Tuesday, 28 April 2015

क्या आज सत्ता और मिडिया दोनों देश के साथ फरेब कर रही है ?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

लोकसभा चुनाव के दौरान जब मोदी प्रचार के लिये पूरे देश का दौरा कर रहे थे,उस समय मिडिया को लेकर एक नया शब्द इज़ाद किया था - "न्यूज ट्रेडर"
पुराने दिनों के कई मामले हमारे सामने आते है - राडिया टेप मामला (2G Spectrum),commonwealth घोटाला.
जब इन मामलों की पुरी तफ्तीश की गयी तो मिडिया को खासकर इन मामलों में "दलाल होने और कमीशन खोर" होने के रुप में देखा जाने लगा.
मनमोहन सरकार के समय यह चर्चा जोरो पर थी कि "देश का ताकतवर पत्रकार और  मिडिया घराना सत्ता के कितने करीब है या कितने दागदार है."
यह पुरी बहस तो अंतहीन है,लेकिन एक बात निकल कर सामने आती है - "मिडिया को लेकर आम लोगों की भावना आज भी अच्छी नहीं है."
मनमोहन सिंह के समय में हर रास्ता पुंजी के रास्ते ही निकलते रहा है.
लेकिन intelectual property भी कोई चीज होती है और उसी के सहारे पत्रकार अपना विस्तार कर सकता है.
इसी मिडिया की तस्वीर मोदी के आने के बाद बदल गयी है,जो अब काले धन को चुनावी वादे का जुमला सचमुच मानने लगी है और महंगाई पर आंख मुंद लेती है.यह जगजाहिर है,ईस स्थिती में मिडिया का दिशा और दशा स्पष्ट है.
अभी हाल में ही केंद्रिय मंत्री वी के सिंह द्वारा मिडिया को 'presstitute' कहा गया है,यह शब्द press और prostitute से मिलकर बना है.
परंतु सोचने वाली बात यह है कि 'वेश्या' खुलेआम अपने व्यापार को चलाती है और किसी से डरती नहीं.लेकिन मिडिया को लेकर लोगों की क्या विचार है,जगजाहिर है.
ईस संबंध में मैंने जब एक खास इंसान से बात किया तो,उन्होनों दो टुक जवाब दिया -
"पत्रकारों दलाली छोड़ो
दलालों पत्रकारीता छोड़ो."
मशहुर पत्रकार ओम ठानवी द्वारा मनमोहन सरकार के समय एक सर्वे करवाया गया था कि क्या मिडिया सचमुच ऐसी है,उस जांच में पाया गया था कि मिडिया ईस बीमारी से सचमुच ग्रसित है.
अगर मिडिया अपने आप में सुधार नहीं करती है तो यह डर सभी को सता रहा है कि कहीं लोकतंत्र का चौथा स्तंभ ही ध्वस्त न हो जाये.
       by -:suresh kumar pandey

Monday, 27 April 2015

बधाई हो बेटी हुयी है !

