Monday, 30 November 2015

भीमराव रामजी अंबेडकर:दलितों का मसीहा

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
       बाबा साहेब भीमराव रामजी अंबेडकर दलितों के मसीहा के रूप में जीवन भर दलितों के लिए संघर्ष करते रहे। इंदौर के समीप पिछड़ी जाति 'महार' परिवार में इनका जन्म 14 अप्रैल,1891 को हुआ। हाईस्कूल की पढ़ाई के  बाद छात्रवृत्ति की मदद से अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र से एम.ए किया। यह बात उल्लेखनीय है कि ये प्रथम भारतीय अछूत और महार थे,जो पढने के लिए विदेश गए। इन्होंने लंदन विश्वविद्यालय से पी.एच.डी की उपाधी धारण की जहां इनका शोध का विषय 'प्रॉब्लम ऑफ़ रूपी(PROBLEM OF RUPEE)' था।
        1930 में ये 'अखिल भारतीय दलित महासंघ' के अध्यक्ष बने तथा 1936 में 'इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी' की स्थापना की जिसका नाम आगे चलकर 'अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ' रखा। भारतीय संविधान सभा में 'संविधान प्रारूप समिति' के अध्यक्ष का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया और इस पद पर रहते हुए इन्होंने संविधान निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
       इन्होंने ब्राह्मण ग्रंथों का विरोध किया और मनुस्मृति को जलाने की बात कही। साथ इनके द्वारा कई पुस्तकें लिखी गयी जो इनके विचार को व्यक्त कराता है जैसे कि WHO ARE SUDRA(शूद्र कौन है);THE UNTOUCHABLES,WHO ARE THEY(अछूत,वे कौन है);ANNIHILATION OF CASTE(जाति-प्रथा का उन्मूलन) आदि।

     डॉ. भीमराव अंबेडकर को मैं एक आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारक कहना पसंद करूँगा। जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में,वे "हिन्दू समाज के अत्याचार तत्वों के प्रति विद्रोह के प्रतीक" थे। ऐसे तो यह आलेख अंबेडकर पर है फिर भी मैं इनके दर्शन को सकारात्मक और नकारात्मक दृष्टिकोण से विश्लेषण करने का प्रयास करूंगा। मूल उद्देश्य यह रहेगा कि इनका विचार भारतीय समाज को किस प्रकार प्रभावित किया और कर रहा है। साथ ही आज के समय में क्या प्रासंगिकता है?

अछूतों का उद्धार(EMANCIPATION OF THE UNTOUCHABLES)
      इनके द्वारा 1936 में लिखी गयी 'ANNIHILATION OF CASTE(जाति-प्रथा का उन्मूलन)',यह वह महत्वपूर्ण कृति है जिसमें इन्होने हिन्दू वर्ण-व्यवस्था का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद छुआछूत या अस्पृश्यता की प्रथा में निहित अन्याय पर प्रकाश डाला है।
      अपने विश्लेषण में उन्होंने अनुभव किया कि उच्च जातियों के कुछ संत-महात्मा और समाज-सुधारक दलित वर्गों के प्रति सहानुभूति तो रखते थे,परन्तु इस दिशा में उनके द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
       फलस्वरूप दलितों की उद्धार के लिए उन्होंने विचार रखा,"तथाकथित अछूत ही अछूत का नेतृत्व कर सकता है।" इस संबंध में उन्होंने दूसरा बात बताया कि दलित वर्गों(DEPRESSED CLASSES) को आत्म सुधार की जरुरत है जैसे कि मदिरा-पान और गौ-मांस भक्षण जैसे आदतों को छोड़ने की सलाह दी।
        दलितों के उत्थान के लिए उन्होंने और कई रास्ते भी बताये,जो है-बच्चों की शिक्षा-दीक्षा पर विशेष ध्यान देने और आत्म-सम्मानपूर्ण व्यवहार करने का रास्ता दिखाया और प्रोत्साहित किया।
        दलितों को हीन भावना से ऊपर उठाने को प्रेरित किया। उन्होंने विश्वास दिलाया कि उनमें योग्यता की कोई कमी नहीं है।
       उन्होंने ये भी कहा कि तकनीकी शिक्षा प्राप्त करके शहरों में जाकर नए व्यवसाय अपना सकते हैं जिससे परंपरागत जातिगत पूर्वाग्रह अपने आप धीमा हो जाएगा।
        उन्होंने शासन की संस्थाओं में दलित वर्गों के उचित और पर्याप्त प्रतिनिधित्व पर बल दिया साथ ही शिकाकत निवारण के लिए कानूनी तरीके अपनाने का सुझाव दिया।
       उन्होंने सवर्ण हिन्दुओं और निम्न जातियों के बीच समानता के लिए आंदोलन चलाया जिसमें मिल-जुलकर पूजा-पर्व मनाने और सम्मिलित प्रीतिभोज में भाग लेने पर बल दिया जाता था।

अंबेडकर का धर्म के प्रति विचार
      वास्तव में डॉ अंबेडकर कोई धार्मिक प्रचारक नहीं थे। ये राजनीतिक तथा सामाजिक नेता थे। लेकिन वे व्यक्ति के जीवन में धर्म के  भली-भांती परिचित थे। अतः उन्होंने धर्म का दलितोद्धार के साधन के रूप में उपयोग किया।
       उन्होंने इस संबंध में दो-तीन बातें किया,"धर्म व्यक्ति के लिए है,व्यक्ति धर्म के लिए नहीं।" धर्म व्यक्तियों के बीच भेद-भाव नहीं करता जो धर्म ऐसा करता है वह धर्म नहीं बल्कि मानवता का अपमान है।
      इस कारण उन्होंने प्रचलित हिन्दू धर्म की आलोचने की और मानव-मात्र के प्रति समानता के संदेशवाहक धर्म की खोज  किया। अंततः 1956 बौद्ध धर्म को ग्रहण कर लिया। बौद्ध धर्म प्रति इनको आकर्षित होने का कई कारण बताये  हैं। पहला,बौद्ध धर्म नैतिकता पर आधारित है;दूसरा,इसमें समानता है;तीसरा,बौद्ध धर्म तर्क पर आधारित है। अंबेडकर के इन्हीं कार्यों के बदौलत डॉ वी.पी. वर्मा ने इनके व्यक्तित्व और कार्यों की तुलना  नीग्रो नेता पॉल रॉब्सन से की है,जिसने  श्वेत बहुमत के विरुद्ध समस्त नीग्रो के आक्रोश को व्यक्त किया।

