Saturday, 2 May 2015

मोदी के समक्ष चुनौतियां

देश का माहौल तेजी से बदल रहा है और देश की राजनीति अब एक ध्रुवीय नहीं रह गयी है.
लोकसभा चुनाव के बाद करीब एक साल तक विपक्ष चित और खामोस पड़ा रहा,लेकिन बदलाव की शुरुआत दिल्ली चुनाव से हुयी और भाजपा को करारी मात मिली.
अब कांग्रेस के मूड में भी बदलाव देखने को मिल रहा है,राहुल गांधी सक्रिय नजर आ रहे हैं.हालांकी इससे यही साबित होता है कि पार्टी गांधी परिवार के बगैर कुछ नहीं है.
उधर पश्चिम बंगाल के नगर निकाय चुनाव में ममता बनर्जी नेजीत हासिल की,बिहार विधानसभा चुनाव के ऐन वक्त पहले जनता परिवार का विलय हो गया.आगे समय ही तय करेगा की मोदी इन सब चुनौतियों से कैसे निपटते हैं.
                     1.
भूमि अधिग्रहण विधेयक पुरी तरह उलझा हुआ है.राजनीतिक लिहाज से देखा जाये तो सत्ता पक्ष बचाव की मुद्रा में दिख रहा है,वह न तो आगे जा सकता है और न ही पीछे.
सत्ता पक्ष के लिये इससे भी बुरा होना अभी बाकी है.वस्तु एवं सेवा कर (GST) को लागू करने के किये एक संशोधन की जरुरत होगी.जिसके लिये 2/3 (दोतिहाई) बहुमत का होना अनिवार्य है.इसलिए यह पारित होगा या नहीं विपक्ष पर निर्भर करेगा.
आगे क्या होगा ?यह देखने की जरुरत है.
                      2.
मोदी ने सुधार के मोर्चे पर धीमी शुरुआत का फ़ैसला लिया जो गलत साबित हुआ.उन्होनों ईस चेतावनी की भी अनदेखी की कि किसी भी नई सरकार को जो भी राजनीतिक अवसर मिलता है वह एक साल में खुद ब खुद खत्म हो जाता है.
इन्होनों अहम राज्यों में चुनावी जीत हासिल करने तक सुधार के मोर्चे पर धीमे कदमों से बढने का तय किया.भाजपा को तो लाभ मिला लेकिन मोदी सरकार को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी.
                     3.
अभी भी वक्त है कि हालात पर नियंत्रण किया जाये.कारोबारी जगत सरकार से निराशा दर्शा रही है,परंतु अधिकांश कारोबारी अभी भी ईस उम्मीद में हैं कि देर होने से पहले सरकार की ओर से कुछ न कुछ सकारात्मकता दिखायी देगी.
अगर मोदी आम निराशा के बावजूद सामाजिक नीति मोर्चे पर व्यापक राजनीतिक समर्थन जुटाने में कामयाब हो जायें तो परिणाम स्पष्ट होगा.
"मन की बात" लोगों से प्रत्यक्ष  जुड़ने का अच्छा तरीका है.इसके लिये मोदी को अपनी संवाद कला का भरपूर इस्तेमाल करना होगा.
अगर प्रधानमंत्री आगे बढकर नेतृत्व नहीं करते और आकांक्षी वर्ग के बीच अपनी लोकप्रियता का लाभ नहीं लेते तो वह राजनीतिक माहौल में बदलाव को रोक अथवा पलट नहीं पायेंगे,अगर ऐसा हो गया तो काफ़ी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
                       4.
यहां ध्यान देने योग्य बात है,
- अगर विपक्ष को राजनीतिक बहस की व्याख्या करने का अवसर दिया गया तो किसी भी लिहाज से लाभप्रद स्थिति नहीं रह जायेगी क्योंकि मौजुदा विपक्ष की रवैया कुछ ऐसा ही लग रहा है.
- अगर भूमि,श्रम और पुंजी जैसे उत्पादन के कारकों के इस्तेमाल को और अधिक किफायती नहीं बनाया गया तो सुधार का कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकेगा.
- गरीबी हटाने और तेज आर्थिक विकास हासिल करने के लिये ऐसा तेज विकास अनिवार्य है जो मोदी सरकार द्वारा चलायी जा रही है और चलाने का प्रयास की जा रही है.
                     5.
इन दिनों आर्थिक मोर्चे पर कई चुनौतियां बनी हुयी है,
- किसानों की समस्या,जो गहन राजनीतिक विमर्ष (political discource) का मुद्दा बनी हुयी है,लेकिन समस्याओं का हल क्या है ? और वे कहां से मिलेंगे ?
यह पुरी बहस ही समाधान बताने के बजाये राजनीतिक ज्यादा लगती है.
- व्यापार के मोर्चे पर समस्यायें व्यापार नीति में नहीं बल्कि समुचित आर्थिक ढाँचे और समझदारी भरी मुद्रा नीति के अभाव में है.
- उद्योग धंधों के मोर्चे पर श्रम और भूमि संबंधी दिक्क्तें जिम्मेवार हैं.
                       6.
यह मामला कृषि और किसानों संबंधी समस्याओं से किसी तरह अलग नहीं है.इसकारण समस्या का समाधान गैर कृषि रोजगार पैदा करने और आजीविका के लिये खेती करने वालों की संख्या कम करने में निहित है.
ऐसे कृषि सुधार के लिये बहुत कुछ किया जाना चाहिये और किया जा सकता है लेकिन मुल समस्या है - गैर कृषि रोजगार उत्पन्न करने का.
इसके लिये सरकार के प्रयासों में विपक्ष द्वारा सहयोग किया जाना चाहिये और रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिये न कि अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा पुरी करने के लिये हर फ़ैसले ,हर नीति मे  टांग अड़ाना चाहिये.
            by - suresh kumar pandey