Monday, 30 November 2015

भीमराव रामजी अंबेडकर:दलितों का मसीहा

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
       बाबा साहेब भीमराव रामजी अंबेडकर दलितों के मसीहा के रूप में जीवन भर दलितों के लिए संघर्ष करते रहे। इंदौर के समीप पिछड़ी जाति 'महार' परिवार में इनका जन्म 14 अप्रैल,1891 को हुआ। हाईस्कूल की पढ़ाई के  बाद छात्रवृत्ति की मदद से अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र से एम.ए किया। यह बात उल्लेखनीय है कि ये प्रथम भारतीय अछूत और महार थे,जो पढने के लिए विदेश गए। इन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से पी.एच.डी की उपाधी धारण की जहां इनका शोध का विषय 'प्रॉब्लम ऑफ़ रूपी(PROBLEM OF RUPEE)' था।
        1930 में ये 'अखिल भारतीय दलित महासंघ' के अध्यक्ष बने तथा 1936 में 'इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी' की स्थापना की जिसका नाम आगे चलकर 'अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ' रखा। भारतीय संविधान सभा में 'संविधान प्रारूप समिति' के अध्यक्ष का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया और इस पद पर रहते हुए इन्होंने संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
       इन्होंने ब्राह्मण ग्रंथों का विरोध किया और मनुस्मृति को जलाने की बात कही। साथ इनके द्वारा कई पुस्तकें लिखी गयी जो इनके विचार को व्यक्त कराता है जैसे कि WHO ARE SUDRA(शूद्र कौन है);THE UNTOUCHABLES,WHO ARE THEY(अछूत,वे कौन है);ANNIHILATION OF CASTE(जाति-प्रथा का उन्मूलन) आदि।

     डॉ. भीमराव अंबेडकर को मैं एक आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारक कहना पसंद करूँगा। जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में,वे "हिन्दू समाज के अत्याचार तत्वों के प्रति विद्रोह के प्रतीक" थे। ऐसे तो यह आलेख अंबेडकर पर है फिर भी मैं इनके दर्शन को सकारात्मक और नकारात्मक दृष्टिकोण से विश्लेषण करने का प्रयास करूंगा। मूल उद्देश्य यह रहेगा कि इनका विचार भारतीय समाज को किस प्रकार प्रभावित किया और कर रहा है। साथ ही आज के समय में क्या प्रासंगिकता है?

अछूतों का उद्धार(EMANCIPATION OF THE UNTOUCHABLES)
      इनके द्वारा 1936 में लिखी गयी 'ANNIHILATION OF CASTE(जाति-प्रथा का उन्मूलन)',यह वह महत्वपूर्ण कृति है जिसमें इन्होने हिन्दू वर्ण-व्यवस्था का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद छुआछूत या अस्पृश्यता की प्रथा में निहित अन्याय पर प्रकाश डाला है।
      अपने विश्लेषण में उन्होंने अनुभव किया कि उच्च जातियों के कुछ संत-महात्मा और समाज-सुधारक दलित वर्गों के प्रति सहानुभूति तो रखते थे,परन्तु इस दिशा में उनके द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
       फलस्वरूप दलितों की उद्धार के लिए उन्होंने विचार रखा,"तथाकथित अछूत ही अछूत का नेतृत्व कर सकता है।" इस संबंध में उन्होंने दूसरा बात बताया कि दलित वर्गों(DEPRESSED CLASSES) को आत्म सुधार की जरुरत है जैसे कि मदिरा-पान और गौ-मांस भक्षण जैसे आदतों को छोड़ने की सलाह दी।
        दलितों के उत्थान के लिए उन्होंने और कई रास्ते भी बताये,जो है-बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान देने और आत्म-सम्मानपूर्ण व्यवहार करने का रास्ता दिखाया और प्रोत्साहित किया।
        दलितों को हीन भावना से ऊपर उठाने को प्रेरित किया। उन्होंने विश्वास दिलाया कि उनमें योग्यता की कोई कमी नहीं है।
       उन्होंने ये भी कहा कि तकनीकी शिक्षा प्राप्त करके शहरों में जाकर नए व्यवसाय अपना सकते हैं जिससे परंपरागत जातिगत पूर्वाग्रह अपने आप धीमा हो जाएगा।
        उन्होंने शासन की संस्थाओं में दलित वर्गों के उचित और पर्याप्त प्रतिनिधित्व पर बल दिया साथ ही शिकाकत निवारण के लिए कानूनी तरीके अपनाने का सुझाव दिया।
       उन्होंने सवर्ण हिन्दुओं और निम्न जातियों के बीच समानता के लिए आंदोलन चलाया जिसमें मिल-जुलकर पूजा-पर्व मनाने और सम्मिलित प्रीतिभोज में भाग लेने पर बल दिया जाता था।

