Tuesday, 10 November 2015

बिहार चुनाव परिणाम:अवसरवादिता और संकीर्ण जातीय सोच की जीत?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
 
       बिहार चुनाव के पहले मैंने एक ब्लॉग लिखा था-"'बिहार चुनाव' इतना महत्वपूर्ण नजर क्यों आ रहा है?" इस ब्लॉग के  माध्यम से मैंने कई सवाल उठाये थे जैसे-राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव का अंत निकट तो नहीं?,ओवैसी फैक्टर कितना असरदार होगा और दक्षिण एशिया में धार्मिक समीकरण को कितना प्रभावित करेगा?,बिहार चुनाव परिणाम से केंद्र सरकार कितना प्रभावित होगी?,यहाँ विकास हावी रहेगा या जातिवाद?,आरक्षण आज भी महत्वपूर्ण चुनावी हथियार है? आदि।
       अब वक्त आ  गया है इन सवालों का विवेचना करने का। बिहार चुनाव का परिणाम आ चुका है और भाजपा नीत एनडीए का महागठबंधन के हाथों करारी मात हुयी है जो मात्र 58 पर सिमट कर रह गया है। कई लोग इसे एक मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री पर विजय बता रहे है और कई दूसरे भी हैं जो हार की वजह केंद्र की नीतियों को मान रहे हैं। लेकिन मुख्य सवाल है कि क्या बिहार में भाजपा की हार को केंद्र की नीतियों से जोड़ सकते हैं? यहाँ मोदी की हार है या 'अवसरवादिता और संकीर्ण जातीय सोच' की जीत है?
बिहार चुनाव परिणाम:विहंगावलोकन
        पांच चरणों के लंबे चुनाव प्रक्रिया के दौरान चुनावी अभियान में कई आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। 'चारा चोर से लेकर 'ब्रह्मपिशाच'(ऐसे इसका अर्थ मुझे नहीं मालुम) और नरभक्षी जैसे कई शब्दों का इस्तेमाल जोर-शोर से किया गया। 'बिहारी बनाम बाहरी' का मुद्दा भी छाया रहा। कभी महागठबंधन जीतती नजर आ रही थी तो कभी भाजपा नीत राजग। लेकिन 8 नवंबर,2015 के चुनावी परिणाम के दिन सब कुछ स्पष्ट हो गया। महागठबंधन के जरिये जदयू,राजद और कांग्रेस की तिकड़ी ने भाजपा नीत राजग को करारी शिकस्त दी और भाजपा के कई मंसूबे पर पानी फेर दिया। लगता है भाजपा के प्रचारकर्ता और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को यह इल्म पहले ही हो गया थी कि हमारी स्थिति डावांडोल हो गयी है।
        परिणाम के बाद राजद सबसे ज्यादा 80 सीटें जीतकर बिहार में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और नीतीश कुमार 71 के साथ दूसरे स्थान पर रहे। वहीं भाजपा मात्र 53 सीट लेकर तीसरे स्थान पर चली गयी,पिछले विधानसभा चुनाव में पाये 91 सीट के मुकाबले इसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। अन्य पार्टियों का हाल तो और खस्ता रहा। सपा के नेतृत्व वाली तीसरा मोर्चा तो अपना खाता भी नहीं खोल पायी। भाकपा(माले) को तीन,हम को एक,रोलेजपा को दो और लोजपा को भी दो सीटों से संतोष करना पड़ा। अगर पैनी नजर से देखा जाए तो इस चुनाव से सबसे ज्यादा फ़ायदा कांग्रेस(27) को मिला जो पिछले 18 महीनों से(लोकसभा चुनाव के बाद से) लगभग मरणासन्न और खामोश हो गयी थी। आज इसमें नयी जान फ़ूँक गयी है।

