Friday, 24 April 2015

जब 'आप' अंधेरे से घिरी है तो दिखायी कैसे देगा ?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

दिल्ली चुनाव तक किसी ने किसी का मुखौटा नहीं उतारा.सत्ता मिलते ही अपने पसंद की मुखौटों को अपने पास रखकर,हर किसी ने हर चेहरे से मुखौटा उतारना शुरू कर दिया,फ़िर "आम आदमी पार्टी" का चेहरा बचेगा कहां से ?
लेकिन मुखौटा उतरने के दौर में ये सच उघरने लगे कि " जिन लोगों को केजरिवाल पहले कटघरे में खड़े कर रहे थे,उन्हीं के साथ मौजुदा आप नेताओं के ताल्लुकात रहे हैं "
यह सवाल इसलिये भी बड़ा है कि दिल्ली में सत्ता चलाने वालों में खोजी रहे आशीष खेतान दूसरे नंबर के खिलाड़ी बन चुके हैं.याराना पुंजीवाद(crony capitalism) और paid news को कैसे आजमाया जगजाहीर है,जो अब प्रशांत भुषण के PIL का हिस्सा बन चुका है.
क्या अब मान लिया जाये कि
- उसुलों की ध्वजधारी आप के लिये सत्ता जीवन-मरण का सवाल बन चुका है/था?
- या फ़िर आप एक ऐसी उम्मीद की हवा में बह रही थी,जहां जनता का मोहभंग सत्ता से हो रहा था और उसे हर बुराई को छुपाते हुये आप के धुरंधर सियासी सेवक (राजनीतिक सेवक) लग रहे थे.
लेकिन ईस पुरी घटनाक्रम से स्पष्ट हो चुका है कि "सत्ता का मतलब सियासत साधना है " और केजरिवाल ने इसका बखुबी अंजाम दिया है.
अगर राजनीति से उपर उठकर सोचे - "आप एक ऐसा प्रयोग था जो भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ था,एक तरफ़ संघर्ष करने वालों की कतार लंबी थी तो दूसरी तरफ़ बौद्धिक व्यक्तित्व वालों में भी जोश था.लेकिन इन सभी के केंद्र में केजरिवाल ही थे.यह एक ऐसा मिलन था जिसे अधिकांस ने स्वीकार किया था और ऐसा लगने लगा था कि राजनीति बदलने वाली है."
परंतु एक ही झटके में सारे सपने चकनाचुर हो गये हैं.सत्ता के खेल ने ऐसी पलटी मारा है कि प्रशांत , योगेंद्र सहित अन्य कई को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.
परिणाम सभी के सामने आ गयी और आप "नौटंकी करने वालों की पार्टी" बनकर रह गयी.
   by - suresh kumar pandey