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

2015 की गणतंत्र दिवस की झांकी में जब " बधाई हो बेटी हुयी है " नाम आंखों के सामने आयी तो सभी के दिलों को छू गयी.
यह झांकी 22 जनवरी,2015 को हरियाणा के पानीपत से प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गयी " बेटी बचाओ,बेटी पढाओ अभियान " से प्रेरित थी.ईस अभियान को हरियाणा से शुरू करने का उद्देश्य है - वहां पर बाल लिंगानुपात (0-6 आयु वर्ग ) मात्र 879 है जो राष्ट्रीय औसत 919 से काफ़ी कम है.
                     1.
भारत में महिलाओं की दुर्दसा का आंकड़ा और वास्तविक्ता :-
- महिलाओं की स्थिति के बारे में एक सर्वे में भारत का स्थान 135 देशों में 105वां है.
- India's girl पर 'save the child report,2014' के मुताबिक
a)18 साल से कम उम्र की बेटियों की संख्या = 22.5 करोड़
b)निजी स्कूल में लड़कियों की संख्या = 45% और लड़कों की 55% है (ईस 10% के अंतर को पाटना सरकार और समाज के लिये बेहद कठिन चुनौती है)
c)70% लड़कियां 10वीं तक जाते जाते पढाई छोड़ देती है,41% 8वीं तक,24% 5वीं तक पहुंचते-पहुंचते घर बैठ जाती है.
6% तो upper प्राइमरी में ही drop हो जाती है.
- एक चौंकाने वाला तथ्य है,
2012 में शिक्षिकायों की संख्या मात्र 31.6% हो गयी है जो 2001 में 38% थी.
इसका मुल कारण छेड़छाड़,बलात्कार और प्रताड़ना को बताया जा रहा है.
यह एक विडंबना ही है कि जब हम धन,विद्या और शक्ति आदि की कामना करते समय लक्ष्मी,सरस्वती और दुर्गा नामक स्त्री की कामना करते हैं,लेकिन जब संतान की चाहत रखते हैं तो ऐसा क्यों नहीं होता ?
भारत में बाल लिंगानुपात 2001 के 927 के अपेक्षा 2011 में घटकर 919 हो गयी लेकिन संपूर्ण लिंगानुपात 933 से बढकर 943 हु गयी.ईस तरह बाल लिंगानुपात का घटना एक चिंता का विषय है.भ्रुण हत्या को इसके लिये जिम्मेदार माना जाता है जो दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों से प्रेरित है.
                      2.
इन सभी बातों को ध्यान में रखकर ही प्रधानमंत्री द्वारा " बेटी बचाओ,बेटी पढाओ अभियान " की शुरुआत की गयी है,जिसकी मुख्य विशेषता और उद्देश्य है -
a)बालिका जन्मोत्सव मनाना और उसे शिक्षित करना,
b)लिंग चयन वाले लेंगिक पुर्वाग्रह का समापन,
c)लड़कियों की बचाव और सुरक्षा सुनिश्चित करना,
d)बालिकाओं की शिक्षा सुनिश्चित करना.
अभियान लागू करने की नीति -
a)बालिका जन्म पर खुशी और उत्सव मनाना,
b)अपनी बेटियों पर गर्व करना और पराये धन की मानसिकता का विरोध करना,
c)लिंग समानता को बढावा देना,
d)बाल-विवाह और दहेज प्रथा का विरोध करना,
e)लड़कियों को स्कूल में दाखिला कराना,
f)लिंग आधारित पुरानी सोच को चुनौती देना.
                        3.
निष्कर्ष (conclusion) -
ईस योजना की सद्भावना राजदूत माधुरी दीक्षित को बनाया गया है.यद्यपी इसमें कई मंत्रालय की भागिदारी है,लेकिन महिला एवं बाल विकास इसकी नोडल मंत्रालय है.
यह स्कीम अभी चुने हुये 100 जिलों में चलायी जा रही है.इसके तहत महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्थलों पर गुड्डी- गुड्डा बोर्ड के द्वारा जन्म से संबंधित बालक बालिका आंकड़ों को दर्शाया जायेगा और जन्म के समय लिंगानुपात का विवरण प्रचारित किया जायेगा.
स्कीम को सफल बनाने के लिये निम्नलिखित उपाय अपनाने की जरुरत है -
-लिंग जांच (सोनोग्राफी) पर रोक,
-लड़कियों के जन्म पर उत्सव मनाने की जरुरत,
-अभियान को केवल लड़की केंदित नहीं बनाया जाना चाहिये,इससे पुरुषों को भी जोड़ने की जरुरत है,
-इसे जनअभियान के रुप में अपनाने के लिये प्रोत्साहित करने की जरुरत है.
      

