Saturday, 21 November 2015

नीतीश कुमार का शपथ-ग्रहण समारोह : कुछ नए संकेत

सुरेश कुमार पाण्डेय,
एक सोच जो अलग हो के लिए

        बीस नवंबर को नीतीश कुमार पांचवी बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इनके साथ जनता दल(यू) और राष्ट्रीय जनता दल के बारह-बारह और कांग्रेस के चार विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली। इसके तुरंत बाद ही कई सवाल उभरकर सामने आये जिनमें से एक है,"बिहार में यह बदलाव का संकेत है या पुन: जंगलराज की वापसी का?"

शपथ-ग्रहण समारोह के मायने 
         ऐतिहासिक गांधी मैदान में हुआ शपथ-ग्रहण समारोह की दो बातें ख़ास गौरतलब है। एक यह कि लालू यादव के दोनों बेटे भी मंत्री बन गए हैं। एक को तो उपमुख्यमंत्री का पद भी मिला । साफ़ है कि इस गठबंधन और इस सरकार के जरिये लालू प्रसाद यादव क्या चाहते हैं।
          मंत्रीमंडल में राजद की तरफ से कौन-कौन शामिल होगा,इसका फैसला लालू प्रसाद यादव ने ही किया होगा। अपने दोनों बेटों को,जिन्होंने पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा,मंत्रीमंडल में जगह दिलाकर लालू ने यह जताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है कि राजनीति में उनकी प्राथमिकता क्या है? जनसत्ता की संपादकीय में लिखा गया है कि पार्टी को इन्होने एक तरह से परिवार का जागीर बना दिया है।
इसे भी पढ़े - 'बिहार चुनाव' इतना महत्वपूर्ण नजर क्यों आ रहा है?
        शपथ-ग्रहण की दूसरी ख़ास देश भर से आये गैर-भाजपा नेताओं का जमावड़ा माना जाएगा,खुद नीतीश ने ट्वीट करके बताया है कि इसमें कौन-कौन आमंत्रित हैं। ममता बनर्जी,अखिलेश यादव,अरविन्द केजरीवाल,तरुण गोगई आदि जैसे लगभग सभी गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद थे। कई पूर्व मुख्यमंत्रियों ने भी शिरकत की।भाजपा के कुछ नेता भी शामिल हुए जो एक शिष्टाचार मात्र था।

        इस जमावड़े से एक संदेश आया है या नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने यह जताना चाहा है कि वे भाजपा के विरोध में राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा बनाने के ख्वाहिशमंद है। चुनाव परिणाम के दिन लालू ने तो भारत दौरा करने का ऐलान भी किया है। परंतु ज्वलंत प्रश्न है,"क्या लालू पर लगे पुराने आरोप और परिवारवाद का छाप उन्हें विपक्ष का धुरी बनने देगा? फिर बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि कुछ राज्यों में एक-दो साल में चुनाव होने वाले हैं,वहाँ क्या समीकरण बनते हैं।

नीतीश को चुनौतियां   
        नीतीश भले ही मुख्यमंत्री,महागठबंधन के बैनर तले बन गये हैं,लेकिन इनको आशंका पहले से ही है कि बिहार में फिर से जंगलराज की वापसी न हो जाये। इसलिए उन्होंने अतिप्रमुख गृह मंत्रालय अपने पास रखा हुआ है। जिस विकास के मुद्दे को लेकर ये चुनाव में गए थे,उसी मॉडल को आगे बढ़ाना उनके लिए मुख्य चुनौती होगी। अगर ऐसा ये कर पाते हैं तभी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में बड़ी भूमिका निभा पायेंगे।
इसे भी पढ़े - बिहार चुनाव परिणाम:अवसरवादिता और संकीर्ण जातीय सोच की जीत?
       लंबे समय से सत्ता से दूर चल रहे लालू के लोगों को भी नियंत्रित करना एक अन्य चुनौती होगी क्योंकि ऐसी शंका है कि ये सत्ता पर अधिकार करने को किसी हद तक जा सकते हैं।

नीतीश का शपथ-ग्रहण का सुरेशवादी व्याख्या  
    दो दशकों से प्रसाद और कुमार के बीच तीखी राजनीतिक नोंक-झोक,बहस आदि हो रही थी। लेकिन सत्ता से दूर रहने का डर इन्हें आपस में मिलाया और बिहार चुनाव को महागठबंधन के बैनर तले लड़ने को मजबूर किया,वोटों का अलगाव रुक गया और इन्हें बिहार में भारी जीत मिली।

      उसके बाद बीस नवंबर को बिहार में नया मंत्रिमंडल का गठन किया गया,इसका विश्लेषण इशारा करता है कि महागठबंधन के सभी घटकों में शक्ति-प्राप्ति को लेकर आतंरिक विरोधाभास है। तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाकर 'गठबंधन सरकार' को राजद और लालू प्रसाद यादव द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है।
       अगर नीतीश कुमार राजद पर नियंत्रण कर लेंगे तो वे अपने विकासवादी मॉडल के जरिये बिहार में बदलाव ला पाएंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो तथाकथित जंगलराज-2 दोबारा अपना पैर पसारने में कोई गुरेज नहीं करेगा। फलस्वरूप मध्यावधि चुनाव अवश्यंभावी हो जाएगा या बिहार फिर से संक्रमण काल में चला जायेगा।