Thursday, 7 May 2015

2. भूमि अधिग्रहन - कहीं विचारधारा की लड़ाई तो नहीं ?

कुछ दिन पहले मोदी ने "मन की बात " में कहा, " यह कानून न तो किसान विरोधी है और न ही गरीब विरोधी " किसानों को गुमराह करने का यह विपक्ष का साजिश है.
पूरे बिल को पढने के लिये यहां क्लिक (click) करें -भूमि अधिग्रहन : मिथक,समस्या और समाधान - 1
ईस बिल पर बहस से दो बातें उभरकर सामने आयी है,जो अपने आप में काफ़ी महत्व रखती है -
1. पहला विवाद सरकार और विपक्ष के बीच बना हुआ है,यह देखना काफ़ी रोचक होगा कि इसका अंत किस पक्ष में होता है.
2. ईस बिल ने पुरी भारतीय समाज को भी दो भागों (खेमों) में विभक्त कर दिया है.
कुल मिलाकर कहा जाये तो ईस कानून के पक्ष और विपक्ष में बोलने वालों की तर्क काफ़ी दमदार है.
1991 में शुरू की गयी आर्थिक उदारीकरण की नीति ने दशकों से चले आ रहे गतिहीन समाज में उथल-पुथल पैदा कर दी.
समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो उदारीकरण के पहले वाली शैली से वाकिफ़ भी नहीं है.जिस कारण पुरा का पुरा समाज दो भागों में बंटता नजर आ रहा है और इससे एक विरोधाभास पैदा हो गयी है.
समाज के लिये सबसे मुख्य चुनौती बनी हुयी है - उनलोगों से निपटना जो अपने अपने आप को समाजवादी कहने और कहलवाने में गर्व का अनुभव महसूस कर रहें है.जबकि इनमें से अधिकांस का विचार समाचार पत्र और न्यूज चैनल डिबेट पर आधारित रहता है और बदलता रहता है.ईस परिप्रेक्ष्य में एक महान दार्शनिक की बात याद आती है - "समाजवादी आज उस गिरगिट की तरह हो गये हैं जो वातावरण को देखकर आसानी से अपना  रंग बदल लेते हैं ."
समाज का एक तबका भारत को ' औद्योगिकरण और कार्पोरेट " माहौल की तरफ़ खींच रहा है जबकि दूसरा उस ओर जाने को तैयार नहीं है.
दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि यह 'कृषि की दुनिया' और 'औद्योगिक विश्व' के बीच एक परिणामदायक और शायद अंतिम लड़ाई है.
    by - suresh kumar pandey