Sunday, 26 April 2015

22 अप्रैल,2015 : गजेन्द्र की मौत भी बहुत कुछ कहती है

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

यह दिन भारतीय संसदीय जनतांत्रिक राजनीति की पराजय के एक दिन के रुप में याद रखा जायेगा.
जब गजेंद्र सिंह नाम के एक किसान ने जंतर-मंतर पर आत्महत्या कर ली.लगने लगा है कि आज भारत में किसी की अवाज तभी सुनी जाती है - जब वह खुद नाटक बन जाये.भारत के राजनीति से ये उम्मीद कतई नहीं थी,जो राजनीति को बदलने आये थे खुद अपनी पार्टी की साख बचाते नजर आये.
अगर गजेंद्र सिंह के विरासत पर ध्यान दिया जाये तो वह अन्य किसानों से काफ़ी अच्छी ज़िंदगी जी रहा था,अपने खेतों में भी मजदुरी जैसा काम नहीं करता था और जो फ़सल की बर्बादी हुयी थी वह भी मात्र 20-25% ही थी.उसकी मिल्कियत 40 बिघा की बतायी जा रही है.जब ऐसे किसान आत्महत्या करने के लिये मजबूर हो जाते हैं तो बाकी किसानों का क्या होता होगा जिनके पास अपनी ज़मीन भी नहीं है और जो खेतिहर मजदुरी के साथ साथ पट्टे पर जमीन ले खेती करते है.
                   1.
किसानों कीआत्महत्या के बढते आंकड़े से  भी राजनीतिक दल को चेतना नहीं आयी है कि वे विदर्भ में,पंजाब में,राजस्थान में किसानों के बीच जायें और यकीन दिलायें की संघर्ष ही रास्ता है,आत्महत्या से संघर्ष को बल नहीं मिलता.
परंतु राजनीतिक दल अपने उस मुल कर्तव्य को भुल गये है जो उनका आधार होता है, वह है - लोगों को शिक्षित करना,उनमें जनतांत्रीक भावना को लाना.
जनतंत्र सिर्फ चुनाव जितने से नहीं चलता,संसद के मुकाबले वह सड़क पर आकार लेता है.
                        2.
आत्महत्या सामूहिक निर्णय का मामला नहीं लेकिन संघर्ष है.लेकिन अभी संघर्ष सामूहिकता का निर्माण नहीं रहा, क्यों ?
आमतौर पर मृत्यु आदमी के भीतर की इंसानियत को जगा देती है.सामने मृत को देखकर हम खामोश हो जाते है.मौत हमें हमारे रोजमर्रा के छोटेपन से मुक्त होने में मदद करती है.हम अपने घोर दुश्मन के मौत पर भी मौन हो जाते हैं.
लेकिन क्या कारण रहा कि गोधरा में ट्रेन में मारे गये लोगों के बाद हम खामोश नहीं रहे,एक जुलूस बनकर निकल पड़े.
   by - suresh kumar pandey

Saturday, 25 April 2015

भूकंप : एक विश्लेषण

हाल में ही नेपाल और भारत के कुछ हिस्सों में भूकंप के बड़े झटकों द्वारा काफ़ी तबाही मचायी गयी,संभावना अभी भी बनी हुयी है.
इन झटकों के बाद नेपाल में 1800 से ज्यादा लोगों की मौत हो गयी है,वहीं भारत में भी मरने वालों की तदात 50 के पार चली गयी है.भारत में सबसे ज्यादा मौतें बिहार में हुयी है खासकर उन इलाकों में जो नेपाल से सटे हुये है.
भूकंप क्या है ?
भूकंप भुपटल की कंपन या लहर है जो धरातल के नीचे अथवा उपर चट्टानों के लचीलेपन या गुरुत्वाकर्षण की समस्थिति में थोड़े समय के लिये अव्यवस्था होने से उत्पन्न होती है. (An earthquake is a vibration or oscilation of the surface of the earth,caused by a transient disturbance of the elastic or gravitational equilibrium of the rocks at or beneath the surface - A.N.Strahler.)
ईस अव्यवस्था के फलस्वरुप भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है.ये ऊर्जा तरंगें सभी दिशाओं में गतिमान होती है.
वह स्थान जहां से ऊर्जा निकलती है वह  भूकंप का फोकस(focus,उदगम केन्द्र ) कहलाता है.इसे अवकेन्द्र(hypocentre) भी कहा जाता है.ये तरंगें अलग अलग दिशाओं में चलती हुयी पृथ्वी के सतह पर पहुंचती है.भूतल पर वह बिंदु जो फोकस के समीपतम होता है,अधिकेंद्र(epicentre) कहलाता है.यहीं पर सबसे पहले तरंगों को महसूस किया जाता है,यह फोकस के ठिक उपर समकोण पर होता है.
भूकंप आने के कारण -
पृथ्वी के अंदर कई प्रकार की प्लेटे होती है जो संचरन करती रहती है.मूल रुप से भूकंप का कारण इन प्लेटो के बीच की समस्थिति(equilibrium) में हुये अचानक बदलाव होता है.
इन प्लेट संचरन के फलस्वरुप तीन प्रकार की प्लेट सीमायें बनती है -
1.अपसारी सीमा (divergent boundaries) - जब प्लेटे एक दूसरे से विपरित दिशा में अलग हटती है.
2.अभिसरण सीमा (convergent boundaries) - जब एक प्लेट दूसरे प्लेट के नीचे धंसती है और जहां भूपर्पटी(crust) नष्ट होती है.
3.रुपांतर सीमा(transform boundaries) - जहां न तो नई पर्पटी का निर्माण होता है और न विनाश होता है.ये प्लेट एक दूसरे के साथ सरक जाती है.
इसके अलावा भी भूकंप आने के कई कारण है - 
1.ज्वालामुखी क्रिया (volcano)
2.भूपटल भ्रंश (faulting)
3.भूसंतुलन में अव्यवस्था (isostatic disturvance)
4.प्लेट टेक्तानिक सिद्धांत (plate tectonic theory)

