Tuesday, 24 November 2015

G-20 का वर्तमान परिदृश्य और प्रासंगिकता

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
         द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही पश्चिम के विकसित देश ब्रेटनवूड संस्थाओं(IMF और वर्ल्ड बैंक)(जिसे ब्रेटनवूड ट्विन्स भी कहा जाता है) के  माध्यम से उदारवादी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था(LIEO) के जरिये विश्व अर्थव्यवस्था को नियंत्रित और संचालित करते रहे हैं। G-20 का गठन को भी इसी के कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे तो इसकी स्थापना 1999 में हो गयी थी,लेकिन 2008 से हेड ऑफ़ स्टेट का मीटिंग आरंभ हुआ। उस समय पश्चिमी जगत मंदी से जूझ रहा था। विकसित देशों को ऐसा लगता था कि चीन और भारत के विशाल बाजारों के सहारे वे मंदी से उबर सकते हैं। उनका यह ख्याल किसी हद तक सही निकला।G-20 की प्रासंगिकता साबित हुयी और तब से हर साल इसका शिखर सम्मलेन होता आ रहा है।

G-20 वर्तमान समय में प्रासंगिकता 
        2014 में ब्रिसबेन में हुआ सम्मलेन,यूक्रेन संकट के कारण कुछ हासिल न कर पाया। रूसी राष्ट्रपति पश्चिमी देशों के दबाव के कारण सम्मलेन को बीच में ही छोड़ दिए। उस समय यह सवाल उठाया गया कि आर्थिक सहयोग और आर्थिक विकास के मुद्दों के बहस पर आधारित इस समूह में सैन्य और राजनीतिक मुद्दों को उठाना सही है?

            लेकिन 2015 में तुर्की के अंताल्या में हुआ सम्मलेन अपने गठन के बुनियाद 'आर्थिक सहयोग,व्यापार और निवेश बढ़ाने' पर बहस करने के अलावा अगले महीने पेरिस में होने वाले वैश्विक जलवायु सम्मलेन के मध्यनजर कार्बन उत्सजन कटौती के उपायों पर भी चर्चा की। परन्तु मूल बुनियाद से समूह आज खिसक सा गया है और 2015 का सम्मलेन भी पेरिस पर हमला और आईएस का आतंकवाद जैसे विषयों पर केन्द्रीत हो गया। कुछ लोग ये भी कहते नजर आये कि अगर दुनिया सुरक्षित न हो तो विकास की कल्पना कैसे कर सकते हैं? बेशक ये बात सही है,लेकिन आर्थिक संगठन के इतर भी कई ऐसे मंच है जहां इस तरह के राजनीतिक मामलों को सुलझाया जा सकता है
 जैसे-संयुक्त राष्ट्र संघ,नाटो और द्विपक्षीय संबंध आदि। अगर ऐसा ही होता रहा तो G-20 की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाने से कोई नहीं रोक सकता।
अंताल्या सम्मलेन,2015:अवलोकन 
        इस सम्मलेन की ख़ास बात यह रही कि सभी नेताओं ने एक सुर में आतंकवाद से लड़ने का संकल्प जताया और आईएस के नेटवर्क को नेस्तानबूद करने की बात कही। दूसरी ओर वान-की-मून ने भी इस संबंध में एक विस्तृत योजना बनाने की बात कही है।

आतंकवाद से लड़ने  के उपाय और वैश्विक पलायन  
        अंताल्या सम्मलेन में आतंकवाद के खिलाफ लड़ने और आतंक के वित्तीय स्त्रोतों को समाप्त करने का संकल्प व्यक्त किया गया। तुर्की के राष्ट्रपति रिसेफ तायिक एर्दोगन की ओर से दिए गए रात्रि भोज के दौरान 'वैश्विक चुनौतियां:आतंकवाद और पलायन' पर बयान का आधार तय हुआ। इस रात्रि भोज के दौरान मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा,"कई देश आतंक को राज्य की नीति के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं जिन्हें अलग-थलग किये जाने की जरुरत है।" और साथ ही ये भी कहा कि आतंक के वित्तपोषण को अपराधिक कार्य करार दिया जाना चाहिए। इन नेताओं ने आतकवाद और इसके वित्तपोषण के खिलाफ सख्त लक्षित वित्तीय प्रतिबन्ध व्यवस्था बनाने की अपील की जिसमें वित्तीय कार्यवाई कार्यबल(FATF) को सुगम तरीके से लागू करना शामिल है।
        अंताल्या घोषणा में 'वैश्विक पलायन' की समस्या का भी उल्लेख किया गया और सभी देशोंं से इस समस्या का समाधान करने की अपील की गयी। 
         परन्तु मुख्य सवाल यह है कि क्या आतंकवाद के वित्तपोषण को रोका जा सकता है,जब 'बिटक्वाइन' जैसा वर्चुअल मुद्रा अपना पैर तेजी से पसार रहा हो और धड़ल्ले से इसके बदौलत कारोबार भी हो रहा है। इस पर अंकुश कैसे लगाया जाएगा,जो कि एक वास्तविक मुद्रा है ही नहीं।

जलवायु परिवर्तन पर G-20 का रुख       
        इस दौरान मोदी ने कहा कि अगले सात साल में भारत की अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता को चौगुना करने और जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी घटाने का संकल्प जताते हुए सभी प्रमुख देशों से आह्वान भी किया कि वे 2020 तक प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर का 'हरित जलवायु कोष' बनाना सुनिश्चित करें। 
       मोदी ने इस मौके पर जलवायु संकट से निपटने के वैश्विक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए सात सूत्र सुझाये। जैसे-कार्बन क्रेडिट से ग्रीन क्रेडिट की ओर जाने;2030 तक शहरों में आवागमन के साधनों में सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों का हिस्सा बढ़ाकर 30 फीसदी तक पहुंचाने;स्वच्छ ऊर्जा के लिए विकासशील देशों को तकनीक और वित्तीय मदद देने आदि शामिल है। 
       
अब ऐसा ही अनुमान लगाया जाएगा कि जिस तरह मंदी से निपटने में G-20 ने एकजुटता का परिचय दिया उसी तरह जालवायु संकट से निपटने में भी साझेदारी और संजीदगी दिखायेगा।
        
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