Thursday, 17 December 2015

हममें संभावना भरा हुआ है?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
         काली रातें इस बात का आभास दे देती है कि कुछ अशुभ होने वाला है,लेकिन हम उस ओर ध्यान नहीं देते जब फलक सफ़ेद बादलों से आच्छादित हो और शुभ होने का संकेत देता हो। मानव मस्तिष्क नकारात्मकता की ओर तेजी से अग्रसर होता है जो एक प्रमाणित तथ्य है। यहां निवास करने वाले अगर इस छोटी सी रहस्य को पहचान लें और अपनी व्यक्तित्व का निर्धारण 'सकारात्मकता के सिद्धांत' पर करें तो पूरा समाज उस स्थिति को पा जाएगा जिसकी कल्पना महान विचारकों ने किया है।

        परन्तु एक सवाल जो सभी के मन में कौंध रहा होगा कि क्या यह संभव है?
'एटीच्यूड'(ATTITUDE) प्रत्येक व्यक्ति का सार्वभौमिक विशेषता होता है जो सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हो सकता है। संज्ञानात्मक(COGNITIVE),संवेदनात्मक(AFFECTIVE) और अनुभवनात्मक(BEHAVIORAL) वे मूल अवयव हैं,जो किसी के 'एटीच्यूड' का निर्धारण करते हैं। इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं,जैसे कि 'बलात्कार की सजा के लिए उम्रकैद का प्रावधान'। ऐसे मुद्दों पर लोगों के विचार को जानकर हम उनके 'एटीच्यूड' का पता भी लगा सकते हैं। अधिकांश का मानना होगा कि उम्रकैद का प्रावधान,बलात्कार की बढ़ती संख्या पर अंकुश लगाएगा। जो लोग इस बात को मानते होंगे वे इस तरह का हरकत करने से हिचकेंगे। लेकिन लोगों के 'एटीच्यूड' का तीसरा पक्ष तब सामने आएगा जब किसी को बलात्कार लिए उम्रकैद की सजा दे दी गयी हो। तब लोग या तो उसके प्रति संवेदना व्यक्त करेंगे या सजा का समर्थन करेंगे। अगर हम दूसरा उदाहरण लेकर देखें जैसे कि 'सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है' तो इस संबंध में 'एटीच्यूड' के तीनों अवयवों का स्वरुप बदल जाएगा। फलस्वरूप स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति का 'एटीच्यूड' किसी घटना के प्रासंगिकता और प्रभाव के आधार पर सकारात्मक और नकारात्मक होता है। ताजा उदाहरण 'निर्भया बलात्कार कांड' को लेकर देख सकते हैं। बालिग़ आरोपी को उम्रकैद मिलना उतना चर्चा का विषय नहीं रहा जितना कि नाबालिग आरोपी का सजा तय करना।

        यह तथ्य स्पष्ट हो चुका है कि किसी व्यक्ति का 'एटीच्यूड' 'घटना' की प्रासंगिकता और होने वाले प्रभाव पर निर्भर करता है। शोधों द्वारा ये भी प्रमाणित किया जा चूका है कि अनहोनी घटना,बुरी वारदात और डरावनी कहानियाँ व्यस्कों के अपेक्षा बच्चों को ज्यादा प्रभावित करते हैं। ये सारगर्भित तथ्य भी सभी जानते होंगे कि किसी इंसान में मूल्य का विकास का आरंभ परिवार से ही होता है,तदुपरांत समाज,स्कूल आदि उसे प्रौढ़ और मजबूत करते हैं। यहीं मूल्य जो किसी के 'एटीच्यूड' को सकारात्मक और नकारात्मक बनाता है। अगर नकारात्मकता को बढ़ावा देने वाले घटनाओं से बच्चों को दूर रखा जाए,तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि हम एक ऐसे समाज  निर्माण कर पायेंगे जो 'सकारात्मकता के सिद्धांत' पर आधारित हो।

हमारा रुझान ऐसे काबिलियत को विकसित करने होना चाहिए, बदौलत हम केवल समस्या को न गिनायें बल्कि उन समस्याओं में भी एक छोटी सी सुराख खोजकर समाधान कर सकें। यह सत्य ही कहा गया है कि प्रत्येक समस्या अपने साथ अपने बराबर का और अपने से भी बड़ा अवसर साथ लाती है।