हिमालय क्षेत्र में ज्यादा भूकंप क्यों आते हैं ?
जहां पर आज हिमालय है वहां काफ़ी समय पहले टेथिस नाम का एक समुद्र हुया करता था.दो प्लेतों के तकराने के फलस्वरुप वहां आज के हिमालय का निर्माण हुया.
चुकी ईस पूरे क्षेत्र में पर्वत निर्माण की प्रक्रिया अभी तक पुरी नहीं हो पायी है,ईसकारण यहां संतुलन की प्रक्रिया अभी पुरी नहीं हुयी है.ईस अस्थरता और अव्यवस्था के कारण ईस क्षेत्र में विनाशकारी भूकंप आते रहते है.यह भारत का सबसे बड़ भूकंप क्षेत्र है.
प्लेट संचरण के दृष्टिकोण से देखा जाये तो कारण है - एशियन और भारतीय प्लेट के टकराव,इन प्लेटो को टकराने के बाद सीमायें टूटती है और भारी मात्रा में ऊर्जा बाहर निकलती है.

भूकंप का वितरण -
1.प्रशांत महासागरीय तटीय पेटी( Circum pacific Belt )
2.मध्य महाद्विपीय पेटी (Mediterrian belt)

ये वे क्षेत्र है जो भूकंप के लिये काफ़ी संवेदनशील है.

भूकंपीय आपदा से होने वाले प्रभाव -
1.भूमी का हिलना,
2.धरातलीय विसंगती,
3.भू-स्खलन,
4.धरातल का एक तरफ़ झुकना,
5.हिमस्खलन,
6बांध के टूटने से बाढ,
7.आग लगना,
8.जान माल की हानि,
9.इमारतों का टूटना,
10.सुनामी (सबसे खतरनाक प्रभाव,अगर epicentre समुद्र में हो)

क्या करें,जब भूकंप आ जाये -
1.घबड़ाये नहीं,और तेजी से न भागे,
2.उंच्ची इमारत,पेड़,बिजली के खंभे आदि से दुर रहे,
3.अगर उपर की इमारत में है तो लिफ़्ट का इस्तेमाल न करें,
4.अगर घर,maal,आदि से निकलना संभव न हो तो कमरे के कोनों में चले जाये और मजबूत चीज को पकड़ ले या table के नीचे छिप जायें.


conclusion -
अभी आने वाले भूकंप के झटके , कल आये भूकंप का बाहरी प्रभाव है.अब आने वाले झटके की तीव्रता कल से कम होगी.इसका मुल कारण है - पृथ्वी से भारी मात्रा में ऊर्जा निकली है और उसका प्रभाव ईस क्षेत्र में दिख रहा है.घबराने की जरुरत नहीं है क्योंकि अब ज्यादा नुकसान होने की संभावना कम है.

ये बात तय हो चुकी है कि अब आने वाले दशकों तक ईस तरह की भूकंप ईस क्षेत्र में नहीं आयेंगे.क्योंकि इससे पहले ईस क्षेत्र में 1934 में झटके महसूस किये गये थे.इतने दिनों बाद यह एक है (80साल बाद)

By - suresh kumar pandey

Friday, 24 April 2015

जब 'आप' अंधेरे से घिरी है तो दिखायी कैसे देगा ?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

दिल्ली चुनाव तक किसी ने किसी का मुखौटा नहीं उतारा.सत्ता मिलते ही अपने पसंद की मुखौटों को अपने पास रखकर,हर किसी ने हर चेहरे से मुखौटा उतारना शुरू कर दिया,फ़िर "आम आदमी पार्टी" का चेहरा बचेगा कहां से ?
लेकिन मुखौटा उतरने के दौर में ये सच उघरने लगे कि " जिन लोगों को केजरिवाल पहले कटघरे में खड़े कर रहे थे,उन्हीं के साथ मौजुदा आप नेताओं के ताल्लुकात रहे हैं "
यह सवाल इसलिये भी बड़ा है कि दिल्ली में सत्ता चलाने वालों में खोजी रहे आशीष खेतान दूसरे नंबर के खिलाड़ी बन चुके हैं.याराना पुंजीवाद(crony capitalism) और paid news को कैसे आजमाया जगजाहीर है,जो अब प्रशांत भुषण के PIL का हिस्सा बन चुका है.
क्या अब मान लिया जाये कि
- उसुलों की ध्वजधारी आप के लिये सत्ता जीवन-मरण का सवाल बन चुका है/था?
- या फ़िर आप एक ऐसी उम्मीद की हवा में बह रही थी,जहां जनता का मोहभंग सत्ता से हो रहा था और उसे हर बुराई को छुपाते हुये आप के धुरंधर सियासी सेवक (राजनीतिक सेवक) लग रहे थे.
लेकिन ईस पुरी घटनाक्रम से स्पष्ट हो चुका है कि "सत्ता का मतलब सियासत साधना है " और केजरिवाल ने इसका बखुबी अंजाम दिया है.
अगर राजनीति से उपर उठकर सोचे - "आप एक ऐसा प्रयोग था जो भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ था,एक तरफ़ संघर्ष करने वालों की कतार लंबी थी तो दूसरी तरफ़ बौद्धिक व्यक्तित्व वालों में भी जोश था.लेकिन इन सभी के केंद्र में केजरिवाल ही थे.यह एक ऐसा मिलन था जिसे अधिकांस ने स्वीकार किया था और ऐसा लगने लगा था कि राजनीति बदलने वाली है."
परंतु एक ही झटके में सारे सपने चकनाचुर हो गये हैं.सत्ता के खेल ने ऐसी पलटी मारा है कि प्रशांत , योगेंद्र सहित अन्य कई को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.
परिणाम सभी के सामने आ गयी और आप "नौटंकी करने वालों की पार्टी" बनकर रह गयी.
   by - suresh kumar pandey

