Saturday, 31 October 2015

भारत-अफ्रीका संबंध : नयी शुरुआत(India-Africa Relation : New Beginning)

      अभी हाल में ही 26-29 अक्टूबर,2015 को तृतीय भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन संपन्न हुआ जिसे  सबसे महत्वाकांक्षी कूटनीतिक आयोजनों में से एक माना जायेगा। यों भारत और अफ्रिका के बीच इस तरह की शिखर बैठक की शुरुआत 2008 में ही दिल्ली सम्मेलन के साथ हुआ,सिलसिला आगे बढ़ा और दूसरा इथियोपिया की राजधानी अदिस-अबाबा में संपन्न हुआ। पहले दो सम्मेलन दिल्ली में हुए ताजा सम्मेलन की तुलना में काफी छोटे थे क्योंकि 'बांजुल फार्मूला' के तहत कुछ देशों को ही आमंत्रित किया जाता था जबकि इस बार फॉर्मूला से बाहर आने का निर्णय लिया गया और अफ़्रीकी महादेश के सभी 54 देशों को आमंत्रित किया गया जो अपने आप में एतिहासिक है।
       ऐसे तो भारत और अफ्रिका का संबंध ऐतिहासिक रहा है। भारतीय मूल के बहुत सारे नागरिक कीनिया,तंजानिया और युगांडा जैसे देशों में आज भी बसते हैं। चाहे गुटनिरपेक्ष आंदोलन हो या महात्मा गांधी का योगदान सभी की याद वहां की देशों में जिन्दा है। नेहरू की दूरदर्शी नीति(बांडुंग सम्मेलन,नाम) की तारीफ़ तो वर्तमान में दक्षिण अफ़्रीकी राष्ट्रपति जैकब जुमा और जिंबाब्वे के राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे समेत कई अफ़्रीकी नेताओं ने किया।

      अगर वर्तमान सन्दर्भ को लेकर विश्लेषण किया जाए तो मालूम चलता है,"भारत और अफ्रीका का संबंध अभी केवल 'सरकार से सरकार' तक है जब तक इस संबंध को 'जनता से जनता' तक  नहीं किया जायेगा तब तक संबंध को टिकाऊ कहना जल्दबाजी होगी।" 

भारत-अफ्रीका संबंध : इतिहास की नजर में -
      अफ़्रीकी महाद्वीप के साथ भारत के संबंध हजारों साल पुराने हैं। ऐसा वैज्ञानिक मत है कि भारत और अफ्रीका का भूभाग प्राचीन काल  दूसरे से जुड़े हुये थे। मध्यकाल में सल्तनत काल में अबीसीनिया और इथियोपिया से आये हब्शी गुलामों ने भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए थे। उपनिवेश काल में अंग्रेज बड़ी संख्या में भारत से मजदूर और कारीगर ले गये जो वहीं बस गये और दक्षिण-अफ्रीका,कीनिया,युगांडा और तंजानिया जैसे देशों में आज भी भारतीय मूल के अनेक नागरिक बसते हैं। भले ही देश में आजादी की लड़ाई की शुरुआत 1857 में हो गयी थी लेकिन यह रफ़्तार तभी पकड़ी जब गांधीजी 1915 में वापस भारत लौटे जिन्होंने अहिंसावादी सत्याग्रह और सिविल नाफरमानी वाले अस्त्र का प्रयोग किया था और भारत लौटे थे। इस कारण अफ़्रीकी महादेश में उपनिवेश विरोधी जान संघर्ष के साथ भारत की सहानुभूति स्वाभाविक थी।
      गुट-निरपेक्ष आंदोलन में नेहरू और घाना के एनक्रूमा के रिश्ते को कौन भूल सकता है। मिश्र के गमाल अब्दुल नासिर का भारत संबंध भी जगजाहिर है। हाल के दिनों में इब्सा अर्थात इंडिया,ब्राजील और साउथ अफ्रीका नामक एक नयी मित्र मंडली गठित की गयी है जिसके बारे में यह प्रचार किया जाता है कि इसके तीनों सदस्य देश अपने-अपने भूगोल में प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति हैं। ये घटना संबंध को और प्रगाढ़ करती है।
       भारत-अफ्रीका संबंधों के बीच 2008 में हुआ पहला भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन मील का पत्थर है। एक बार शुरुआत होने के बाद यह सिलसिला कभी रुका नहीं और रिश्तों की शानदार नमूना पेश करते हुए तीन सफल सम्मेलन का आयोजन कर चुका है।

भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन : निहितार्थ -
        प्रथम भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन का आयोजन 2008 में हुआ लेकिन इस सम्मेलन में भारत के साथ केवल अफ्रीका के 14 देशों ने भाग लिया। वहीं दूसरे सम्मलेन का आयोजन 2011 में इथियोपिया की राजधानी अदिस अबाबा में हुआ। भाग लेने वाले देशों की संख्या में मामूली बढ़त हुयी लेकिन संतोषजनक नहीं क्योंकि इन दोनों सम्मेलनों का आयोजन 'बांजुल फॉर्मूले के आधार' पर किया गया था जिस कारण देशों की संख्या सीमित रह जाती थी। दूसरे सम्मेलन  में इस बात को लेकर भाग लेने वाले नेताओं द्वारा चर्चा की गयी कि किस तरह भारत-अफ्रीका सहयोग के उद्देश्य को बढ़ाया जाए ताकि एक- फ़ायदा हो।
       चीन 2000 से ही इस तरह की सम्मेलनों का आयोजन कर रहा है। दुनिया के तमाम बड़ी शक्ति जैसे अमेरिका,जापान और यूरोपियन संघ द्वारा ऐसी बैठक का आयोजन किया जा चुका है। अंतर था तो केवल एक -इन देशों की सम्मेलनों में अफ्रीका के सभी देशों द्वारा भाग लिया जाता था जबकि भारत के साथ हुए सम्मलेन में यह संख्या 10-15 तक सीमित रहती थी। लेकिन इस बार वर्तमान सरकार द्वारा बांजुल फॉर्मूले को बदलने का फैसला किया गया और अफ्रीका के सभी 54 देशों को आमंत्रित किया गया जो भारत की ओर से एक बड़ी कूटनीतिक आयोजन हो गया।

