Thursday, 2 April 2015

जैन और बौध्द धर्म का भारतीय समाज पर प्रभाव

आज से 2500 साल पूर्व गौतम और वर्ध्दमान नाम के दो तेजस्वी बालक का जन्म शाक्य तथा वज्जि नामक गण में हुया था,दोनों के परिवार का इनसे काफ़ी उम्मीदें थी लेकिन अपनी रास्ते का चयन इनदोनों ने खुद किया.जिसके फलस्वरुप इतिहास में सदियों के लिये अमर हो गये.
गौतम बुध्द ने बौध्द धर्म तथा माहावीर ने जैन धर्म को काफ़ी उच्चाईयां दी (महावीर से पहले ही जैन धर्म का स्थापना हो चुका था जिसका श्रेय ऋषभदेव को दिया जाता है जो पहले उपदेशक थे)
दोनों ने अपनी शिक्षा प्राकृत भाषा में दी और दोनों ने ही पुर्वजन्म में विश्वास किया.बुध्द ने कहा की हमारे कष्ट और दुख का कारण है ,"हमारी इच्छा और लालसायें जो कभी पुरी नहीं हो सकती"
माहावीर भी इसी कथन से अपने उपदेश की शुरुआत करते हैं.इनदोनों का मुल ध्येय था - "किस प्रकार मनुष्य को जन्म -मरन के चक्र से मुक्त कराकर मोक्ष की प्राप्ति करवाया जाये."
ईस उद्देश्य प्राप्ति के लिये बुध्द ने मध्यम मार्ग अपनाने का विकल्प दिया जबकि माहावीर ने यति जीवन का(यानी जो अपने शरीर को जितना कष्ट देगा उसे मोक्ष की प्राप्ति उतना ही जल्दी होगी.)
इसका एक नकरात्मक(negative) पहलू जल्द उभरकर सामने आ गया.जैन धर्म से लोगों का जुड़ाव बौध्द धर्म के अपेक्षा धीरे धीरे कम होता चला गया.
तत्कालिक भारतीय समाज पर प्रभाव :-
1.दोनों ने वर्ण व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया,फलस्वरुप यह धीरे धीरे कमजोर होती गायी और भारतीय समाज में भ्रातृत्व अपना पैर तेजी से जमाने लगी.
2.ईस समय की समाज में वेदों की कर्मकांडीय परंपरा का उतना अधिक बोलबला नहीं रहा था,उपनिषदों ने जीवन के आधारभूत समस्या के बारे में चिंतन करने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी,परंतु मुख्य समस्या था - मोक्ष की विधि का पता लगाना.ईस समस्या को जैन और बौध्द धर्म ने दूर करने की सफल प्रयास किया .
3.यह वह समय था जब भारतीय समाज में कई संप्रदायों की स्थापना हुयी,भारत में ऐसा पहले कभी नहीं हुया था जिसने भारतीय समाज और संस्कृति को बहुत अधिक प्रभावित किया.
4.भारतीय समाज में एक नये विचार का जन्म हुया - शुध्द और नैतिक जीवन में विश्वास के साथ साथ ईश्वर के विचार की अस्वीकृति.
5.कर्म की प्रधानता तो पहले से ही चली आ रही थी लेकिन इनदोनों के प्रभाव में आकर और अधिक मजबूत हुआ.
6.ऐसा पहली बार देखने में आया कि कोई क्षत्रिय व्यापक बदलाव की स्थिति समाज में बना दिया.अर्थात अब कोई ऐसा संदेह नहीं रह गया कि ब्राह्मण के अलावा सामाजिक बदलाव का काम कोई दूसरा नहीं कर सकता.