Saturday, 31 October 2015

भारत-अफ्रीका संबंध : नयी शुरुआत(India-Africa Relation : New Beginning)

      अभी हाल में ही 26-29 अक्टूबर,2015 को तृतीय भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन संपन्न हुआ जिसे  सबसे महत्वाकांक्षी कूटनीतिक आयोजनों में से एक माना जायेगा। यों भारत और अफ्रिका के बीच इस तरह की शिखर बैठक की शुरुआत 2008 में ही दिल्ली सम्मेलन के साथ हुआ,सिलसिला आगे बढ़ा और दूसरा इथियोपिया की राजधानी अदिस-अबाबा में संपन्न हुआ। पहले दो सम्मेलन दिल्ली में हुए ताजा सम्मेलन की तुलना में काफी छोटे थे क्योंकि 'बांजुल फार्मूला' के तहत कुछ देशों को ही आमंत्रित किया जाता था जबकि इस बार फॉर्मूला से बाहर आने का निर्णय लिया गया और अफ़्रीकी महादेश के सभी 54 देशों को आमंत्रित किया गया जो अपने आप में एतिहासिक है।
       ऐसे तो भारत और अफ्रिका का संबंध ऐतिहासिक रहा है। भारतीय मूल के बहुत सारे नागरिक कीनिया,तंजानिया और युगांडा जैसे देशों में आज भी बसते हैं। चाहे गुटनिरपेक्ष आंदोलन हो या महात्मा गांधी का योगदान सभी की याद वहां की देशों में जिन्दा है। नेहरू की दूरदर्शी नीति(बांडुंग सम्मेलन,नाम) की तारीफ़ तो वर्तमान में दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति जैकब जुमा और जिंबाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे समेत कई अफ़्रीकी नेताओं ने किया।

      अगर वर्तमान सन्दर्भ को लेकर विश्लेषण किया जाए तो मालूम चलता है,"भारत और अफ्रीका का संबंध अभी केवल 'सरकार से सरकार' तक है जब तक इस संबंध को 'जनता से जनता' तक  नहीं किया जायेगा तब तक संबंध को टिकाऊ कहना जल्दबाजी होगी।" 

भारत-अफ्रीका संबंध : इतिहास की नजर में -
      अफ़्रीकी महाद्वीप के साथ भारत के संबंध हजारों साल पुराने हैं। ऐसा वैज्ञानिक मत है कि भारत और अफ्रीका का भूभाग प्राचीन काल  दूसरे से जुड़े हुये थे। मध्यकाल में सल्तनत काल में अबीसीनिया और इथियोपिया से आये हब्शी गुलामों ने भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए थे। उपनिवेश काल में अंग्रेज बड़ी संख्या में भारत से मजदूर और कारीगर ले गये जो वहीं बस गये और दक्षिण-अफ्रीका,कीनिया,युगांडा और तंजानिया जैसे देशों में आज भी भारतीय मूल के अनेक नागरिक बसते हैं। भले ही देश में आजादी की लड़ाई की शुरुआत 1857 में हो गयी थी लेकिन यह रफ़्तार तभी पकड़ी जब गांधीजी 1915 में वापस भारत लौटे जिन्होंने अहिंसावादी सत्याग्रह और सिविल नाफरमानी वाले अस्त्र का प्रयोग किया था और भारत लौटे थे। इस कारण अफ़्रीकी महादेश में उपनिवेश विरोधी जान संघर्ष के साथ भारत की सहानुभूति स्वाभाविक थी।
      गुट-निरपेक्ष आंदोलन में नेहरू और घाना के एनक्रूमा के रिश्ते को कौन भूल सकता है। मिश्र के गमाल अब्दुल नासिर का भारत संबंध भी जगजाहिर है। हाल के दिनों में इब्सा अर्थात इंडिया,ब्राजील और साउथ अफ्रीका नामक एक नयी मित्र मंडली गठित की गयी है जिसके बारे में यह प्रचार किया जाता है कि इसके तीनों सदस्य देश अपने-अपने भूगोल में प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति हैं। ये घटना संबंध को और प्रगाढ़ करती है।
       भारत-अफ्रीका संबंधों के बीच 2008 में हुआ पहला भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन मील का पत्थर है। एक बार शुरुआत होने के बाद यह सिलसिला कभी रुका नहीं और रिश्तों की शानदार नमूना पेश करते हुए तीन सफल सम्मेलन का आयोजन कर चुका है।

भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन : निहितार्थ -
        प्रथम भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन का आयोजन 2008 में हुआ लेकिन इस सम्मेलन में भारत के साथ केवल अफ्रीका के 14 देशों ने भाग लिया। वहीं दूसरे सम्मलेन का आयोजन 2011 में इथियोपिया की राजधानी अदिस अबाबा में हुआ। भाग लेने वाले देशों की संख्या में मामूली बढ़त हुयी लेकिन संतोषजनक नहीं क्योंकि इन दोनों सम्मेलनों का आयोजन 'बांजुल फॉर्मूले के आधार' पर किया गया था जिस कारण देशों की संख्या सीमित रह जाती थी। दूसरे सम्मेलन  में इस बात को लेकर भाग लेने वाले नेताओं द्वारा चर्चा की गयी कि किस तरह भारत-अफ्रीका सहयोग के उद्देश्य को बढ़ाया जाए ताकि एक- फ़ायदा हो।
       चीन 2000 से ही इस तरह की सम्मेलनों का आयोजन कर रहा है। दुनिया के तमाम बड़ी शक्ति जैसे अमेरिका,जापान और यूरोपियन संघ द्वारा ऐसी बैठक का आयोजन किया जा चुका है। अंतर था तो केवल एक -इन देशों की सम्मेलनों में अफ्रीका के सभी देशों द्वारा भाग लिया जाता था जबकि भारत के साथ हुए सम्मलेन में यह संख्या 10-15 तक सीमित रहती थी। लेकिन इस बार वर्तमान सरकार द्वारा बांजुल फॉर्मूले को बदलने का फैसला किया गया और अफ्रीका के सभी 54 देशों को आमंत्रित किया गया जो भारत की ओर से एक बड़ी कूटनीतिक आयोजन हो गया।

       तीसरा भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन मुख्य रूप से आपसी सहयोग बढ़ाने,आतंकबाद से मिलकर मुकाबला करने और संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तावित सुधार पर केंद्रित रहा जिसका विस्तृत वर्णन दिल्ली घोषणा,2015 में किया गया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बने संयुक्त राष्ट्र का बुनियादी स्वरुप आज भी वैसा ही है जैसा उस समय था। परन्तु इतने दिनों में विश्व परिदृश्य तेजी से बदली है जैसे कि स्वतंत्र देशों की संख्या बढ़कर 193 के पास पहुँच गयी है,विभिन्न देशों के पास परमाणु हथियार आ जाने से शक्ति संतुलन का स्वरुप भी बदला है। आज जहां कई देश आर्थिक रूप से विकास कर विश्व राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं वहाँ संयुक्त राष्ट्र की यह पुराणी व्यवस्था है।
       विकासशील देशों को ऐसा लगता है कि अगर सुरक्षा परिषद का विस्तार होगा तो विश्व मामलों के समाधान और निर्णय निर्माण में इनकी भूमिका बढ़ेगी। इसी को लेकर भारत-अफ्रीका जुगलबंदी देखने को मिल रही है।

क्या अफ्रीका में चीन हमारे लिए चुनौती है?
       ऐतिहासिक काल से ही चीन का रिश्ता अफ्रीका से सिल्क रूट के माध्यम से रहा है। अगर आधुनिक समय में देखा जाए तो चीन का अफ्रीका से व्यापार 1980 के दशक से ही परवान चढ़ना शुरू किया उससमय के एक बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर आज 2012 के अंत तक 164 बिलियन अमेरिकी डॉलर को पार कर गया है। इतना ही नहीं चीन ने अफ्रीकन स्वतन्त्रता आंदोलन का मजबूती से समर्थन कर;स्वास्थ्य,आधारभूत ढांचा में सहयोग कर वहाँ पर अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली है। गुट निरपेक्ष आंदोलन के एक महत्वपूर्ण सदस्य इजिप्ट के साथ सैनिक समझौता कर नया सवाल पैदा कर दिया है। इसने लाइबेरिया और कांगो जैसे देशों में शांती स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र के शांती रक्षक दस्ते के माध्यम से 1500 से अधिक सैनिक भेजकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
       ऐसे इन सब कामों में भारत भी पीछे नहीं रहा है परन्तु आज जहां राजनीतिक और ऐतिहासिक संबंध से आर्थिक संबंध ज्यादा मायने रखने लगा है इस सन्दर्भ में चीन भारत के लिए अफ्रीका में मुख्य चुनौती बनकर उभरा है। भारत और अफ्रीका के बीच का व्यापार चीन के तुलना में काफी पीछे है और 2015 के अंत तक 90 बिलियम अमेरिकी डॉलर ही रहा। भारत के समक्ष यह एक मुख्य सवाल है कि वह अफ्रीका में चीन के मुकाबले कैसे आगे निकलता है।