       तीसरा भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन मुख्य रूप से आपसी सहयोग बढ़ाने,आतंकबाद से मिलकर मुकाबला करने और संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तावित सुधार पर केंद्रित रहा जिसका विस्तृत वर्णन दिल्ली घोषणा,2015 में किया गया है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बने संयुक्त राष्ट्र का बुनियादी स्वरुप आज भी वैसा ही है जैसा उस समय था। परन्तु इतने दिनों में विश्व परिदृश्य तेजी से बदली है जैसे कि स्वतंत्र देशों की संख्या बढ़कर 193 के पास पहुँच गयी है,विभिन्न देशों के पास परमाणु हथियार आ जाने से शक्ति संतुलन का स्वरुप भी बदला है। आज जहां कई देश आर्थिक रूप से विकास कर विश्व राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं वहाँ संयुक्त राष्ट्र की यह पुराणी व्यवस्था है।
       विकासशील देशों को ऐसा लगता है कि अगर सुरक्षा परिषद का विस्तार होगा तो विश्व मामलों के समाधान और निर्णय निर्माण में इनकी भूमिका बढ़ेगी। इसी को लेकर भारत-अफ्रीका जुगलबंदी देखने को मिल रही है।

क्या अफ्रीका में चीन हमारे लिए चुनौती है?
       ऐतिहासिक काल से ही चीन का रिश्ता अफ्रीका से सिल्क रूट के माध्यम से रहा है। अगर आधुनिक समय में देखा जाए तो चीन का अफ्रीका से व्यापार 1980 के दशक से ही परवान चढ़ना शुरू किया उससमय के एक बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर आज 2012 के अंत तक 164 बिलियन अमेरिकी डॉलर को पार कर गया है। इतना ही नहीं चीन ने अफ्रीकन स्वतन्त्रता आंदोलन का मजबूती से समर्थन कर;स्वास्थ्य,आधारभूत ढांचा में सहयोग कर वहाँ पर अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली है। गुट निरपेक्ष आंदोलन के एक महत्वपूर्ण सदस्य इजिप्ट के साथ सैनिक समझौता कर नया सवाल पैदा कर दिया है। इसने लाइबेरिया और कांगो जैसे देशों में शांती स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र के शांती रक्षक दस्ते के माध्यम से 1500 से अधिक सैनिक भेजकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
       ऐसे इन सब कामों में भारत भी पीछे नहीं रहा है परन्तु आज जहां राजनीतिक और ऐतिहासिक संबंध से आर्थिक संबंध ज्यादा मायने रखने लगा है इस सन्दर्भ में चीन भारत के लिए अफ्रीका में मुख्य चुनौती बनकर उभरा है। भारत और अफ्रीका के बीच का व्यापार चीन के तुलना में काफी पीछे है और 2015 के अंत तक 90 बिलियम अमेरिकी डॉलर ही रहा। भारत के समक्ष यह एक मुख्य सवाल है कि वह अफ्रीका में चीन के मुकाबले कैसे आगे निकलता है।

भारत से अफ्रीका की चाहत और भारत की संभावनायें -  
       अफ्रीका के देशों में भारत की एक महत्वपूर्ण छवि है कि वह हमारा बराबर का साझेदार बन सकता है। ये देश इस बात की इच्छा जाता चुके हैं कि भारत अफ्रीका में शिक्षा,स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में निवेश करें। इससे हमारे सामने वहाँ यूनिवर्सिटी,अस्पताल में निवेश करने का विकल्प मौजूद है। अफ्रीकन देश गवर्नेंस,मानव संशाधन के विकास के लिए स्किल इंडिया का अनुभव साझा करने की भी उच्चा जाता चुके है भारत के  एक दूसरा विकल्प खुलकर सामने आता है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर शिखर सम्मेलनों के बाद भारत ने 7.4 बिलियन डॉलर का किफायती ऋण दिया है जिसका उपयोग बुनियादी ढांचा,कृषि,उद्योग,ऊर्जा,जल के क्षेत्रों में विकास  जा रहा है। 40 से अधिक देशों में 100 से अधिक परियोजनायें कार्यरत है और 100 से अधिक संस्थानों में भारत द्वारा 1.2 बिलियन डॉलर कका निवेश किया गया है जो मानव संसाधन विकास के लिए प्रमुखता से योगदान दे रहे हैं।
      दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाए तो अफ्रीका प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता में काफी धनी है। जैसे कि कांगो कॉपर के लिए;सियरा लिओन,अंगोला और बोत्स्वाना हीरा के लिए;सूडान,नाइजीरिया,लीबिया,अल्जीरिया आदि तेल उत्पादन के लिए।
     पुरा अफ़्रीका महादेश दुनिया में मानव संसाधन में काफी महत्वपूर्ण स्थान रखता है और वहाँ की 65% आबादी की उम्र 35 वर्ष से काम है। भारत वहाँ कई उद्योगों के माध्यम से फ़ायदा उठा सकता है।
     आज के दिनों में चीन को अफ्रीका में कई देशों द्वारा विरोध का सामना करना पड़ रहा है इसका मूल कारण है चीन का 'दो और लो'(GIVER AND TAKER) की रणनीति। अगर भारत को वहाँ लम्बे समय तक रहना है तो भाईचारे के रिश्ते से ही आगे बढ़ना होगा न कि चीन की नीति से।

भारत-अफ्रीका संबंध के निष्कर्षात्मक अवलोकन -
प्राकृतिक संसाधन और मानव संसाधन में इतना समृद्ध होने के बाद भी अफ्रीका कई तरह के घरेलु समस्याओं,गृह युद्ध आदि से ग्रसित है। कई पड़ोसी देशों के साथ भी तनावपूर्ण संबंध है। अगर भारत को मजबूत रिश्तों की बुनियाद अफ्रीका के साथ रखनी है तो इस बात को हमेसा ध्यान में रखना कि वहाँ की आंतरिक मामलों में तटस्थता की नीति अपनाये। इस सजगता के साथ ही अफ्रीका में अपनी पहुँच बढ़ानी होगी।
     अभी तक जो देखने में मिला है की संबंध केवल सरकार से सरकार तक है जरुरत इस बात की है कि इसे जनता से जनता तक,मीडिया से मीडिया तक,सिविल सोसाइटी से सिविल सोसाइटी तक किया जाये। तभी लक्ष्य को पाया जा सकता है।
      तृतीय भारत-अफ्रीका शिखर सम्मलेन के अंतिम दिन नरेंद्र मोदी भावपूर्ण ढंग से अपनी बात रखकर सभी का दिल जीत लिये जो इन्हीं के शब्दों में इस प्रकार कहा जा सकता है,"जैसा कि अफ्रीकी कहावत में कहा गया है कि एक छोटा सा घर सैकड़ों मित्रों को स्थान दे सकता है,और वैसा ही भारत का पारंपरिक विश्वास है : सन्तः स्वयं परहिते निहिताभियोगाः यानि भले लोग सदैव दूसरे का भला ही करते हैं,
 हमारे लिए मंडेला का आह्वान प्रेरणा दायक है इस तरह जियो कि दूसरों के सम्मान और दूसरों की आजादी में वृद्धि हो।
     आज हम साथ चलने की शपथ लेते हैं, हमारा प्रत्येक कदम लयबद्ध हो और समरसता प्रकट करने वाला हो।
      यह कोई नई यात्रा नहीं है, न नई शुरूआत है लेकिन प्राचीन संबंधों का उज्ज्वल भविष्य का नया संदेश इसमें सन्नहित है।"

