 28 December 2016

मीडिया पर सेंसर लगाने का प्रयास होते रहता है,लेकिन सिविल सोसाइटी की नियत का पता चल जाता है!

हाल में ही पश्चिम बंगाल पुलिस द्वारा जी न्यूज के सुधीर चौधरी समेत दो पत्रकारों पर मुकदमा किया गया है,आरोप है दंगों के असंवेदनशील रिपोर्टिंग का। इस आरोप में कितना दम है,यह तो कोर्ट में ही मालूम चल पाएगा।

पर यहाँ सोचने की बात है कि जिस दंगों की रिपोर्टिंग इस जी मीडिया समूह द्वारा किया गया,उस ओर किसी अन्य मीडिया संस्थानों का ध्यान क्यों नहीं गया? कहीं कारण यह तो नहीं कि वहाँ निशाना बहुसंख्यक हिंदुओं को बनाया गया और बाकी सेकुलरिज्म और अभिव्यक्ति के झंडाबरदार शख्सियतों को मुस्लिम तुष्टिकरण का एक सुनहरा अवसर मिल गया।

यह प्रकरण एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि भारत का सिविल सोसाइटी अभी भी प्रौढ़ नहीं हुई है,साथ ही वह आरोप जो लगातार लगते रहे हैं कि ये फंडेड लोग हैं और मात्र फ्रेम के हिस्सा भर हैं,अधिकाँश तो भाई-भतीजावाद से पीड़ित बेकार हो चुके जमात का भाग भर है,को सही प्रतीत करता है।

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा एक निजी चैनल पर एकदिनी प्रतिबंध लगाया गया था तो किस तरह से लॉबिंग किया गया था,सभी को मालूम है। फेसबूक पेज,ग्रुप आदि को बनाकर किसतरह मुहीम चलाया गया था,यह भी सभी को मालूम है। हद तो तब हो गयी जब स्टूडियो में दो जोकर को माइम एक्टर के रूप में लाकर बैठा दिया गया। इन सभी घटनाओं को अभिव्यक्ति की आजादी,आपातकाल की आहट आदि से जोड़कर पेश किया गया,जबकि चैनल पर जाँच कमिटी ने देश-विरोधी रिपोर्टिंग करने का आरोप तय कर दिया था।

सवाल यहीं है कि वो लोग जो उस एक निजी चैनल(स्क्रीन काला करने वाला) के पक्ष में खड़े हुए थे और चिल्ला-चिल्लाकर बार-बार यहीं कह रहे थे कि हम तो निष्पक्ष हैं,अभिव्यक्ति के आजादी के साथ हैं और मीडिया पर लगे किसी भी प्रकार के सेंसर के खिलाफ हैं,लेकिन वो आवाज आज जी न्यूज पर हुए मुकदमे के खिलाफ क्यों नहीं उठ रहे हैं? जाहिर है उनकी अपनी स्वामीभक्ति थी,उस विरोध का कोई भी किसी भी कोण से संबंध अभिव्यक्ति,सेंसर आदि से नहीं था क्योंकि निष्पक्ष आवाज किसी के लिए भी उठते हैं।

अब भारतीय जनमानस को समझ जाना चाहिए कि इन वामपंथियों बुद्धिजीवियों का विरोध चाहे हैदराबाद दलित आत्यहत्या को लेकर हो या अखलाख वध को लेकर हो या अकादमी पुरस्कार का लौटाया जाना हो,सभी के सभी बनावटी और विचारधारा से प्रेरित फर्जी और स्वामीभक्तिपूर्ण था जो मात्र विरोध के फ्रेम का हिस्सा भर था और कुछ नहीं।

इसीकारण मुकदमे के खिलाफ अपनी गुस्सा प्रकट करते हुए सुधीर चौधरी अपने फेसबूक पेज पर लिखते हैं," यह एक गिरा हुआ कदम है जो एक चुनी हुई सरकार पुलिस के जोर पर मीडिया को दबाने की कोशिश की है क्योंकि वास्तविकता और असहज तथ्यों से दूर भागना चाहती है। जब मीडिया को सम्भाल नहीं पाते तो राज्य की मशीनरी का इस्तेमाल कर अपने प्रशासन की खामियों को छुपाना चाहते है। यह एक सामंती जमींदार प्रवृति वाली असहिष्णु मुख्यमंत्री है जो राज्य पुलिस का मनचाहे ढंग से इस्तेमाल कर रही है।

मैं इस देश के खुली सोच रखने वाले सभी व्यक्तियों के कार्यों के लिए एक रास्ता के रूप में इस गलती के सकारात्मक पक्ष को देखता हूँ ताकि फासीवादी ताकतों को उनका वास्तविक स्थान दिखाये। या एक बार फिर से स्वार्थी राजनीति प्रबल होगी? यहीं मेरा डर है।"

Sunday, 25 December 2016

   मनुस्मृति को जलाने का क्या तुक है?

        'सत्य मजबूती से अडिग रहता है,झूठ का बार-बार हमला इसमें और निखार लाता है।' ठीक ऐसा ही कुछ 'धर्मशास्त्र और हिंदुत्व' के साथ हो रहा है,यह सत्य है,विश्वव्यापी है,अमर है जिसपर झूठ के बदौलत बार-बार आघात और निखार ला रहा है,अपना परचम लहरा रहा है।

         सभी जानते हैं,किताबें अपने समय की धरोहर होती है,तत्कालीन समाज का संरचना,विशेषता और गुण-अवगुण जानने का माध्यम होती है। कोई भी किताब पूर्ण नहीं होती,उसमें खामियाँ होती है और साथ में कई विचारों का सार,नैतिकता आदि का समावेश होता है।

         अगर आपके अनुसार खामियाँ है और अगर उस किताब से परेशानी है तो उसे नहीं माने परंतु किताब को जलाकर ड्रामेवाजी क्यों कर रहे हैं? क्या दिखाना चाहते है?

