Monday, 5 October 2015

'बिहार चुनाव' इतना महत्वपूर्ण नजर क्यों आ रहा है?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए 

        2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को  एनडीए की तरफ़ से प्रधानमंत्री के पद के लिये नाम के घोषणा के साथ ही जदयू-भाजपा रिश्ता नेस्तानबुद हो गया और कई तरह की घटना देखने को मिला.नरेंद्र मोदी को जहां प्रधानमंत्री का तमगा मिला वहीं नीतीश कुमार शोक में अपनी सत्ता को छोड़कर पाश्चाताप करने चले गये.जितन राम मांझी जिन्हें नीतिश का रिमोट कंट्रौल वाला व्यक्तित्व माना गया,ये बागी चरित्र दिखाकर अपनी खुद की पार्टी 'हिंदुस्तानी अवाम पार्टी'(हम) बनाकर भाजपा का दामन थामकर 2015 के विधान सभा चुनावी रणक्षेत्र में ताल ठोक रहे हैं.यह 2014 के लोकसभा चुनाव का ही परिणाम था कि एक-दूसरे के विरोधी माने जाने वाले लालू और नीतीश महागठबंधन के हिस्सा बन गये.लालू प्रसाद यादव ने ईस बात को स्वीकार किया कि संप्रदायिक ताकतों को हराने के लिये वे जहर का घुंट भी पी लेंगे,यह साफ़ तौर पर झलकता है कि इनका ईशारा भाजपा और नीतिश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की सहमति पर थी.
बिहार चुनाव के मायने -
           चौथी दुनिया के एक पत्रकार 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव को लालू के लिये अंतिम चुनाव मानते हैं और कुछ लोग ये भी अटकलें लगा रहे हैं कि कहीं यह लालू प्रसाद यादव का अंत तो नहीं क्योंकि लगातार दो चुनावों से इनकी पत्नि राबड़ी देवी चुनाव हार रही है,लालू सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के तहत 6 सालों तक चुनाव नहीं लड़ सकते इसकारण यह कहा जा सकता है कि ईनके दोनों बेटों को चुनाव में उतरना गेम प्लान का ही हिस्सा है.अगर ये चुनाव हार जाते हैं तो मुझे भी इनका अंत करीब नजर आ रहा है लेकिन शायद हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि राजनीति में किसी का अंत नहीं होता.
         
           वहीं नीतीश कुमार के लिये यह चुनाव प्रतिष्ठा का उतना ही विषय बन गया है जितना नरेंद्र मोदी के लिये.गठबंधन टूटने के बाद अगर 2014 को नजरअंदाज कर दिया जाये तो यह पहला मौका है जब दोनों आमने सामने हो रहे हैं.नीतिश ईस चुनाव को किसी भी तरह भुनाना चाहते हैं इसकारण हमले का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहते.
           बाकी जितने भी मोर्चा ईस चुनाव में बने हैं चाहे वह वाम दलों का मोर्चा हो या सपा की नेतृत्व वाली मोर्चा,बिहार की राजनीति में ये उतना सफल नहीं हो पायेगी ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है.ओवैसी की पार्टी को मुसलिम युवाओं द्वारा एक आशा की किरण से पूरे भारत में देखा जा रहा है ईस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं कर सकते क्योंकि यह हैदराबाद से निकलकर महाराष्ट्र के नगरपालिका चुनाव में विजय पा चुकी हैं और कई जगहों पर परिणाम इसके अनुरूप रहा है,अतः ईस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बिहार में इसका प्रभाव नहीं होगा.
          नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिये यह चुनाव काफ़ी महत्वपूर्ण हो जाता है इसके मुख्य मायने हैं राज्यसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व बढाना,यह जगजाहिर है कि केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण विधेयक पर कई बार अध्यादेश निकालने के बाद भी ईसे कानून नहीं बना पायी और अपनी प्रतिबध्दता से पीछे हटती नजर आ रही है.
           वर्तमान में राज्यसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व 48 है और बिहार 16 सदस्यों का प्रतिनिधित्व करता है.अगर बिहार में भाजपा को जीत मिलती है तो निश्चित रुप से राज्यसभा के प्रतिनिधित्व में सुधार होगा नहीं तो अगले पांच सालों तक ये मौका नहीं मिल पायेगा जिस कारण ईसे राज्यसभा से कोई भी विधेयक पास कराने के लिये काफ़ी मशक्कत करना होगा जैसा कि भूमि बिल में देखने को मिला.