अंबेडकर का धर्म के प्रति विचार
      वास्तव में डॉ अंबेडकर कोई धार्मिक प्रचारक नहीं थे। ये राजनीतिक तथा सामाजिक नेता थे। लेकिन वे व्यक्ति के जीवन में धर्म के  भली-भांती परिचित थे। अतः उन्होंने धर्म का दलितोद्धार के साधन के रूप में उपयोग किया।
       उन्होंने इस संबंध में दो-तीन बातें किया,"धर्म व्यक्ति के लिए है,व्यक्ति धर्म के लिए नहीं।" धर्म व्यक्तियों के बीच भेद-भाव नहीं करता जो धर्म ऐसा करता है वह धर्म नहीं बल्कि मानवता का अपमान है।
      इस कारण उन्होंने प्रचलित हिन्दू धर्म की आलोचने की और मानव-मात्र के प्रति समानता के संदेशवाहक धर्म की खोज  किया। अंततः 1956 बौद्ध धर्म को ग्रहण कर लिया। बौद्ध धर्म प्रति इनको आकर्षित होने का कई कारण बताये  हैं। पहला,बौद्ध धर्म नैतिकता पर आधारित है;दूसरा,इसमें समानता है;तीसरा,बौद्ध धर्म तर्क पर आधारित है। अंबेडकर के इन्हीं कार्यों के बदौलत डॉ वी.पी. वर्मा ने इनके व्यक्तित्व और कार्यों की तुलना  नीग्रो नेता पॉल रॉब्सन से की है,जिसने  श्वेत बहुमत के विरुद्ध समस्त नीग्रो के आक्रोश को व्यक्त किया।

अंबेडकर का अछूतोंद्धार नीति और धर्म के प्रति विचार का समीक्षा
       दलितों के उद्धार के लिए उनका पहला विचार था एक अछूत ही अछूत का नेतृत्व कर सकता है। उस समय की समाजिक स्थिति को देखने पर भले ही यह पहली नजर में सही लग सकता है परन्तु परिणाम की वास्तविकता इसपर संशय पैदा करेगा। इनसे पहले भी कई समाज-सुधारक जैसे-दयानंद सरस्वती,विवेकानंद और महात्मा गांधी आदि द्वारा भी दलितोद्धार का प्रयास किये गए हैं,जो अछूत नहीं थे।
        मेरा मानना है कि किसी भी दबाये हुए वर्ग(महिला,समलैंगिक,दलित आदि) का उत्थान और सशक्तिकरण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि समस्त समाज द्वारा प्रयास न किये जायें। महिला आंदोलन और महिला सशक्तिकरण जिस ऊंचाई पर आज  पहुंचा है इनके कई महिला नारीवादियों  साथ-साथ पुरुष नारीवादियों का भी प्रमुख योगदान रहा है।
        अछूत भी उसी  समाज के अंग है जिस समाज में सवर्णों द्वारा इन्हें प्रताड़ित किया गया है,अतः जब तक सवर्ण उनकी स्थिति को मान्यता नहीं देंगे तब तक ये सामाजिक रूप से सशक्त नहीं हो पाएंगे? इसकारण सवर्णों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाना चाहिए न कि इनसे अलग रहकर अलग अस्तित्व बनाने की।
         उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए आत्म-सुधार,बच्चों की शिक्षा,शराब और गोमांस का त्याग,व्यापार,हीन-भावना से ऊपर उठाने की बात कही जो पूर्णतः सही है,किसी भी समाज का विकास उन्हीं सब मूल्यों में संवृद्धि के बदौलत होता है। अगर संपूर्ण दलित समाज उनके द्वारा बताये गए इन उपायों को सही तरीके से अपने जीवन में लागू करता तो अंबेडकर के उद्देश्य को पाया जा सकता था। साथ ही समाज में प्रचलित जातिगत पूर्वाग्रह भी आज मिटने के करीब रहता।
         उनके द्वारा शासन की संस्थाओं में दलितों के लिए आरक्षण की मांग की गयी ताकि उस विषमता को दूर कर सत्ता के स्तर पर लोकतांत्रीकरण(जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व) को सृदृढ़ किया जा सके। भारत में लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब राजनीतिक स्तर के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर लागू हो। यह अलग बहस का विषय है कि आरक्षण से उनको क्या फ़ायदा हुआ और कितना उत्थान हुआ तथा कब तक जरुरत है?
         1956 में उनके द्वारा बौद्ध धर्म इसी कारण अपनाया गया कि यह नैतिकता,समानता और तर्क पर आधारित है,उनके उस विश्वास और विचार का खंडन कर दिया जो दलितों के उद्धार का साधन था,जो है-अंतर्जातीय विवाह,सम्मिलित पूजा-पर्व बनाने और सम्मिलित भोज आदि। उनका आधार वहीं धर्मशास्त्र है जिसमें ये भी कहा गया है कि अपने धर्म हमेशा सुखदायी होता है और दूसरों का दुखदायी। यहां उनका दोहरा चरित्र निकलकर सामने आता है। यह विडंबना ही कहा जाएगा कि वो दलित जो अंबेडकर के साथ बौद्ध धर्म अपना लिए थे उन्हें बौद्ध अल्पसंख्यक नहीं बल्कि हिन्दू दलित के तहत गणना किया जाता है और आज स्थिति ऐसा है कि ये आरक्षण का फ़ायदा भी उठा रहे हैं जबकि बौद्ध धर्म आरक्षण से वंचित है।

(यह आलेख कई भाग में प्रकाशित होगा जो अंबेडकर पर केंद्रित है। "भीमराव रामजी अंबेडकर:दलितों का मसीहा" इस सीरीज का पहला भाग है।)