         कुछ लोगों के लिये कहीं ऐसा तो नहीं हो गया है कि आंबेडकर ने जलाया था तो हमें भी करना चाहिये,उन्होंने जो कहा था क्या वह पत्थर का लकीर हो सकता है? बिल्कुल नहीं,क्योंकि बाकियों की तरह उसका समीक्षा भी हो सकता है?

         मैं बार-बार यहीं कह रहा हूँ कि किसी के विचार क्या कहता है,वह परिस्थिति और परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है। आंबेडकर के साथ भी ऐसा ही है,अगर उस दौरान मंदिर में घुसने की इजाज़त दे दी गयी होती तो वे बौद्ध धर्म नहीं अपनाते और साथ ही उनका विचार आज अलग परिप्रेक्ष्य में होता। शायद हिन्दू धर्म के बड़े हिमायती होते।

अगर आंबेडकर का अछूतोंद्धार नीति और धर्म के प्रति विचार का समीक्षा करें तो कई बातें निकलकर आती है -

       दलितों के उद्धार के लिए उनका पहला विचार था एक अछूत ही अछूत का नेतृत्व कर सकता है। उस समय की समाजिक स्थिति को देखने पर भले ही यह पहली नजर में सही लग सकता है परन्तु परिणाम की वास्तविकता इसपर संशय पैदा करेगा। इनसे पहले भी कई समाज-सुधारक जैसे-दयानंद सरस्वती,विवेकानंद और महात्मा गांधी आदि द्वारा भी दलितोद्धार का प्रयास किये गए हैं,जो अछूत नहीं थे।

        मेरा मानना है कि किसी भी दबाये हुए वर्ग(महिला,समलैंगिक,दलित आदि) का उत्थान और सशक्तिकरण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि समस्त समाज द्वारा प्रयास न किये जायें। महिला आंदोलन और महिला सशक्तिकरण जिस ऊंचाई पर आज  पहुंचा है इनके कई महिला नारीवादियों  साथ-साथ पुरुष नारीवादियों का भी प्रमुख योगदान रहा है।

        अछूत भी उसी  समाज के अंग है जिस समाज में सवर्णों द्वारा इन्हें प्रताड़ित किया गया है,अतः जब तक सवर्ण उनकी स्थिति को मान्यता नहीं देंगे तब तक ये सामाजिक रूप से सशक्त नहीं हो पाएंगे? इसकारण सवर्णों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाना चाहिए न कि इनसे अलग रहकर अलग अस्तित्व बनाने की।

         उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए आत्म-सुधार,बच्चों की शिक्षा,शराब और गोमांस का त्याग,व्यापार,हीन-भावना से ऊपर उठाने की बात कही जो पूर्णतः सही है,किसी भी समाज का विकास उन्हीं सब मूल्यों में संवृद्धि के बदौलत होता है। अगर संपूर्ण दलित समाज उनके द्वारा बताये गए इन उपायों को सही तरीके से अपने जीवन में लागू करता तो अंबेडकर के उद्देश्य को पाया जा सकता था। साथ ही समाज में प्रचलित जातिगत पूर्वाग्रह भी आज मिटने के करीब रहता।

         उनके द्वारा शासन की संस्थाओं में दलितों के लिए आरक्षण की मांग की गयी ताकि उस विषमता को दूर कर सत्ता के स्तर पर लोकतांत्रीकरण(जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व) को सृदृढ़ किया जा सके। भारत में लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब राजनीतिक स्तर के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर लागू हो। यह अलग बहस का विषय है कि आरक्षण से उनको क्या फ़ायदा हुआ और कितना उत्थान हुआ तथा कब तक जरुरत है? साथ ही गौर करने की बात यह भी है कि वो दलित जो बौद्ध धर्म अपना लिए हैं,वे आज 'हिंदू दलित' को मिले आरक्षण का फायदा उठा रहे हैं,लेकिन बाकी बौद्ध धर्म नहीं उठाता। इसका जवाब आप खुद सोंचे कि कथनी और करनी में कितना अंतर है?

और अंत में,

मुझे जाति-व्यवस्था में पूर्ण विश्वास है!

          आजादी के आंदोलन में महान योगदान देने वाले महात्मा गांधी कहते हैं,'वर्णाश्रम की अपनी जो खामियां हो,उसमें कोई पाप नहीं है,लेकिन छुआछूत है। इनका कहना था कि छुआछूत जाति-प्रथा के कारण नहीं,बल्कि यह तो'उच्च' और 'निम्न' के कृत्रिम बंटवारे का फल है। जातियां एक दूसरे की पूरक होकर काम करें,तो जाति-प्रथा में कोई जाति न उच्ची है,न कोई नीचा।(छुआछूत मिटाने से सभी भारतीय एक हो जाएंगे)'

            पूर्ण जाति-व्यवस्था का उन्मूलन असंभव है क्योंकि यह धीरे-धीरे समय के साथ सवर्ण के बीच भी पनप गया है और दलितों के बीच भी। अगर जातियों के बीच अपनापन विकसित किया जाये और प्राचीन वर्ण व्यवस्था का क्षैतिज क्रम स्थापित किया जाये तो उत्पन्न बुराइयों को काफ़ी हद तक दूर किया जा सकता है। बुराई छूआछूत में है,जाति-व्यवस्था में नहीं,इसलिये छूआछूत को समाप्त करने की जरुरत है।

            एक सवाल मैं उन सभी से पूछना चाहूंगा कि जो लोग कहते हैं,मैं जाति-व्यवस्था को नहीं मानता,जाति-उन्मूलन चाहता हूँ तो ये शुरुआत अपने घर से क्यों नहीं करते?
किसी दलित से शादी करके इसे खत्म करें,लेकिन नहीं करेंगे यह हम जानते हैं और वो भी जानते हैं और पूरा समाज भी कि क्यों?

