Wednesday, 22 April 2015

गांधी आलोचना कितना सही ?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

आज हम ऐसे युग में जी रहे है,जहां लोग किसी खास व्यक्ति के बहुमूल्य योगदानों को भूलकर उसके कुछ गलतियों के कारण आलोचना करने लगते है लेकिन सच्चाई कुछ और होता है.
पहली बात ध्यान देने योग्य यह है कि जिस काम को समाज द्वारा गलती माना जा रहा है,उसकी वास्तविक्ता क्या है?
मुलतः भारत में गांधी की आलोचना दो बातों पर की जाती है,कई और भी वजहें हो सकती है.लेकिन मैं इन दो मुद्दों पर ही ध्यान केन्द्रित करुंगा,जो है
1.भगत सिंह की मामला और
2.विभाजन के समय मुसलमानों के पक्ष में अनशन(भूख हड़ताल )
          
                             1
भगत सिंह की फांसी का कारण लोगों द्वारा गांधी को माना जाता है कि इन्होनों सिंह को छुड़ाने का कोई प्रयास नहीं किया और ब्रिटिश सरकार ने एक दिन पहले (23march,1931) फांसी दे दी जो 24 march को प्रस्तावित था.
अगर आधुनिक शोधों की बात करें तो यह स्पष्ट हो चुका है कि गांधी जी ने भगत सिंह के मामले में चिठ्ठी लिखी थी जो अंग्रेज दस्तावेजों में आज भी सुरक्षित है.
 अंग्रेज गांधी से भयभीत थे कि कहीं फ़िर वे अनशन शुरू न कर दे और इसलिये इन्होनों महात्मा के पत्र का उत्तर देने से पूर्व ही फांसी दे दी.
यहां एक और पहलु से पर्दा हटाने का वक्त आ गया है,जो है
जब भारत को आजादी मिली उस समय समाजवादियों का प्रभाव काफ़ी ज्यादा था चाहे वह संसद हो या इतिहासकार.यहा तक कि पंडित नेहरू का व्यक्तित्व भी समाजवादी ही था.इन्होनों भारत के इतिहास लेखन काम उन इतिहासकारों को सौंपा जो कट्टर समाजवादी थे.इनमें विपिन चंद्र,रोमिला थापर जैसे इतिहासकार प्रमुख थे.थापर ने तो यह स्पष्ट लिखा है कि मुगल काल में धर्म के नाम पर कोई मंदिर नहीं तोड़ा गया,क्या यह सही है ?
दूसरी बात जिसपर ध्यान देना बहुत जरुरी है.भगत सिंह जिनका रुझान भी वामपंथी था और समाजवादी विचारधारा से काफ़ी प्रभावित थे.वे इतिहासकार जिनको आजादी के बाद इतिहास लिखने का काम सौंपा गया सभी ने अपनी समाजवादी रुझान के कारण बिना मतलब का भगत सिंह का महिमामंडन करकर गांधी के विचारों को तिलांजली देने नाकाम कोशिश की.ये बात सभी जानते है जो विचारधारा से थोड़ा भी तालुक रखते होंगे कि वामपंथी गांधी को किस नजरिये से देखते हैं.इसमें थोरा भी इज्जत का भाव नहीं रहता.
                         2
भारत का समाज हिंदू बहुसंख्यक है और भारत की साक्षरता दर को सभी जानते हैं अगर हम 'दुनिया के एक खास सख्स एडोल्फ हिटलर' के बातों को याद करें तो स्पष्ट हो जाता है,जो है " समाज के बड़े तबके को बेवकूफ़ बनाना ज्यादा आसान है  किसी व्यक्ति विशेष के अपेक्षा "
ठिक हु-ब-हु ऐसा ही हुया भारत में ,और महात्मा गांधी का गलत प्रचार किया गया कि वो हिंदुओं के खिलाफ़ भुख हड़ताल कर रहे हैं.जबकि सच्चाई ये था कि वे जिस भारत को बनाने में अपनी ज़िंदगी गुजार दी और अपने तरिकों "सत्य,अहिंसा और सत्याग्रह " के माध्यम से 15 अगस्त,1947 को भाग्यवधू से मिलन करवाये ,आज वहीं भारत खुन की होली खेले ,यह उन्हें कतई मंजूर नहीं था.
वह अनशन किसी के खिलाफ़ या पक्ष में नहीं था बल्कि अपनी सिद्धांतों के लिये था,एक मजबुत भारत के निर्माण के लिये था ,भाईचारे के लिये था और उस सोच को कायम रखने के लिये था जिसे दशकों से हम उपयोग करते आ रहे थे (1915 - 1948) लेकिन अपने जेहन में उतार नहीं पाये थे.
अतः इन दो मामलों को लेकर की जा रही गांधी आलोचना बिल्कुल सही नहीं है.
          by - suresh kumar pandey