अंबेडकर का अछूतोंद्धार नीति और धर्म के प्रति विचार का समीक्षा
       दलितों के उद्धार के लिए उनका पहला विचार था एक अछूत ही अछूत का नेतृत्व कर सकता है। उस समय की समाजिक स्थिति को देखने पर भले ही यह पहली नजर में सही लग सकता है परन्तु परिणाम की वास्तविकता इसपर संशय पैदा करेगा। इनसे पहले भी कई समाज-सुधारक जैसे-दयानंद सरस्वती,विवेकानंद और महात्मा गांधी आदि द्वारा भी दलितोद्धार का प्रयास किये गए हैं,जो अछूत नहीं थे।
        मेरा मानना है कि किसी भी दबाये हुए वर्ग(महिला,समलैंगिक,दलित आदि) का उत्थान और सशक्तिकरण तब तक नहीं हो सकता जब तक कि समस्त समाज द्वारा प्रयास न किये जायें। महिला आंदोलन और महिला सशक्तिकरण जिस ऊंचाई पर आज  पहुंचा है इनके कई महिला नारीवादियों  साथ-साथ पुरुष नारीवादियों का भी प्रमुख योगदान रहा है।
        अछूत भी उसी  समाज के अंग है जिस समाज में सवर्णों द्वारा इन्हें प्रताड़ित किया गया है,अतः जब तक सवर्ण उनकी स्थिति को मान्यता नहीं देंगे तब तक ये सामाजिक रूप से सशक्त नहीं हो पाएंगे? इसकारण सवर्णों को प्रोत्साहित करने का प्रयास किया जाना चाहिए न कि इनसे अलग रहकर अलग अस्तित्व बनाने की।
         उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए आत्म-सुधार,बच्चों की शिक्षा,शराब और गोमांस का त्याग,व्यापार,हीन-भावना से ऊपर उठाने की बात कही जो पूर्णतः सही है,किसी भी समाज का विकास उन्हीं सब मूल्यों में संवृद्धि के बदौलत होता है। अगर संपूर्ण दलित समाज उनके द्वारा बताये गए इन उपायों को सही तरीके से अपने जीवन में लागू करता तो अंबेडकर के उद्देश्य को पाया जा सकता था। साथ ही समाज में प्रचलित जातिगत पूर्वाग्रह भी आज मिटने के करीब रहता।
         उनके द्वारा शासन की संस्थाओं में दलितों के लिए आरक्षण की मांग की गयी ताकि उस विषमता को दूर कर सत्ता के स्तर पर लोकतांत्रीकरण(जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व) को सृदृढ़ किया जा सके। भारत में लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है जब राजनीतिक स्तर के साथ-साथ सामाजिक स्तर पर लागू हो। यह अलग बहस का विषय है कि आरक्षण से उनको क्या फ़ायदा हुआ और कितना उत्थान हुआ तथा कब तक जरुरत है?
         1956 में उनके द्वारा बौद्ध धर्म इसी कारण अपनाया गया कि यह नैतिकता,समानता और तर्क पर आधारित है,उनके उस विश्वास और विचार का खंडन कर दिया जो दलितों के उद्धार का साधन था,जो है-अंतर्जातीय विवाह,सम्मिलित पूजा-पर्व बनाने और सम्मिलित भोज आदि। उनका आधार वहीं धर्मशास्त्र है जिसमें ये भी कहा गया है कि अपने धर्म हमेशा सुखदायी होता है और दूसरों का दुखदायी। यहां उनका दोहरा चरित्र निकलकर सामने आता है। यह विडंबना ही कहा जाएगा कि वो दलित जो अंबेडकर के साथ बौद्ध धर्म अपना लिए थे उन्हें बौद्ध अल्पसंख्यक नहीं बल्कि हिन्दू दलित के तहत गणना किया जाता है और आज स्थिति ऐसा है कि ये आरक्षण का फ़ायदा भी उठा रहे हैं जबकि बौद्ध धर्म आरक्षण से वंचित है।

(यह आलेख कई भाग में प्रकाशित होगा जो अंबेडकर पर केंद्रित है। "भीमराव रामजी अंबेडकर:दलितों का मसीहा" इस सीरीज का पहला भाग है।) 

Saturday, 28 November 2015

आसियान-भारत संबंध

 सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
       फिलीपींस,मलेशिया,थाईलैंड,इंडोनेशिया और सिंगापुर द्वारा 8 अगस्त,1967 को 'बैंकाक घोषणा' के तहत आसियान की स्थापना की गयी। ऐसे तो इस दिशा में कदम 1961 में गठित 'दक्षिण-पूर्वी एशियाई संघ के गठन के साथ ही हो गया था। जिसमें फिलीपींस,मलेशिया और थाईलैंड शामिल थे। आशियान की स्थापना का उद्देश्य वियतनाम में साम्यवादी प्रसार और अपनी सीमाओं के भीतर विद्रोही प्रदर्शन को रोकना था।
       समय के साथ आसियान  सदस्यों की संख्या बढ़ती गयी। 1995 में वियतनाम आसियान का सांतवा सदस्य बना जो पहला साम्यवादी देश था। 1999 में कंबोडिया इसका दशवाँ सदस्य बन गया। फलस्वरूप आसियान दस सदस्यों वाला एक प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रीय संगठन के रूप में विख्यात हुआ। 
       1992 से 1995 के दौरान आसियान और भारत के बीच वार्त्ता साझेदारी तेजी से विकसित हुयी। 2002 में नोमपेन्ह  भारत-आसियान सम्मिट प्रत्येक साल होने लगा। 

आसियान का आर्थिक सहयोग 
       आसियान मूल रूप से व्यापारिक उदारीकरण की मांग करता है। व्यापार को सुसाध्य बनाने,गैर-सीमा व्यवस्था और निवेश को बढ़ाने की गतिविधियों पर भी बल देता है। आज इसके अंतर्गत सहयोग के नए क्षेत्र जैसे-सेवाओं और बौद्धिक संपत्ति अधिकारों को भी लागू करने का प्रयास किया जा रहा है(स्त्रोत-आसियान वेबसाइट)। भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने भी भारत में IPR नीति घोषित करने की बात कही है। इस साल के अंत तक एक 'COMPREHENSIVE NATIONAL INTELLECTUAL PROPERTY RIGHTS' आने की संभावना है।


आसियान+3 का निहितार्थ
       1999 में आसियान+3 प्रक्रिया का सांस्थानीकरण(INSTITUTIONALIZATION) हुआ। ये तीन प्रदेश जापान,चीन और दक्षिण कोरिया हैं। आसियान और +3 देश सहयोग को गहरा और मजबूत करने के लिए शिखर सम्मलेन,मंत्रिस्तरीय वार्त्ता आदि के माध्यम से वार्त्ताएं और परामर्श करते हैं। आसियान और इन देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार व्यवस्था की भी स्थापना हो गयी है। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि ये  भविष्य में 'पूर्वी एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र(EAFTA)' की संभावित स्थापना के लिए आधारशिला का काम करेगी।

आसियान और भारत
आसियान और भारत के बीच राजनीतिक साझेदारी
        2002 में कंबोडिया के नोम-पेन्ह में हुआ आसियान सम्मलेन से भारत-आसियान वार्त्ता को काफी तेजी मिली। इस क्रम में अब राजनीतिक और सुरक्षात्मक आयाम भी शामिल हो गए हैं। भारत ने आसियान के साथ कई मंत्रणात्मक सभाओं में भाग लिया है जैसे कि आसियान रीजनल फोरम(ARF),10+1,10+10 आदि।
        1996 से ही भारत ARF के महत्व को देखता है और आसियान के देशों के साथ द्विपक्षीय संबंध को पूरक मानता है। 2003 में बाली में हुए दूसरे आसियान-भारत शिखर सम्मलेन के दौरान शांती,सुरक्षा,स्थायित्व और विकास पर साझा हित प्रकट किये गए। अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर काबू पाने के लिए भी संयुक्त घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर हुआ।
भारत-आसियान व्यापारिक साझेदारी
       आसियान के देशों का सम्मिलित GDP लगभग 24 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है,जो विश्व अर्थव्यवस्था में एक विशेष महत्व रखता है। आसियान विनिर्माण और व्यापार का एक वैश्विक हब है साथ-ही-साथ विश्व में तेजी से बढ़ने वाला उपभोक्ता बाजार भी है।(स्त्रोत-ASEAN INDIA BUSINESS COUNCIL की वेबसाइट और IMF का रिपोर्ट)
        इस परिदृश्य को देखकर भारत के लिए इसका महत्व काफी ज्यादा इसलिए भी बढ़ जाता है कि भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति तभी सार्थक हो पाएगी जब आसियान से रिश्ते प्रगाढ़ होंगे।
        भारतीय विदेश मंत्रालय के एक रिपोर्ट के अनुसार भारत-आसियान के बीच वार्षिक व्यापार 22% की दर से बढ़ रहा है जो 2014-15 में बढकर लगभग 76.52 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है।
        आसियान के देशों द्वारा अप्रैल,2007 से मार्च,2015 के बीच 32.44 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश भारत में किया गया। वहीं भारत द्वारा आसियान के देशों में 38.67 बिलियन डॉलर का भी निवेश किया गया है। भारत-आसियान मुक्त व्यापार समझौता(FTA)
         भारत और आसियान के बीच 2014 में मुक्त व्यापार समझौता किया गया परन्तु आसियान के कुछ  द्वारा इसका विरोध भी हुआ और अभी भी हो रहा है। आगे देखना है कि यह कहाँ तक सफल होता है। मलेशिया और सिंगापुर की अर्थव्यवस्था के विकास में सेवा क्षेत्र का काफी योगदान है। भारत की अर्थव्यवस्था भी सेवा क्षेत्र के बदौलत विकास कर रहा है,मलेशिया जैसे देशों को आशंका इस बात की है कि मुक्त व्यापार के चलते उन्हें कहीं नुकसान न उठाना पड़ जाए। साथ ही साथ आसियान और भारत के नीति-निर्माता इस बात का भी प्रयास कर रहे हैं कि निजी क्षेत्र की साझेदारी को भी मजबूती से बढ़ाया जाए।