            जवाब स्पष्ट है - क्योंकि समाज अभी तैयार नहीं है और कभी तैयार भी नहीं होगा। इसकी चिंता सभी को है। मेरे इतना व्यावाहारिकता बताने के बाद भी अगर कोई मुझे जातिवादी कहे तो वह उनका समझ का चूक है।

जाति-व्यवस्था समाप्त करना कोई समाधान नहीं बल्कि समाज तोड़ने जैसा है,वहीं छूआछूत उन्मूलन एक विकल्प जरूर है।

        

Wednesday, 21 December 2016

लव जिहाद खतरनाक स्थिति को पा चुका है -

हाल में ही दो अजीबोगरीब घटनाएं घटित हुई - पहला,बॉलीवुड से ताल्लुक रखने वाली एक दंपति ने अपने बच्चे का नाम तैमूर रखा है और दूसरा,2015 की सिविल सेवा टॉपर का शादी का फैसला(बौद्धिक लव जिहाद)।
'तैमूर' नाम का रखा जाना उसी इस्लामिक परंपरा का प्रभाव है जिसका असर हर मुसलमान पर रहता है कि अपने धर्म का प्रचार कर जन्नत के द्वार के नजदीक पहुँच जाएँ। जाहिर है तैमूर नाम रखने के पीछे मुसलमान पिता के उसूलों को तवज्जो दिया गया होगा और एक हिंदू माँ को नजरअंदाज कर दिया गया होगा क्योंकि इन्हें पहले ही पैसे और शोहरत की लालच ने लव जिहाद का शिकार बना दिया है।
ये ऐसा पिता है जो एक खूनी योद्धा पर मुसलमान होने के कारण गर्व करता है और नामकरण करके उसका उजागर भी कर दिया है। बीबीसी हिंदी अपने एक आलेख में लिखता है,"तैमूरलंग इतिहास में एक खूनी योद्धा के तौर पर मशहूर हुए। 14वीं शताब्दी में उन्होंने युद्ध के मैदान में कई देशों की जीता। कहते हैं कि तैमूरलंग को अपने दुश्मनों के सिर काटकर जमा करने का शौक था।"
दूसरे शब्दों में इन मुसलमान स्टारों द्वारा 'लव जिहाद' को बढ़ावा देने का यहीं तरीका है कि बहलाफुसलाकार हिंदू नारी से शादी करो और बाद में इस्लाम के उसूलों में पिरोकर अंतरराष्ट्रीय साजिस के तहत हिंदू जनसंख्या को कम करने का प्रयास करें। यह तो ऊँचे स्तर की बात है जिसे इतना उछाला गया,आम आदमी के बीच तो यह गंभीर रूप धारण कर चुका है।
'लव जिहाद' की पराकाष्टा का दूसरा रूप तो हमें 2015 के सिविल सेवा टॉपर के शादी के फैसले में देखने को मिला। एक लड़की जो की दलित है जिसका सरोकार हिंदू परंपरा से है,और वहीं लड़का इस्लामिक परंपरा को मानता है। इसपर हिन्दू महासभा नाम का एक संगठन लिखता है,"इससे लव जेहाद को बढ़ावा मिलेगा। इस निर्णय से पूरा हिन्दू समाज आक्रोशित है। यद्यपि गांधी जी का अहिंसा का सिद्धांत देशहित में नहीं था, परन्तु एक लोकतांत्रिक संगठन होने के कारण हिन्दू महासभा गांधीगिरी के द्वारा इस विवाह का विरोध करेगी। शीघ्र ही बुद्धि-शुद्धि यज्ञ का आयोजन होगा।"
पर इस शादी के ऐलान के कई मायने निकाले जा सकते हैं - उन दलित बुद्धिजीवियों के लिए यह जोर का तमाचा है जो परिणाम के दिन पूरे हिन्दू समाज को ब्राह्मणवाद के नाम पर गाली दे रहे थे। आज स्थिति यह हो गयी है कि ये शर्म के कारण मर रहे हैं कि हमारा दलित समुदाय एक अच्छा लड़का भी नहीं दे पाया?
दूसरा,आने वाले दिनों में कुछ लोग इस शादी को दलित-मुसलमान गठजोड़ के रूप में पेश करेंगे और अपनी राजनीतिक बढ़त बनाने का प्रयास करते नजर आएंगे।
तीसरा और अंतिम सबसे महत्वपूर्ण की यह 'बौद्धिक लव जिहाद' हैं जिसमें शब्दों के जाल में हिन्दू पढ़ी-लिखी बालिकाओं को इसतरह उलझा दिया जाता है कि वह समझ ही नहीं पाती कि सामने वाला सच्चा है या झूठा?