भारत से अफ्रीका की चाहत और भारत की संभावनायें -  
       अफ्रीका के देशों में भारत की एक महत्वपूर्ण छवि है कि वह हमारा बराबर का साझेदार बन सकता है। ये देश इस बात की इच्छा जाता चुके हैं कि भारत अफ्रीका में शिक्षा,स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में निवेश करें। इससे हमारे सामने वहाँ यूनिवर्सिटी,अस्पताल में निवेश करने का विकल्प मौजूद है। अफ्रीकन देश गवर्नेंस,मानव संशाधन के विकास के लिए स्किल इंडिया का अनुभव साझा करने की भी उच्चा जाता चुके है भारत के  एक दूसरा विकल्प खुलकर सामने आता है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर शिखर सम्मेलनों के बाद भारत ने 7.4 बिलियन डॉलर का किफायती ऋण दिया है जिसका उपयोग बुनियादी ढांचा,कृषि,उद्योग,ऊर्जा,जल के क्षेत्रों में विकास  जा रहा है। 40 से अधिक देशों में 100 से अधिक परियोजनायें कार्यरत है और 100 से अधिक संस्थानों में भारत द्वारा 1.2 बिलियन डॉलर कका निवेश किया गया है जो मानव संसाधन विकास के लिए प्रमुखता से योगदान दे रहे हैं।
      दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए तो अफ्रीका प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता में काफी धनी है। जैसे कि कांगो कॉपर के लिए;सियरा लिओन,अंगोला और बोत्स्वाना हीरा के लिए;सूडान,नाइजीरिया,लीबिया,अल्जीरिया आदि तेल उत्पादन के लिए।
     पुरा अफ़्रीका महादेश दुनिया में मानव संसाधन में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है और वहाँ की 65% आबादी की उम्र 35 वर्ष से काम है। भारत वहाँ कई उद्योगों के माध्यम से फ़ायदा उठा सकता है।
     आज के दिनों में चीन को अफ्रीका में कई देशों द्वारा विरोध का सामना करना पड़ रहा है इसका मूल कारण है चीन का 'दो और लो'(GIVER AND TAKER) की रणनीति। अगर भारत को वहाँ लम्बे समय तक रहना है तो भाईचारे के रिश्ते से ही आगे बढ़ना होगा न कि चीन की नीति से।

भारत-अफ्रीका संबंध के निष्कर्षात्मक अवलोकन -
प्राकृतिक संसाधन और मानव संसाधन में इतना समृद्ध होने के बाद भी अफ्रीका कई तरह के घरेलु समस्याओं,गृह युद्ध आदि से ग्रसित है। कई पड़ोसी देशों के साथ भी तनावपूर्ण संबंध है। अगर भारत को मजबूत रिश्तों की बुनियाद अफ्रीका के साथ रखनी है तो इस बात को हमेसा ध्यान में रखना कि वहाँ की आंतरिक मामलों में तटस्थता की नीति अपनाये। इस सजगता के साथ ही अफ्रीका में अपनी पहुँच बढ़ानी होगी।
     अभी तक जो देखने में मिला है की संबंध केवल सरकार से सरकार तक है जरुरत इस बात की है कि इसे जनता से जनता तक,मीडिया से मीडिया तक,सिविल सोसाइटी से सिविल सोसाइटी तक किया जाये। तभी लक्ष्य को पाया जा सकता है।
      तृतीय भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन के अंतिम दिन नरेंद्र मोदी भावपूर्ण ढंग से अपनी बात रखकर सभी का दिल जीत लिये जो इन्हीं के शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है,"जैसा कि अफ्रीकी कहावत में कहा गया है कि एक छोटा सा घर सैकड़ों मित्रों को स्थान दे सकता है,और वैसा ही भारत का पारंपरिक विश्वास है : सन्तः स्वयं परहिते निहिताभियोगाः यानि भले लोग सदैव दूसरे का भला ही करते हैं,
 हमारे लिए मंडेला का आह्वान प्रेरणा दायक है इस तरह जियो कि दूसरों के सम्मान और दूसरों की आजादी में वृद्धि हो।
     आज हम साथ चलने की शपथ लेते हैं, हमारा प्रत्येक कदम लयबद्ध हो और समरसता प्रकट करने वाला हो।
      यह कोई नई यात्रा नहीं है, न नई शुरूआत है लेकिन प्राचीन संबंधों का उज्ज्वल भविष्य का नया संदेश इसमें सन्नहित है।"

फोटो सौजन्य - इंडियन एक्सप्रेस,द हिन्दू ,इंडिया-अफ्रीका फोरम और गूगल 
WRITTEN BY-SURESH KUMAR PANDEY