क्षेत्रवादी अस्मिता हमेशा बरकरार रहेगी?
        भारत जैसी संघीय व्यवस्था में जहां शासन प्रणाली तीन स्तरों में बंटा हुआ है,शक्ति का लगभग विकेंद्रीकरण है। वहाँ सभी के हितों की रक्षा सामान रूप से नहीं की जा सकती। विविधता से भरे इस देश में जहाँ छोटी-छोटी घटनाएँ और मुद्दे भी राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन जाता है वहाँ जातीय और धार्मिक हितों की पूर्ति करना असंभव तो नहीं लेकिन कठिन जरूर है। इन्हीं सब परिस्थितियों का उपज आरक्षण और धर्मनिरपेक्षता का जुमला है जो भारतीय राजनीति में गहरी पैठ बना चुका है।
       कुछ दिनों पहले तक क्षेत्रीय दलों की सिमटती दायरा ने यह आभास दिया था कि 'क्षेत्रवाद' अब गुजरे जमाने की बात हो गयी है,लेकिन बिहार के ताजा घटना ने इस सवाल को फिर से पैदा कर दिया है कि भारत जैसे विविधता से भरे देश में क्षेत्रवाद को नकार नहीं सकते। इस घटनाक्रम के बाद जो मुख्य सन्देश निकालकर बाहर आया है,वह है,"किसी जाति आधारित क्षेत्रीय पार्टी के बगैर राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां सरकार तो क्या सम्मानजनक प्रदर्शन भी नहीं कर सकती।" इसपर लगभग सभी सहमत दिख रहें हैं। जो क्षेत्रवादी अस्मिता की नींव को और मजबूत करता है।
लालू का फिर से उदय?
       पिछले कई चुनावों से लालू की पार्टी उमदा प्रदर्शन नहीं कर पा रही थी। स्थिति ऐसी हो गयी थी कि उनकी पत्नी और पुत्री को भी हार का सामना करना पड़ा था। 2015 के विधानसभा चुनाव में इन्होंने 80 सीटें जीतकर सभी को संदेश दे दिया कि बिहार की राजनीति के दमदार खिलाड़ी हम ही हैं।
       बोलने के अपने एक अलग अंदाज के कारण प्रेस का हमेशा निशाना बनते रहे हैं। कितने ही टीवी शो प्रस्तोता उनके बोलने की अंदाज का नक़ल उतारते हुए नजर आते हैं। इनका यहीं देहाती अंदाज लोगों के दिलों-दिमाग पर छाया रहता है और यह इनके इस मजबूती को भी दिखाता है कि वे बिहार के स्थानीय लोगों पर कितना पकड़ रखते हैं।

आरक्षण आज भी मजबूत चुनावी हथियार
       पिछले ब्लॉग में हमने एक सवाल उठाया था,"कोई भी योद्धा अपने आजमाये हुये हथियार का ही बार-बार इस्तेमाल करता है,लालू प्रसाद यादव इस बार भी यहीं कर रहें हैं  देखना है कि आरक्षण वाली लालू की हथियार का धार कितना कुंद और तेज है?"
       वर्तमान चुनावी परिणाम देखने से लगता है कि आरक्षण प्राप्त लोग आरक्षण के लिए अपनी सारी जिंदगी बरबाद करने का भी तमन्ना रखते हैं। ऐसे तो संविधान में आरक्षण का प्रावधान 'समाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन' के आधार पर किया गया है लेकिन आज यह जातीय परिप्रेक्ष्य ले चुका है ठीक उसी तरह प्राचीन समाज का आदर्श वर्ण-व्यवस्था का जाति में परिवर्तन।
        संघ प्रमुख मोहन भागवत का 'आरक्षण का समीक्षा' वाला बयान को लालू ने इस कदर इस्तेमाल किया और इसके जरिये लोगों को सम्मोहित किया कि आरक्षण को समाप्त कर हमें सड़क पर ला दिया जाएगा और हम हीं आरक्षण को बरकरार रख सकते हैं। जिसका इन्हें भरपूर फ़ायदा मिला। आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि बिहार की राजनीति में हाशिये पर चले गये लालू और इनकी पार्टी राजद फिर से मुख्य धारा में लौट आयी है।
आरक्षण को लेकर संघ और भाजपा को नुकसान
        चुनाव से ऐन वक्त पहले 'आरक्षण की समीक्षा का बयान देकर मोहन भागवत इस बात को समझना चाहते थे कि आज के परिवेश में आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अपना खुली विचार रखकर वे प्रायोगिक राजनीति में कहाँ टिकते हैं। अगर भाजपा बिहार का चुनाव जीत जाती अथवा सम्मानजनक प्रदर्शन करती तो 'आरक्षण का समीक्षा' अवश्यंभावी था। परन्तु स्थिति एकदम उलट गया है। इस बात का आशंका जताया जा रहा है कि बिहार चुनाव परिणाम भाजपा के लिए काफी नुकसानदायक होगा। इसका खामियाजा इसे असम,पश्चिम बंगाल,केरल,उत्तर-प्रदेश आदि के आगामी चुनाओं में भुगतना पड़ सकता है।