विकास बनाम जातिवाद -
           देश की राजनीति में धर्म और जाति के प्रभाव को यथार्थ माना जाता है,एक तरह से कहा जाये तो भारत में जाति यथार्थ है.ऐसे तो नीतीश कुमार और मोदी द्वारा विकास के नाम पर लोगों को रिझाने का प्रयास किया जा रहा है.लेकिन सवाल ये है कि विकास का फार्मुला क्या है और ये किस तरह की विकास की बात कर रहे हैं,केवल फ्लाई ओवर,रोड और मौल तक ही विकास को सीमित नहीं किया जा सकता.अगर संयुक्त राष्ट्र संघ की मानव विकास सूचकांक को ऊदाहरण माने तो स्वच्छता इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हो जाता है जो विकास को समझने को सही पैमाना पेश करता है.अगर इससे भी थोड़ा आगे बढे तो आज समावेशी और स्थायी विकास की बात की जा रही है.जो भी हो परंतु बिहार में जातिवाद को झुठलाया नहीं जा सकता,शायद यह ऐसा राज्य है जहां चुनावी परिणाम 'जाति फैक्टर' और 'हवा फ़ैक्टर' से प्रभावित होती है.लोगों में यह बात सुनी जा सकती है कि 'किसकी हवा है'
            तमाम राज्य स्तरीय पार्टियां और भाजपा सहित अन्य दल विभिन्न जातियों को साधने का प्रयास अपने तरीके से कर रहे हैं चाहे लालू का एमवाई समीकरण हो या भाजपा का अगड़ी जातियों को रिझाने का प्रयास.गिरिराज सिंह का यह बयान कि भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री ओबीसी या दलित होगा,ईसे किसी भी तरीके से जातिवादी टिप्पणी से अलग नहीं किया जा सकता.उपेंद्र कुशवाहा अपनी कुशवाहा समाज के बदौलत रण में रेश लगा रहे हैं तो मांझी दलितों के नेता के तौर पर.परिणामस्वरुप बिहार में किसी भी एक पार्टी को विकास का प्रतीक और दूसरी को जातिवादी का तमगा नहीं दिया जा सकता.
मोहन भागवत का आरक्षण पर बयान का मायने -
           संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान,"आरक्षण का फ़िर से समीक्षा होना चाहिये." कई राजनीतिक दल अपनी महत्वाकांक्षा पुरा करने के लिये इसका गलत मतलब निकालकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं कि भाजपा आरक्षण को समाप्त करना चाहती है.ईस बयान पर लालू प्रसाद यादव काफ़ी आक्रामक नजर आ रहे है और मौजुदा चुनाव को अगड़ी और पिछड़ी जाति का चुनाव करार दिये है हलांकि चुनाव आयोग ने ईसका संज्ञान लिया है.लालू यादव के संबंध में यह बात सटीक बैठती है कि कोई भी योद्धा अपने अजमाये हुये हथियार को ही भरोसे के साथ उपयोग करता है,आरक्षण इनका अजमाया हुआ हथियार है 1990 के दशक से कई बार वे ईसका इस्तेमाल चुनाव में कर चुके हैं और विजयी भी हुये हैं लेकिन सवाल यह है कि यह हथियार 2015 में कितना तेज या कुंद हुयी है परिणाम ही बतायेगा.क्योंकि लंबे समय से सत्ता में न रहने के कारण लालू के पास विकास के नाम पर कहने को कुछ नहीं है ऐसे भी महागठबंधन से ताल्लुक रखने वाले नीतीश कुमार अपनी छवि विकास पुरुष के रुप में पेश कर चुके हैं.
            कुछ पत्रकार,विद्वान,विश्लेषक और राजनीतिक नेता यह सवाल उठा रहें हैं कि भागवत के आरक्षण जैसे इतने संवेदनशील मुद्दे पर बयान के बाद भी मोदी चुप्पी ले लिये हैं लेकिन इनलोगों को सोचना चाहिये कि जब भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बेगुसराय की रैली में यह बात कह चुके हैं कि भाजपा की नीति आरक्षण की यथास्थिति बनाये रखने में है तो मोदी के बयान का क्या जरुरत रह जाता है.
राजनीतिक दल मोहन भागवत के आरक्षण पर बयान का फ़ायदा उठाने की भी भरपूर कोशिश कर रहे हैं लेकिन सवाल है कि समीक्षा का मतलब आरक्षण खत्म करना होता है क्या?
इनके द्वारा पूरे आरक्षण की समीक्षा करने की बात कही गयी है,हो सकता है समीक्षा के बाद आरक्षण बढ जाये,अन्य दूसरे समुह भी शामिल हो जायें और जो समुह शामिल हैं और अगर इन्हें जरुरत नहीं हैं तो निकाल भी जायें.            
            दूसरी महत्वपूर्ण बात निकलकर जो सामने आती है वह है कि केंद्र में भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है अभी भी वहां दुबारा चुनाव होने में काफ़ी वक्त है इसतरह बिहार का चुनाव एक प्रयोग हो सकता है.ऐसा राज्य जहां जाति का बोलबाला सबसे ज्यादा रहता है,जहां आरक्षण एक चुनावी हथियार के रुप में काम करता है वहां ईस तरह की बयान देकर भाजपा और संघ यह देखना चाहती है कि वह परिणाम में कहां टिकती है.अगर यहां आशाअनुरूप परिणाम आ जाता है तो आने वाले चुनाव में आरक्षण पर खुलकर बात की जा सकती है.ईसतरह संघ प्रमुख का यह बयान जबान की फिसलन नहीं बल्कि एक सोची समझी रणनीति है.

बिहार कौन?
             बिहार एक ऐसा प्रदेश रहा है जो शैक्षणिक रुप से पीछे रहने के बाद भी राजनीतिक रुप से सशक्त माना जाता है ईसका मुख्य कारण रहा है वहां की सामाजिक पिछड़ापन.
बुद्ध,महावीर से लेकर चाणक्य,मौर्य सम्राज्य और अशोक सभी ने समाज को रास्ता दिखाने का काम किया है.आजादी की लड़ाई में चंपारन से लेकर  जेपी का आंदोलन सभी ने देश को रास्ता दिखाने का काम हमेशा किया है ये तो अब वक्त बतायेगा कि 2015 के विधान सभा चुनाव परिणाम क्या निर्देश लेकर आयेगा?