फोटो सौजन्य - इंडियन एक्सप्रेस,द हिन्दू ,इंडिया-अफ्रीका फोरम और गूगल 
WRITTEN BY-SURESH KUMAR PANDEY 

Monday, 26 October 2015

भूकंप : एक विश्लेषण

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

भूकंप क्या है ?
भूकंप भुपटल की कंपन या लहर है जो धरातल के नीचे अथवा उपर चट्टानों के लचीलेपन या गुरुत्वाकर्षण की समस्थिति में थोड़े समय के लिये अव्यवस्था होने से उत्पन्न होती है. (An earthquake is a vibration or oscilation of the surface of the earth,caused by a transient disturbance of the elastic or gravitational equilibrium of the rocks at or beneath the surface - A.N.Strahler.)
ईस अव्यवस्था के फलस्वरुप भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है.ये ऊर्जा तरंगें सभी दिशाओं में गतिमान होती है.
वह स्थान जहां से ऊर्जा निकलती है वह  भूकंप का फोकस(focus,उदगम केन्द्र ) कहलाता है.इसे अवकेन्द्र(hypocentre) भी कहा जाता है.ये तरंगें अलग अलग दिशाओं में चलती हुयी पृथ्वी के सतह पर पहुंचती है.भूतल पर वह बिंदु जो फोकस के समीपतम होता है,अधिकेंद्र(epicentre) कहलाता है.यहीं पर सबसे पहले तरंगों को महसूस किया जाता है,यह फोकस के ठिक उपर समकोण पर होता है.
भूकंप आने के कारण -
पृथ्वी के अंदर कई प्रकार की प्लेटे होती है जो संचरन करती रहती है.मूल रुप से भूकंप का कारण इन प्लेटो के बीच की समस्थिति(equilibrium) में हुये अचानक बदलाव होता है.
इन प्लेट संचरन के फलस्वरुप तीन प्रकार की प्लेट सीमायें बनती है -
1.अपसारी सीमा (divergent boundaries) - जब प्लेटे एक दूसरे से विपरित दिशा में अलग हटती है.
2.अभिसरण सीमा (convergent boundaries) - जब एक प्लेट दूसरे प्लेट के नीचे धंसती है और जहां भूपर्पटी(crust) नष्ट होती है.
3.रुपांतर सीमा(transform boundaries) - जहां न तो नई पर्पटी का निर्माण होता है और न विनाश होता है.ये प्लेट एक दूसरे के साथ सरक जाती है.
इसके अलावा भी भूकंप आने के कई कारण है - 
1.ज्वालामुखी क्रिया (volcano)
2.भूपटल भ्रंश (faulting)
3.भूसंतुलन में अव्यवस्था (isostatic disturvance)
4.प्लेट टेक्तानिक सिद्धांत (plate tectonic theory)
हिमालय क्षेत्र में ज्यादा भूकंप क्यों आते हैं ?
जहां पर आज हिमालय है वहां काफ़ी समय पहले टेथिस नाम का एक समुद्र हुया करता था.दो प्लेतों के तकराने के फलस्वरुप वहां आज के हिमालय का निर्माण हुया.
चुकी ईस पूरे क्षेत्र में पर्वत निर्माण की प्रक्रिया अभी तक पुरी नहीं हो पायी है,ईसकारण यहां संतुलन की प्रक्रिया अभी पुरी नहीं हुयी है.ईस अस्थरता और अव्यवस्था के कारण ईस क्षेत्र में विनाशकारी भूकंप आते रहते है.यह भारत का सबसे बड़ भूकंप क्षेत्र है.
प्लेट संचरण के दृष्टिकोण से देखा जाये तो कारण है - एशियन और भारतीय प्लेट के टकराव,इन प्लेटो को टकराने के बाद सीमायें टूटती है और भारी मात्रा में ऊर्जा बाहर निकलती है.
भूकंप का वितरण -
1.प्रशांत महासागरीय तटीय पेटी( Circum pacific Belt )
2.मध्य महाद्विपीय पेटी (Mediterrian belt)
ये वे क्षेत्र है जो भूकंप के लिये काफ़ी संवेदनशील है.
भूकंपीय आपदा से होने वाले प्रभाव -
1.भूमी का हिलना,
2.धरातलीय विसंगती,
3.भू-स्खलन,
4.धरातल का एक तरफ़ झुकना,
5.हिमस्खलन,
6बांध के टूटने से बाढ,
7.आग लगना,
8.जान माल की हानि,
9.इमारतों का टूटना,
10.सुनामी (सबसे खतरनाक प्रभाव,अगर epicentre समुद्र में हो)
क्या करें,जब भूकंप आ जाये -
1.घबड़ाये नहीं,और तेजी से न भागे,
2.उंच्ची इमारत,पेड़,बिजली के खंभे आदि से दुर रहे,
3.अगर उपर की इमारत में है तो लिफ़्ट का इस्तेमाल न करें,
4.अगर घर,मौल,आदि से निकलना संभव न हो तो कमरे के कोनों में चले जाये और मजबूत चीज को पकड़ ले या table के नीचे छिप जायें.
By - suresh kumar pandey

Friday, 23 October 2015

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कितना उचित ?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