भारत-आसियान सम्मलेन,2015 
       G20 की तरह यह सम्मलेन भी आतंकवाद पर केन्द्रीत हो गया,लेकिन इस सम्मलेन में संवेदनशील मुद्दा दक्षिण चीन सागर में क्षेत्रीय और समुद्री विवादों के जल्द समाधान पर भी चर्चा की गयी। इस दौरान भारतीय प्रधानमंत्री मोदी की वार्ता चीनी समकक्ष से भी हुयी और दोनों आतंकवाद पर सूचना साझेदारी को  भी हो गए हैं।       इस समय मोदी ने अपने भाषण के दौरान कहा कि भारत और आसियान के बीच 2020 तक व्यापार को 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर और 2025 तक २०० बिलियन अमेरिकी डॉलर तक बढ़ाना है। जबकि 2014-15 में व्यापार की मौजूदा स्थिति 76.5 बिलियन डॉलर है।
        इन्होने आसियान के पांच देशों के साथ वीजा फैसिलिटी बढ़ाने की भी बात कही और आसियान के साथ भारत की फिज़िकल,डिजिटल और इंस्टीटूशनल कनेक्शन बढ़ाने की इच्छा जतायी।
        मोदी ने आसियान-भारत इनोवेशन प्लेटफार्म बनाने की भी बात कही ताकि इस व्यवस्था के जरिये  तकनीक और शोध का आदान-प्रदान किया जा सके।
        कंबोडिया,लाओस,म्यांमार और वियतनाम के साझेदारी के साथ 'प्रोजेक्ट डेवलपमेंट फण्ड' की स्थापना की सहमति बनी ताकि विनिर्माण हब का निर्माण किया  सके।
         जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए ब्रिटेन,G20 सम्मलेन के बाद यहां भी मोदी ने 122 सोलर रिच कंट्री के बीच सौर ऊर्जा के प्रोत्साहन के लिए समझौता की बात कही और प्रस्ताव रखा।
        और अंत में अपने भाषण के दौरान शिलौंग में आसियान स्टडी सेंटर को स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।

भारत-आसियान:भविष्य की रणनीति
        अब यह देखना महत्वपूर्ण हो गया है कि भारत-आसियान रिश्ता भविष्य में कैसे चलता है और कितना प्रगाढ़ होता है। दोनों पक्षों के रिश्तों के बीच जो मूल बिंदु सबसे ऊपर है,वो है-भारत आसियान रिश्ते को तेजी से बढ़ावा देना,प्रशिक्षित श्रम(SKILLED LABOUR) का आदान-प्रदान,माल और सेवा(GOODS AND SERVICE) के बेहतरीन गुण को बढ़ावा देना,बराबर वैश्विक अवसर देना और आर्थिक विकास को बढ़ाकर गुणात्मक रोजगार पैदा करना। इसी के इर्द-गिर्द भारत-आसियान रिश्ता भविष्य में टिका हुआ रहेगा ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है।

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Tuesday, 24 November 2015

G-20 का वर्तमान परिदृश्य और प्रासंगिकता

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
         द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही पश्चिम के विकसित देश ब्रेटनवूड संस्थाओं(IMF और वर्ल्ड बैंक)(जिसे ब्रेटनवूड ट्विन्स भी कहा जाता है) के  माध्यम से उदारवादी अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था(LIEO) के जरिये विश्व अर्थव्यवस्था को नियंत्रित और संचालित करते रहे हैं। G-20 का गठन को भी इसी के कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे तो इसकी स्थापना 1999 में हो गयी थी,लेकिन 2008 से हेड ऑफ़ स्टेट का मीटिंग आरंभ हुआ। उस समय पश्चिमी जगत मंदी से जूझ रहा था। विकसित देशों को ऐसा लगता था कि चीन और भारत के विशाल बाजारों के सहारे वे मंदी से उबर सकते हैं। उनका यह ख्याल किसी हद तक सही निकला।G-20 की प्रासंगिकता साबित हुयी और तब से हर साल इसका शिखर सम्मलेन होता आ रहा है।

G-20 वर्तमान समय में प्रासंगिकता 
        2014 में ब्रिसबेन में हुआ सम्मलेन,यूक्रेन संकट के कारण कुछ हासिल न कर पाया। रूसी राष्ट्रपति पश्चिमी देशों के दबाव के कारण सम्मलेन को बीच में ही छोड़ दिए। उस समय यह सवाल उठाया गया कि आर्थिक सहयोग और आर्थिक विकास के मुद्दों के बहस पर आधारित इस समूह में सैन्य और राजनीतिक मुद्दों को उठाना सही है?

            लेकिन 2015 में तुर्की के अंताल्या में हुआ सम्मलेन अपने गठन के बुनियाद 'आर्थिक सहयोग,व्यापार और निवेश बढ़ाने' पर बहस करने के अलावा अगले महीने पेरिस में होने वाले वैश्विक जलवायु सम्मलेन के मध्यनजर कार्बन उत्सजन कटौती के उपायों पर भी चर्चा की। परन्तु मूल बुनियाद से समूह आज खिसक सा गया है और 2015 का सम्मलेन भी पेरिस पर हमला और आईएस का आतंकवाद जैसे विषयों पर केन्द्रीत हो गया। कुछ लोग ये भी कहते नजर आये कि अगर दुनिया सुरक्षित न हो तो विकास की कल्पना कैसे कर सकते हैं? बेशक ये बात सही है,लेकिन आर्थिक संगठन के इतर भी कई ऐसे मंच है जहां इस तरह के राजनीतिक मामलों को सुलझाया जा सकता है
 जैसे-संयुक्त राष्ट्र संघ,नाटो और द्विपक्षीय संबंध आदि। अगर ऐसा ही होता रहा तो G-20 की प्रासंगिकता पर प्रश्नचिह्न लगाने से कोई नहीं रोक सकता।
अंताल्या सम्मलेन,2015:अवलोकन 
        इस सम्मलेन की ख़ास बात यह रही कि सभी नेताओं ने एक सुर में आतंकवाद से लड़ने का संकल्प जताया और आईएस के नेटवर्क को नेस्तानबूद करने की बात कही। दूसरी ओर वान-की-मून ने भी इस संबंध में एक विस्तृत योजना बनाने की बात कही है।

आतंकवाद से लड़ने  के उपाय और वैश्विक पलायन  
        अंताल्या सम्मलेन में आतंकवाद के खिलाफ लड़ने और आतंक के वित्तीय स्त्रोतों को समाप्त करने का संकल्प व्यक्त किया गया। तुर्की के राष्ट्रपति रिसेफ तायिक एर्दोगन की ओर से दिए गए रात्रि भोज के दौरान 'वैश्विक चुनौतियां:आतंकवाद और पलायन' पर बयान का आधार तय हुआ। इस रात्रि भोज के दौरान मोदी ने पाकिस्तान का नाम लिए बिना कहा,"कई देश आतंक को राज्य की नीति के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं जिन्हें अलग-थलग किये जाने की जरुरत है।" और साथ ही ये भी कहा कि आतंक के वित्तपोषण को अपराधिक कार्य करार दिया जाना चाहिए। इन नेताओं ने आतकवाद और इसके वित्तपोषण के खिलाफ सख्त लक्षित वित्तीय प्रतिबन्ध व्यवस्था बनाने की अपील की जिसमें वित्तीय कार्यवाई कार्यबल(FATF) को सुगम तरीके से लागू करना शामिल है।
        अंताल्या घोषणा में 'वैश्विक पलायन' की समस्या का भी उल्लेख किया गया और सभी देशोंं से इस समस्या का समाधान करने की अपील की गयी। 
         परन्तु मुख्य सवाल यह है कि क्या आतंकवाद के वित्तपोषण को रोका जा सकता है,जब 'बिटक्वाइन' जैसा वर्चुअल मुद्रा अपना पैर तेजी से पसार रहा हो और धड़ल्ले से इसके बदौलत कारोबार भी हो रहा है। इस पर अंकुश कैसे लगाया जाएगा,जो कि एक वास्तविक मुद्रा है ही नहीं।