किसकी जीत:विकास या जातिवाद?
        बिहार में चुनाव मुख्य रूप से केंद्र की विकासवादी नीतियां और राज्य की अवसरवादी महागठबंधन के बीच था। चुनावी दंगल में अगर कोई पार्टी हार जाती है तो उसका मतलब यह नहीं होता कि उसकी नीतियां गलत है। और भी कई परिस्थितियां और कारक होती है जो परिणाम को प्रभावित करती है। जातिगत समीकरण बिहार जैसे राज्य का वह मूल कारक होता है जो चुनाव पर नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रकार का प्रभाव डालता है।
         गहराई से देखने पर मालुम चलता है कि बिहार का पूरा चुनाव कभी भी विकासवादी एजेंडा पर लड़ा ही नहीं गया। विकास सभी के लिए एक मुखौटा था चाहे लालू हो या नीतीश,कांग्रेस हो या भाजपा। काफी दिनों से सत्ता से अलग रहने के कारण इसकी संभावना न के बराबर है कि लालू को विकास के नाम पर वोट दिया गया होगा। यह सभी समझ सकते हैं कि बिहार परिणाम का मूल वजह क्या है?

ओवैशी फैक्टर:किसे नुकसान और किसे फ़ायदा?
         असादुद्दीन ओवैशी हैदराबाद से आकर मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्रों में अपनी भाग्य आजमाने की ठानी। राजनीतिक पंडितों द्वारा ऐसा अनुमान लगाया जाने लगा कि मुसलिम वोटों का विभाजन भाजपा को फ़ायदा पहुंचा सकता है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। सीमांचल क्षेत्रों में भाजपा को तो नुकसान उठाना ही पड़ा,साथ ही साथ ओवैशी की पार्टी खाता भी नहीं खोल पायी पुरे बिहार में।
(भारत में ओवैशी की पार्टी दक्षिण एशिया में क्या प्रभाव डालेगा? इसे एक अलग ब्लॉग के रूप में प्रकाशित किया जाएगा।)

बिहार चुनाव परिणाम का प्रभाव
       बिहार चुनाव परिणाम का प्रभाव तो दूरगामी दिखाई दे रहा है जिसे इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता है-पहला,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सुधार एजेंडा काफी ज्यादा प्रभावित होगा। इस परिणाम के बाद विपक्ष के पास एक निर्णयकारी विधायी शक्ति आ गयी है,जिसके चलते विशेषकर राज्यसभा में विधेयकों को लेकर काफी मशक्क़त करनी पड़ेगी। जीएसटी जैसे कई विधेयकों का भविष्य क्या होगा,आने वाले समय की गर्भ में है। दूसरा,राष्ट्रीय राजनीति में एक नए आयाम की शुरुआत होने की संभावना है। गैर-कोंग्रेसी गठबंधन बनाकर नीतीश कुमार,ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल मोदी को घेरने का प्रयास करेंगे जो भाजपा के खिलाफ एक प्रभावकारी विपक्ष होगा। तीसरा,भाजपा के लीडरशीप पर भी अंगुली उठाये जाने की संभावना है। चौथा,लोकसभा चुनाव और अन्य कई राज्यों के चुनावों में भाजपा को बड़ी जीत दिलाने के बाद मोदी,'ब्रांड मोदी' के रूप में पहचाने जाने लगे थे। लेकिन साल की शुरुआत में दिल्ली और अंत में बिहार में हार के बाद इनपर भी सवालिया निशान लगना शुरू हो गया है।
बिहार चुनाव परिणाम का 'सुरेशवादी व्याख्या'-(सुरेशवादी विचारधारा : एक परिचय)
       बिहार का पुरा-का-पुरा चुनाव परिणाम 'अवसरवादिता' और 'संकीर्ण जातीय सोच' के विजय का सूचक है। चुनाव के पहले लालू नीतीश का आपस में मिलना लगभग पुरे जातीय समीकरण को बदल कर रख दिया। अगर परिस्थितियां विपरीत हो और देश हित के लिए ऐसा जरूरी हो तो इस तरह के गठबंधन से किसी को गुरेज नहीं करना चाहिए। जैसे जम्मू-काश्मीर को विकास के राह पर ले जाने के लिये भाजपा और पीडीपी का गठबंधन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
        देखने से नहीं लगता कि बिहार की परिस्थिति वैसी थी। एक तरह से नीतीश और लालू दोनों के लिए सत्ता का मोह ही आपस में मिलाने के लिए मजबूर किया। लालू जहां लंबे समय से सत्ता से बाहर चल रहे थे वहीं नीतीश को लोकसभा चुनाव में हार के बाद डर सताने लगा था। यहीं वह मूल कड़ी और आधार रहा जो एक दूसरे को आकर्षित किया। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता या यों कहे कि इसको कोई नकार भी नहीं सकता कि बिहार में विकास की जीत नहीं बल्कि 'अवसरवादिता' और 'संकीर्ण जातीय सोच' की जीत है।