Sunday, 18 December 2016

राष्ट्रगान और सुप्रीम कोर्ट का तत्कालिक फैसला -

मुझे नहीं लगता कि कोर्ट के उस फैसले के सभी बिंदुओं को किसी ने पढ़ा हो? नकारात्मक मीडिया हमारे दिलों दिमाग पर इस कदर हावी हो गयी है कि किसी खबर/मुद्दे/घटना के मूल में जाने की हमारी प्रवृत्ति ही खत्म हो रही है। इंडियन एक्सप्रेस के संपादक के शब्दों में कहा जा सकता है," ऐसा है कि बुरी पत्रकारिता पाँच सालों की तुलना में आज ज्यादा शोर(हल्ला) मचाते हैं।" ( It is that bad journalism makes a lot more noise than it used to do five years ago.)
कोर्ट द्वारा दिए गए सात आदेशों में केवल एक पर ज्यादा चर्चा और मजाक बनाया गया,कारण कि कुछ दिन पहले तक ऐसी घटना आ चुकी थी कि सिनेमा घर में राष्ट्रगान बजते समय कुछ लोग खड़े नहीं हुए तो उन्हें अन्य लोगों द्वारा पिट दिया गया। अपने इस आदेश में सुप्रीम कोर्ट कहता है," सिनेमा हॉल में राष्ट्रगान बजने से पहले वहाँ घुसने और वहाँ से निकलने के रास्ते बंद होने चाहिए ताकि कोई किसी तरह का व्यवधान पैदा न कर सके जो राष्ट्रगान का अपमान करने के समान होगा। राष्ट्रगान के समाप्त होने के बाद दरवाज़े खोले जा सकते हैं।"
अन्य आदेश जैसे कि राष्ट्रगान का किसी तरह का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं हो सकता, प्रत्यक्ष या परोक्ष से राष्ट्रगान का कोई नाटकीय इस्तेमाल नहीं किया जा सकता या उसे किसी मनोरंजन कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता, राष्ट्रगान या उसका कोई हिस्सा किसी वस्तु पर नहीं छापा जा सकता, या उस तरह या उन जगहों पर प्रदर्शित नहीं किया जा सकता जहाँ उसका असम्मान होने की आशंका हो आदि पर कोई ध्यान नहीं दिया गया?
क्या आपको नहीं लगता कि आलोचकों का यह विरोध किसी ख़ास मकसद को धारण किये हुए था। आज भारत का वातावरण ऐसा बन गया है कि 'देशभक्ति बनाम देशद्रोही' का बहस परवान चढ़ा हुआ है। एकतरफ इस फैसले को दक्षिणपंथी विचार रखने वाले लोगों द्वारा स्वागत किया गया तो दूसरी तरफ एक अन्य विचार रखने वाले व्यक्तियों द्वारा मजाक बनाया गया और आलोचना किया गया।
राष्ट्रगान पर सम्मान की बात करना आलोचना का विषय हो सकता है? ये आप खुद सोचें।
एक अन्य सवाल जिसे काफी उछाला गया,वह कि राष्ट्रभक्ति को क़ानून से बाँधना सही है?
जहाँ तक मैंने पाया है,भारत अभी परिपक्व राष्ट्र की श्रेणी में नहीं आता। क़ानून को मानना स्वेक्षा पर आधारित न होकर अधिकाँश मामलों में डर पर आधारित है। ट्रैफिक पुलिस का डर ही हमें बत्तियों के इशारों पर चलने को मज़बूर करता है। आये दिनों ऐसी तमाम घटनाएं घटित हो रही है जिससे भारत राष्ट्र के सामने चुनौतियाँ उत्पन्न हो गयी है। देश विरोधी नारे लगाकर,असहमति का हक करार दिया जा रहा है,सेना जिसके बदौलत हम अपनी बातों को कहने का हिम्मत रखते हैं पर तरह-तरह का लांछन लगा दिया जाता है। ऐसी परिस्तिथि में राष्ट्रवाद की बुनियाद को मजबूत करने का एक ही मार्ग नजर आता है - कानून का डर।
इसकारण सुप्रीम कोर्ट का फैसला स्वागतयोग्य है।

Saturday, 17 December 2016

समाज का नेतृत्व 'सर्वहारा की तानाशाही' में नहीं बल्कि 'बुद्धिजीवी वर्ग की तानाशाही' में होगी!

