Wednesday, 1 April 2015

इतिहास की समझ - 2,गांधी एक ब्रिटिश एजेंट ?

इन दिनों महात्मा गांधी को लेकर काफ़ी तेज बहस हो रही है,इनका व्यक्तित्व कैसा था खासकर तब से जब एक जज ने उनको ब्रिटिश एजेंट कहकर गंभीर आरोप लगाये.यह किसी को कोसने का वक्त नहीं है,वक्त है अपनी तर्क देकर दूसरे की बातों को गलत ठाहराने का.
हम भारतीय का सबसे गंभीर कमी है कि हम भावनाओं में बहकर अपनी तर्क करने की कसौटी को तिलांजलि दे देते हैं खासकर ईस दौर में जब समाज का बड़ा तबका में किसी भी कथन और बात को मानने के लिये प्रमाण की मांग करने की प्रवृति तेजी से बढी है.
गांधी बनाम गोडसे :-
जनवरी का महीना,गांधी के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है.
यह वही महीना था जब वे भारत आये थे,और इनकी भारत वापसी का सदी के रूप में वर्ष 2015 को मनाया गया.इसी महीने गांधी के जीवन का अंतिम उपवास भी था,अंत होते होते इनकी जीवन लीला ही समाप्त कर दी गयी .(jan30,1948)
यह वह दौर था जब कम से कम भारत के बड़े हिस्से के हिंदू उनसे अधिक निराश हो चुके थे. उनके मुताबिक़ गांधी उनके लिए न सिर्फ़ ग़ैरज़रूरी हो गए थे, बल्कि उनको लगने लगा था कि गांधी का जीवित रहना भारत के लिए ख़तरनाक हो सकता था.
गांधी ने इन्ही दिनों दंगे को रोकने के उद्देश्य से उपवास की घोषणा कर दी और उपवास पर बैठ भी गये लेकिन नियति को कुछ और ही मंजुर था,
उपवास ख़त्म होने के बाद गाँधी की प्रार्थना सभा पर बम विस्फोट हुए और मदन लाल पहवा नाम का व्यक्ति गिरफ़्तार हुआ.
नाथूराम गोडसे, जो अपने दल के साथ दिल्ली में डेरा डाले हुए थे, इसके बाद यहाँ से निकल गए, लेकिन वह फिर लौटे.
30 जनवरी को वह प्रार्थना सभा की ओर जाते हुए गांधी के आगे रुके, उन्हें प्रणाम किया और फिर उनपर गोलियाँ दाग़ दीं.
ईस दर्द भरी घटना के बाद , एक तरफ़ तो कई घरों में चूल्हा नहीं जला, लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों और समर्थकों ने मिठाइयाँ बांटी और दीवाली मनाई.
आज जब वह संघ भारत की सत्ता पर क़ाबिज़ है. तो यह एक मौक़ा हो सकता है यह विचार करने का कि क्या अंतिम रूप से गाँधी के विचारों को विदाई दे दी गई है.
यहा सोचने वाली बात है,आरएसएस(RSS) की क्या मजबूरी रही होगी?
अगर राम मनोहर लोहिया के एक कथन पर ध्यान दिया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है ,"तत्कालिक कोई भी घटना गलत या सही नहीं होती क्योंकि किसी भी घटना पर कोई भी विचार तब प्रमाणित हो जाती है जब उसकी समीक्षा 100 वर्षों बाद किया जाये ,तब तक इतिहास उसका निष्पक्ष समालोचना कर चुका होता है."
परंतु मशहूर ब्रिटिश विचारक टामस पेन को याद किया जाये ,तब यह स्पष्ट होता है कि "कोई भी विचारधारा समाज में तब तक जीवित रहती है जब तक समाज की उसे स्वीकृति प्राप्त हो अन्यथा गर्त में खो जाती है."पेन के कथन का दूसरा पक्ष है " कोई भी विचारधारा समाज में जीवित रहती है जब वह समयअनुकूल हो.
उस समय संघ अपनी शुरुआति अवस्था में था और अपनी साख बनाने के लिये कोई तो विचारधारा होना ही चाहिये था और इसने हिंदु हित को पुरा करने का जो अजेंडा चलाया उसमें मैं कहीं गलती नहीं देखता क्योंकि इतिहास गवाह है बहुसंख्यवाद का पैरोकार करने वाला कोई न कोई संगठन पैदा हो ही जाता है.कोई भी संगठन चलाने की बुनियादि आधार होती है - लोगों का समर्थन जो कि उसे प्राप्त था और आज भी है. तो दूसरे नजरिये से कहा जा सकता है कि इसमें संघ की नहीं हमारी गलती थी.
आखिर गोडसे ने गांधी की हत्या क्यों की?
गिरफ़्तार होने के बाद गोडसे ने गांधी के पुत्र देवदास गांधी (राजमोहन गांधी के पिता) को तब पहचान लिया था जब वे गोडसे से मिलने थाने पहुँचे थे. इस मुलाकात का जिक्र नाथूराम के भाई और सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने अपनी किताब गांधी वध क्यों, में किया है.
गोपाल गोडसे को फांसी नहीं हुई, क़ैद की सजा हुई थी. जब देवदास गांधी पिता की हत्या के बाद संसद मार्ग स्थित पुलिस थाने पहुंचे थे, तब नाथूराम गोडसे ने उन्हें पहचाना थानाथूराम ने देवदास गांधी से कहा, "मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूं. हिंदी अख़बार हिंदू राष्ट्र का संपादक. मैं भी वहां था (जहां गांधी की हत्या हुई). आज तुमने अपने पिता को खोया है. मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुंचा है. तुम पर और तुम्हारे परिवार को जो दुख पहुंचा है, इसका मुझे भी बड़ा दुख है. कृप्या मेरा यक़ीन करो, मैंने यह काम किसी व्यक्तिगत रंजिश के चलते नहीं किया है, ना तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और ना ही कोई ख़राब भाव."
