Thursday, 2 April 2015

धारा 66(A) की समाप्ती : कहां तक उचित ?

सुप्रिम कोर्ट का फ़ैसला सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 (IT ACT 2000) के कुछ धाराओं पर आया है,जो है
1.धारा 66(A) की समाप्ती (असंवैधानिक घोसित कर दिया गया )
2.धारा 69 को बरकरार रखा गया है, जो सरकार को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह website को गोपनीय रुप से सेंसर कर सके और जरुरत पड़ने पर block भी.
इसके तहत ऐसी कोई समीक्षा व्यवस्था नहीं है कि block करने से पहले मालिक को इसकी सूचना दिया जाये और block के बिरुध्द अपील की जाये.
3.धारा 79 में सुप्रिम कोर्ट ने कुछ ढील दी है.इसके तहत प्रवधान था - Internate सेवा प्रदाताओं को कोई भी नकरात्मक सामाग्री संबंधी नोटिस प्राप्त होने पर 36 घंटे के भीतर हटानी होती थी या फ़िर उसकी जवाबदेही बनती थी.
ईस मामले में मननाने तरिके से नोटिस भेजा जा सकता था,लेकिन कोर्ट ने कहा है कि कोई भी समाग्री हटाना तभी जरुरी होगा जब अदालत इसका आदेश दे या सक्षम सरकारी विभाग की ओर से ऐसा करने को कहा जाये.
66(A) को हटाने का कानूनी आधार :-
हमारे संविधान के भाग -3 में मुलाधिकार की व्याख्या की गयी है,जिसके तहत अनुच्छेद 19(1)(a) में सभी नागरिकों को बोलने की स्वतंत्रता और अभीव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है.
धारा 66(A) में प्रवधान था
(क) कोई भी जानकारी जो ठेस पहुंचाने वाली हो या जिसका स्वर धमकी भरा हो.
(ख) कोई भी जानकारी (जो वह शख्स जानता है कि झूठी है) पर असुविधा या ख़तरा पैदा करने, आहत करने, आपराधिक धमकी देने, शत्रुता, दुर्भावना या नफ़रत फैलाने या किसी को गुस्सा दिलाने के मकसद से डाली जाए.
(ग) ऐसी कोई भी इलेक्ट्रॉनिक मेल या इलेक्ट्रॉनिक मेल संदेश जो पाने वाले को नाराज़ करे, उस संदेश के मूल स्रोत को लेकर धोखा दे, गुमराह करे या असुविधा पैदा करे..
इसके तहत 3 साल की सजा हो सकती थी.सुप्रिम कोर्ट ने इसे निरस्त करते हुये निम्न तर्क दिया,
धारा 66(A) काफ़ी अस्पष्ट थी जिस कारण पुलिस को असीमित अधिकार मिले हुये थे और सोशल मिडिया पर आलोचना और असहमति का इजहार करने वालों को प्रताड़ित होने की आशंका बनी हुयी थी.जो भारतीय संविधान की अनुच्छेद 19(1)(a) के खिलाफ़ थी,जिसमें असहमति को भी अभीव्यक्ति का आजादी माना गया है.
IT ACT 2000, में एक संशोधन के जरिये धारा 66(A) ,2008 में जोड़ दिया गया था,जो संसद में बिना बहस के ही पास हो गया था,जिसके चलते कई लोग प्रताड़ित हो चुके है.
19(1) के तहत नागरिकों को जो भी अधिकार प्राप्त है,उसे 19(2) के जरिये सीमित कर दिया जाता है.
19(2) कहता है -अगर दिये गये अधिकारों के प्रयोग से भारत की संप्रभुता और अखंडता ,राज्य की सुरक्षा,विदेशी राज्यों के साथ संबंध,लोक व्यवस्था,न्यायलय अवमान,मानहानि या कोई अपराध होता है तो 19(1) के इस्तेमाल को राज्य द्वारा रोका जा सकता है साथ ही राज्य प्रतिबंध भी लगा सकता है.
जब ऐसी प्रावधान संविधान में ही निहित है तो 66(a) की क्या जरुरत है.
