Saturday, 11 July 2015

समझ कब आयेगी?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

सफ़ेद बादलों से सजा आकाश मुझे आज आकर्षित कर रहा है,लगता है कुछ शुभ होने वाला है लेकिन सफ़ेद बादलों के पिछे छिपी काली रात का क्या? याद है,मैंने सुना है कि हर काली रातें और परेशानियां खुशनुमा सुबह और समस्याओं का हल लाती है लेकिन न जाने क्यों मेरा दिल यह मानने को तैयार नहीं हो रहा है.
वक्त-वक्त की बात है,आखिर सच ही कहा गया है,"अनुभव इंसान को परिपक्व बनाता है."मैं अपनी यादों में खोया हुआ किंकर्त्तव्यविमूढ(confused) होकर सफ़ेद बादलों को देखता रहा कि कहीं से वो मिल जाये जिसका मुझे तलाश है.
फ़िर सोचता हुं आखिर कमी कहां है?मेरे सोचने की नजरिया में या समाज में?राजा राम मोहन राय एक बार कहे थे,"राजनीति समाज का अभिन्न अंग है."इसकी पुष्टि युनान के महान दार्शनिक अरस्तु सदियों पहले कर चुके थे,"मनुष्य एक सामाजिक(राजनीतिक) प्राणी है."
मैं ये नहीं कह रहा हुं कि मुझे अपनी सोच को लेकर कोई अफ़सोस है आखिर सुकरात को भी तंत्र और लोगों ने पागल घोषित कर दिया था,लेकिन उसे अपनी व्यवस्था और कानून में पूर्ण आस्था थी तभी वह महान बना.आर्किमिडिज के बारे में भी लोगों का विचार ऐसा ही था,इसे कौन भूल सकता है कि अपनी सिद्धांत को पा लेने के बाद नंगे ही युनान की गलियों में 'यूरेका' कहते हुये दौड़ पड़ा था और आज इसका सिद्धांत दुनिया को कहां से कहां लेकर आ गया,दुनिया की सामुद्रिक दूरी घटकर न के बराबर हो गयी है.
परंतु आज की मिडिया ये समझ क्यों नहीं रही है?एक दौर था जब तंत्र मिडिया पर अंकुश लगाती थी तो इसका जवाब आता था मुझे अधिकार प्राप्त है,लेकिन वर्त्तमान में तंत्र द्वारा बैठने को कहने पर ही मिडिया लोटने को बेताब है.इसका कारण खोजने पर मालूम चलता है,इनकी अल्पबुद्धि और समसामयिक विषयों की नासमझ,इनकी नियुक्ति का न कोई व्यवस्था है और न ही कोई पैमाना.लोकतंत्र का चौथा स्तंभ और जिम्मेदारी पूर्ण कार्य करने के लिये चाहिये कि इन्हें पहले परंपरागत और साइंसटिफिक विषयों से वकायदा प्रशिक्षित किया जाये.यह तब तक दूर नहीं हो सकता जब तक पुरी मिडिया पेशेवराना चरित्र को छोड़कर रिपोर्टिंग करने को अपना चरित्र नहीं समझे.
एक दिन सोचते-सोचते मैं गहराइयों में चला गया,मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि जहां अभी तक न किसी समाजशास्त्री और न ही किसी राजनीतिशास्त्री का ध्यान जा पाया है.मैंने अपने मन में सवाल उठाया-क्या सोशल मिडिया का स्वैच्छिक समुह,जो किसी राजनीतिक दल के प्रचार का काम करता है वह उनकी जीत में अहम भूमिका निभायेगा?मैंनेऐसा कई उदाहरण देखा है जो फेसबूक,व्हाटस ऐप और ट्विटर आदि पर किसी पार्टी के लिये बिना लाभ स्वेच्छा से उनकी नीतियों का प्रचार-प्रसार करते हैं.इनकी एक अनजान दुनिया भी बन चुकी है जो समाज की चहलकदमी से दूर अपने आप को एक बंद कोठरी या मोबाइल की स्क्रीन पर कैद कर एक-दूसरे से जुड़े हैं.ये तो समय बतायेगा कि क्या सचमुच यह समुह ताकतवर हो जायेगा.
कुछ दिन पहले दीमापुर में बलात्कार के एक आरोपी को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला.कुछ लोग बेरहमी से पीट रहे थे और कुछ वहां खड़े होकर उसका विडियो बना रहे थे.ठीक ऐसी ही घटना बिहार के नालंदा में भी घटी.एक स्कूल से दो छात्र लापता हो गये और दोनों का शव कुछ दिन बाद एक गढ्ढे में मिला,बाद में भीड़ ने स्कूल के प्राचार्य को पीट-पीटकर मार डाला.
आखिर हो क्या रहा है आजकल,इसका कारण क्या है?दोनों ही स्थितियां एक सी थी इसका विश्लेषण करने पर मालूम चला कि कहीं पुरी व्यवस्था और कानून से लोगों की आस्था तो नहीं डगमगा गयी है?अगर ऐसा है तो देश के सामने बड़ी चुनौती पैदा होने वाली है,अभी यह आरोपी लोगों तक ही सीमित है,हो सकता है आने वाले दिनों में यह अपनी सीमा लांघकर बुद्धिजीवी वर्ग,संसद और अदालत आदि के दरवाजों पर दस्तक दे दे.
हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का विडिओ,पोस्ट और इससे संबंधित आलेख का वायरल होना यह स्पष्ट कर देता है कि समाज की सोच तेजी से उस ओर आकर्षित हो रही है जो सभ्य समाज को प्रतिविंबित नहीं करती है.जरुरत है इसपर गंभीर समाजशास्त्रीय शोध की ताकि इसके कारणों को जानकर निराकरण किया जा सके.
कई जगहों से प्राप्त अनुभवों और उदाहरणों से मैंने पाया है,"पहला दूसरे का फ़ायदा उठाता है,दूसरा तीसरे का और यह सिलसिला चलता रहता है.
इसकारण किंकर्त्तव्यविमूढ(confused) होकर सफ़ेद बादलों के पिछे छिपी काली रात को देखने की जरुरत नहीं,जरुरत है सफ़ेद बादलों से सीखने की जो काली रात को भी उजाले में बदल देती है.
                      -सुरेश कुमार पान्डेय