देवदास ने तब पूछा, "तब, तुमने ऐसा क्यों किया?"
जवाब में नाथूराम ने कहा, "केवल और केवल राजनीतिक वजह से."
नाथूराम ने देवदास से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. अदालत में नाथूराम ने अपना वक्तव्य रखा था, जिस पर अदालत ने पाबंदी लगा दी.
गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक के अनुच्छेद में नाथूराम की वसीयत का जिक्र किया है. जिसकी अंतिम पंक्ति है- "अगर सरकार अदालत में दिए मेरे बयान पर से पाबंदी हटा लेती है, ऐसा जब भी हो, मैं तुम्हें उसे प्रकाशित करने के लिए अधिकृत करता हूं."
पहली बात, वह गांधी का सम्मान करता था. उसने कहा था, "वीर सावरकर और गांधीजी ने जो लिखा है या बोला है, उसे मैंने गंभीरता से पढ़ा है. मेरे विचार से, पिछले तीस सालों के दौरान इन दोनों ने भारतीय लोगों के विचार और कार्य पर जितना असर डाला है, उतना किसी और चीज़ ने नहीं."
दूसरी बात, जो नाथूराम ने कही, "इनको पढ़ने और सोचने के बाद मेरा यकीन इस बात में हुआ कि मेरा पहला दायित्व हिंदुत्व और हिंदुओं के लिए है, एक देशभक्त और विश्व नागरिक होने के नाते. 30 करोड़ हिंदुओं की स्वतंत्रता और हितों की रक्षा अपने आप पूरे भारत की रक्षा होगी, जहां दुनिया का प्रत्येक पांचवां शख्स रहता है. इस सोच ने मुझे हिंदू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम के नज़दीक किया. मेरे विचार से यही विचारधारा हिंदुस्तान को आज़ादी दिला सकती है और उसे कायम रख सकती है."
इस नज़रिए के बाद नाथूराम ने गांधी के बारे में सोचा. "32 साल तक विचारों में उत्तेजना भरने वाले गांधी ने जब मुस्लिमों के पक्ष में अपना अंतिम उपवास रखा तो मैं इस नतीजे पर पहुंच गया कि गांधी के अस्तित्व को तुरंत खत्म करना होगा. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों को हक दिलाने की दिशा में शानदार काम किया था, लेकिन जब वे भारत आए तो उनकी मानसिकता कुछ इस तरह बन गई कि क्या सही है और क्या गलत, इसका फैसला लेने के लिए वे खुद को अंतिम जज मानने लगे. अगर देश को उनका नेतृत्व चाहिए तो यह उनकी अपराजेयता को स्वीकार्य करने जैसा था. अगर देश उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता तो वे कांग्रेस से अलग राह पर चलने लगते."
महात्मा पर आरोप
इस सोच ने नाथूराम को गांधी की हत्या करने के लिए उकसाया. नाथूराम ने भी कहा, "इस सोच के साथ दो रास्ते नहीं हो सकते. या तो कांग्रेस को गांधी के लिए अपना रास्ता छोड़ना होता और गांधी की सारी सनक, सोच, दर्शन और नजरिए को अपनाना होता या फिर गांधी के बिना आगे बढ़ना होता."
तीसरा आरोप ये था कि गांधी ने पाकिस्तान के निर्माण में मदद की. नाथूराम ने कहा, "जब कांग्रेस के दिग्गज नेता, गांधी की सहमति से देश के बंटवारे का फ़ैसला कर रहे थे, उस देश का जिसे हम पूजते रहे हैं, मैं भीषण ग़ुस्से से भर रहा था. व्यक्तिगत तौर पर किसी के प्रति मेरी कोई दुर्भावना नहीं है लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि मैं मौजूदा सरकार का सम्मान नहीं करता, क्योंकि उनकी नीतियां मुस्लिमों के पक्ष में थीं. लेकिन उसी वक्त मैं ये साफ देख रहा हूं कि ये नीतियां केवल गांधी की मौजूदगी के चलते थीं."
नाथूराम के तर्कों के साथ समस्याएं थीं. मसलन, उसकी सोच थी कि गांधी देश के बंटवारे के प्रति उत्साहित थे, जबकि इतिहास के मुताबिक मामला बिलकुल उल्टा था. उन्होंने कहा कि कांग्रेस में गांधी तानाशाह थे, लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि कांग्रेस के अंदर अपनी बात मनवाने के लिए गांधी को भूख हड़ताल करनी पड़ती थी. किसी तानाशाह को आदेश देने के सिवा कुछ करने की जरूरत क्यों होगी?
यह गोडसे के निजी विचार है,यहा इसे केवल इसलिये डाला गया है ताकि समझा जा सके कि सच्चाई क्या है और उसके मन में चल क्या रहा था.
अगले आलेख में बाकी पहलू  को क्लियर किया जयेगा.
स्त्रोत्र - Bbc,
         फ्रीडम स्ट्रगल by vipin chandra,
         india after independence by vipin chandra,
         modern india by sumit sarkar,vipin chandra and ncert.
         -SURESH KUMAR PANDEY