Tuesday, 20 October 2015

कौन है तु

कभी मेरी मंजिल बनकर मेरे को
रास्ता दिखाती हो
तो कभी रास्ता बनकर मेरे को
मंजिल तक पहुंचाती हो
लेकिन अकसर मेरी मंजिल ही
क्यों मुड़ जाती है
कभी अंधेरे में उजाला करके
हौंसला देती हो
कभी उजाले को मिटाकर
ठोकर खाने का मतलब सिखाती हो
लेकिन अकसर मेरी मंजिल क्यों मुड़ जाती है
आखिर कौन है तु
कि जो मेरे को अपने वजूद का ऐहसास दिलाती हो
कभी हंसकर हाथ पकड़ लेती हो
तो कभी कुछ ना कहकर वेगाना कर देती हो
आती हो खामोशी से मेरी दुखों के पलों में
चढा जाती हो एक हसीन सी मुस्कान चेहरे पर
तो क्यों सुहाने पलों में मेरा हाथ छोड़ कर चली जाती हो
रख कर दो आंसू मेरे आखों में
क्या जादू कर चली गयी तो
हंसना भी सिखा गई
रोने का सलिका भी
कौन है तु
जो जिन्दगी लेकर
जिन्दगी का मतलब सिखा गयी
रहता हूं तेरी पहचान करने
दिन-रात खड़ा सदा
मगर दिखती नहीं कभी
इन नेत्रों से कभी
चली गयी है कहीं दूर सदा
लेकर मेरी काया
लेकिन छाप कर गयी अपनी
तस्वीर मेरे मन पर सदा!
द्वारा - करन गजारे(karan gajare)