Thursday, 7 May 2015

3. भूमि अधिग्रहन - सामाजिक क्षति आकलन का महत्व (social impact assesment)

कुछ लोगों द्वारा कहा जा रहा है कि यह प्रावधान LARR ACT 2013 का आत्मा था,जिसे मौजुदा सरकार द्वारा हटा दिया गया है.
पुरानी कानून का नये से तुलना को पढने के लिये यहां क्लिक करें - भूमि अधिग्रहन : मिथक,समस्या और समाधान - 1
इसके तहत विकास परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले समुदायों को चिन्हित किया जा सकता है.
इससे यह निर्धारित होता है कि कौन-कौन लोग किस-किस सीमा तक घाटे में रहने वाले हैं.(इसका तात्पर्य है - वे समुदाय जो मुवाअजा के हकदार हैं लेकिन वे भूमि के वास्तविक मालिक तो नहीं होते परंतु उनका अस्तित्व और आजीविका उस भूमि से संबंद्ध होता है)
इन समुदायों में आते हैं - खेत मजदूर,बटाईदार किसान,आदिवासी,ग्रामिण दस्तकारी पेशे से जुड़ी जातियां,मछुआरे और चरवाहे आदि
किसी भी भूमि के टुकड़ों से उपर्युक्त सभी का जीवन यापन चलता है और आश्रित रहता है.
ये बात सही है कि अगर भूमि को अधिग्रिहित किया जाता है तब इनलोगों को प्रभावित होने की संभावना बनी रहेगी.जैसा की हमें नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध बनाने के बाद और बार-बार इसकी उंचाई बढाने के दौरान देखने को मिला है.इनलोगों की हक के लिये लंबी लड़ाई  मेधा पाटेकर नाम की सामाजिक कार्यकार्त्ता बखुबी लड़ रही है.
इससे जुड़े अन्य आलेख पढने के लिये यहां क्लिक करें - भूमि अधिग्रहन - कहीं विचारधारा की लड़ाई तो नहीं ?
परंतु सोचने वाली बात यह रही है कि भारत की छवि हमेशा से एक कल्याणकारी राज्य की रही है,जो अपने उद्देश्य की पूर्ति को लोगों की इच्छा ध्यान रखकर करता है.
आज पुरा का पुरा विश्व एक अनजानी डर से कांप रहा है,जो है - ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वातावरण में आ रहा तेजी से बदलाव.अगर इसे ध्यान में रखा जाये तो "सामाजिक क्षति आकलन (social impact assesment) " के प्रावधान हटाना गंभीर परिणाम सामने ला सकता है.
    by - suresh kumar pandey