16 अक्टुबर 2015 को देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले के साथ ही 'राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग' का भविष्य समाप्त हो गया। पर यह फैसला  बहुत से सवाल देश के विधायिका,कार्यपालिका और साथ ही न्यायपालिका के सामने भी खड़ा कर दिया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण हो गया है कि इस सवाल का अंत किस तरीके से होता है और परिणाम क्या होता है?
सत्ता पक्ष अर्थात कार्यपालिका के सदस्य गण फैसले के बाद एक तरह से बौखलाए हुए हैं  और इसे  संसदीय लोकतंत्र की गरिमा के खिलाफ बता रहे है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने ब्लॉग में लिखा,"भारतीय लोकतंत्र अनिर्वाचित का तानाशाही  नहीं हो सकता अगर निर्वाचित को का दबाया गया तो लोकतंत्र  स्वयं खतरे में पड़ जायेगा।"
परन्तु एक ऐसा देश जहां की पृष्टभूमि इस प्रकार की बन गयी है कि एक दागी नेता को बचाने के लिए अदालत के फैसले के खिलाफ कार्यपालिका द्वारा अध्यादेश लाया जाता है,सांसदों का वेतन बढ़ाने का प्रस्ताव एक मत में पास हो जाता है और लोकतंत्र की निगरानी करने वाली और मौलिक अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्था पर अंकुश लगाने का काम तेजी से किया  जाता है वैसे देश में सैध्दांतिक रूप से अरुण जेटली का बयान भले ही सही लगे लेकिन व्यवहार में कहीं भी नहीं टिकता।
जिस 99वां संशोधन विधेयक को संसद द्वारा पास होने के बाद 20 राज्यों की विधान सभाओं ने भी अपनी सहमती दी और बाद में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी  ने इस संशोधन विधेयक पर 31 दिसंबर  2014  को हस्ताक्षर कर कानून बनाया,आखिर क्या कारण रहा कि देश की सर्वोच्च अदालत ने इसे असंवैधानिक करार दिया?
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग(एनजेएसी) का मतलब और कॉलेजियम प्रणाली -
राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन 99वां संशोधन कानून के जरिये किया गया था जिसका उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट और देश में मौजूद 24 हाई कोर्ट के न्यायधीशों का नियुक्ति और उनका तबादला(ट्रांसफर) था जो 13 अप्रैल 2015 को लागू हुआ था। इस संशोधन विधेयक के जरिये भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 124A जोड़ा गया जिसमें कहा गया कि  भारत का सर्वोच्च न्यायलय का मुख्य न्यायाधीश,मुख्य न्यायाधीश के बाद सुप्रीम कोर्ट के ही दो वरिष्ठ न्यायाधीश,भारत सरकार का कानून मंत्री  और दो प्रतिष्ठित व्यक्ति(जिनका चुनाव  भारत का सर्वोच्च न्यायलय का मुख्य न्यायाधीश,लोकसभा में विपक्ष का नेता (नहीं रहने पर विपक्ष के  बड़ा दल  का नेता और प्रधानमंत्री की कमिटी करेगी) से मिलकर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनेगा ।लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मात्र छह माह बाद ही इसे असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया परिणामस्वरूप 20 साल पुराना कॉलेजियम प्रणाली फिर से लागू हो गया।
भारत में सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम प्रणाली भारत के संवैधानिक अदालत में जजों को नियुक्त करता है। इसका गठन एक प्रक्रियात्मक तरीके से हुयी जिसे थ्री जजेज केस के नाम से जाता है ऐसे तो कॉलेजियम प्रणाली की गठन सेकेण्ड जजेज केस (SUPREME COURT ADVOCATES ON RECORD ASSOCIATION V/S UNION OF INDIA,1993) द्वारा किया गया जो जस्टिस जे एस वर्मा के निर्णय का परिणाम था । बाकी दो जजेज केस SP GUPTA V/S UNION OF INDIA,1981(ALSO KNOWN AS JUDGE TRANSFER CASE),1981और IN RE SPECIAL REFERENCE 1 OF 1998 इसका पूरक है ऐसे तो 1998 का केस कोई केस नहीं है यह सर्वोच्च अदालत का ओपिनियन है जिसे राष्ट्रपति के आर नारायणन द्वारा अनुच्छेद 143  के तहत मान्यता दी गयी है । संक्षेपतः इन तीनों केसों से यह निष्कर्ष निकलता है,"न्यायलय की स्वतंत्रता में विधायिका और कार्यपालिका का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।"

सर्वोच्च अदालत के फैसले का कारण और परिणाम -
अदालत द्वारा फैसला 1030  पन्नों में दिया गया है जिसका मुख्य पहलु इसप्रकार है जो फैसले के कारण को प्रतिविंबित करता है। पहला,एनजेएसी न्यायपालिका की स्वतंत्रता में ही नहीं शक्तियों के विभाजन में भी दखल देता है। दूसरा, न्यायिक स्वतंत्रता संविधान की बुनियादी ढांचा है जिसमें सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती इसकारण इसे रद्द किया जाता है। तीसरा, एनजेएसी से न केवल न्यायाधीश की स्वतंत्रता कम हो रही है बल्कि राष्ट्रपति की भूमिका भी काम हो रही थी। चौथा,न्यायाधीशों के मामले में राष्ट्रपति मंत्रीमंडल के सलाह पर काम नहीं करते बल्कि स्वतंत्र रूप से निर्णय लेता हैं।पांचवा,दो जाने माने व्यक्तियों को शामिल कर इन्हें न्यायाधीश के समकक्ष मानना थोड़ा भी व्यावहारिक नहीं है। हालांकि संविधान पीठ ने माना है कि कॉलेजियम प्रणाली में कुछ खामियां हैं और इस पर सुनवाई के लिए पीठ ने तीन नवंबर की तारीख तय की है। 


अगर संसद अपनी संप्रभुता के लिए खड़ी होती है तो टकराव सुनिश्चित है और अगर नहीं खड़ी होती है तो संविधान संशोधन और कानून बनाने की शक्ति पर प्रश्न खड़ा होता है। बयानों को देखने से कि टकराव की संभावना बन रही है। ऐसा  होता है तो न्यायिक सुधार का क्या होगा?आज दो करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित है। करीब चार सौ के आसपास न्ययाधीशों के पद खाली पड़े हैं अगर टकराव हो जाता है तो ये नियुक्तियां नहीं होगी। 

