Friday, 23 October 2015

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कितना उचित ?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

16 अक्टुबर 2015 को देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले के साथ ही 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' का भविष्य समाप्त हो गया। पर यह फैसला  बहुत से सवाल देश के विधायिका,कार्यपालिका और साथ ही न्यायपालिका के सामने भी खड़ा कर दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण हो गया है कि इस सवाल का अंत किस तरीके से होता है और परिणाम क्या होता है?
सत्ता पक्ष अर्थात कार्यपालिका के सदस्य गण फैसले के बाद एक तरह से बौखलाए हुए हैं  और इसे  संसदीय लोकतंत्र की गरिमा के खिलाफ बता रहे है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने ब्लॉग में लिखा,"भारतीय लोकतंत्र अनिर्वाचित का तानाशाही  नहीं हो सकता अगर निर्वाचित को का दबाया गया तो लोकतंत्र  स्वयं खतरे में पड़ जायेगा।"
परन्तु एक ऐसा देश जहां की पृष्टभूमि इस प्रकार की बन गयी है कि एक दागी नेता को बचाने के लिए अदालत के फैसले के खिलाफ कार्यपालिका द्वारा अध्यादेश लाया जाता है,सांसदों का वेतन बढ़ाने का प्रस्ताव एक मत में पास हो जाता है और लोकतंत्र की निगरानी करने वाली और मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्था पर अंकुश लगाने का काम तेजी से किया  जाता है वैसे देश में सैध्दांतिक रूप से अरुण जेटली का बयान भले ही सही लगे लेकिन व्यवहार में कहीं भी नहीं टिकता।
जिस 99वां संशोधन विधेयक को संसद द्वारा पास होने के बाद 20 राज्यों की विधान सभाओं ने भी अपनी सहमती दी और बाद में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी  ने इस संशोधन विधेयक पर 31 दिसंबर  2014  को हस्ताक्षर कर कानून बनाया,आखिर क्या कारण रहा कि देश की सर्वोच्च अदालत ने इसे असंवैधानिक करार दिया?
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग(एनजेएसी) का मतलब और कॉलेजियम प्रणाली -
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन 99वां संशोधन कानून के जरिये किया गया था जिसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट और देश में मौजूद 24 हाई कोर्ट के न्यायधीशों का नियुक्ति और उनका तबादला(ट्रांसफर) था जो 13 अप्रैल 2015 को लागू हुआ था। इस संशोधन विधेयक के जरिये भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 124A जोड़ा गया जिसमें कहा गया कि  भारत का सर्वोच्च न्यायलय का मुख्य न्यायाधीश,मुख्य न्यायाधीश के बाद सुप्रीम कोर्ट के ही दो वरिष्ठ न्यायाधीश,भारत सरकार का कानून मंत्री  और दो प्रतिष्ठित व्यक्ति(जिनका चुनाव  भारत का सर्वोच्च न्यायलय का मुख्य न्यायाधीश,लोकसभा में विपक्ष का नेता (नहीं रहने पर विपक्ष के  बड़ा दल  का नेता और प्रधानमंत्री की कमिटी करेगी) से मिलकर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनेगा ।लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मात्र छह माह बाद ही इसे असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया परिणामस्वरूप 20 साल पुराना कॉलेजियम प्रणाली फिर से लागू हो गया।
भारत में सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम प्रणाली भारत के संवैधानिक अदालत में जजों को नियुक्त करता है। इसका गठन एक प्रक्रियात्मक तरीके से हुयी जिसे थ्री जजेज केस के नाम से जाता है ऐसे तो कॉलेजियम प्रणाली की गठन सेकेण्ड जजेज केस (SUPREME COURT ADVOCATES ON RECORD ASSOCIATION V/S UNION OF INDIA,1993) द्वारा किया गया जो जस्टिस जे एस वर्मा के निर्णय का परिणाम था । बाकी दो जजेज केस SP GUPTA V/S UNION OF INDIA,1981(ALSO KNOWN AS JUDGE TRANSFER CASE),1981और IN RE SPECIAL REFERENCE 1 OF 1998 इसका पूरक है ऐसे तो 1998 का केस कोई केस नहीं है यह सर्वोच्च अदालत का ओपिनियन है जिसे राष्ट्रपति के आर नारायणन द्वारा अनुच्छेद 143  के तहत मान्यता दी गयी है । संक्षेपतः इन तीनों केसों से यह निष्कर्ष निकलता है,"न्यायलय की स्वतंत्रता में विधायिका और कार्यपालिका का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।"

