Sunday, 26 April 2015

22 अप्रैल,2015 : गजेन्द्र की मौत भी बहुत कुछ कहती है

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

यह दिन भारतीय संसदीय जनतांत्रिक राजनीति की पराजय के एक दिन के रुप में याद रखा जायेगा.
जब गजेंद्र सिंह नाम के एक किसान ने जंतर-मंतर पर आत्महत्या कर ली.लगने लगा है कि आज भारत में किसी की अवाज तभी सुनी जाती है - जब वह खुद नाटक बन जाये.भारत के राजनीति से ये उम्मीद कतई नहीं थी,जो राजनीति को बदलने आये थे खुद अपनी पार्टी की साख बचाते नजर आये.
अगर गजेंद्र सिंह के विरासत पर ध्यान दिया जाये तो वह अन्य किसानों से काफ़ी अच्छी ज़िंदगी जी रहा था,अपने खेतों में भी मजदुरी जैसा काम नहीं करता था और जो फ़सल की बर्बादी हुयी थी वह भी मात्र 20-25% ही थी.उसकी मिल्कियत 40 बिघा की बतायी जा रही है.जब ऐसे किसान आत्महत्या करने के लिये मजबूर हो जाते हैं तो बाकी किसानों का क्या होता होगा जिनके पास अपनी ज़मीन भी नहीं है और जो खेतिहर मजदुरी के साथ साथ पट्टे पर जमीन ले खेती करते है.
                   1.
किसानों कीआत्महत्या के बढते आंकड़े से  भी राजनीतिक दल को चेतना नहीं आयी है कि वे विदर्भ में,पंजाब में,राजस्थान में किसानों के बीच जायें और यकीन दिलायें की संघर्ष ही रास्ता है,आत्महत्या से संघर्ष को बल नहीं मिलता.
परंतु राजनीतिक दल अपने उस मुल कर्तव्य को भुल गये है जो उनका आधार होता है, वह है - लोगों को शिक्षित करना,उनमें जनतांत्रीक भावना को लाना.
जनतंत्र सिर्फ चुनाव जितने से नहीं चलता,संसद के मुकाबले वह सड़क पर आकार लेता है.
                        2.
आत्महत्या सामूहिक निर्णय का मामला नहीं लेकिन संघर्ष है.लेकिन अभी संघर्ष सामूहिकता का निर्माण नहीं रहा, क्यों ?
आमतौर पर मृत्यु आदमी के भीतर की इंसानियत को जगा देती है.सामने मृत को देखकर हम खामोश हो जाते है.मौत हमें हमारे रोजमर्रा के छोटेपन से मुक्त होने में मदद करती है.हम अपने घोर दुश्मन के मौत पर भी मौन हो जाते हैं.
लेकिन क्या कारण रहा कि गोधरा में ट्रेन में मारे गये लोगों के बाद हम खामोश नहीं रहे,एक जुलूस बनकर निकल पड़े.
   by - suresh kumar pandey