अरुण जेटली के ब्लॉग के मायने -
ये अपने ब्लॉग में लिखते हैं,
"यह फैसला भारत के बृहत् संवैधानिक संरचना को अनदेखा करती है। निर्विवाद रूप से न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का एक हिस्सा है। इसे संरक्षित किया जाना चाहिए। लेकिन यह निर्णय इस तथ्य के ओर ध्यान नहीं देता कि संविधान की कई अन्य विशेषताएं हैं जो बुनियादी संरचना में शामिल है। संविधान का सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा संसदीय लोकतंत्र है। भारतीय संविधान की अगली महत्वपूर्ण बुनियादी संरचना एक चुनी हुई सरकार है जो देश की संप्रभुता की आत्मा का प्रतिनिधित्व करती है। प्रधानमंत्री संसदीय लोकतंत्र में सबसे महत्वपूर्ण जवाबदेह संस्था है। विपक्ष के नेता बुनियादी संरचना का एक अनिवार्य पहलू हैं जो संसद में वैकल्पिक आवाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। क़ानून मंत्री संविधान संविधान की एक प्रमुख बुनियादी संरचना, मंत्रिपरिषद, का प्रतिनिधित्व करते हैं जो संसद के प्रति जवाबदेह है। ये सभी संस्थाएं, संसदीय संप्रभुता, एक निर्वाचित सरकार, प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, कानून मंत्री संविधान के बुनियादी ढांचे का एक हिस्सा हैं। वे लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। जाहिर है कि बहुमत की राय का वास्ता एकमात्र बुनियादी संरचना से था - न्यायपालिका की स्वतंत्रता - जबकि एक तर्क के औचित्य पर निर्णय पारित करके कि भारत के लोकतंत्र को उसके चुने हुए प्रतिनिधियों से बचाना है, अन्य सभी बुनियादी संरचनाओं को "राजनेता" के रूप में जिक्र कर निरर्थक बता दिया गया । न्यायाधीशों के निर्णय ने एक बुनियादी संरचना, न्यायपालिका की स्वतंत्रता की श्रेष्ठता को बरकरार रखा है लेकिन संविधान के पांच अन्य बुनियादी ढांचे, संसदीय लोकतंत्र, चुनी हुई सरकार, मंत्रि परिषद, एक निर्वाचित प्रधानमंत्री और चुने हुए विपक्ष के नेता को कमजोर कर दिया है।" (अरुण जेटली का पूरा ब्लॉग पढने के लिए यहां क्लिक करें)

इनके ब्लॉग से निकलकर एक खास बात  बाहर आती है जो है - संसदीय संप्रभुता और प्रधानमंत्री सबसे महत्वूर्ण जवाबदेह संस्था,ऐसे तो ये न्यायपालिका की स्वतंतता की बात करते हैं लेकिन गौण रूप में संसदीय संप्रभुता की बात करते-करते ये संविधान प्रदत प्रावधानों को भूल जाते हैं कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को लागू करने की पूरी जिम्मेवारी सरकार अर्थात कार्यपालिका को है। अनुच्छेद 50 राज्य को यह निर्देश देता है कि वह न्यायपालिका और कार्यपालिका को अलग करने का कदम उठाएगा,अगर पूरी सत्ता इस बात को समझने का प्रयास करती तो संसदीय लोकतंत्र की आड़ में न्यायपालिका पर अंकुश लगाने का प्रयास अन्य दो अंगों द्वारा नहीं किया जाता। सबसे ताज्जुब की बात यह है की अदालत के फैसले के विरुद्ध सत्ता पक्ष की तीखी आलोचना के बाद भी किसी पार्टी द्वारा और किसी अन्य नेता द्वारा विरोध नहीं किया गया। 
एक रिपोर्ट के अनुसार सर्वोच्च अदालत में अनिर्णित मुकदमों में लगभग 50% से अधिक केंद्र सरकार के विरुद्ध ही है यह व्यावहारिक नहीं लगता कि जजों द्वारा निर्णय निष्पक्षता के साथ उन्हीं लोगों के खिलाफ होगा जो उन्हें चुनेंगे।(कानून मंत्री का एनजेएसी का पदेन सदस्य होना।)दूसरी बात यह मामला सरकार के अंगों से संबंधित है अर्थात अगर यह प्रावधान एक बार लागू हो जाता है तो आने वाले सभी सरकार के पक्ष में ही रहेगा और उनकी स्थिति को मजबूत करेगा यहीं कारण है की किसी भी पार्टियों द्वारा इस सरकार की आलोचना एनजेएसी को लेकर नहीं की गयी।

एनजेएसी के आगे क्या?
अगर दुनिया में होने वाली न्यायाधीशों की तुलना भारत के साथ किया जाए तो यह स्पष्ट होता है कि ज्यादातर देशों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका है जैसे अमेरिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है और सीनेट इसकी अनुमति देता है वहीँ जापान में कैबिनेट द्वारा मनोनीत होने के बाद राजा करते हैं,ब्रिटेन में न्यायपालिका की सभी नियुक्तियां हाउस ऑफ़ लॉड्स के संबंधित मंत्री के सलाह पर कार्यकारी राजा करते हैं। जब दुनिया के सभी लोकतांत्रिक देशों में न्यायधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका की भूमिका है तो भारत में क्यों नहीं?
तीन नवंबर को यह देखना होगा कि कॉलेजियम में सुधार की क्या गुंजाइस बनती है,यह भी तय है कि इसमें बदलाव होगा या नहीं हालांकि यह न्यायपालिका के रुख पर निर्भर करेगा।
लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि कॉलेजियम में अपेक्षित पारदर्शिता नहीं है इसको इसतरह से बनाया जाये कि पारदर्शिता से रहित हो और हितधारकों की आवाज भी प्रतिबिंबित नहीं करे।
(फोटो सौजन्य - गूगल और सुप्रीम कोर्ट वेबसाइट)

WRITTEN BY - SURESH KUMAR PANDEY

Tuesday, 20 October 2015

कौन है तु

कभी मेरी मंजिल बनकर मेरे को
रास्ता दिखाती हो
तो कभी रास्ता बनकर मेरे को
मंजिल तक पहुंचाती हो
लेकिन अकसर मेरी मंजिल ही
क्यों मुड़ जाती है
कभी अंधेरे में उजाला करके
हौंसला देती हो
कभी उजाले को मिटाकर
ठोकर खाने का मतलब सिखाती हो
लेकिन अकसर मेरी मंजिल क्यों मुड़ जाती है
आखिर कौन है तु
कि जो मेरे को अपने वजूद का ऐहसास दिलाती हो
कभी हंसकर हाथ पकड़ लेती हो
तो कभी कुछ ना कहकर वेगाना कर देती हो
आती हो खामोशी से मेरी दुखों के पलों में
चढा जाती हो एक हसीन सी मुस्कान चेहरे पर
तो क्यों सुहाने पलों में मेरा हाथ छोड़ कर चली जाती हो
रख कर दो आंसू मेरे आखों में
क्या जादू कर चली गयी तो
हंसना भी सिखा गई
रोने का सलिका भी
कौन है तु
जो जिन्दगी लेकर
जिन्दगी का मतलब सिखा गयी
रहता हूं तेरी पहचान करने
दिन-रात खड़ा सदा
मगर दिखती नहीं कभी
इन नेत्रों से कभी
चली गयी है कहीं दूर सदा
लेकर मेरी काया
लेकिन छाप कर गयी अपनी
तस्वीर मेरे मन पर सदा!
द्वारा - करन गजारे(karan gajare)

