Friday, 13 November 2015

सहिष्णुता सचमुच हिन्दुओं के खून में है?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

         धार्मिक असहिष्णुता की बात कर इन दिनों साहित्य अकादमी पुरस्कार,पद्म पुरस्कार और सरकार प्रदत पुरस्कार लौटाने की घोषणा करने वालों का नाम सुर्ख़ियों में छाया हुआ है। अपने आप को प्रतिष्ठित की श्रेणी में रखने वाले ये साहित्यकार,लेखक,वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता इतनी ओछी और निचले तबके वाला विद्रोह कर रहे हैं कि आज कई विश्लेषक इस आशंका की ओर ध्यान दिलाने लगे हैं,"कहीं इसका विपरीत प्रभाव न पड़ जाये।"
         कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायडू ने एक कार्यक्रम में कहा,"वो कह रहे हैं कि इस देश में सहिष्णुता की कमी आ रही है जबकि भारत दुनिया का इकलौता देश है जहां सहिष्णुता है,अगर यह 100 प्रतिशत नहीं है तो कम से कम 99 प्रतिशत तो है हीं।" ये आगे कहते हैं," हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं,यहीं भारत की महानता है,सहिष्णुता तो भारतीय के खून में है।" 
         दो धारणाएं जिसपर अधिकांस भारतीयों का विश्वास है-पहली यह कि भारत केवल आक्रमण का शिकार रहा है और भारतीयों ने कभी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया,भारतीय(इस सन्दर्भ में इसका मतलब हिन्दू है) ही वो लोग हैं जो अपने विजेताओं के साथ रहे। दूसरी ये की भारतीय अनोखे हैं क्योकि इनमें सहिष्णुता है, धर्मों का सम्मान और आदर करते हैं। इसका प्रमाण हम देख सकते हैं। भारत में सभी धर्मों के आदर को लेकर कानूनी प्रावधान है जिसे मूल अधिकार में भी शामिल किया गया है। हम कभी नहीं सुनते कि किसी द्वारा किसी को मंदिर,मस्जिद,गिरजाघर या जैन-बौद्ध मंदिरों में जाने से रोक गया हो।
                                                                      1.
हम यहां विश्लेषण की शुरुआत दूसरे धारणा से करेंगे
क्या सचमुच में हम भारतीय अनोखे हैं और हममें सहिष्णुता है?
         यह देश का दुर्भाग्य माना जायेगा कि गिरजाघर के खिड़की के शीशा टूटने को मीडिया और कुछ विद्वानों द्वारा इस कदर हवा दी गयी,जैसा लगा कि चारों तरफ ईसाईयों का कत्लेयाम हो रहा है। अकसर ये लोग इस बात को भूल जाते हैं कि सैकड़ों वर्षों तक उपनिवेशकाल में हमारा शोषण होता रहा लेकिन फिर भी आजादी मिलाने के बाद हमारे प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने राष्ट्रमंडल का सदस्य होना स्वीकार किया और दोस्ती की। ऐसा मिसाल दुनिया में कम ही मिलते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी द्वारा रूस पर हमला को वहाँ के लोग आज तक नहीं भूले हैं और सामाजिक स्तर पर कटुता जगजाहिर है।
        गहराई में जाने पर सिर्फ एक ही बात निकल सामने आती है और इस प्रश्न का उत्तर भी मिल जाता है कि वर्तमान परिदृश्य में असहिष्णुता जैसे जालीम शब्द को हवा क्यों दिया जा रहा है?
        2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जो लोग खुली चिट्ठी और ज्ञापन के माध्यम से इस बात का जोर-शोर से प्रचार कर रहे थे कि अगर मोदी प्रधानमंत्री  है तो देश का माहौल बिगड़ जाएगा। लगता है ये लोग भविष्यवक्ता थे और भगवान से सीधा संबंध था कि ऐसा होने ही वाला ही है।
       परन्तु इनकी आशंका इस कदर धुल में विलीन हो गयी जैसे ताश के पत्ते के घर हवा के एक झोके भी सहन नहीं कर पाते। ये इस दर्द को सहन नहीं कर पाये कि देश का माहौल क्यों नहीं बिगड़ा और ज़िंदा रहते हुए भी मरने लगे। जो लोग पहले से ही इस पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं कि मोदी,भाजपा,संघ आदि सांप्रदायिक हैं और वो देश का माहौल बिगाड़ने का काम करते हैं उनसे एक अर्थपूर्ण बहस की कल्पना कैसे की जा सकती है?गलत बात को भी बार-बार कहने से सही लगाने लगता है इसी का प्रयास इन लोगों द्वारा किया जा रहा है।
       वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्यित्व को देखा जाये तो उनका चरित्र हमेशा से विकासपुरूष जैसा रहा है जिसे उन्होंने गुजरात में गुजरात मॉडल के जरिये प्रमाणित भी किये है। गोधरा जैसी घटना में हमें नहीं पड़ना है कि नरेंद्र मोदी की संलिप्तता उसमें थी या नहीं?अगर अदालत के फैसले को देखा जाए तो इनका चरित्र हमेशा से साफ़ रहा है।
        उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है,"भारत में धार्मिक असहिष्णुता में बढ़ोतरी न के बराबर हुयी है,बढ़ोतरी हुयी है तो 'सहिष्णुता की राजनीति' करने वाले हथकंडों में।"
क्या गाय असहिष्णुता को बढ़ायी है?
        दादरी में अखलाक की ह्त्या,वह मूल मुद्दा रहा जिसके इर्द-गिर्द असहिष्णुता और धार्मिक कट्टरता का बहस उछलता रहा। गाय के मांस के नाम पर किसी व्यक्ति की ह्त्या कर दी जाती है और सरकार द्वारा 45 लाख की सहायता राशि दी जाती है,क्या हम इसे सहिष्णुता कहेंगे? ह्त्या करने वालों को  कानूनी प्रावधान है,इसके तहत ही इसका समाधान किया जाना चाहिए था। एबीवीपी अभी हाल में ही दादरी घटना के एक और पहलू की ओर ध्यान दिलाया है घटना की जड़ गाय नहीं प्रेम-प्रसंग को है।
     इस बात पर लगभग सभी सहमत है कि हम उस तथ्य को नहीं नकार सकते जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त है। गाय जो कि पवित्र जानवर है हिन्दुओं के लिये ,कई लोगों की भावनायें इससे जुड़ी हुयी है तो कुछ समुदाय द्वारा अपनी जिह्वा तृष्णा की पूर्ति के लिये अपमान करना किसने सीखा दिया?
        धर्म तो जीवन का साक्षात्कार होता है,समाज में लोगों को नियंत्रित करने का यंत्र होता है,नैतिकता और सदाचार सीखाने का एक माध्यम होता है। जब ये हम जानते हैं तो फिर क्यों उस तरह का कदम उठाते हैं जो एक ख़ास समुदाय की भावनाओं को कुंठित करती है। गाय खाना किसी का धर्म नहीं हो सकता बल्कि राक्षसी प्रवृति वाला एक आदत है।
        'गाय का अर्थशास्त्र' काफी कुछ बयान कर देता है। इसके आर्थिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता। गोमुत्र और गाय के कई उत्पादों का पेटेंट कई देशों के वैज्ञानिकों द्वारा करा लिया गया है।
        वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो एक खाद्य श्रृंखला में मांसाहारी ही सबसे कम दिन जीवित रहता है,कारण है स्तर-दर-स्तर ऊर्जा की मात्र का घटते जाना। जब यह तथ्य हमारे पर्यावरण में हमेशा देखने को मिल रहा है फिर भी हम अपनी पाँव पर कुल्हाड़ी मारने का जोखिम क्यों ले रहे हैं।
                                                                     2.
पहली धारणा का विश्लेषण
क्या भारतीयों ने कभी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया?
     दुनिया का कोई ऐसा भाग नहीं जहां राजतंत्र रहा हो और राज्य के विस्तार के नाम पर युद्ध,आक्रमण और 
हत्यायें नहीं हुयी हो। भारत एक ऐसा देश रहा है जो अपने ही लोगों के खून का प्यासा रहा है। सम्राट अशोक 
के कलिंग युद्ध में हत्याओं की विभीषिका को कौन भूल सकता है। और थोड़ा आगे बढे तो गुर्जर-प्रतिहार,पाल 
वंश और राष्ट्रकूट के मध्य का त्रिपक्षीय संघर्ष इसका एक और उदाहरण है। इन्हीं राजाओं के बीच चक्रवर्तित्व 
के संघर्ष भी मध्यकाल में मिल जाता है। कई चोल राजाओं द्वारा श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व के देशों से युद्ध 
करने का उल्लेख और प्रमाण मिलता है। 
      अगर भारतीय राजाओं द्वारा किसी दूर समुद्री देश पर आक्रमण न करने का सवाल है तो इसका 
उत्तर नौसेना के विकास न होने के रूप में खोजा जा सकता है। अगर आस्ट्रेलिया जैसे सुदूर समुद्री प्रदेश पर 
आक्रमण नहीं किया गया तो वह कारण रहा भारतीय के पास सशक्त नौसेना का नहीं होना क्योंकि बीच का 
अथाह समुद्री सीमा मार्ग एक अवरोध का काम करता रहा।
         अगर इन सबकी तुलना अन्य साम्राज्यों से किया जाये तो नगण्य ही माना जायेगा। भारत के अंदर के 
राजाओं का दूसरे राजाओं पर आक्रमण कूटनीतिक दृष्टि से सही ठहराया जा सकता है। यह एक यथार्थ है 
अगर आप शांत हैं तो अपने साम्राज्य की रक्षा नहीं कर सकते जिसकी पुष्टि चाणक्य(कौटिल्य) का 'मंडल 
सिद्धांत भी करता है। राजतंत्र को बचाये रखने के लिए इसकी अनिवार्यता अवश्यंभावी लगती है।
क्या भारतीय ही वो लोग हैं जो अपने विजेताओं के साथ रहे ?

       इस बात को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं की हम भारतीय(इसका मतलब हिंदू है) ही वो लोग हैं जो 
विदेशी ताकतों द्वारा कई तरह के यातनायें देने के बाद भी  अच्छे से रहे,पारिवारिक और सामाजिक संबंधों 
को बढ़ावा दिया। इस तथ्य का विश्लेषण करने की जरुरत नहीं है क्यों कि इसका प्रमाण हमें आज भी देखने 
को मिल रहा है। 

 जरूर जानें - सुरेशवादी विचारधारा : एक परिचय