Friday, 16 October 2015

साहित्य अकादमी पुरस्कार का लौटाया जाना भांड़ फोड़ पायेगा?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी के मौत और दादरी की घटना के बाद लेखकों/साहित्यकारों द्वारा उदारता और बढते हुये असहिष्णुता की बात कर पुरस्कार लौटाने का एक सिलसिला सा चल पड़ा है.यह देखने वाली बात होगी कि साहित्य जगत में यह कुलबुलाहट कितना असरदार होगा या एक रस्मदायगी भर रह जायेगी.
लेकिन एक बात जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है-इस पुरस्कार लौटाने की घटना ने लगभग पूरे भारतीय समाज को दो वर्गों में बांट दिया है एक ओर पुरस्कार लौटाने वालों के समर्थक हैं जो लेखकों के इस काम को क्रांतिकारी कदम बता रहें हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे लोग हैं जो इन साहित्यकारों को मौकापरस्त की पदवी से नवाज रहे हैं.एक अन्य धड़ा भी है जो जिसमें 'रस्मदायगी' और 'भावी परिवर्तन का आरंभ' दोनों पर चर्चा कर रहा है.ईसका परिणाम जो भी होगा परंतु भारतीय समाज के लिये यह अच्छी बात साबित हो रही है कि एक सामाजिक विमर्श सही पैमाने पर हो रहा है.
एक तरह से देखा जाये तो साहित्य अकादमी विभिन्न भाषाओं की कृतियों की राष्ट्रीय अकादमी है.इसका उद्देश्य प्रकाशन,अनुवाद,गोष्ठियां और कार्यशालायें आयोजित करके भारतीय साहित्य के विकास को बढावा देना है.
अकादमी की स्थापना 1954 में एक स्वायत्त संस्था के रुप में की गयी तथा इसके लिये धन की व्यवस्था भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय करता है.अकादमी का समीति के रुप में पंजीकरण 1956 में सोसायटी एक्ट 1860 के तहत हुआ था.अकादमी ने कुल 24 भाषाओं को मान्यता दे रखी है.(भारत-2015,पेज-99)
1954 से ही प्रत्येक वर्ष अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त प्रमुख भारतीय भाषाओं में प्रकाशित साहित्य की उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों को पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं.अकादमी इन 24 भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करती है और पुरस्कृत कृतियों का कई भाषाओं में अनुवाद भी करती है.
साहित्य अकादमी द्वारा 2005 में प्रेमचंद फेलोशिप की स्थापना की गयी जो भारतीय साहित्य पर अनुसंधान करने वाले विद्वानों के अलावा सार्क देशों के विद्वानों को भी दिया जाता है.
अकादमी के वर्तमान प्रमुख डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का कहना है,"साहित्य अकादमी पुरस्कार देने का फ़ैसला लेखकों का एक मंडली करता है,इसमें कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता.ये आगे कहते हैं लेखक पुरस्कार लौटाकर अकादमी का अपमान कर रहे हैं साथ ही गरिमा भी गिरा रहें है."
हिंदी के चर्चित लेखक उदय प्रकाश साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले सबसे पहले लेखक थे.इन्होंने एमएम कलबुर्गी की हत्या के विरोध में सम्मान लौटाया था.इसके कुछ ही दिन बाद दादरी की घटना हुयी और पुरस्कार लौटाने का सिलसिला चल पड़ा.नयनतारा सहगल,अशोक वाजपेयी,सच्चिदानन्दन थोड़े ही समय में ईस कतार में खड़े हो गये.
पुरस्कार लौटाने वालों में से लगभग सभी के मुंह से एक ही बयान आया कि आज देश में उदारता मिट रही है,साहिष्णुता धुमिल हो रही है और वर्तमान सरकार के कारण वैर-भाव बढ रहा है,परंतु सच्चाई क्या है?इसकी तफ्तीश बहुत जरुरी है.