Friday, 16 October 2015

साहित्य अकादमी पुरस्कार का लौटाया जाना भांड़ फोड़ पायेगा?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी के मौत और दादरी की घटना के बाद लेखकों/साहित्यकारों द्वारा उदारता और बढते हुये असहिष्णुता की बात कर पुरस्कार लौटाने का एक सिलसिला सा चल पड़ा है.यह देखने वाली बात होगी कि साहित्य जगत में यह कुलबुलाहट कितना असरदार होगा या एक रस्मदायगी भर रह जायेगी.
लेकिन एक बात जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है-इस पुरस्कार लौटाने की घटना ने लगभग पूरे भारतीय समाज को दो वर्गों में बांट दिया है एक ओर पुरस्कार लौटाने वालों के समर्थक हैं जो लेखकों के इस काम को क्रांतिकारी कदम बता रहें हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे लोग हैं जो इन साहित्यकारों को मौकापरस्त की पदवी से नवाज रहे हैं.एक अन्य धड़ा भी है जो जिसमें 'रस्मदायगी' और 'भावी परिवर्तन का आरंभ' दोनों पर चर्चा कर रहा है.ईसका परिणाम जो भी होगा परंतु भारतीय समाज के लिये यह अच्छी बात साबित हो रही है कि एक सामाजिक विमर्श सही पैमाने पर हो रहा है.
एक तरह से देखा जाये तो साहित्य अकादमी विभिन्न भाषाओं की कृतियों की राष्ट्रीय अकादमी है.इसका उद्देश्य प्रकाशन,अनुवाद,गोष्ठियां और कार्यशालायें आयोजित करके भारतीय साहित्य के विकास को बढावा देना है.
अकादमी की स्थापना 1954 में एक स्वायत्त संस्था के रुप में की गयी तथा इसके लिये धन की व्यवस्था भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय करता है.अकादमी का समीति के रुप में पंजीकरण 1956 में सोसायटी एक्ट 1860 के तहत हुआ था.अकादमी ने कुल 24 भाषाओं को मान्यता दे रखी है.(भारत-2015,पेज-99)
1954 से ही प्रत्येक वर्ष अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त प्रमुख भारतीय भाषाओं में प्रकाशित साहित्य की उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों को पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं.अकादमी इन 24 भाषाओं में पुस्तकें प्रकाशित करती है और पुरस्कृत कृतियों का कई भाषाओं में अनुवाद भी करती है.
साहित्य अकादमी द्वारा 2005 में प्रेमचंद फेलोशिप की स्थापना की गयी जो भारतीय साहित्य पर अनुसंधान करने वाले विद्वानों के अलावा सार्क देशों के विद्वानों को भी दिया जाता है.
अकादमी के वर्तमान प्रमुख डा. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी का कहना है,"साहित्य अकादमी पुरस्कार देने का फ़ैसला लेखकों का एक मंडली करता है,इसमें कोई राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होता.ये आगे कहते हैं लेखक पुरस्कार लौटाकर अकादमी का अपमान कर रहे हैं साथ ही गरिमा भी गिरा रहें है."
हिंदी के चर्चित लेखक उदय प्रकाश साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले सबसे पहले लेखक थे.इन्होंने एमएम कलबुर्गी की हत्या के विरोध में सम्मान लौटाया था.इसके कुछ ही दिन बाद दादरी की घटना हुयी और पुरस्कार लौटाने का सिलसिला चल पड़ा.नयनतारा सहगल,अशोक वाजपेयी,सच्चिदानन्दन थोड़े ही समय में ईस कतार में खड़े हो गये.
पुरस्कार लौटाने वालों में से लगभग सभी के मुंह से एक ही बयान आया कि आज देश में उदारता मिट रही है,साहिष्णुता धुमिल हो रही है और वर्तमान सरकार के कारण वैर-भाव बढ रहा है,परंतु सच्चाई क्या है?इसकी तफ्तीश बहुत जरुरी है.
गृह मंत्रालय के रिपोर्ट के अनुसार 2009-2014 तक 4,265 संप्रदायिक दंगों की पहचान की गयी जिसमें 12,805 लोग घायल हुए साथ ही 654 लोग मारे भी गये.अगर 2015 के आंकड़ा को देखा जाये तो जनवरी से मई तक कुल 287 घटनाओं की पहचान की गयी जो संप्रदायिक थी इसमें 961 लोग घायल हुए और मात्र 43 लोग मारे गये.अगर इसका तुलना जनवरी से मई 2014  में हुए संप्रदायिक घटनाओं से किया जाये तो 25% की वृद्धि दर्शाता है क्योंकि उससमय यह घटना 215 थी.
25% की वृद्धि तो चिंता का विषय है लेकिन यह वृद्धि ऐसी नहीं है कि साहित्यकार और लेखक इसे मुद्दा बनाकर पुरस्कार लौटाना शुरू कर दें.संप्रदायिक घटनायें वर्ष दर वर्ष घटती-बढती रही है.कई साल तो आंकड़ा 25% को भी पार कर गया है.इनमें से कई लेखक तो उससमय भी रहें हैं जब आंकड़ा में उतार-चढाव हुआ है.अगर कुछ वर्षों के इतिहास को देखा जाये तो बाबरी मस्जिद का टूटना,गोधरा में हजारों लोगों का मारा जाना,सिख दंगा,काश्मीरी पंडितों का अपना निवास स्थान छोड़ने के लिये मजबूर होना;ये ऐसी घटनायें हैं जो काफ़ी मार्मिक और दिल दहलाने वाली रही है लेकिन इन मुद्दों पर इन लेखकों द्वारा कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं की गयी और न ही पुरस्कार लौटाने की कोई पहल की गयी?
अब सवाल है कि कलबुर्गी की हत्या और दादरी की घटना में ऐसी क्या थी जो लेखकों को पुरस्कार लौटाने के लिये मजबूर किया?
इस सवाल का उत्तर इनके बयान के विश्लेषण से ही खोजा जा सकता है और विश्लेषण के उपरांत यह मालूम चलता है कि ये सभी किसी-न-किसी मानसिक और बौद्धिक पीड़ा से ग्रसित हैं इसका कारण है जो तवज्जो इनको पूर्ववर्ती सरकार द्वारा दी जाती थी वह सत्ता परिवर्तन के बाद लगभग कम होती जा रही है क्योंकि वर्तमान सरकार की सोच पुरानी सरकार की पुरानी मार्क्सवादी विश्व दृष्टि से आगे निकलकर एक नयी दशा और दिशा अपना ली है जिसकारण इन लेखकों/साहित्यकारों की पीड़ा दिन-प्रतिदिन बढती गयी और अचानक रस्मदायगी वाला प्रतिरोध का रुप ले लिया.
दूसरी महत्वपूर्ण बात जो शायद थोड़ा मुख्यधारा से हटकर लगे लेकिन यथार्थ है.पुरस्कार लौटाने वालों में से अधिकतर ऐसे साहित्यकार और लेखक हैं जो 'मोदी,भाजपा,संघ की विरोध' की पुर्वाग्रह से ग्रस्त हैं.
हरिमोहन जैन जैसे भारतीय राजनीतिक शास्त्री इस बात पर बल दिये हैं,"भाजपा का स्वरुप धर्मनिरपेक्ष रहा है लेकिन इसकी बढती लोकप्रियता को देखकर अन्य पार्टियों द्वारा विद्वानों/साहित्यकारों/लेखकों द्वारा जिन्हें इन अन्य पार्टियों का आश्रय मिलता रहा है,विरोध करना एक मजबूरी बन गयी थी/है.
दादरी घटना,कलबुर्गी के बाद एक बहाना मिल गयी,ये साहित्यकार नये सरकार के कारण एक तरह से हाशिये पर चले गये थे तो ये विरोध का हथकंडा अपनाकर कुछ सुर्खियां तो बटोर ही लिये हैं.
अब यह देखना महत्वपूर्ण हो गया है कि आगे इनके विरोध का क्या परिणाम होता है?यह रस्मदायगी ही रहकर नामवर सिंह के बयान को सही करेगा या भांड़ फोड़कर विष्णु खरे के बयान को गलत ठहरायेगा?

