Saturday, 5 December 2015

जाति-व्यवस्था:अंबेडकर और गांधी के विचार

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
   
        प्रसिद्ध इतिहासकार रामशरण शर्मा कहते हैं,"श्रम-विभाजन का जो काम रोमन साम्राज्य में कोड़ों के मार के डर से कराया जाता था,भारत में वहीं काम 'वर्ण-व्यवस्था' के जरिये आसानी से कराया जा सका,जो ब्राह्मणों के दिमाग का उपज था। जिसके बदौलत प्राचीन काल में एक सशक्त और आदर्श सामाजिक व्यवस्था का निर्माण किया जा सका था।"
        लेकिन उस समय जिस आदर्श 'वर्ण-व्यवस्था' का गूँज,भारत को गुँजायमान करती थी। धीरे-धीरे प्रवर्तित होकर आज व्यवहार में 'जाति-व्यवस्था' का रूप ले चुका है,साथ ही इसमें कई बुराईयाँ भी व्याप्त हो गयी है।
        आधुनिक भारत में कई विद्वानों और समाज-सुधारकों द्वारा इन सामाजिक दोषों को दूर करने का प्रयास किया गया। इन सबका व्याख्या यहां नहीं की जाएगी। चुकी यह आलेख अंबेडकर पर कड़ी का दूसरा भाग है,जिनका जाति-व्यवस्था को लेकर महात्मा गांधी से बड़ा वैचारिक विरोध रहा है,इसी का विश्लेषण करने का प्रयास यहां किया जाएगा।(पहले भाग को यहां पढ़े-भीमराव रामजी अंबेडकर:दलितों का मसीहा)

1930 का दशक 
         अंग्रेजों की 'बांटों और राज करो' की नीति का एक और असली रूप अगस्त 1932 में 'सांप्रदायिक पुरस्कार' के रूप में सामने आया। इसके तहत प्रत्येक अल्पसंख्यक समुदाय के लिए विधान मंडलों में कुछ सीटें सुरक्षित की गयी थी। जिनके लिए सदस्यों का चुनाव पृथक निर्वाचन-मंडलों से होना था। यानी मुसलमान सिर्फ मुसलमान को और सिख सिर्फ सिख को वोट दे सकता था।
         मुसलमान,सिख और ईसाई पहले से ही अल्पसंख्यक थे,लेकिन अब इस नए क़ानून द्वारा दलित(आज अनुसूचित जाति कहा जाता है) को भी अल्पसंख्यक करार दिया गया।
        परन्तु दलित वर्ग को शेष हिंदू समाज से अलग करने के प्रयास का लगभग सभी राष्ट्रवादी नेताओं ने विरोध किया।

गांधी का विचार 
      गांधीजी उस समय यरवदा जेल में थे ये खबर मिलते ही इन्होने इसका कड़ा विरोध और इसे भारतीय एकता पर हमला कहा। इनका कहना था कि दलित वर्गों की सामाजिक हालात सुधारने के बारे में इसमें कुछ कहा ही नहीं गया है। एक बार यदि दलित और पिछड़े वर्ग को पृथक समुदाय का दर्जा दे दिया गया,तो फिर छुआछूत को  ख़त्म करने का मामला ही दब जाएगा और हिन्दू समाज की सुधार का काम रुक जाएगा।
       गांधीजी का तर्क था कि पृथक निर्वाचक मंडल अछूतों के हमेशा अछूत बने रहने की बात सुनिश्चित करता है। दलितों के हितों की सुरक्षा के नाम पर विधानमंडलों में या नौकरियों में सीटें सुरक्षित करने की जरुरत नहीं,उन्हें अलग समुदाय बनाने की जरुरत नहीं,जरुरत है समाज से छुआछूत की कुरीति को जड़ से उखाड़ फेंकने की।
       गांधीजी ने मांग की कि दलित वर्ग के प्रतिनिधियों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर आम निर्वाचन मंडल के माध्यम से होनी चाहिए। साथ ही गांधी जी ने दलित वर्ग के लिए काफी संख्या में सीटें सुरक्षित करने की मांग का विरोध नहीं किया। अपनी मांग मनवाने के लिए वह 20 सितंबर,1932 से आमरण अनशन पर बैठ गए।
       20 सितंबर का दिन 'उपवास और प्रार्थना दिवस' के रूप में मनाया गया। पुरे देश में कुएं,मंदिर वगैरह दलितों के लिए खोल दिए गए थे। रविन्द्रनाथ टैगोर ने गांधीजी को एक सन्देश भेजकर कहा,"भारत की एकता और उसकी सामाजिक अखंडता के लिए यह उत्कृष्ट बलिदान है। हमारे व्यथित ह्रदय आपकी इस महान तपस्या का आदर और प्रेम के साथ अनुकरण करेंगे।"
         फलस्वरूप एक समझौता हुआ जिसे 'पूना समझौता' के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के तहत दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल समाप्त कर दिया,लेकिन प्रांतीय विधानमंडल में दलितों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा दी गयी। केंद्रीय विधानमंडल में भी सीटों की संख्या 18  फीसदी बढ़ा दी गयी।
         उपवास तोड़ने के बाद गांधीजी सारे काम छोड़कर 'छुआछूत निवारण आंदोलन' में जुट गए। 7 नवंबर 1933 को इन्होंने 'हरिजन यात्रा' शुरू की। दलित वर्गों के लिए 'हरिजन' नाम देकर इनके लिए सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक उत्थान के लिए काम करने की अपील लोगों से की।

