Sunday, 20 December 2015

क्या हम असचेत और अतार्किक जनमत हैं?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
        पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम(UNDP) द्वारा जारी 'मानव विकास सूचकांक' में हम 188 देशों की सूची में 130 के ऊपर रहे। आलम यह है कि बांग्लादेश,पाकिस्तान और इराक़ भी हमसे लिंग-भेद यानी नारी-सशक्तिकरण के स्तर पर बेहतर हैं। शर्म की बात है।
         हम हर पांच साल पर सरकार चुनते हैं,लोेकिन अपनी समस्याओं को नहीं समझ पाते। लगभग हर चुनाव का मुद्दा जाति,धर्म,संप्रदाय,दंगा आदि हो जाता है। हम इस मुद्दे को चुनावी रणक्षेत्र में उछालने का जद्दोजहद नहीं करते कि आखिर क्यों गरीब और गरीब होते जा रहे हैं तथा अमीर और अमीर होते जा रहें हैं?
        हालिया प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2000 में देश की कुल संपत्ति का 37% भाग धनी लोगों के पास था,जो अब वर्ष 2014 में बढ़कर 70% हो गया है यानी अगर विकास हुआ है तो केवल एक फीसदी धनी वर्ग का।
         लेकिन कई टिप्पणीकार 'अल्पतंत्र के लौह नियम'(IRON LAW OF OLIGARCHY) के पहलू को लेकर सही साबित करने का प्रयास करते हैं कि 'सत्ता का केंद्रीकरण' कुछ लोगों के हाथों में ही होता है और पैसे पर भी लागू करते हैं,जो एक सार्वभौमिक सत्य है। इसे 'अभिजन वर्ग सिद्धांत'(ELITE CLASS THEORY) का  समर्थन प्राप्त है। फिर भी इस तरह के सिद्धांत की आलोचना और एक विकल्प के रूप में कार्ल मार्क्स द्वारा 'धन के विकेंद्रीकरण' पर आधारित एक सिद्धांत दिया गया,यों कहें कि विचारधारा। यह कितना सफल हुआ है,हम सभी अच्छी तरह जानते हैं।
         मूल सवाल यह है कि चुनाव के दौरान जनता के बीच यह मुद्दा क्यों नहीं बनता कि जब हम जीडीपी के मामले में दुनिया के देशों में शीर्ष दस में हैं,तो मानव विकास में 185 देशों में 130वें या 135वें स्थान पर क्यों हैं?
यह हमारी अपनी विकास का बात है,अगर ऐसा नहीं करते हैं तो ये असचेत और अतार्किक होने का पहला प्रमाण है। क्योंकि हमें पता है,प्रजातंत्र में सबको सही रास्ते पर रखने का काम करता है-सचेत और तार्किक जनमत।
इस बात का विश्लेषण करना अति-आवश्यक है कि हम 'मानव विकास सूचकांक' में इतने पिछड़े क्यों है?
मानव विकास सूचकांक शिक्षा,स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा के गणना के आधार पर निकाला जाता है।
एक बड़ा कारण जो HDI में भारत को पीछे रखता है,वह है-शिक्षा को लेकर भयानक खाई। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था काफी महंगी हो गयी है। सरकारी शिक्षा व्यवस्था की ओर रुझान काफी काम हुआ और निजी शिक्षा व्यवस्था तक पहुँच कुछ अमीर घरानों की ही है। शिक्षा ही वह माध्यम है,जिसके बदौलत हम तरक्की,आत्म-विश्वास,विकास आदि को पा सकते हैं। लेकिन फिर भी हम शिक्षा को लेकर कोई आंदोलन नहीं करते। यह हमारा असचेत और अतार्किक होने का दूसरा प्रमाण है।

         आंकड़ों से साफ़ है कि आर्थिक उदारीकरण के बाद देश में आर्थिक विकास तो हुआ लेकिन इसका लाभ कुछ लोगों तक ही सिमट कर रह गया। लेकिन मैं इसे आर्थिक विकास(ECONOMIC DEVELOPMENT) नहीं बल्कि आर्थिक संवृध्दि(ECONOMIC GROWTH) कहूँगा। विकास का व्यापक अवधारणा है,जो मात्रात्मक के साथ-साथ गुणात्मक परिवर्तन भी लाता है,जबकि संवृद्धि का दायरा केवल मात्रात्मक होता है। ये बात सही है कि 'आर्थिक संवृद्धि' के जरिये ही हम 'आर्थिक विकास' के लक्ष्य को पा सकते हैं,लेकिन इसका गारंटी देना कठिन है कि विकास गुणात्मक परिवर्तन को भी लाएगा। इसी समस्या को ध्यान में रखकर 'मानव विकास' की अवधारणा अस्तित्व में आयी जो गुणात्मक संवृद्धि की बात करता है और वास्तविक विकास का प्रतिक है। फिर भी यह उन सभी मामलों को शामिल नहीं करता,जैसे-अच्छी प्रशासन और भ्रष्टाचार से मुक्ति आदि। विकास में इन अवधारणाओं को शामिल करने के लिए भूटान में प्रचलित 'सकल खुशहाली सूचकांक' ज्यादा लाभकारी होगा।
         हाल में ही प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में 74% लोग अर्थव्यवस्था के मामूली शब्द 'मुद्रास्फीति','बैंक दर','WPI' आदि को भी नहीं समझ पाते। इस स्थिति में मानव विकास और मानव खुशहाली  करना बेमानी होगी।
        यहीं कारण है कि की राजनीतिक पार्टियां आर्थिक संवृद्धि को आर्थिक विकास बताती है और चुनाव में  भरपूर फायदा उठाती है। अब आप सभी सोच रहें होंगे कि भारत में क्या होता है आर्थिक संवृध्दि या आर्थिक विकास? तो जवाब है भारत में संवृद्धि(केवल मात्रात्मक) होता है,विकास(मात्रात्मक और गुणात्मक दोनों) नहीं।          हमें ऐसे शब्दों की आधारिक जानकारी प्राप्त करने के लिए एक विशेष मुहीम चलाने की जरुरत है,ताकि सरकार जगह-जगह खुली कैंप लगाकर सभी वर्गों को शिक्षित कर सके। जब हमें जानकारी होगी तब ही हम चुनाव के दौरान मुद्दों को उठाएंगे और वास्तविक विकास हो पायेगा। गुणात्मक संवृद्धि तभी हमारे लिए यथार्थ बनेगा नहीं तो दस्तावेजी संवृद्धि पर ही अटकें रहेंगे। अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो यह हमारा असचेत और अतार्किक होने का तीसरा प्रमाण है।

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