Monday, 5 October 2015

'बिहार चुनाव' इतना महत्वपूर्ण नजर क्यों आ रहा है?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए 

        2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को  एनडीए की तरफ़ से प्रधानमंत्री के पद के लिये नाम के घोषणा के साथ ही जदयू-भाजपा रिश्ता नेस्तानबुद हो गया और कई तरह की घटना देखने को मिला.नरेंद्र मोदी को जहां प्रधानमंत्री का तमगा मिला वहीं नीतीश कुमार शोक में अपनी सत्ता को छोड़कर पाश्चाताप करने चले गये.जितन राम मांझी जिन्हें नीतिश का रिमोट कंट्रौल वाला व्यक्तित्व माना गया,ये बागी चरित्र दिखाकर अपनी खुद की पार्टी 'हिंदुस्तानी अवाम पार्टी'(हम) बनाकर भाजपा का दामन थामकर 2015 के विधान सभा चुनावी रणक्षेत्र में ताल ठोक रहे हैं.यह 2014 के लोकसभा चुनाव का ही परिणाम था कि एक-दूसरे के विरोधी माने जाने वाले लालू और नीतीश महागठबंधन के हिस्सा बन गये.लालू प्रसाद यादव ने ईस बात को स्वीकार किया कि संप्रदायिक ताकतों को हराने के लिये वे जहर का घुंट भी पी लेंगे,यह साफ़ तौर पर झलकता है कि इनका ईशारा भाजपा और नीतिश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की सहमति पर थी.
बिहार चुनाव के मायने -
           चौथी दुनिया के एक पत्रकार 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव को लालू के लिये अंतिम चुनाव मानते हैं और कुछ लोग ये भी अटकलें लगा रहे हैं कि कहीं यह लालू प्रसाद यादव का अंत तो नहीं क्योंकि लगातार दो चुनावों से इनकी पत्नि राबड़ी देवी चुनाव हार रही है,लालू सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के तहत 6 सालों तक चुनाव नहीं लड़ सकते इसकारण यह कहा जा सकता है कि ईनके दोनों बेटों को चुनाव में उतरना गेम प्लान का ही हिस्सा है.अगर ये चुनाव हार जाते हैं तो मुझे भी इनका अंत करीब नजर आ रहा है लेकिन शायद हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि राजनीति में किसी का अंत नहीं होता.
         
           वहीं नीतीश कुमार के लिये यह चुनाव प्रतिष्ठा का उतना ही विषय बन गया है जितना नरेंद्र मोदी के लिये.गठबंधन टूटने के बाद अगर 2014 को नजरअंदाज कर दिया जाये तो यह पहला मौका है जब दोनों आमने सामने हो रहे हैं.नीतिश ईस चुनाव को किसी भी तरह भुनाना चाहते हैं इसकारण हमले का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहते.
           बाकी जितने भी मोर्चा ईस चुनाव में बने हैं चाहे वह वाम दलों का मोर्चा हो या सपा की नेतृत्व वाली मोर्चा,बिहार की राजनीति में ये उतना सफल नहीं हो पायेगी ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है.ओवैसी की पार्टी को मुसलिम युवाओं द्वारा एक आशा की किरण से पूरे भारत में देखा जा रहा है ईस सच्चाई को नजरअंदाज नहीं कर सकते क्योंकि यह हैदराबाद से निकलकर महाराष्ट्र के नगरपालिका चुनाव में विजय पा चुकी हैं और कई जगहों पर परिणाम इसके अनुरूप रहा है,अतः ईस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बिहार में इसका प्रभाव नहीं होगा.
          नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिये यह चुनाव काफ़ी महत्वपूर्ण हो जाता है इसके मुख्य मायने हैं राज्यसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व बढाना,यह जगजाहिर है कि केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण विधेयक पर कई बार अध्यादेश निकालने के बाद भी ईसे कानून नहीं बना पायी और अपनी प्रतिबध्दता से पीछे हटती नजर आ रही है.
           वर्तमान में राज्यसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व 48 है और बिहार 16 सदस्यों का प्रतिनिधित्व करता है.अगर बिहार में भाजपा को जीत मिलती है तो निश्चित रुप से राज्यसभा के प्रतिनिधित्व में सुधार होगा नहीं तो अगले पांच सालों तक ये मौका नहीं मिल पायेगा जिस कारण ईसे राज्यसभा से कोई भी विधेयक पास कराने के लिये काफ़ी मशक्कत करना होगा जैसा कि भूमि बिल में देखने को मिला.