आज के बुद्धिजीवी खासकर भारत के तो,मार्कूजे के इस उद्धरण को अपने जेहन में इस कद्र उतार चुके हैं कि यह एक छद्म बातें,कल्पना में ही सही,वामपंथी बुद्धिजीवियों के लिए यथार्थ लगने लगी है/थी। हालांकि यह बात अलग है कि मार्कूजे 'व्यक्ति के आनंद' पाने की अपनी संकल्पना के कारण साम्यवादी और पूँजीवादी दोनों तरह के व्यवस्थाओं का विरोध किया है।
'सर्वहारा की तानाशाही' और 'बुद्धिजीवी वर्ग की तानाशाही' दोनों में बेहतर कौन होगा/है? इस विवाद में मुझे नहीं पड़ना है। बस इतना ही कहूँगा कि 'सर्वहारा की तानाशाही' को तो 1917 से ही देख रहे हैं,धीरे-धीरे जब इसका मुखौटा हटने लगा तो इसके वास्तविक रूप को सभी ने देखा की किस तरह इसने एक दमनकारी राज्य का रूप अख्तियार कर लिया। 'बुद्धिजीवी वर्ग की तानाशाही' तो मुझे मिचेल्स की 'अल्पतंत्र के लौह नियम' का प्रतिबिंब ही दिखाई दे रहा है,अंतर केवल भागीदारों को लेकर है।
इसे भारत के संबंध में कुछ उदाहरणों को लेकर असानी से समझा जा सकता है - नोटबंदी और जेएनयू में लगे देश-विरोधी नारे।
ऐसे तो इन मुद्दों पर मैं बहुत कुछ लिख चुका हूँ,इसलिए यहाँ दोबारा वर्णन करना उचित नहीं है;लेकिन आपसभी को याद होगा कि इन सारे प्रकरण में किस तरह समाज को बुद्धिजीवियों(वामपंथी) द्वारा गुमराह किया गया और बरगलाया गया।
दुनिया का कोई भी राष्ट्र,राष्ट्रवाद की बुनियाद पर देश-विरोधी नारों को सहन नहीं कर सकता। लेकिन इन नारों को भारत में यहीं वामपंथी बुद्धिजीवी 'असहमति का हक' करार देकर मार्कूजे के हिंसा पर सहमति वाली विचार पर मुहर लगा दिए कि 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' और 'लड़ के लेंगे आजादी' को मार्क्स के विचारों से पाया जा सकता है।
मैं तो स्पष्ट रूप से मानता हूँ कि ये सभी जो 'असहमति का हक' करार दे रहे थे उन्होंने प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से हिंसा का समर्थन किये,ठीक उसी तरह जिसतरह ये माओवादी जो हिंसा करते रहते हैं से सहानूभूति रखते हैं और सरकार के नियंत्रण के प्रयास को दमन कहकर पुकारते हैं।
इनको निर्देश देने और समझदारी का इशारा करने के लिए एक ही बात कहूँगा,"आज राज्य के पास पहले की तुलना में किसी भी देश-विरोधी आंदोलन को कुचलने के लिए अधिक शक्ति और साधन मौजूद है।"
दूसरा मामला 'नोटबंदी' को लेकर हालिया अफवाह और विवाद है। इस परिस्थिति में तो बुद्धिजीवियों ने अपनी सारी हदें पार कर दी है। मामले को कोर्ट में पहुँचा दिया गया और समाज में बेवजह के बहसों का दौर चल रहा है,नित्यदिन नए आरोप लग रहे हैं।
जबकि कल ही सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट कहा,"अपनी आर्थिक और राजकोषीय नीतियों का सबसे अच्छा जज होने के लिए सरकार पर यह भरोसा किया।"
(The court said It trusted the government to be the best judge of its own economic and fiscal policies.)
भले ही मार्कूजे के उद्धहरण 'बुद्धिजीवी वर्ग के तानाशाही' को अपने जेहन में उतार लिए हैं,लेकिन ये सभी वामपंथी बुद्धिजीवी केंद्र में मौजूद सरकार,जिसकी प्रकृति दक्षिणपंथी है,के कारण हर मामलों का नकारात्मक प्रवक्ता(negative spokesperson) बन गए हैं।
यहीं वह वजह है कि आज इनके द्वारा की जा रही सरकारी आलोचना 'अयथार्थवादी और भावुकतापूर्ण' बनकर रह गयी है।

Thursday, 15 December 2016

रामराज्य रूपी भारत में राम रूपी मोदी!

लगता है भारत अपने अतीत के गौरव को बहुत जल्द पा लेगा। रामराज्य स्थापना की दिशा में अब तक का सबसे मजबूत कदम 'नोटबंदी' को धरातल पर उतारकर भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा देने का कोशिश रंग ला रही है।

भारत फल-फूल रहा है। 'नींदमग्न सुंदरी' जाग उठी है। हम भाग्यशाली है। हम और हमारे बच्चे रंगीन सपनों की इस दुनिया में आगे बढ़ रहे हैं। मोदी पूरे विश्व में भारत की छवि विश्व गुरु वाली बनाने को प्रयत्नशील है।

वर्तमान सरकार एक नए भारत की तस्वीर बनाएगी। यह विकास का ही परिणाम है कि विलास से परिपूर्ण हम मेट्रो ट्रेन में सफर कर रहे हैं। कोई ऐसा व्यक्ति नहीं होगा जिसके पॉकेट में मोबाइल नहीं होगा? यह सब इसी विकास की पहचान है। यहीं तो हर व्यक्ति को चाहिए।

भले ही विकास के मायने हर व्यक्ति के लिए अलग हो। किसी के लिए यह लाभकारी सिद्ध होता है तो किसी के लिए विनाशकारी लेकिन फिर भी यहीं वह माध्यम है जिसके बदौलत हम उस विनाश को भी कम कर सकते हैं और तरक्की की नयी इबारत भी लिख सकते हैं। इससे हम भौतिक सुख तो पा सकते हैं,लेकिन मानसिक और अध्यात्मिक सुख के लिए हिंदुत्व हमारे सामने है। विकास के साथ-साथ इस हिंदुत्व को भी अपनाने की जरुरत है।

आरोप तो लगते रहते हैं। रामराज्य में भी राम पर सीता को लेकर आरोप लगे और अंततः सीता को जंगल भेजना पड़ा। यह ताज्जूब की बात नहीं।

हमें तो वर्तमान प्रधानमंत्री में राम का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा है,वे जनता के सुख और आजादी के लिए अपने परिवार और अपनी प्यारी पत्नी सीता को भी त्याग दिए,ठीक उसी तरह नरेंद्र मोदी भी देश-जनता के लिए अपनी पत्नी और परिवार की कोई तवज्जो नहीं दी,आज प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनका परिवार आम नागरिक की तरह जीवन-वशर करता है। जिस धोबी द्वारा रामराज्य में सीता की चरित्र पर लांछन लगाया गया था वो बाद में राम की महानता पर रोता घूम रहा था और मुग्ध था।

आज भी कई लोग और नेता मोदी पर कोर्ट,डिग्री,बीबी और घूस का आरोप लगाते हैं और मुंह का खाते हैं,ठीक उसी तरह जिसतरह वह धोबी जो दूसरों का मैल तो धोता था लेकिन अपने गिरेबान का नहीं। ये नेता और लोग मोदी रूपी राम में तो कमियाँ देख लेते हैं लेकिन अपनी नजर नहीं आती। इन्हें उस रामराज्य के धोबी से तो कम नहीं आँका जा सकता?