सर्वोच्च अदालत के फैसले का कारण और परिणाम -
अदालत द्वारा फैसला 1030  पन्नों में दिया गया है जिसका मुख्य पहलु इसप्रकार है जो फैसले के कारण को प्रतिविंबित करता है। पहला,एनजेएसी न्यायपालिका की स्वतंत्रता में ही नहीं शक्तियों के विभाजन में भी दखल देता है। दूसरा, न्यायिक स्वतंत्रता संविधान की बुनियादी ढांचा है जिसमें सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती इसकारण इसे रद्द किया जाता है। तीसरा, एनजेएसी से न केवल न्यायाधीश की स्वतंत्रता कम हो रही है बल्कि राष्ट्रपति की भूमिका भी काम हो रही थी। चौथा,न्यायाधीशों के मामले में राष्ट्रपति मंत्रीमंडल के सलाह पर काम नहीं करते बल्कि स्वतंत्र रूप से निर्णय लेता हैं।पांचवा,दो जाने माने व्यक्तियों को शामिल कर इन्हें न्यायाधीश के समकक्ष मानना थोड़ा भी व्यावहारिक नहीं है। हालांकि संविधान पीठ ने माना है कि कॉलेजियम प्रणाली में कुछ खामियां हैं और इस पर सुनवाई के लिए पीठ ने तीन नवंबर की तारीख तय की है। 


अगर संसद अपनी संप्रभुता के लिए खड़ी होती है तो टकराव सुनिश्चित है और अगर नहीं खड़ी होती है तो संविधान संशोधन और कानून बनाने की शक्ति पर प्रश्न खड़ा होता है। बयानों को देखने से कि टकराव की संभावना बन रही है। ऐसा  होता है तो न्यायिक सुधार का क्या होगा?आज दो करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित है। करीब चार सौ के आसपास न्ययाधीशों के पद खाली पड़े हैं अगर टकराव हो जाता है तो ये नियुक्तियां नहीं होगी। 

अरुण जेटली के ब्लॉग के मायने -
ये अपने ब्लॉग में लिखते हैं,
"यह फैसला भारत के बृहत् संवैधानिक संरचना को अनदेखा करती है। निर्विवाद रूप से न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का एक हिस्सा है। इसे संरक्षित किया जाना चाहिए। लेकिन यह निर्णय इस तथ्य के ओर ध्यान नहीं देता कि संविधान की कई अन्य विशेषताएं हैं जो बुनियादी संरचना में शामिल है। संविधान का सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा संसदीय लोकतंत्र है। भारतीय संविधान की अगली महत्वपूर्ण बुनियादी संरचना एक चुनी हुई सरकार है जो देश की संप्रभुता की आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है। प्रधानमंत्री संसदीय लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण जवाबदेह संस्था है। विपक्ष के नेता बुनियादी संरचना का एक अनिवार्य पहलू हैं जो संसद में वैकल्पिक आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। क़ानून मंत्री संविधान संविधान की एक प्रमुख बुनियादी संरचना, मंत्रिपरिषद, का प्रतिनिधित्व करते हैं जो संसद के प्रति जवाबदेह है। ये सभी संस्थाएं, संसदीय संप्रभुता, एक निर्वाचित सरकार, प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, कानून मंत्री संविधान के बुनियादी ढांचे का एक हिस्सा हैं। वे लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। जाहिर है कि बहुमत की राय का वास्ता एकमात्र बुनियादी संरचना से था - न्यायपालिका की स्वतंत्रता - जबकि एक तर्क के औचित्य पर निर्णय पारित करके कि भारत के लोकतंत्र को उसके चुने हुए प्रतिनिधियों से बचाना है, अन्य सभी बुनियादी संरचनाओं को "राजनेता" के रूप में जिक्र कर निरर्थक बता दिया गया । न्यायाधीशों के निर्णय ने एक बुनियादी संरचना, न्यायपालिका की स्वतंत्रता की श्रेष्ठता को बरकरार रखा है लेकिन संविधान के पांच अन्य बुनियादी ढांचे, संसदीय लोकतंत्र, चुनी हुई सरकार, मंत्रि परिषद, एक निर्वाचित प्रधानमंत्री और चुने हुए विपक्ष के नेता को कमजोर कर दिया है।" (अरुण जेटली का पूरा ब्लॉग पढने के लिए यहां क्लिक करें)