जलवायु परिवर्तन पर G-20 का रुख       
        इस दौरान मोदी ने कहा कि अगले सात साल में भारत की अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता को चौगुना करने और जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी घटाने का संकल्प जताते हुए सभी प्रमुख देशों से आह्वान भी किया कि वे 2020 तक प्रतिवर्ष 100 अरब डॉलर का 'हरित जलवायु कोष' बनाना सुनिश्चित करें। 
       मोदी ने इस मौके पर जलवायु संकट से निपटने के वैश्विक प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए सात सूत्र सुझाये। जैसे-कार्बन क्रेडिट से ग्रीन क्रेडिट की ओर जाने;2030 तक शहरों में आवागमन के साधनों में सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों का हिस्सा बढ़ाकर 30 फीसदी तक पहुंचाने;स्वच्छ ऊर्जा के लिए विकासशील देशों को तकनीक और वित्तीय मदद देने आदि शामिल है। 
       
अब ऐसा ही अनुमान लगाया जाएगा कि जिस तरह मंदी से निपटने में G-20 ने एकजुटता का परिचय दिया उसी तरह जालवायु संकट से निपटने में भी साझेदारी और संजीदगी दिखायेगा।
        
संबंधित पोस्ट - म्यांमार लोकतंत्र की ओर 
                        सीरिया संकट(the syrian catastrophe)
                       भारत - श्रीलंका

Saturday, 21 November 2015

म्यांमार लोकतंत्र की ओर

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
      म्यांमार में लोकतंत्र की विजेता 'आंग सान सू की' की पार्टी एनएलडी(नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी) गत दिनों हुए चुनावों में जरूरी दो तिहाई बहुमत पा ली है। 1990 के बाद म्यांमार में सू की की पार्टी का यह पहला चुनाव है। जिसके जरिये एनएलडी को निचली और ऊपरी सदन में नियंत्रण मिल गया है। अब यह पार्टी राष्ट्रपति का निर्वाचन और सरकार का गठन कर सकती है।
      इस चुनाव में पुराने दिनों की अपेक्षा सैन्य प्रतिष्ठान संयत रहे हैं लेकिन फिर भी व्यापक शक्तियां इनके ही हाथों में है। चुकि सू राष्ट्रपति पद पर आसीन नहीं हो सकती,कारण कि संविधान में वर्णित प्रावधान बाधा पैदा करते हैं। साथ ही सेना के लिए यह संविधान 25 फीसदी सीटें भी आरक्षित करता है। लेकिन एक बात तय है जो म्यांमार के ही स्वतंत्र विश्लेषक रिचर्ड होर्से के शब्दों में कहा जा सकता है,"एनएलडी जो भी नियम पारित करना चाहेगी ,वह कर सकेगी,उन्हें गठबंधन और किसी समझौते की जरुरत नहीं पड़ेगी।"
       थीन सीन की सत्ताधारी यूनियन सोलेडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी(यूएसडीपी) आसानी से इस चुनाव में हार गयी है। बाकी सभी छोटे दल हाशिये पर चले गए हैं। यूएसडीपी पुराने सैन्य कार्यकर्ताओं से बनी पार्टी है। 2011 में सरकार का नेतृत्व करने के लिए अपनी वर्दी छोड़ कर असैन्य वेश धारण करने वाले पूर्व जनरल थीन सीन को सुधारों की शुरुआत के लिए सराहा जाता है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून ने भी सुधार प्रक्रिया के नेतृत्व के लिए थीन सीन के साहस और सोच की सराहना की है। 

म्यांमार में नए युग का आगाज:एक विवेचना
      सू की की पार्टी म्यांमार में एक बड़ी पार्टी बन गयी है,लेकिन इस निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी कि इस आम चुनाव के बाद म्यांमार में फ़ौजी बूटों का हलचल कम हो पाएगी,कारण कि 1990 के चुनाव में भी एनएलडी को सफलता मिली थी,पर सेना ने उस चुनाव को खारिज कर दिया था। परन्तु स्थितियां आज बदल गयी है। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का काफी दबाव तथा आर्थिक नाकेबंदी ने म्यांमार और यहां की फ़ौजी सत्ता को तोड़ कर रख दिया है। सुधार ही वह रास्ता है जिसके बदौलत म्यांमार मुख्यधारा में आ सकता है। 
      दरअसल सैन्य शासन ने 2011 में भी राजनीतिक सुधारों की पहल की तो इसका भी कारण यहीं था कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण यह दुनिया से अलग-थलग पड़ गया था।
       लोकतंत्र को कुचलने के लिए सेना ने 1990 से ही आंग सान सू की को नजरबंद कर रखा था। परन्तु नवंबर 2010 में विश्व विरादरी के प्रयासों और दबावों के चलते नजरबंदी हटानी पड़ी। 2010 में ही म्यांमार में चुनाव हुआ। लेकिन इसका महत्त्व इसलिए नहीं रहा क्योंकि सू की ने उस चुनाव का बहिष्कार किया था कारण कि इनको अंदेशा हो गया था कि चुनाव साफ़-सुथरा नहीं होगा,जिसकी पुष्टि अंतराष्ट्रीय मीडिया ने भी की और कई धांधली का उल्लेख किया। अब मुख्य सवाल यह है कि क्या फ़ौजी हुकूमत 2015 के चुनाव के जनादेश का सम्मान करेगी?

2008 में लागू संविधान 
       2008 में जो नया संविधान लागू किया गया था वह लोकतंत्र के भावनाओं के प्रतिकूल था। जनता के बहिष्कार के बावजूद सैन्यतंत्र ने इसे जबरन लागू किया। इसमें कई आपत्तिजनक प्रावधान है जैसे कि संविधान का अनुच्छेद 59F कहता है,'अगर किसी के पास विदेशी संतान हो तो वह राष्ट्रपति नहीं बन सकता।' सू की के दो पुत्रों के पास ब्रिटिश नागरिकता है। इसी तरह सेना के लिए एक चौथाई सीट भी आरक्षित है।

म्यांमार की आतंरिक परेशानी और सू की के लिए चुनौती 
       म्यांमार की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चौपट हो गयी है इसको पटरी पर लाना इनके लिए मुख्य चुनौती होगी। बहुत सारे जनजातीय समाजों वाले इस देश में हिंसा हमेशा होती रहती है। तानाशाही हुकूमत में यह परदे के पीछे रह जाता था लेकिन अब सतह पर आयेगा जिससे निपटना सू की की दूसरी बड़ी चुनौती होगी। 
      सबसे बड़ी चुनौती जिसके ओर सभी का ध्यान आकृष्ट हुआ है,वह है-दुनिया की बड़ी ताकतों में केवल चीन ही जुंटा का साथ दिया। बदले में चीन ने अपना पैर खूब पसारा। निवेश से लेकर कूटनीतिक स्तर तक म्यांमार को अपने पर आश्रित बना लिया। अब सू की को ही विदेश नीति के मामले में ध्यान देना होगा कि वह किसका ज्यादा रुख करेगी भारत का या चीन का?
      म्यांमार का अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमान शायद दुनिया की सबसे पीड़ित समुदाय है। इन्हें यहां मताधिकार भी प्राप्त नहीं है। इन्हें बौद्धों द्वारा काफी पीड़ित किया जाता है। ये अलग शोध का विषय है कि आखिर क्या कारण रहा कि अहिंसक बौद्ध श्रीलंका और म्यांमार जैसे कई देशों में हिंसक हो गए है?

