Saturday, 28 November 2015

आसियान-भारत संबंध

 सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
       फिलीपींस,मलेशिया,थाईलैंड,इंडोनेशिया और सिंगापुर द्वारा 8 अगस्त,1967 को 'बैंकाक घोषणा' के तहत आसियान की स्थापना की गयी। ऐसे तो इस दिशा में कदम 1961 में गठित 'दक्षिण-पूर्वी एशियाई संघ के गठन के साथ ही हो गया था। जिसमें फिलीपींस,मलेशिया और थाईलैंड शामिल थे। आशियान की स्थापना का उद्देश्य वियतनाम में साम्यवादी प्रसार और अपनी सीमाओं के भीतर विद्रोही प्रदर्शन को रोकना था।
       समय के साथ आसियान  सदस्यों की संख्या बढ़ती गयी। 1995 में वियतनाम आसियान का सांतवा सदस्य बना जो पहला साम्यवादी देश था। 1999 में कंबोडिया इसका दशवाँ सदस्य बन गया। फलस्वरूप आसियान दस सदस्यों वाला एक प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रीय संगठन के रूप में विख्यात हुआ। 
       1992 से 1995 के दौरान आसियान और भारत के बीच वार्त्ता साझेदारी तेजी से विकसित हुयी। 2002 में नोमपेन्ह  भारत-आसियान सम्मिट प्रत्येक साल होने लगा। 

आसियान का आर्थिक सहयोग 
       आसियान मूल रूप से व्यापारिक उदारीकरण की मांग करता है। व्यापार को सुसाध्य बनाने,गैर-सीमा व्यवस्था और निवेश को बढ़ाने की गतिविधियों पर भी बल देता है। आज इसके अंतर्गत सहयोग के नए क्षेत्र जैसे-सेवाओं और बौद्धिक संपत्ति अधिकारों को भी लागू करने का प्रयास किया जा रहा है(स्त्रोत-आसियान वेबसाइट)। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने भी भारत में IPR नीति घोषित करने की बात कही है। इस साल के अंत तक एक 'COMPREHENSIVE NATIONAL INTELLECTUAL PROPERTY RIGHTS' आने की संभावना है।


आसियान+3 का निहितार्थ
       1999 में आसियान+3 प्रक्रिया का सांस्थानीकरण(INSTITUTIONALIZATION) हुआ। ये तीन प्रदेश जापान,चीन और दक्षिण कोरिया हैं। आसियान और +3 देश सहयोग को गहरा और मजबूत करने के लिए शिखर सम्मलेन,मंत्रिस्तरीय वार्त्ता आदि के माध्यम से वार्त्ताएं और परामर्श करते हैं। आसियान और इन देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार व्यवस्था की भी स्थापना हो गयी है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि ये  भविष्य में 'पूर्वी एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र(EAFTA)' की संभावित स्थापना के लिए आधारशिला का काम करेगी।

