Thursday, 9 July 2015

समाज और चारित्रिक बोध

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

समाज का चरित्र कैसा हो,इसपर प्राचीन पीढियों से लेकर आज तक काफ़ी शोध हो चुके हैं परंतु संतोषजनक उत्तर पाने में हम नाकाम रहे हैं.वर्तमान में मुख्य चुनौति है,"इसकी चारित्रिक पतन पर लगाम लगाने की ताकि हम अपने आने वाली पीढियों को अच्छा मंच दे सकें.
'समाज के चरित्र' का निर्धारण और बदलाव कैसे किया जाये ? यह सवाल लगभग सभी के मन को झकझोर रहा है.कुछ चर्चित मुद्दें जो कभी-कभी काफ़ी संवेदनशील और असहज हो जाते हैं.लोगों द्वारा दूसरे को कोसने,आलोचना करने का लंबा सिलसिला चल पड़ता है लेकिन एक सारवान विमर्श का अभाव हमें किसी भी परिणाम पर पहुंचने से रोक देता है.
'बाबा जी का ठुल्लू','केएलपीडी' और 'कह के लुंगा' आदि जैसे वाक्यांश आज  बच्चों,युवाओं और अधेड़ों द्वारा धड़ल्ले से बोल-चाल की भाषा में इस्तेमाल किया जा रहा है.
'कह के लुंगा' अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’के एक गाने का मुखड़ा था. वहां इसे यह कहकर तर्कसंगत ठहराया जा सकता था कि गाने में किसी की जान लेने की बात कही जा रही है.परंतु इसका द्विअर्थी होना कुछ संदेह पैदा कर देता है.
आज ये शब्द-समुह पिछले कुछ सालों से हाशिये को लांघकर मुख्यधारा का हिस्सा बनते जा रहे हैं और साथ ही गली-मुहल्लों से निकलकर ड्राइंगरुम और बेडरुम का हिस्सा तेजी से बनते जा रहे हैं.
कुछ दिन पहले मैं अपने एक मित्र से बात कर रहा था उनका ताल्लुक महाराष्ट्र से है.उनके साथ कुछ ऐसा हुआ था कि वार्त्ता के क्रम में वो बोल पड़ी 'मेरी तो फट गयी थी',ये वाक्यांश उस क्षेत्र में धड़ल्ले से उपयोग किया जाता है,जब मैं इसे सुना तो आश्चर्यचकित रह गया कि एक महिला ईस तरह के शब्द-समुहों का इस्तेमाल कितनी बेतरतीब तरीके से कर रही है.बाद में मैंने उन्हें समझाया कि एक सभ्य समाज की भाषा ऐसी नहीं होती,शायद उनपर मेरा प्रभाव पड़ गया होगा और बाद के किसी भी वार्त्तालाप में मेरे सामने ईस वाक्यांश का प्रयोग नहीं की.
हरियाणा और दिल्ली के कुछ भागों में एक मशहूर शब्द-समुह 'बहन के ………' शब्द-समुह का चलन काफ़ी ज्यादा रहा है और आज भी है.जब मैं पहली बार दिल्ली आया तो यह सुनकर मुझे अजीब सा महसूस हुआ.मैंने इसके अर्थ और इसकी उत्पत्ति को जानने का प्रयास किया.ईस सिलसिले में कुछ लोगों से बात की,लेकिन जवाब सुनकर और असमंजस में पड़ गया.किसी ने कहा मैं बचपन से सुनते आ रहा हुं और इन वाक्यांशों का इस्तेमाल करना एक आदत सी बन गयी है.मुझे ज्यादा ताज्जुब तब हुआ जब लगभग सभी ने इसका अर्थ बताने में असमर्थता जताई.
इसके बाद मैंने अपने विश्लेषण में पाया कि समाज में ऐसे बहुत से वाक्यांश प्रचलित रहते हैं जो लोगों को विरासत में मिली होती है.इन वाक्यांशों को बोलते समय उनका किसी प्रकार का दुर्भावना नहीं रहता और अंदाज भी मजाकिया होता है.
बिहार और उत्तर प्रदेश के पुर्वी भाग खासकर हिंदीभाषी राज्यों में 'शाला' शब्द का इस्तेमाल लगभग सभी के द्वारा किया जाता है.मैं बिहार से ही ताल्लुक रखता हुं-ईस शब्द को किसी के प्रति इस्तेमाल करने से उनको कोई तकलीफ़ नहीं होती.
एक सामान्य बात जो निकलकर सामने आती है,वह है-इन वाक्यांशों को कहने वाले  और सुनने वाले दोनों ही इसी समाज के अंग होते हैं.कहने वालों को भी कोई बेझिझक नहीं होती और न ही सुनने वालों को कोई तकलीफ़ अर्थात समाज इसे मान्यता दे देता है लेकिन सबसे बड़ा सवाल जो उभरकर सामने आता है वह है-क्या यह नैतिक मुल्यों पर खरा उतरता है?
इतिहास का अध्ययन हमें बताता है-सामाजिक बदलाव,सामाजिक प्रचलन आदि पीढी-दर-पीढी,समय-दर-समय और वर्षों में होते हैं तथा स्थापित होते हैं.हम चाहकर भी अचानक बदलाव नहीं कर सकते,यह एक बुनियादि सिद्धांत है जिसे लगभग सभी विद्वान मानते हैं और इसमें समाजशास्त्र भी अपनी आस्था प्रकट करता है.
अगर लोगों को बोलने का अंदाज यह निर्धारित कर दे कि इन वाक्यांशों का इस्तेमाल सामान्य अर्थ में किया जा रहा,द्विअर्थी नहीं तो हम इसको नैतिक मूल्य पर भी सही घोषित कर सकते हैं.
अपनी भड़ास निकालने का,दिल को तसल्ली देने का काम भी ऐसे वाक्यांश करते हैं जिसे एक तरह से मनुष्य की मनोचिकित्सा की श्रेणी में रख सकते हैं.जो इंसान को संतुलित रखने का एक रामवाण भी है.
            - सुरेश कुमार पान्डेय