66(A) को लेकर राजनीतिक दलों का विचार :-
1. पिछले साल गोआ में देबु चोडानकर पर एक फेसबुक पोस्ट पर अपराधिक मामला दर्ज किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि 'उन्हें डर है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं तो 'हॉलोकास्ट' (नाजियों द्वारा यहुदियों की नरसंहार का समर्थन करना ) की स्थिति पैदा हो जाएगी.'
2.पुडुचेरी में रवि श्रीनिवासन को ये ट्वीट करने पर गिरफ्तार कर लिया गया कि ‘रिपोर्ट मिली है कि कार्ति चिदांबरम ने वाड्रा से ज़्यादा संपत्ति इकट्ठा कर ली है.’
3.कक्षा 11वीं के छात्र विकी ख़ान तब गिरफ़्तार किया गया जब उन्होंने एक कथन को ग़लती से समाजवादी पार्टीके नेता आज़म ख़ान के हवाले से लिख दिया.
4.कोलकाता के एक प्रोफ़ेसर अम्बिकेश महापात्रा पर आरोप लगा कि वे ममता बनर्जी के एक कार्टून का प्रचार कर रहे थे जो पुलिस के मुताबिक, अपमानजनक था.
5.महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की मृत्यु पर टिप्पणी को लेकर दो किशोरियों की गिरफ्तारी.
विडम्बना ये है कि इनमें से कोई भी कथन उन वाजिब प्रतिबंधों के तहत नहीं आता जो कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार पर लगता है.
चाहे किसी भी राज्य में किसी भी पार्टी का सरकार रहा हो सभी ने ईस कानून का इस्तेमाल अपने मन मुताबिक किया हो.वह भाजपा हो या कांग्रेस या त्रिनमुल या सपा.
किसी के द्वारा इसे बदलने संबंधी कोई ब्यान नहीं आया था.
शुक्र है कि न्यायलय, "न्यायिक सक्रीयता" के अपने भूमिका को ईमानदारी से निभाता आ रहा है,मौजुदा फ़ैसला उसी की एक कड़ी है.
जब भी नागरिक अधिकारों को कुचलने का कदम उठाये गये है,न्यायपालिका ने नागरिकों का पक्ष लेकर इनके अधिकारों की रक्षा की है.
66(A) के समाप्ति से उत्पन्न परेशानियां : -
1.साइबर स्पेस पर किसी को परेशान करना,पीछा करना और बदनाम करना एक आम बात हो गयी है.66(A) के तहत इन पीड़ीतों को जो राहत मिलती थी वह जाती रही.
2.66A(c) के तहत स्पैम पर नियंत्रण का जो प्रावधान था वह खत्म कर दिया गया है.जबकि दुनिया में सबसे ज्यादा स्पैम भारत में ही बनते है लेकिन इसे रोकने का यहां कोई नियम नहीं है.
3.66ए के हटने से साइबर अपराधियों से निपटने में दिक्कत होगी.
4.डिजिटल दुनिया में दूसरों पर गलत तरिकों से हमले करने वालों को, जो कुछ थोरा बहुत डर होता था अब वह भी नहीं होगा.
66(A) की समाप्ति से सरकार को चेतावनी :-
1.सरकार ऐसा अब कोई कानून नहीं बनाये जो संविधान के मुख्य सिध्दान्त के खिलाफ़ हो.
2.IT ACT में संशोधन करते वक्त सरकार को ध्यान रखना होगा कि यह समय की जरुरतों और बदलती हुयी तकनिक के अनुरूप हो.
conclusion :-
कोर्ट का यह अच्छा पहल है,जिसके चलते 66(a) के तहत सजा पाये लोगों को अब राहत मिलेगी.
world wide wave पर लगाम लगाना उतना असान नहीं है जितनी आसानी से TRAI ने SMS पर रोक लगायी.कोई सरकार इसे नियंत्रिट नहीं कर सकती है.चीन कई साल तक इसके लिये कठिन मेहनत कर चुका है लेकिन अभी तक सब बेकार रहा है.
internet एक ऐसी चीज है जिसका हमारे जीवन की तमाम दृश्य और अदृश्य चिजों पर दखल रहा है.यह सबकुछ देखने और जानने में सक्षम एक ऐसी संस्था है जिसकी मौजूदगी तो घोर नास्तिक भी इंकार नहीं कर सकता.