Friday, 8 May 2015

4. भूमि अधिग्रहन का मार्क्सवादी समीक्षा : एक विश्लेषण

कुछ दिन पहले मैं indian express group का हिंदी समाचार पत्र जनसत्ता में एक आलेख पढ रहा था, जो संभवतः अपुर्वानंद द्वारा लिखा गया था.
उन्होनों मार्क्स की एक उक्ती को भूमि अधिग्रहन से जोड़ कर ईस प्रकार अभिव्यक्त किया है, " आप भयभीत हो जाते हैं जब हम निजी संपती की खात्मे की बात करते हैं.लेकिन आपके आज के समाज में तो पहले ही आबादी के दस में से नौ के लिये निजी संपती खत्म कर दी गयी है,अगर यह कुछेक के पास है तो सिर्फ ईस वजह से कि यह दस में से नौ के पास नहीं है.
यह कथन आज भूमि अधिग्रहन  कानून की बहस में कितना प्रासंगिक जान पड़ता है.
पूंजी के साथ मिलकर राज्य किसानों से कह रहा है कि उन्हें राष्ट्र और समाज की भले की सोचकर अपनी निजी संपति का त्याग करना चाहिये.लेकिन वह कुछ नहीं बताता कि इससे कुछेक की निजी संपति में कितना इजाफा होगा.
आखिर वे कभी ये त्याग क्यों नहीं करते !
किसान आखिर निजी संपति की रक्षा का संघर्ष ही तो कर रहे हैं ? फिर राज्य उनके साथ न होकर पुंजी के साथ क्यों है ?
उसी तरह जब वह आदिवासियों को कहता है कि वे उस जंगल और जमीन से हट जायें जिसके नीचे खनिज दबा है,तो वह उस संपति से उन्हें वंचित कर उस पर अपनी या पुंजीपतियों की दावेदारी पेश कर रहे हैं.
ये विचार उस परंपरागत मार्क्सवादी सोच को प्रतिबिंबित करता है जिसका आज कोई अस्तित्व नहीं रह गया है.इसपर आधारित पुरी की पुरी साम्यवादी संरचना ढह गयी है.साम्यवादी राज्य चीन तो आज पुंजीवाद का गढ बन गया है और इसकी सारी नीतियां 1971 में 'open door policy' अपनाने के बाद पुंजीवाद के इर्द-गिर्द ही निर्धारित होती है.
परंतु एक विचारधारा के रुप में देखा जाये तो मार्क्स की प्रासंगिकता आज भी बनी हुयी है ठीक उसी तरह जिस तरह गांधी,पैगम्बर,ईसा,राम,हीगल,कांट,मैकियावली,प्लेटो और बर्लिन की.यह एक अलग मुद्दा है इसपर एक लंबी बहस हो सकती है.
अगर हम भूमि अधिग्रहण की मूल उद्देश्य को देखें तो स्पष्ट होता है - आज पुरी दुनिया बदल चुकी है,जिस प्रिष्टभूमि में मार्क्सवादी संरचना की उत्पत्ति मार्क्स और एंजेल्स द्वारा किया गया था वह आज नहीं रहीं.
न उस समय का तत्कालिक औद्योगिक समाज रहा और वो शोषणकारी पुंजीवादी प्रव्रितियां.
कल्याणकारी राज्य जिसकी मुख्य भूमिका ही सामाजिक कल्याण की रही है अपनी काम बखुबी निभा रही है.आज हम अगर ब्रिटेन का उदाहरण लें,जिसकी विकास का पुरा आधार ही औद्योगीकरन रहा है,लेकिन आज उसकी स्थिति ऐसी है जहां स्वास्थ्य सुविधायें और बुनियादी जरुरतों तक लोगों की पहुंच काफ़ी विस्तृत और आसान है.इसका मुल आधार पुंजी ही है,एक सामान्य अनुभव है हम पुंजी के अलावा कोई वो काम नहीं कर सकते जो हमारी चाहत रही है,समाज की चाहत रही है और देश की चाहत रही है.
बुनियादी सिद्धांत जिसे हम सदियों से पढते आ रहे हैं - विकास मुल रुप से तीन बातों पर निर्भर करती है " श्रम , पुंजी और विचार.
भारत के पास उपर्युक्त तीन में से दो तो है लेकिन पुंजी का अभाव है.
  by - suresh kumar pandey