विकास बनाम जातिवाद -
           देश की राजनीति में धर्म और जाति के प्रभाव को यथार्थ माना जाता है,एक तरह से कहा जाये तो भारत में जाति यथार्थ है.ऐसे तो नीतीश कुमार और मोदी द्वारा विकास के नाम पर लोगों को रिझाने का प्रयास किया जा रहा है.लेकिन सवाल ये है कि विकास का फार्मुला क्या है और ये किस तरह की विकास की बात कर रहे हैं,केवल फ्लाई ओवर,रोड और मौल तक ही विकास को सीमित नहीं किया जा सकता.अगर संयुक्त राष्ट्र संघ की मानव विकास सूचकांक को ऊदाहरण माने तो स्वच्छता इसका महत्वपूर्ण हिस्सा हो जाता है जो विकास को समझने को सही पैमाना पेश करता है.अगर इससे भी थोड़ा आगे बढे तो आज समावेशी और स्थायी विकास की बात की जा रही है.जो भी हो परंतु बिहार में जातिवाद को झुठलाया नहीं जा सकता,शायद यह ऐसा राज्य है जहां चुनावी परिणाम 'जाति फैक्टर' और 'हवा फ़ैक्टर' से प्रभावित होती है.लोगों में यह बात सुनी जा सकती है कि 'किसकी हवा है'
            तमाम राज्य स्तरीय पार्टियां और भाजपा सहित अन्य दल विभिन्न जातियों को साधने का प्रयास अपने तरीके से कर रहे हैं चाहे लालू का एमवाई समीकरण हो या भाजपा का अगड़ी जातियों को रिझाने का प्रयास.गिरिराज सिंह का यह बयान कि भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री ओबीसी या दलित होगा,ईसे किसी भी तरीके से जातिवादी टिप्पणी से अलग नहीं किया जा सकता.उपेंद्र कुशवाहा अपनी कुशवाहा समाज के बदौलत रण में रेश लगा रहे हैं तो मांझी दलितों के नेता के तौर पर.परिणामस्वरुप बिहार में किसी भी एक पार्टी को विकास का प्रतीक और दूसरी को जातिवादी का तमगा नहीं दिया जा सकता.
मोहन भागवत का आरक्षण पर बयान का मायने -
           संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान,"आरक्षण का फ़िर से समीक्षा होना चाहिये." कई राजनीतिक दल अपनी महत्वाकांक्षा पुरा करने के लिये इसका गलत मतलब निकालकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं कि भाजपा आरक्षण को समाप्त करना चाहती है.ईस बयान पर लालू प्रसाद यादव काफ़ी आक्रामक नजर आ रहे है और मौजुदा चुनाव को अगड़ी और पिछड़ी जाति का चुनाव करार दिये है हलांकि चुनाव आयोग ने ईसका संज्ञान लिया है.लालू यादव के संबंध में यह बात सटीक बैठती है कि कोई भी योद्धा अपने अजमाये हुये हथियार को ही भरोसे के साथ उपयोग करता है,आरक्षण इनका अजमाया हुआ हथियार है 1990 के दशक से कई बार वे ईसका इस्तेमाल चुनाव में कर चुके हैं और विजयी भी हुये हैं लेकिन सवाल यह है कि यह हथियार 2015 में कितना तेज या कुंद हुयी है परिणाम ही बतायेगा.क्योंकि लंबे समय से सत्ता में न रहने के कारण लालू के पास विकास के नाम पर कहने को कुछ नहीं है ऐसे भी महागठबंधन से ताल्लुक रखने वाले नीतीश कुमार अपनी छवि विकास पुरुष के रुप में पेश कर चुके हैं.
            कुछ पत्रकार,विद्वान,विश्लेषक और राजनीतिक नेता यह सवाल उठा रहें हैं कि भागवत के आरक्षण जैसे इतने संवेदनशील मुद्दे पर बयान के बाद भी मोदी चुप्पी ले लिये हैं लेकिन इनलोगों को सोचना चाहिये कि जब भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बेगुसराय की रैली में यह बात कह चुके हैं कि भाजपा की नीति आरक्षण की यथास्थिति बनाये रखने में है तो मोदी के बयान का क्या जरुरत रह जाता है.
राजनीतिक दल मोहन भागवत के आरक्षण पर बयान का फ़ायदा उठाने की भी भरपूर कोशिश कर रहे हैं लेकिन सवाल है कि समीक्षा का मतलब आरक्षण खत्म करना होता है क्या?
इनके द्वारा पूरे आरक्षण की समीक्षा करने की बात कही गयी है,हो सकता है समीक्षा के बाद आरक्षण बढ जाये,अन्य दूसरे समुह भी शामिल हो जायें और जो समुह शामिल हैं और अगर इन्हें जरुरत नहीं हैं तो निकाल भी जायें.            
            दूसरी महत्वपूर्ण बात निकलकर जो सामने आती है वह है कि केंद्र में भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है अभी भी वहां दुबारा चुनाव होने में काफ़ी वक्त है इसतरह बिहार का चुनाव एक प्रयोग हो सकता है.ऐसा राज्य जहां जाति का बोलबाला सबसे ज्यादा रहता है,जहां आरक्षण एक चुनावी हथियार के रुप में काम करता है वहां ईस तरह की बयान देकर भाजपा और संघ यह देखना चाहती है कि वह परिणाम में कहां टिकती है.अगर यहां आशाअनुरूप परिणाम आ जाता है तो आने वाले चुनाव में आरक्षण पर खुलकर बात की जा सकती है.ईसतरह संघ प्रमुख का यह बयान जबान की फिसलन नहीं बल्कि एक सोची समझी रणनीति है.

बिहार कौन?
             बिहार एक ऐसा प्रदेश रहा है जो शैक्षणिक रुप से पीछे रहने के बाद भी राजनीतिक रुप से सशक्त माना जाता है ईसका मुख्य कारण रहा है वहां की सामाजिक पिछड़ापन.
बुद्ध,महावीर से लेकर चाणक्य,मौर्य सम्राज्य और अशोक सभी ने समाज को रास्ता दिखाने का काम किया है.आजादी की लड़ाई में चंपारन से लेकर  जेपी का आंदोलन सभी ने देश को रास्ता दिखाने का काम हमेशा किया है ये तो अब वक्त बतायेगा कि 2015 के विधान सभा चुनाव परिणाम क्या निर्देश लेकर आयेगा?