Wednesday, 14 December 2016

'दलित ईसाई'(वो हिन्दू दलित जो ईसाई बने हैं) भी छूआछूत के शिकार है!

महान हिन्दू धर्म के आध्यात्मिक पुस्तकों में यह स्पष्ट रूप से लिख दिया गया है कि दूसरों का धर्म डरावना होता है तो फिर क्यों आज के दलित अपने मूल हिन्दू धर्म को छोड़कर बौद्ध या ईसाई या इस्लाम कबूल कर रहे हैं?
इनका वास्तविक अधिकार इसी हिन्दू धर्म में ही मिल सकता है। किसी और धर्म में नहीं। इंडियन एक्सप्रेस नामक अंग्रेजी के समाचार पत्र में छपी एक खबर के मुताबिक "उच्च स्तर पर नेतृत्व में उनकी (दलित ईसाइयों की) सहभागिता न के बराबर है।"
बीबीसी पर छपी एक खबर में कहा गया है कि इस अख़बार के मुताबिक़ ये दस्तावेज़ कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ़ इंडिया में जारी किए गए। ये समुदाय की सर्वोच्च निर्णायक संस्था है। ये सामाजिक तौर पर पिछड़े लोगों से हर तरह का भेदभाव ख़त्म करने और उनके उत्थान के लिए प्रयास करती है। लेकिन अब भारत की कैथोलिक चर्च ने पहली बार आधिकारिक तौर पर मान लिया है कि दलित ईसाइयों को छूआछूत और भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
कुछ दिन पहले मैंने वामपंथी इतिहासकारों के कपटजाल पर कई सारे ब्लॉग लिखे थे,जिसमें रामशरण शर्मा नाम के एक प्राचीन भारत के इतिहासकार 'हिन्दू धर्म और परंपरा' को केवल ब्राह्मणवाद मानकर नकार देते हैं।
उसमें मैंने लिखा था.....
       रामशरण शर्मा 'मौर्य शासन के महत्त्व' वाले अध्याय में लिखते हैं,"ब्राह्मणों की ओर से प्रतिक्रिया की शुरुआत अशोक की नीति के परिणामस्वरुप हुई।"
       यहाँ इन सारी पंक्तियों को लिखना तो संभव नहीं,लेकिन इसका सार है -ब्राह्मणों का अशोक के प्रति विद्वेष हो गया क्योंकि इन्होंने बलि पर रोक लगा दी,स्पष्ट है कि ब्राह्मणों की आमदनी पर असर पड़ा होगा और गुजर-बसर प्रभावित हुआ होगा।
       पर सवाल यह है कि
        "बलियों का कितना हिस्सा ब्राह्मणों को दक्षिणा स्वरूप प्राप्त होता होगा ?" इस पर कुछ नहीं कहा गया है।
       अगर वास्तव में सभी लोग बालियाँ चढ़ाया करते थे तो अशोक के समय(2300 वर्ष पूर्व) संचार व्यवस्था इतनी मजबूत तो नहीं थी कि अचानक सब बंद करा दिया गया होगा। लोग आसानी से अपनी परंपराओं को छोड़ा नहीं करते जबतक कि उसका स्थान लेने कोई आधुनिकता का प्रतीक या दूसरा न आ जाए। उस समय इस तरह का कोई संकेत नहीं मिलता। अगर दबाव डालकर ऐसा कराया गया होता तो विद्रोह के संकेत जरूर मिलते जो स्पष्ट करने के लिए काफी है कि ब्राह्मणों में कोई विद्वेष नहीं हुआ था।
         खैर..... ये बात तो आपको भी मालूम होगा कि इतिहास अटकलबाजियों पर नहीं चलती,कुछ भी कहने से पहले प्रमाण पेश करना होता है,लेकिन शर्मा जी द्वारा किताब में कोई भी साक्ष्य इस मामले में दिया ही नहीं गया है।
         प्रमाण की बात तो अलग रही,लेकिन ज़रा गौर कीजिये कि किन-किन जुमलों को जोड़कर दोषारोपण किया गया है -
        "हिन्दू धर्म का अर्थ है - ब्राह्मणवाद।"
        "ब्राह्मण का लक्ष्य है - आमदनी कमाना।"
        जो कि सरासर गलत है,ऐतिहासिक स्त्रोत तो कभी इस तरह का वर्णन नहीं करते। लेकिन सभी जानते हैं कि ब्राह्मणवाद नाम का कोई चीज ही नहीं है।
       ईसाई धर्म को लेकर कई तर्क देते हुए ये कहते हैं कि इसमें जाति नामक भेदभाव का कोई निशान नहीं,लेकिन जब यह दृष्टिगोचर हो गया कि चर्चों में 'दलित ईसाईयों' को अलग बैठने की व्यवस्था की जा रही है तो इतिहासकार महोदय को 'दलित ईसाईयों' के लिए भी आरक्षण की मांग कर देना चाहिए,लेकिन फिर भी ये आजतक यह बात दोहराने में लगे हुए हैं कि परिभाषा के अनुसार इस वर्ग(दलित) का ईसाई धर्म में कोई अस्तित्व नहीं है। (सितंबर,2016 का ब्लॉग)
अब तो खुद ईसाई धर्म यह मान चुका है कि दलित ईसाईयों के साथ छूआछूत और भेदभाव है तो क्या ये इतिहासकार जो झूठ के बदौलत अपनी दुकानदारी चलाते रहे हैं,वे आज माफी मांगेंगे या वहीं राग अलापते रहेंगे कि परिभाषा के अनुसार इस वर्ग(दलित) का ईसाई धर्म में कोई अस्तित्व नहीं है?