आसियान और भारत
आसियान और भारत के बीच राजनीतिक साझेदारी
        2002 में कंबोडिया के नोम-पेन्ह में हुआ आसियान सम्मलेन से भारत-आसियान वार्त्ता को काफी तेजी मिली। इस क्रम में अब राजनीतिक और सुरक्षात्मक आयाम भी शामिल हो गए हैं। भारत ने आसियान के साथ कई मंत्रणात्मक सभाओं में भाग लिया है जैसे कि आसियान रीजनल फोरम(ARF),10+1,10+10 आदि।
        1996 से ही भारत ARF के महत्व को देखता है और आसियान के देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध को पूरक मानता है। 2003 में बाली में हुए दूसरे आसियान-भारत शिखर सम्मलेन के दौरान शांती,सुरक्षा,स्थायित्व और विकास पर साझा हित प्रकट किये गए। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर काबू पाने के लिए भी संयुक्त घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर हुआ।
भारत-आसियान व्यापारिक साझेदारी
       आसियान के देशों का सम्मिलित GDP लगभग 24 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है,जो विश्व अर्थव्यवस्था में एक विशेष महत्व रखता है। आसियान विनिर्माण और व्यापार का एक वैश्विक हब है साथ-ही-साथ विश्व में तेजी से बढ़ने वाला उपभोक्ता बाजार भी है।(स्त्रोत-ASEAN INDIA BUSINESS COUNCIL की वेबसाइट और IMF का रिपोर्ट)
        इस परिदृश्य को देखकर भारत के लिए इसका महत्व काफी ज्यादा इसलिए भी बढ़ जाता है कि भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति तभी सार्थक हो पाएगी जब आसियान से रिश्ते प्रगाढ़ होंगे।
        भारतीय विदेश मंत्रालय के एक रिपोर्ट के अनुसार भारत-आसियान के बीच वार्षिक व्यापार 22% की दर से बढ़ रहा है जो 2014-15 में बढकर लगभग 76.52 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है।
        आसियान के देशों द्वारा अप्रैल,2007 से मार्च,2015 के बीच 32.44 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश भारत में किया गया। वहीं भारत द्वारा आसियान के देशों में 38.67 बिलियन डॉलर का भी निवेश किया गया है। भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता(FTA)
         भारत और आसियान के बीच 2014 में मुक्त व्यापार समझौता किया गया परन्तु आसियान के कुछ  द्वारा इसका विरोध भी हुआ और अभी भी हो रहा है। आगे देखना है कि यह कहाँ तक सफल होता है। मलेशिया और सिंगापुर की अर्थव्यवस्था के विकास में सेवा क्षेत्र का काफी योगदान है। भारत की अर्थव्यवस्था भी सेवा क्षेत्र के बदौलत विकास कर रहा है,मलेशिया जैसे देशों को आशंका इस बात की है कि मुक्त व्यापार के चलते उन्हें कहीं नुकसान न उठाना पड़ जाए। साथ ही साथ आसियान और भारत के नीति-निर्माता इस बात का भी प्रयास कर रहे हैं कि निजी क्षेत्र की साझेदारी को भी मजबूती से बढ़ाया जाए।

भारत-आसियान सम्मलेन,2015 
       G20 की तरह यह सम्मलेन भी आतंकवाद पर केन्द्रीत हो गया,लेकिन इस सम्मलेन में संवेदनशील मुद्दा दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय और समुद्री विवादों के जल्द समाधान पर भी चर्चा की गयी। इस दौरान भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की वार्ता चीनी समकक्ष से भी हुयी और दोनों आतंकवाद पर सूचना साझेदारी को  भी हो गए हैं।       इस समय मोदी ने अपने भाषण के दौरान कहा कि भारत और आसियान के बीच 2020 तक व्यापार को 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर और 2025 तक २०० बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाना है। जबकि 2014-15 में व्यापार की मौजूदा स्थिति 76.5 बिलियन डॉलर है।
        इन्होने आसियान के पांच देशों के साथ वीजा फैसिलिटी बढ़ाने की भी बात कही और आसियान के साथ भारत की फिज़िकल,डिजिटल और इंस्टीटूशनल कनेक्शन बढ़ाने की इच्छा जतायी।
        मोदी ने आसियान-भारत इनोवेशन प्लेटफार्म बनाने की भी बात कही ताकि इस व्यवस्था के जरिये  तकनीक और शोध का आदान-प्रदान किया जा सके।
        कंबोडिया,लाओस,म्यांमार और वियतनाम के साझेदारी के साथ 'प्रोजेक्ट डेवलपमेंट फण्ड' की स्थापना की सहमति बनी ताकि विनिर्माण हब का निर्माण किया  सके।
         जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ब्रिटेन,G20 सम्मलेन के बाद यहां भी मोदी ने 122 सोलर रिच कंट्री के बीच सौर ऊर्जा के प्रोत्साहन के लिए समझौता की बात कही और प्रस्ताव रखा।
        और अंत में अपने भाषण के दौरान शिलौंग में आसियान स्टडी सेंटर को स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।

भारत-आसियान:भविष्य की रणनीति
        अब यह देखना महत्वपूर्ण हो गया है कि भारत-आसियान रिश्ता भविष्य में कैसे चलता है और कितना प्रगाढ़ होता है। दोनों पक्षों के रिश्तों के बीच जो मूल बिंदु सबसे ऊपर है,वो है-भारत आसियान रिश्ते को तेजी से बढ़ावा देना,प्रशिक्षित श्रम(SKILLED LABOUR) का आदान-प्रदान,माल और सेवा(GOODS AND SERVICE) के बेहतरीन गुण को बढ़ावा देना,बराबर वैश्विक अवसर देना और आर्थिक विकास को बढ़ाकर गुणात्मक रोजगार पैदा करना। इसी के इर्द-गिर्द भारत-आसियान रिश्ता भविष्य में टिका हुआ रहेगा ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है।

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