Tuesday, 28 April 2015

क्या आज सत्ता और मिडिया दोनों देश के साथ फरेब कर रही है ?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

लोकसभा चुनाव के दौरान जब मोदी प्रचार के लिये पूरे देश का दौरा कर रहे थे,उस समय मिडिया को लेकर एक नया शब्द इज़ाद किया था - "न्यूज ट्रेडर"
पुराने दिनों के कई मामले हमारे सामने आते है - राडिया टेप मामला (2G Spectrum),commonwealth घोटाला.
जब इन मामलों की पुरी तफ्तीश की गयी तो मिडिया को खासकर इन मामलों में "दलाल होने और कमीशन खोर" होने के रुप में देखा जाने लगा.
मनमोहन सरकार के समय यह चर्चा जोरो पर थी कि "देश का ताकतवर पत्रकार और  मिडिया घराना सत्ता के कितने करीब है या कितने दागदार है."
यह पुरी बहस तो अंतहीन है,लेकिन एक बात निकल कर सामने आती है - "मिडिया को लेकर आम लोगों की भावना आज भी अच्छी नहीं है."
मनमोहन सिंह के समय में हर रास्ता पुंजी के रास्ते ही निकलते रहा है.
लेकिन intelectual property भी कोई चीज होती है और उसी के सहारे पत्रकार अपना विस्तार कर सकता है.
इसी मिडिया की तस्वीर मोदी के आने के बाद बदल गयी है,जो अब काले धन को चुनावी वादे का जुमला सचमुच मानने लगी है और महंगाई पर आंख मुंद लेती है.यह जगजाहिर है,ईस स्थिती में मिडिया का दिशा और दशा स्पष्ट है.
अभी हाल में ही केंद्रिय मंत्री वी के सिंह द्वारा मिडिया को 'presstitute' कहा गया है,यह शब्द press और prostitute से मिलकर बना है.
परंतु सोचने वाली बात यह है कि 'वेश्या' खुलेआम अपने व्यापार को चलाती है और किसी से डरती नहीं.लेकिन मिडिया को लेकर लोगों की क्या विचार है,जगजाहिर है.
ईस संबंध में मैंने जब एक खास इंसान से बात किया तो,उन्होनों दो टुक जवाब दिया -
"पत्रकारों दलाली छोड़ो
दलालों पत्रकारीता छोड़ो."
मशहुर पत्रकार ओम ठानवी द्वारा मनमोहन सरकार के समय एक सर्वे करवाया गया था कि क्या मिडिया सचमुच ऐसी है,उस जांच में पाया गया था कि मिडिया ईस बीमारी से सचमुच ग्रसित है.
अगर मिडिया अपने आप में सुधार नहीं करती है तो यह डर सभी को सता रहा है कि कहीं लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही ध्वस्त न हो जाये.
       by -:suresh kumar pandey