गृह मंत्रालय के रिपोर्ट के अनुसार 2009-2014 तक 4,265 संप्रदायिक दंगों की पहचान की गयी जिसमें 12,805 लोग घायल हुए साथ ही 654 लोग मारे भी गये.अगर 2015 के आंकड़ा को देखा जाये तो जनवरी से मई तक कुल 287 घटनाओं की पहचान की गयी जो संप्रदायिक थी इसमें 961 लोग घायल हुए और मात्र 43 लोग मारे गये.अगर इसका तुलना जनवरी से मई 2014  में हुए संप्रदायिक घटनाओं से किया जाये तो 25% की वृद्धि दर्शाता है क्योंकि उससमय यह घटना 215 थी.
25% की वृद्धि तो चिंता का विषय है लेकिन यह वृद्धि ऐसी नहीं है कि साहित्यकार और लेखक इसे मुद्दा बनाकर पुरस्कार लौटाना शुरू कर दें.संप्रदायिक घटनायें वर्ष दर वर्ष घटती-बढती रही है.कई साल तो आंकड़ा 25% को भी पार कर गया है.इनमें से कई लेखक तो उससमय भी रहें हैं जब आंकड़ा में उतार-चढाव हुआ है.अगर कुछ वर्षों के इतिहास को देखा जाये तो बाबरी मस्जिद का टूटना,गोधरा में हजारों लोगों का मारा जाना,सिख दंगा,काश्मीरी पंडितों का अपना निवास स्थान छोड़ने के लिये मजबूर होना;ये ऐसी घटनायें हैं जो काफ़ी मार्मिक और दिल दहलाने वाली रही है लेकिन इन मुद्दों पर इन लेखकों द्वारा कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं की गयी और न ही पुरस्कार लौटाने की कोई पहल की गयी?
अब सवाल है कि कलबुर्गी की हत्या और दादरी की घटना में ऐसी क्या थी जो लेखकों को पुरस्कार लौटाने के लिये मजबूर किया?
इस सवाल का उत्तर इनके बयान के विश्लेषण से ही खोजा जा सकता है और विश्लेषण के उपरांत यह मालूम चलता है कि ये सभी किसी-न-किसी मानसिक और बौद्धिक पीड़ा से ग्रसित हैं इसका कारण है जो तवज्जो इनको पूर्ववर्ती सरकार द्वारा दी जाती थी वह सत्ता परिवर्तन के बाद लगभग कम होती जा रही है क्योंकि वर्तमान सरकार की सोच पुरानी सरकार की पुरानी मार्क्सवादी विश्व दृष्टि से आगे निकलकर एक नयी दशा और दिशा अपना ली है जिसकारण इन लेखकों/साहित्यकारों की पीड़ा दिन-प्रतिदिन बढती गयी और अचानक रस्मदायगी वाला प्रतिरोध का रुप ले लिया.
दूसरी महत्वपूर्ण बात जो शायद थोड़ा मुख्यधारा से हटकर लगे लेकिन यथार्थ है.पुरस्कार लौटाने वालों में से अधिकतर ऐसे साहित्यकार और लेखक हैं जो 'मोदी,भाजपा,संघ की विरोध' की पुर्वाग्रह से ग्रस्त हैं.
हरिमोहन जैन जैसे भारतीय राजनीतिक शास्त्री इस बात पर बल दिये हैं,"भाजपा का स्वरुप धर्मनिरपेक्ष रहा है लेकिन इसकी बढती लोकप्रियता को देखकर अन्य पार्टियों द्वारा विद्वानों/साहित्यकारों/लेखकों द्वारा जिन्हें इन अन्य पार्टियों का आश्रय मिलता रहा है,विरोध करना एक मजबूरी बन गयी थी/है.
दादरी घटना,कलबुर्गी के बाद एक बहाना मिल गयी,ये साहित्यकार नये सरकार के कारण एक तरह से हाशिये पर चले गये थे तो ये विरोध का हथकंडा अपनाकर कुछ सुर्खियां तो बटोर ही लिये हैं.
अब यह देखना महत्वपूर्ण हो गया है कि आगे इनके विरोध का क्या परिणाम होता है?यह रस्मदायगी ही रहकर नामवर सिंह के बयान को सही करेगा या भांड़ फोड़कर विष्णु खरे के बयान को गलत ठहरायेगा?