        अपने 'हरिजनोत्थान आंदोलन' के दौरान गांधीजी हमेशा कुछ मूलभूत चीजों पर जोड़ देते रहे,जो है-हरिजनों पर अत्याचार का मामला और दूसरा,छुआछूत को जड़ से समाप्त करना।
        इसके लिए उन्होंने मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश का मामला उठाया। गांधीजी ने बार-बार कहा कि हम हिन्दू  सदियों से हरिजन और दलितों पर जो अत्याचार ढाते आये हैं,अब हमें उसका प्रायश्चित करना चाहिए। इसीकारण गांधीजी ने अंबेडकर द्वारा आलोचना किये जाने पर भी बुरा नहीं माना। इन्होंने हिन्दू समाज को चेतावनी दी कि अगर छुआछूत का रोग समाप्त नहीं होगा तो हिन्दू धर्म समाप्त हो जाएगा।(शायद यह हिन्दू समाज का प्रायश्चित ही था कि 1947 के बाद नौकरियों इत्यादि में हरिजनों के लिए बड़े पैमाने पर सीटों के आरक्षण का क़ानून बनाया।)
       गांधीजी छुआछूत निवारण के मुद्दे को अंतर्जातीय विवाह और अन्य मुद्दे के साथ जोड़ने के पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि ये चीजें तो खुद सवर्ण हिन्दू समाज और हरिजनों के बीच में भी है। इनका कहना था कि हरिजनोत्थान आंदोलन का उद्देश्य उन कुरीतियों,कठिनाइयों को दूर करना है,जिसमें हरिजन समाज और दलित शोषित है।
        गांधीजी अंबेडकर के इस विचार से सहमत थे,"अछूत जाति-प्रथा कायम रहेगी,अछूत बने रहेंगे। जाति-प्रथा को समाप्त किये बिना अछूतोद्धार असंभव है।"
         लेकिन गांधीजी का कहना था कि वर्णाश्रम की अपनी जो खामियां हो,उसमें कोई पाप नहीं है,लेकिन छुआछूत है। इनका कहना था कि छुआछूत जाति-प्रथा के कारण नहीं,बल्कि यह तो 'उच्च' और 'निम्न' के कृत्रिम बंटवारे का फल है। जातियां एक दूसरे की पूरक होकर काम करें,तो जाति-प्रथा में कोई जाति न उच्ची है,न कोई नीचा।(छुआछूत मिटाने से सभी भारतीय एक हो जाएंगे)

अंबेडकर का विचार 
         अपनी कृति 'एनिहिलेशन ऑफ़ कास्ट' में जाति-प्रथा और अपने विचार व्यक्त करते हैं।
पहला,तथाकथित अछूत ही अछूतों को नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं;दूसरा,इनमें योग्यता की कोई कमी नहीं है;तीसरा,शासन की संस्थाओं में दलित वर्गों के उचित और पर्याप्त प्रतिनिधित्व;चौथा,हिन्दू धर्म के भीतर  हिन्दुओं और निम्न जातियों के बीच समानता का आंदोलन(अंतर्जातीय विवाह,सम्मिलित भोज)
         गांधीजी ने एक तर्क दिया था कि सवर्ण हिन्दुओं का ह्रदय-परिवर्तन करके छुआछूत की प्रथा मिटाई जा   सकती है और 'श्रम की गरिमा'(DIGNITY OF LABOUR)  पर बल देकर अस्पृश्य जातियों के लिए 'हरिजन' का प्रयोग किया। लेकिन इनके खिलाफ अंबेडकर ने तर्क दिया,"टूटे-फूटे मकान की रंगाई-पुताई करके उसके दुर्दशा को छिपा तो सकते हैं,सुधार नहीं सकते। ऐसी हालत में उसे गिराकर नया मकान बनाना ही उपयुक्त होगा।" इनके अनुसार अस्पृश्यता की जड़े हिन्दू वर्ण व्यवस्था में निहित है,अतः इस कुप्रथा को मिटाने के लिए वर्ण-व्यवस्था का अंत जरूरी है।

संबंधित पोस्ट - भीमराव रामजी अंबेडकर:दलितों का मसीहा