आंग सान सू की का वर्तमान व्यक्तित्व 
     काफी दिनों तक नजरबन्द रहने के बाद 1990 के अपेक्षा ये काफी समझदार और मानसिक स्तर पर मजबूत हो गयी हैं। इनको अभास पहले से ही है कि बिना सेना की सहायता के वह म्यांमार में लोकतंत्र की डगर को ज्यादा दिनों तक नहीं चला पाएगी। इसी कारण उन्होंने कहा कि वे राष्ट्रपति से ऊपर रहकर शासन करेंगी। जो वहाँ के लोगों को काफी प्रभावित किया।
      1989 से लेकर 2010 तक सू की नजरबन्द रही। इनकी इसी नजरबंदी में इनकी पूरी जवानी निकल गयी। अगर इनके जीते जी म्यांमार में एक सशक्त लोकतंत्र स्थापित हो जाएगा तो इसकी कीमत पूरी की जा सकेगी।       हालांकि लोकतंत्र कोई राकेट साइंस नहीं है जो रातों रात आ जाएगी,यह एक प्रक्रिया है,जो लोगों में स्वतः प्रेरणा देता है। भारत भी लोकतांत्रिक देश बनने की प्रक्रिया में है।
      कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सू की अब सभी कदम समझदारी से उठायेगी और म्यांमार में लोकतंत्र के दिन को बहुरेगी।

आखिर अब क्या?
      म्यांमार के सैन्य प्रशासकों को समझना होगा कि लोकतंत्र में ही म्यांमार के लोगों का भविष्य सुरक्षित है। सैन्य शासन के दौरान म्यांमार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक छाप धूमिल पड़ति गयी। इसकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि कभी दूसरे देश को धान निर्यात करने वाला यह देश आज अपनी जरूरतों के लिए खुद आयात कर रहा है। सागौन की लकड़ियों के लिए यह दुनिया भर में विख्यात है,आज इसकी तस्करी चरम पर है। कच्ची अफीम की आमदनी से इसकी आय जरूर बढ़ी है लेकिन इसकी कीमत यहां के युवाओं को चुकानी पड़ रही है। अगर म्यांमार को तरक्की के रास्ते पर चलना है तो लोकतंत्र को अपनाने के लिए यहां के सैन्य शासकों को भरपूर सहायता देना चाहिय्र तभी इसे अंतर्राष्ट्रीय मदद मिल सकती है।

म्यांमार और भारत 
     अगर म्यांमार में चीन का प्रभाव कम हो रहा है,तो इसका कारण भारत है। भारत काफी ज्यादा दबाव बनाया हुआ है। नजरबंदी से छूटने के बाद सू की सबसे पहले दिल्ली आयी थी। यहां उनका जोरदार स्वागत किया गया था,जो भारत और सू की के रिश्ते को स्पष्ट करता है।
      भारत के लिए म्यांमार का खासा महत्व है। दक्षिण एशिया में भारत की सारी नीतियां चाहे वह लूक ईस्ट पॉलिसी हो या एक्ट ईस्ट पालिसी सभी म्यांमार से ही शुरू होता है। जो म्यांमार के बिना चल भी नहीं सकता।        भारत द्वारा रिश्ते प्रगाढ़ करने के और प्रयास किये जाने की जरुरत है। पुराने और ठंढे बस्ते में पड़ी परियोजनाओं को अमल में लाने की जरुरत है। जैसे भारत-म्यांमार-थाईलैंड सड़क मार्ग का विकास आदि।
      मोदी ने म्यांमार के महत्त्व और रिश्ते को 3C के जरिये व्यक्त किया जिसका तात्पर्य है कॉमर्स(इरावदी नदी में पोर्ट);कल्चर(बौद्ध); और कनेक्टिविटी(भारत-म्यांमार-थाईलैंड सड़क मार्ग)। इसके बदौलत रिश्ते को और प्रगाढ़ किया जा सकता है।
                                                                                                                  लेखक से संपर्क करें
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नीतीश कुमार का शपथ-ग्रहण समारोह : कुछ नए संकेत

सुरेश कुमार पाण्डेय,
एक सोच जो अलग हो के लिए

        बीस नवंबर को नीतीश कुमार पांचवी बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इनके साथ जनता दल(यू) और राष्ट्रीय जनता दल के बारह-बारह और कांग्रेस के चार विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली। इसके तुरंत बाद ही कई सवाल उभरकर सामने आये जिनमें से एक है,"बिहार में यह बदलाव का संकेत है या पुन: जंगलराज की वापसी का?"

शपथ-ग्रहण समारोह के मायने 
         ऐतिहासिक गांधी मैदान में हुआ शपथ-ग्रहण समारोह की दो बातें ख़ास गौरतलब है। एक यह कि लालू यादव के दोनों बेटे भी मंत्री बन गए हैं। एक को तो उपमुख्यमंत्री का पद भी मिला । साफ़ है कि इस गठबंधन और इस सरकार के जरिये लालू प्रसाद यादव क्या चाहते हैं।
          मंत्रीमंडल में राजद की तरफ से कौन-कौन शामिल होगा,इसका फैसला लालू प्रसाद यादव ने ही किया होगा। अपने दोनों बेटों को,जिन्होंने पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़ा,मंत्रीमंडल में जगह दिलाकर लालू ने यह जताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है कि राजनीति में उनकी प्राथमिकता क्या है? जनसत्ता की संपादकीय में लिखा गया है कि पार्टी को इन्होने एक तरह से परिवार का जागीर बना दिया है।
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        शपथ-ग्रहण की दूसरी ख़ास देश भर से आये गैर-भाजपा नेताओं का जमावड़ा माना जाएगा,खुद नीतीश ने ट्वीट करके बताया है कि इसमें कौन-कौन आमंत्रित हैं। ममता बनर्जी,अखिलेश यादव,अरविन्द केजरीवाल,तरुण गोगई आदि जैसे लगभग सभी गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद थे। कई पूर्व मुख्यमंत्रियों ने भी शिरकत की।भाजपा के कुछ नेता भी शामिल हुए जो एक शिष्टाचार मात्र था।

        इस जमावड़े से एक संदेश आया है या नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव ने यह जताना चाहा है कि वे भाजपा के विरोध में राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा बनाने के ख्वाहिशमंद है। चुनाव परिणाम के दिन लालू ने तो भारत दौरा करने का ऐलान भी किया है। परंतु ज्वलंत प्रश्न है,"क्या लालू पर लगे पुराने आरोप और परिवारवाद का छाप उन्हें विपक्ष का धुरी बनने देगा? फिर बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि कुछ राज्यों में एक-दो साल में चुनाव होने वाले हैं,वहाँ क्या समीकरण बनते हैं।

नीतीश को चुनौतियां   
        नीतीश भले ही मुख्यमंत्री,महागठबंधन के बैनर तले बन गये हैं,लेकिन इनको आशंका पहले से ही है कि बिहार में फिर से जंगलराज की वापसी न हो जाये। इसलिए उन्होंने अतिप्रमुख गृह मंत्रालय अपने पास रखा हुआ है। जिस विकास के मुद्दे को लेकर ये चुनाव में गए थे,उसी मॉडल को आगे बढ़ाना उनके लिए मुख्य चुनौती होगी। अगर ऐसा ये कर पाते हैं तभी राष्ट्रीय स्तर की राजनीति में बड़ी भूमिका निभा पायेंगे।
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       लंबे समय से सत्ता से दूर चल रहे लालू के लोगों को भी नियंत्रित करना एक अन्य चुनौती होगी क्योंकि ऐसी शंका है कि ये सत्ता पर अधिकार करने को किसी हद तक जा सकते हैं।

नीतीश का शपथ-ग्रहण का सुरेशवादी व्याख्या  
    दो दशकों से प्रसाद और कुमार के बीच तीखी राजनीतिक नोंक-झोक,बहस आदि हो रही थी। लेकिन सत्ता से दूर रहने का डर इन्हें आपस में मिलाया और बिहार चुनाव को महागठबंधन के बैनर तले लड़ने को मजबूर किया,वोटों का अलगाव रुक गया और इन्हें बिहार में भारी जीत मिली।

      उसके बाद बीस नवंबर को बिहार में नया मंत्रिमंडल का गठन किया गया,इसका विश्लेषण इशारा करता है कि महागठबंधन के सभी घटकों में शक्ति-प्राप्ति को लेकर आतंरिक विरोधाभास है। तेजस्वी यादव को उपमुख्यमंत्री बनाकर 'गठबंधन सरकार' को राजद और लालू प्रसाद यादव द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है।
       अगर नीतीश कुमार राजद पर नियंत्रण कर लेंगे तो वे अपने विकासवादी मॉडल के जरिये बिहार में बदलाव ला पाएंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो तथाकथित जंगलराज-2 दोबारा अपना पैर पसारने में कोई गुरेज नहीं करेगा। फलस्वरूप मध्यावधि चुनाव अवश्यंभावी हो जाएगा या बिहार फिर से संक्रमण काल में चला जायेगा।  