Tuesday, 13 December 2016

आज का सबसे प्रमुख समस्या - व्यक्ति की है!

आधुनिक सभ्यता की समस्याओं में से एक और सबसे ज्वलंत समस्या है-व्यक्ति की समस्या। जो एक ओर पूँजीवादी समाज तथा दूसरी ओर अत्यंत केंद्रीकृत राज्य-व्यवस्था अर्थात समाजवाद द्वारा लगातार कुचला जा रहा है। शायद इन सबसे ज्यादा बदतर स्थिति तो मिश्रित राज्य-व्यवस्थाओं में है,भारत में व्यक्ति की स्थिति ऐसी हो गयी है कि "धोबी का कुत्ता न घर का,न घाट का"।
इसीकारण 'व्यक्ति' में एक अजीब किस्म का अलगाव(alienation) का प्रवृति का विकास होते जा रहा है। अगर भारत के संदर्भ में देखें तो इस अलगाव के कारण हमारे सामने पाँच प्रकार के व्यक्तियों का पहचान आता है -
-एक,किसी खास पार्टी/संगठन का समर्थक,जिसे उपमावश 'भक्त' कहा जा रहा है।
-दूसरा,एकतरफा विध्वंशक आलोचक,जिसपर फंडेड होने का आरोप लगता रहा है।
-तीसरा,संतुलित विचार रखने वाले,फिर भी कोई पैमाना नहीं कि क्या वे वाकई संतुलित हैं?
-चौथा,वे जो निष्पक्ष होने का दावा करते हैं,पर अलग-अलग व्यक्तियों के लिए सच्चाई कुछ और ही रहता है।
-पाँचवा व अंतिम,अन्य छोटे-छोटे पार्टियों/संगठनों के समर्थक।
"इन सबमें से कुछ या इन सबसे अलग जहाँ तक साधारण नागरिक का प्रश्न है,वह अपना सारा समय अपने आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कठिन प्रयासों को करते हुए और इसी चिंता में अपना कीमती समय बिता देता है।"
ये साधारण जन मामूली किसान से लेकर दिहाड़ी मजदूर से निम्न मध्यमवर्गीय परिवार को अपने अंदर समेट लेता है,इन्हें ही किसी अचानक बदलाव की सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है - नोटबंदी एक उदाहरणस्वरूप ही है।
इस साधारण जन को वास्तव में सांस्कृतिक,नैतिक और सामाजिक विकास का मौका ही नहीं मिलता। अपने कठिन प्रयासों ताकि आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके,के कारण व्यक्ति का व्यक्ति से संपर्क लगभग टूट गया है या टूटते जा रहा है। कहीं-कहीं होने वाले छोटे-मोटे आंदोलनों में शिरकत से तो संपर्क बनता है,लेकिन कभी आंदोलन के उद्देश्य प्राप्ति और कभी उद्देश्य के भटकाव से आंदोलन के ठप हो जाने के कारण अंततः व्यक्ति पुनः अलगाव की स्थिति में ही आ जाता है।
इसकारण इस 'अलगाव' को दूर करने का वक्त आ गया है,इसकारण सामाजिक स्तर पर नए प्रयास की जरुरत है या हो रहे प्रयासों जैसे - संघ का शाखा या अन्य संगठनों के क्रियाकलाप में से बेहतर को आपको ही चुनना है,पर ध्यान केंद्रित किया जाए या नए किस्म के राज्य-व्यवस्था की जरुरत है जो व्यक्ति के समस्याओं के अलगाव का हल ला सके और दुनिया को एक आदर्श दे सके।

मोदी और नोटबंदी : मोदी आलोचना (अवलोकन-4)