इनके ब्लॉग से निकलकर एक खास बात  बाहर आती है जो है - संसदीय संप्रभुता और प्रधानमंत्री सबसे महत्वूर्ण जवाबदेह संस्था,ऐसे तो ये न्यायपालिका की स्वतंतता की बात करते हैं लेकिन गौण रूप में संसदीय संप्रभुता की बात करते-करते ये संविधान प्रदत प्रावधानों को भूल जाते हैं कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने की पूरी जिम्मेवारी सरकार अर्थात कार्यपालिका को है। अनुच्छेद 50 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह न्यायपालिका और कार्यपालिका को अलग करने का कदम उठाएगा,अगर पूरी सत्ता इस बात को समझने का प्रयास करती तो संसदीय लोकतंत्र की आड़ में न्यायपालिका पर अंकुश लगाने का प्रयास अन्य दो अंगों द्वारा नहीं किया जाता। सबसे ताज्जुब की बात यह है की अदालत के फैसले के विरुद्ध सत्ता पक्ष की तीखी आलोचना के बाद भी किसी पार्टी द्वारा और किसी अन्य नेता द्वारा विरोध नहीं किया गया। 
एक रिपोर्ट के अनुसार सर्वोच्च अदालत में अनिर्णित मुकदमों में लगभग 50% से अधिक केंद्र सरकार के विरुद्ध ही है यह व्यावहारिक नहीं लगता कि जजों द्वारा निर्णय निष्पक्षता के साथ उन्हीं लोगों के खिलाफ होगा जो उन्हें चुनेंगे।(कानून मंत्री का एनजेएसी का पदेन सदस्य होना।)दूसरी बात यह मामला सरकार के अंगों से संबंधित है अर्थात अगर यह प्रावधान एक बार लागू हो जाता है तो आने वाले सभी सरकार के पक्ष में ही रहेगा और उनकी स्थिति को मजबूत करेगा यहीं कारण है की किसी भी पार्टियों द्वारा इस सरकार की आलोचना एनजेएसी को लेकर नहीं की गयी।

एनजेएसी के आगे क्या?
अगर दुनिया में होने वाली न्यायाधीशों की तुलना भारत के साथ किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि ज्यादातर देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका है जैसे अमेरिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है और सीनेट इसकी अनुमति देता है वहीँ जापान में कैबिनेट द्वारा मनोनीत होने के बाद राजा करते हैं,ब्रिटेन में न्यायपालिका की सभी नियुक्तियां हाउस ऑफ़ लॉड्स के संबंधित मंत्री के सलाह पर कार्यकारी राजा करते हैं। जब दुनिया के सभी लोकतांत्रिक देशों में न्यायधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका है तो भारत में क्यों नहीं?
तीन नवंबर को यह देखना होगा कि कॉलेजियम में सुधार की क्या गुंजाइस बनती है,यह भी तय है कि इसमें बदलाव होगा या नहीं हालांकि यह न्यायपालिका के रुख पर निर्भर करेगा।
लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि कॉलेजियम में अपेक्षित पारदर्शिता नहीं है इसको इसतरह से बनाया जाये कि पारदर्शिता से रहित हो और हितधारकों की आवाज भी प्रतिबिंबित नहीं करे।
(फोटो सौजन्य - गूगल और सुप्रीम कोर्ट वेबसाइट)

WRITTEN BY - SURESH KUMAR PANDEY