Friday, 13 November 2015

सहिष्णुता सचमुच हिन्दुओं के खून में है?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

         धार्मिक असहिष्णुता की बात कर इन दिनों साहित्य अकादमी पुरस्कार,पद्म पुरस्कार और सरकार प्रदत पुरस्कार लौटाने की घोषणा करने वालों का नाम सुर्ख़ियों में छाया हुआ है। अपने आप को प्रतिष्ठित की श्रेणी में रखने वाले ये साहित्यकार,लेखक,वैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता इतनी ओछी और निचले तबके वाला विद्रोह कर रहे हैं कि आज कई विश्लेषक इस आशंका की ओर ध्यान दिलाने लगे हैं,"कहीं इसका विपरीत प्रभाव न पड़ जाये।"
         कुछ दिन पहले केंद्रीय मंत्री वैंकेया नायडू ने एक कार्यक्रम में कहा,"वो कह रहे हैं कि इस देश में सहिष्णुता की कमी आ रही है जबकि भारत दुनिया का इकलौता देश है जहां सहिष्णुता है,अगर यह 100 प्रतिशत नहीं है तो कम से कम 99 प्रतिशत तो है हीं।" ये आगे कहते हैं," हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं,यहीं भारत की महानता है,सहिष्णुता तो भारतीय के खून में है।" 
         दो धारणाएं जिसपर अधिकांस भारतीयों का विश्वास है-पहली यह कि भारत केवल आक्रमण का शिकार रहा है और भारतीयों ने कभी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया,भारतीय(इस सन्दर्भ में इसका मतलब हिन्दू है) ही वो लोग हैं जो अपने विजेताओं के साथ रहे। दूसरी ये की भारतीय अनोखे हैं क्योकि इनमें सहिष्णुता है, धर्मों का सम्मान और आदर करते हैं। इसका प्रमाण हम देख सकते हैं। भारत में सभी धर्मों के आदर को लेकर कानूनी प्रावधान है जिसे मूल अधिकार में भी शामिल किया गया है। हम कभी नहीं सुनते कि किसी द्वारा किसी को मंदिर,मस्जिद,गिरजाघर या जैन-बौद्ध मंदिरों में जाने से रोक गया हो।
                                                                      1.
हम यहां विश्लेषण की शुरुआत दूसरे धारणा से करेंगे
क्या सचमुच में हम भारतीय अनोखे हैं और हममें सहिष्णुता है?
         यह देश का दुर्भाग्य माना जायेगा कि गिरजाघर के खिड़की के शीशा टूटने को मीडिया और कुछ विद्वानों द्वारा इस कदर हवा दी गयी,जैसा लगा कि चारों तरफ ईसाईयों का कत्लेयाम हो रहा है। अकसर ये लोग इस बात को भूल जाते हैं कि सैकड़ों वर्षों तक उपनिवेशकाल में हमारा शोषण होता रहा लेकिन फिर भी आजादी मिलाने के बाद हमारे प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू ने राष्ट्रमंडल का सदस्य होना स्वीकार किया और दोस्ती की। ऐसा मिसाल दुनिया में कम ही मिलते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी द्वारा रूस पर हमला को वहाँ के लोग आज तक नहीं भूले हैं और सामाजिक स्तर पर कटुता जगजाहिर है।
        गहराई में जाने पर सिर्फ एक ही बात निकल सामने आती है और इस प्रश्न का उत्तर भी मिल जाता है कि वर्तमान परिदृश्य में असहिष्णुता जैसे जालीम शब्द को हवा क्यों दिया जा रहा है?
        2014 के लोकसभा चुनाव से पहले जो लोग खुली चिट्ठी और ज्ञापन के माध्यम से इस बात का जोर-शोर से प्रचार कर रहे थे कि अगर मोदी प्रधानमंत्री  है तो देश का माहौल बिगड़ जाएगा। लगता है ये लोग भविष्यवक्ता थे और भगवान से सीधा संबंध था कि ऐसा होने ही वाला ही है।
       परन्तु इनकी आशंका इस कदर धुल में विलीन हो गयी जैसे ताश के पत्ते के घर हवा के एक झोके भी सहन नहीं कर पाते। ये इस दर्द को सहन नहीं कर पाये कि देश का माहौल क्यों नहीं बिगड़ा और ज़िंदा रहते हुए भी मरने लगे। जो लोग पहले से ही इस पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं कि मोदी,भाजपा,संघ आदि सांप्रदायिक हैं और वो देश का माहौल बिगाड़ने का काम करते हैं उनसे एक अर्थपूर्ण बहस की कल्पना कैसे की जा सकती है?गलत बात को भी बार-बार कहने से सही लगाने लगता है इसी का प्रयास इन लोगों द्वारा किया जा रहा है।
       वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्यित्व को देखा जाये तो उनका चरित्र हमेशा से विकासपुरूष जैसा रहा है जिसे उन्होंने गुजरात में गुजरात मॉडल के जरिये प्रमाणित भी किये है। गोधरा जैसी घटना में हमें नहीं पड़ना है कि नरेंद्र मोदी की संलिप्तता उसमें थी या नहीं?अगर अदालत के फैसले को देखा जाए तो इनका चरित्र हमेशा से साफ़ रहा है।
        उपर्युक्त विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है,"भारत में धार्मिक असहिष्णुता में बढ़ोतरी न के बराबर हुयी है,बढ़ोतरी हुयी है तो 'सहिष्णुता की राजनीति' करने वाले हथकंडों में।"
क्या गाय असहिष्णुता को बढ़ायी है?
        दादरी में अखलाक की ह्त्या,वह मूल मुद्दा रहा जिसके इर्द-गिर्द असहिष्णुता और धार्मिक कट्टरता का बहस उछलता रहा। गाय के मांस के नाम पर किसी व्यक्ति की ह्त्या कर दी जाती है और सरकार द्वारा 45 लाख की सहायता राशि दी जाती है,क्या हम इसे सहिष्णुता कहेंगे? ह्त्या करने वालों को  कानूनी प्रावधान है,इसके तहत ही इसका समाधान किया जाना चाहिए था। एबीवीपी अभी हाल में ही दादरी घटना के एक और पहलू की ओर ध्यान दिलाया है घटना की जड़ गाय नहीं प्रेम-प्रसंग को है।
     इस बात पर लगभग सभी सहमत है कि हम उस तथ्य को नहीं नकार सकते जिसे सामाजिक मान्यता प्राप्त है। गाय जो कि पवित्र जानवर है हिन्दुओं के लिये ,कई लोगों की भावनायें इससे जुड़ी हुयी है तो कुछ समुदाय द्वारा अपनी जिह्वा तृष्णा की पूर्ति के लिये अपमान करना किसने सीखा दिया?
        धर्म तो जीवन का साक्षात्कार होता है,समाज में लोगों को नियंत्रित करने का यंत्र होता है,नैतिकता और सदाचार सीखाने का एक माध्यम होता है। जब ये हम जानते हैं तो फिर क्यों उस तरह का कदम उठाते हैं जो एक ख़ास समुदाय की भावनाओं को कुंठित करती है। गाय खाना किसी का धर्म नहीं हो सकता बल्कि राक्षसी प्रवृति वाला एक आदत है।
        'गाय का अर्थशास्त्र' काफी कुछ बयान कर देता है। इसके आर्थिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता। गोमुत्र और गाय के कई उत्पादों का पेटेंट कई देशों के वैज्ञानिकों द्वारा करा लिया गया है।
        वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो एक खाद्य श्रृंखला में मांसाहारी ही सबसे कम दिन जीवित रहता है,कारण है स्तर-दर-स्तर ऊर्जा की मात्र का घटते जाना। जब यह तथ्य हमारे पर्यावरण में हमेशा देखने को मिल रहा है फिर भी हम अपनी पाँव पर कुल्हाड़ी मारने का जोखिम क्यों ले रहे हैं।
                                                                     2.
पहली धारणा का विश्लेषण
क्या भारतीयों ने कभी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं किया?
     दुनिया का कोई ऐसा भाग नहीं जहां राजतंत्र रहा हो और राज्य के विस्तार के नाम पर युद्ध,आक्रमण और 
हत्यायें नहीं हुयी हो। भारत एक ऐसा देश रहा है जो अपने ही लोगों के खून का प्यासा रहा है। सम्राट अशोक 
के कलिंग युद्ध में हत्याओं की विभीषिका को कौन भूल सकता है। और थोड़ा आगे बढे तो गुर्जर-प्रतिहार,पाल 
वंश और राष्ट्रकूट के मध्य का त्रिपक्षीय संघर्ष इसका एक और उदाहरण है। इन्हीं राजाओं के बीच चक्रवर्तित्व 
के संघर्ष भी मध्यकाल में मिल जाता है। कई चोल राजाओं द्वारा श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व के देशों से युद्ध 
करने का उल्लेख और प्रमाण मिलता है। 
      अगर भारतीय राजाओं द्वारा किसी दूर समुद्री देश पर आक्रमण न करने का सवाल है तो इसका 
उत्तर नौसेना के विकास न होने के रूप में खोजा जा सकता है। अगर आस्ट्रेलिया जैसे सुदूर समुद्री प्रदेश पर 
आक्रमण नहीं किया गया तो वह कारण रहा भारतीय के पास सशक्त नौसेना का नहीं होना क्योंकि बीच का 
अथाह समुद्री सीमा मार्ग एक अवरोध का काम करता रहा।
         अगर इन सबकी तुलना अन्य साम्राज्यों से किया जाये तो नगण्य ही माना जायेगा। भारत के अंदर के 
राजाओं का दूसरे राजाओं पर आक्रमण कूटनीतिक दृष्टि से सही ठहराया जा सकता है। यह एक यथार्थ है 
अगर आप शांत हैं तो अपने साम्राज्य की रक्षा नहीं कर सकते जिसकी पुष्टि चाणक्य(कौटिल्य) का 'मंडल 
सिद्धांत भी करता है। राजतंत्र को बचाये रखने के लिए इसकी अनिवार्यता अवश्यंभावी लगती है।
क्या भारतीय ही वो लोग हैं जो अपने विजेताओं के साथ रहे ?