(भाजपा के लिए कहीं शाइनिंग इंडिया का दोहराव तो नहीं?)
नोटबंदी का फैसला पूरे दूनिया में उन ऐतिहासिक फैसलों में से एक माना जाएगा,जिसे अधिकांश राजनेता लेने का जोहमत नहीं उठा सकते। आखिर कहा ही गया है,सबसे कठिनतम कामों में एक 'निर्णय-निर्माण' है जिससे आपके व्यक्तित्व का निर्धारण हमेशा के लिए हो जाता है। मोदी का यह वहीं निर्णय-निर्माण का क्षमता है जो शायद सफलता के बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में महान बना दे।
पर इस फैसले को लेकर दो तरह के विवाद और विमर्श देखने को मिल रहे हैं - पहला,नोटबंदी का फैसला तो अच्छा है लेकिन इसका प्रबंधन और तैयारी अच्छे से नहीं किया गया। राज्यसभा में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसी समस्या की ओर इशारा किये हैं और दूसरा,मोदी द्वारा अचानक फैसला लेकर आमलोगों,किसानों और मजदूरों के लिए परेशानी खड़ा कर दिया गया है,विमर्श के इस कड़ी का अगुवाई उन तमाम राजनेताओं द्वारा किया जा रहा है जो मोदी के धूर विरोधी और विपक्ष में है। पर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट तौर पर निर्देश देते हुए कह दिए हैं कि मैं समझता हूं कि मुद्दा ये नहीं है कि सरकार ने पूरी तैयारी नहीं की। ऐसे लोगों की पीड़ा इस बात की है कि सरकार ने किसी को तैयारी करने का समय नहीं दिया।
अवलोकन का शुरुआत दूसरे प्रकार से करते हैं कि कुछ राजनेताओं का विरोध का असलियत क्या है? मुझे तो यह केवल बनावटी और खोखला लगा। शुरुआती दौर में मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था केजरीवाल सरीखे कुछ नेता जो नोटबंदी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं,उनके पास पर्याप्त प्रमाण और सटीक आधार है। पर ऐसा नहीं था - केजरीवाल का आरोप एक बार फिर निराधार साबित हुआ। इसी कड़ी में इन्हीं द्वारा इनकम टैक्स द्वारा कुछ असत्यापित दस्तावेज के आधार पर मोदी पर 25 करोड़ का घुस लेने का आरोप लगाया गया था,जिसे लेकर प्रशांत भूषण द्वारा एक याचिका भी दायर किया गया था,उस दस्तावेज को ही सुप्रीम कोर्ट जीरो और फर्जी बता चुकी है और आगे जांच के लिए 15 दिसंबर तक ठोस सबूत देने को कहा है। मतलब यह कि मोदी को कटघरे में खड़ा करने वालों को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है।
विपक्ष द्वारा भारत-बंद का प्रयास भी पूरी तरह असफल हो गया और इनका खोखलापन उभरकर सामने आ गया कि नोटबंदी पर ये एकजूट नहीं है और न ही जनता को ही इसके खिलाफ कर सके,जो स्पष्ट करने के लिए काफी है कि जनता का बड़ा तबका यह मान रहा है कि नोटबंदी के अच्छे परिणाम आ सकते हैं,एक उम्मीद की किरण है,एक आशा है और भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग शायद अंतिम अवस्था में है।
अब अगर हम विमर्श के पहले प्रकार पर आयें तो यह मुझे भी लगता है कि नोटबंदी को लेकर प्रबंधन और व्यवस्था अच्छे से नहीं किया गया। राज्यसभा में मनमोहन सिंह अपने भाषण में कहे,"प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दलील दे रहे हैं कि काले धन पर लगाम कसने, जाली नोटों के प्रसार को रोकने और चरमपंथी गतिविधियों को मिलने वाले पैसों को नियंत्रित करने का यह तरीका है। मैं इन उद्देश्‍यों से असहमत नहीं हूं। लेकिन मैं इतना जरूर कहना चाहूंगा कि नोटबंदी की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर कुप्रबंधन किया गया है। इसके बारे में समूचे देश में कोई दो राय नहीं है। ये कहा जा रहा है कि लंबी अवधि में इस कदम का फायदा होगा. ऐसा कहने वालों को मैं जाने माने अर्थशास्त्र के दार्शनिक कीन्स के शब्द याद दिलाता हूं कि आखिर में तो हम सबको मर ही जाना है।"
वहीं जाने-माने अर्थशास्त्री और नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगड़िया कहते हैं,"नकदी की दिक्कत तीन महीने तक रहेगी। केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले से देश के भीतर आर्थिक गतिविधियां और वृद्धि दर प्रभावित होंगे। और ऐसा हो रहा है। यह सिस्टम में नकदी की कमी के कारण हो रहा है। ये कमी तीन महीने तक बनी रह सकती है। समस्या धीरे-धीरे सुलझाई जा रही है, प्रणाली में नकदी डाली जा रही है। साथ ही उन्होंने कहा कि सिस्टम में नकदी की स्थिति एक पखवाड़े पहले की तुलना में अब काफी बेहतर है।" जो सरकार के पक्ष को बखूबी बयान कर रहा है।
नोटबंदी को लागू करने के लिए जो व्यवस्था की गयी वो पर्याप्त नहीं है और आज लगभग 20 दिनों बाद भी स्थिति में सुधार देखने को नहीं मिल रहा है। कई एटीएम बंद पड़े हैं,अधिकांश में कैश ही नहीं है। अब लोगों का गुस्सा खुलकर नजर आ रहा है,जिसे मैंने खुद एहसास किया जब कल रात में पैसे निकालने के लिए लगभग 2 घंटे तक लाइन में खड़ा रहा,कुछ लोगों का गुस्सा तो और बढ़ गया जब 2000 के नोट प्राप्त हुए,खुले का समस्या बना हुआ है लेकिन मामूली प्रयास के बाद तो मुझे खुले मिल गये।
अब यह देखना जरूरी हो गया है कि नोटबंदी से कितना काला धन बाहर आ रहा है? वक्त का बात है,सरकार का साथ देते हुए इंतजार तो करना ही पड़ेगा क्योंकि और भी तो भ्रष्टाचार मिटाने का कोई रास्ता नहीं है हमारे पास? यह जगजाहिर है कि जब समाज बुराई समाप्त करने में असफल हो जाता है तो उसे कानून के माध्यम से ही दूर किया जाता है।
(नोटबंदी का दक्षिणपंथी व्याख्या और 'कहीं भाजपा का हश्र नोटबंदी के कारण शाइनिंग इंडिया जैसा तो नहीं' को अगले आलेख में पढ़ें।)