       इस बात को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं की हम भारतीय(इसका मतलब हिंदू है) ही वो लोग हैं जो 
विदेशी ताकतों द्वारा कई तरह के यातनायें देने के बाद भी  अच्छे से रहे,पारिवारिक और सामाजिक संबंधों 
को बढ़ावा दिया। इस तथ्य का विश्लेषण करने की जरुरत नहीं है क्यों कि इसका प्रमाण हमें आज भी देखने 
को मिल रहा है। 

 जरूर जानें - सुरेशवादी विचारधारा : एक परिचय

Tuesday, 10 November 2015

बिहार चुनाव परिणाम:अवसरवादिता और संकीर्ण जातीय सोच की जीत?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
 
       बिहार चुनाव के पहले मैंने एक ब्लॉग लिखा था-"'बिहार चुनाव' इतना महत्वपूर्ण नजर क्यों आ रहा है?" इस ब्लॉग के  माध्यम से मैंने कई सवाल उठाये थे जैसे-राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव का अंत निकट तो नहीं?,ओवैसी फैक्टर कितना असरदार होगा और दक्षिण एशिया में धार्मिक समीकरण को कितना प्रभावित करेगा?,बिहार चुनाव परिणाम से केंद्र सरकार कितना प्रभावित होगी?,यहाँ विकास हावी रहेगा या जातिवाद?,आरक्षण आज भी महत्वपूर्ण चुनावी हथियार है? आदि।
       अब वक्त आ  गया है इन सवालों का विवेचना करने का। बिहार चुनाव का परिणाम आ चुका है और भाजपा नीत एनडीए का महागठबंधन के हाथों करारी मात हुयी है जो मात्र 58 पर सिमट कर रह गया है। कई लोग इसे एक मुख्यमंत्री का प्रधानमंत्री पर विजय बता रहे है और कई दूसरे भी हैं जो हार की वजह केंद्र की नीतियों को मान रहे हैं। लेकिन मुख्य सवाल है कि क्या बिहार में भाजपा की हार को केंद्र की नीतियों से जोड़ सकते हैं? यहाँ मोदी की हार है या 'अवसरवादिता और संकीर्ण जातीय सोच' की जीत है?
बिहार चुनाव परिणाम:विहंगावलोकन
        पांच चरणों के लंबे चुनाव प्रक्रिया के दौरान चुनावी अभियान में कई आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। 'चारा चोर से लेकर 'ब्रह्मपिशाच'(ऐसे इसका अर्थ मुझे नहीं मालुम) और नरभक्षी जैसे कई शब्दों का इस्तेमाल जोर-शोर से किया गया। 'बिहारी बनाम बाहरी' का मुद्दा भी छाया रहा। कभी महागठबंधन जीतती नजर आ रही थी तो कभी भाजपा नीत राजग। लेकिन 8 नवंबर,2015 के चुनावी परिणाम के दिन सब कुछ स्पष्ट हो गया। महागठबंधन के जरिये जदयू,राजद और कांग्रेस की तिकड़ी ने भाजपा नीत राजग को करारी शिकस्त दी और भाजपा के कई मंसूबे पर पानी फेर दिया। लगता है भाजपा के प्रचारकर्ता और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को यह इल्म पहले ही हो गया थी कि हमारी स्थिति डावांडोल हो गयी है।
        परिणाम के बाद राजद सबसे ज्यादा 80 सीटें जीतकर बिहार में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और नीतीश कुमार 71 के साथ दूसरे स्थान पर रहे। वहीं भाजपा मात्र 53 सीट लेकर तीसरे स्थान पर चली गयी,पिछले विधानसभा चुनाव में पाये 91 सीट के मुकाबले इसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। अन्य पार्टियों का हाल तो और खस्ता रहा। सपा के नेतृत्व वाली तीसरा मोर्चा तो अपना खाता भी नहीं खोल पायी। भाकपा(माले) को तीन,हम को एक,रोलेजपा को दो और लोजपा को भी दो सीटों से संतोष करना पड़ा। अगर पैनी नजर से देखा जाए तो इस चुनाव से सबसे ज्यादा फ़ायदा कांग्रेस(27) को मिला जो पिछले 18 महीनों से(लोकसभा चुनाव के बाद से) लगभग मरणासन्न और खामोश हो गयी थी। आज इसमें नयी जान फ़ूँक गयी है।

क्षेत्रवादी अस्मिता हमेशा बरकरार रहेगी?
        भारत जैसी संघीय व्यवस्था में जहां शासन प्रणाली तीन स्तरों में बंटा हुआ है,शक्ति का लगभग विकेंद्रीकरण है। वहाँ सभी के हितों की रक्षा सामान रूप से नहीं की जा सकती। विविधता से भरे इस देश में जहाँ छोटी-छोटी घटनाएँ और मुद्दे भी राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन जाता है वहाँ जातीय और धार्मिक हितों की पूर्ति करना असंभव तो नहीं लेकिन कठिन जरूर है। इन्हीं सब परिस्थितियों का उपज आरक्षण और धर्मनिरपेक्षता का जुमला है जो भारतीय राजनीति में गहरी पैठ बना चुका है।
       कुछ दिनों पहले तक क्षेत्रीय दलों की सिमटती दायरा ने यह आभास दिया था कि 'क्षेत्रवाद' अब गुजरे जमाने की बात हो गयी है,लेकिन बिहार के ताजा घटना ने इस सवाल को फिर से पैदा कर दिया है कि भारत जैसे विविधता से भरे देश में क्षेत्रवाद को नकार नहीं सकते। इस घटनाक्रम के बाद जो मुख्य सन्देश निकालकर बाहर आया है,वह है,"किसी जाति आधारित क्षेत्रीय पार्टी के बगैर राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां सरकार तो क्या सम्मानजनक प्रदर्शन भी नहीं कर सकती।" इसपर लगभग सभी सहमत दिख रहें हैं। जो क्षेत्रवादी अस्मिता की नींव को और मजबूत करता है।
लालू का फिर से उदय?
       पिछले कई चुनावों से लालू की पार्टी उमदा प्रदर्शन नहीं कर पा रही थी। स्थिति ऐसी हो गयी थी कि उनकी पत्नी और पुत्री को भी हार का सामना करना पड़ा था। 2015 के विधानसभा चुनाव में इन्होंने 80 सीटें जीतकर सभी को संदेश दे दिया कि बिहार की राजनीति के दमदार खिलाड़ी हम ही हैं।
       बोलने के अपने एक अलग अंदाज के कारण प्रेस का हमेशा निशाना बनते रहे हैं। कितने ही टीवी शो प्रस्तोता उनके बोलने की अंदाज का नक़ल उतारते हुए नजर आते हैं। इनका यहीं देहाती अंदाज लोगों के दिलों-दिमाग पर छाया रहता है और यह इनके इस मजबूती को भी दिखाता है कि वे बिहार के स्थानीय लोगों पर कितना पकड़ रखते हैं।

आरक्षण आज भी मजबूत चुनावी हथियार
       पिछले ब्लॉग में हमने एक सवाल उठाया था,"कोई भी योद्धा अपने आजमाये हुये हथियार का ही बार-बार इस्तेमाल करता है,लालू प्रसाद यादव इस बार भी यहीं कर रहें हैं  देखना है कि आरक्षण वाली लालू की हथियार का धार कितना कुंद और तेज है?"
       वर्तमान चुनावी परिणाम देखने से लगता है कि आरक्षण प्राप्त लोग आरक्षण के लिए अपनी सारी जिंदगी बरबाद करने का भी तमन्ना रखते हैं। ऐसे तो संविधान में आरक्षण का प्रावधान 'समाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन' के आधार पर किया गया है लेकिन आज यह जातीय परिप्रेक्ष्य ले चुका है ठीक उसी तरह प्राचीन समाज का आदर्श वर्ण-व्यवस्था का जाति में परिवर्तन।
        संघ प्रमुख मोहन भागवत का 'आरक्षण का समीक्षा' वाला बयान को लालू ने इस कदर इस्तेमाल किया और इसके जरिये लोगों को सम्मोहित किया कि आरक्षण को समाप्त कर हमें सड़क पर ला दिया जाएगा और हम हीं आरक्षण को बरकरार रख सकते हैं। जिसका इन्हें भरपूर फ़ायदा मिला। आज स्थिति ऐसी हो गयी है कि बिहार की राजनीति में हाशिये पर चले गये लालू और इनकी पार्टी राजद फिर से मुख्य धारा में लौट आयी है।
आरक्षण को लेकर संघ और भाजपा को नुकसान
        चुनाव से ऐन वक्त पहले 'आरक्षण की समीक्षा का बयान देकर मोहन भागवत इस बात को समझना चाहते थे कि आज के परिवेश में आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अपना खुली विचार रखकर वे प्रायोगिक राजनीति में कहाँ टिकते हैं। अगर भाजपा बिहार का चुनाव जीत जाती अथवा सम्मानजनक प्रदर्शन करती तो 'आरक्षण का समीक्षा' अवश्यंभावी था। परन्तु स्थिति एकदम उलट गया है। इस बात का आशंका जताया जा रहा है कि बिहार चुनाव परिणाम भाजपा के लिए काफी नुकसानदायक होगा। इसका खामियाजा इसे असम,पश्चिम बंगाल,केरल,उत्तर-प्रदेश आदि के आगामी चुनाओं में भुगतना पड़ सकता है।

किसकी जीत:विकास या जातिवाद?
        बिहार में चुनाव मुख्य रूप से केंद्र की विकासवादी नीतियां और राज्य की अवसरवादी महागठबंधन के बीच था। चुनावी दंगल में अगर कोई पार्टी हार जाती है तो उसका मतलब यह नहीं होता कि उसकी नीतियां गलत है। और भी कई परिस्थितियां और कारक होती है जो परिणाम को प्रभावित करती है। जातिगत समीकरण बिहार जैसे राज्य का वह मूल कारक होता है जो चुनाव पर नकारात्मक और सकारात्मक दोनों प्रकार का प्रभाव डालता है।
         गहराई से देखने पर मालुम चलता है कि बिहार का पूरा चुनाव कभी भी विकासवादी एजेंडा पर लड़ा ही नहीं गया। विकास सभी के लिए एक मुखौटा था चाहे लालू हो या नीतीश,कांग्रेस हो या भाजपा। काफी दिनों से सत्ता से अलग रहने के कारण इसकी संभावना न के बराबर है कि लालू को विकास के नाम पर वोट दिया गया होगा। यह सभी समझ सकते हैं कि बिहार परिणाम का मूल वजह क्या है?

ओवैशी फैक्टर:किसे नुकसान और किसे फ़ायदा?
         असादुद्दीन ओवैशी हैदराबाद से आकर मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्रों में अपनी भाग्य आजमाने की ठानी। राजनीतिक पंडितों द्वारा ऐसा अनुमान लगाया जाने लगा कि मुसलिम वोटों का विभाजन भाजपा को फ़ायदा पहुंचा सकता है लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। सीमांचल क्षेत्रों में भाजपा को तो नुकसान उठाना ही पड़ा,साथ ही साथ ओवैशी की पार्टी खाता भी नहीं खोल पायी पुरे बिहार में।
(भारत में ओवैशी की पार्टी दक्षिण एशिया में क्या प्रभाव डालेगा? इसे एक अलग ब्लॉग के रूप में प्रकाशित किया जाएगा।)

बिहार चुनाव परिणाम का प्रभाव
       बिहार चुनाव परिणाम का प्रभाव तो दूरगामी दिखाई दे रहा है जिसे इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता है-पहला,प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सुधार एजेंडा काफी ज्यादा प्रभावित होगा। इस परिणाम के बाद विपक्ष के पास एक निर्णयकारी विधायी शक्ति आ गयी है,जिसके चलते विशेषकर राज्यसभा में विधेयकों को लेकर काफी मशक्क़त करनी पड़ेगी। जीएसटी जैसे कई विधेयकों का भविष्य क्या होगा,आने वाले समय की गर्भ में है। दूसरा,राष्ट्रीय राजनीति में एक नए आयाम की शुरुआत होने की संभावना है। गैर-कोंग्रेसी गठबंधन बनाकर नीतीश कुमार,ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल मोदी को घेरने का प्रयास करेंगे जो भाजपा के खिलाफ एक प्रभावकारी विपक्ष होगा। तीसरा,भाजपा के लीडरशीप पर भी अंगुली उठाये जाने की संभावना है। चौथा,लोकसभा चुनाव और अन्य कई राज्यों के चुनावों में भाजपा को बड़ी जीत दिलाने के बाद मोदी,'ब्रांड मोदी' के रूप में पहचाने जाने लगे थे। लेकिन साल की शुरुआत में दिल्ली और अंत में बिहार में हार के बाद इनपर भी सवालिया निशान लगना शुरू हो गया है।
बिहार चुनाव परिणाम का 'सुरेशवादी व्याख्या'-(सुरेशवादी विचारधारा : एक परिचय)
       बिहार का पुरा-का-पुरा चुनाव परिणाम 'अवसरवादिता' और 'संकीर्ण जातीय सोच' के विजय का सूचक है। चुनाव के पहले लालू नीतीश का आपस में मिलना लगभग पुरे जातीय समीकरण को बदल कर रख दिया। अगर परिस्थितियां विपरीत हो और देश हित के लिए ऐसा जरूरी हो तो इस तरह के गठबंधन से किसी को गुरेज नहीं करना चाहिए। जैसे जम्मू-काश्मीर को विकास के राह पर ले जाने के लिये भाजपा और पीडीपी का गठबंधन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
        देखने से नहीं लगता कि बिहार की परिस्थिति वैसी थी। एक तरह से नीतीश और लालू दोनों के लिए सत्ता का मोह ही आपस में मिलाने के लिए मजबूर किया। लालू जहां लंबे समय से सत्ता से बाहर चल रहे थे वहीं नीतीश को लोकसभा चुनाव में हार के बाद डर सताने लगा था। यहीं वह मूल कड़ी और आधार रहा जो एक दूसरे को आकर्षित किया। इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता या यों कहे कि इसको कोई नकार भी नहीं सकता कि बिहार में विकास की जीत नहीं बल्कि 'अवसरवादिता' और 'संकीर्ण जातीय सोच' की जीत है।