Wednesday, 22 April 2015

गांधी आलोचना कितना सही ?

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

आज हम ऐसे युग में जी रहे है,जहां लोग किसी खास व्यक्ति के बहुमूल्य योगदानों को भूलकर उसके कुछ गलतियों के कारण आलोचना करने लगते है लेकिन सच्चाई कुछ और होता है.
पहली बात ध्यान देने योग्य यह है कि जिस काम को समाज द्वारा गलती माना जा रहा है,उसकी वास्तविक्ता क्या है?
मुलतः भारत में गांधी की आलोचना दो बातों पर की जाती है,कई और भी वजहें हो सकती है.लेकिन मैं इन दो मुद्दों पर ही ध्यान केन्द्रित करुंगा,जो है
1.भगत सिंह की मामला और
2.विभाजन के समय मुसलमानों के पक्ष में अनशन(भूख हड़ताल )
          
                             1
भगत सिंह की फांसी का कारण लोगों द्वारा गांधी को माना जाता है कि इन्होनों सिंह को छुड़ाने का कोई प्रयास नहीं किया और ब्रिटिश सरकार ने एक दिन पहले (23march,1931) फांसी दे दी जो 24 march को प्रस्तावित था.
अगर आधुनिक शोधों की बात करें तो यह स्पष्ट हो चुका है कि गांधी जी ने भगत सिंह के मामले में चिठ्ठी लिखी थी जो अंग्रेज दस्तावेजों में आज भी सुरक्षित है.
 अंग्रेज गांधी से भयभीत थे कि कहीं फ़िर वे अनशन शुरू न कर दे और इसलिये इन्होनों महात्मा के पत्र का उत्तर देने से पूर्व ही फांसी दे दी.
यहां एक और पहलु से पर्दा हटाने का वक्त आ गया है,जो है
जब भारत को आजादी मिली उस समय समाजवादियों का प्रभाव काफ़ी ज्यादा था चाहे वह संसद हो या इतिहासकार.यहा तक कि पंडित नेहरू का व्यक्तित्व भी समाजवादी ही था.इन्होनों भारत के इतिहास लेखन काम उन इतिहासकारों को सौंपा जो कट्टर समाजवादी थे.इनमें विपिन चंद्र,रोमिला थापर जैसे इतिहासकार प्रमुख थे.थापर ने तो यह स्पष्ट लिखा है कि मुगल काल में धर्म के नाम पर कोई मंदिर नहीं तोड़ा गया,क्या यह सही है ?
दूसरी बात जिसपर ध्यान देना बहुत जरुरी है.भगत सिंह जिनका रुझान भी वामपंथी था और समाजवादी विचारधारा से काफ़ी प्रभावित थे.वे इतिहासकार जिनको आजादी के बाद इतिहास लिखने का काम सौंपा गया सभी ने अपनी समाजवादी रुझान के कारण बिना मतलब का भगत सिंह का महिमामंडन करकर गांधी के विचारों को तिलांजली देने नाकाम कोशिश की.ये बात सभी जानते है जो विचारधारा से थोड़ा भी तालुक रखते होंगे कि वामपंथी गांधी को किस नजरिये से देखते हैं.इसमें थोरा भी इज्जत का भाव नहीं रहता.
                         2
भारत का समाज हिंदू बहुसंख्यक है और भारत की साक्षरता दर को सभी जानते हैं अगर हम 'दुनिया के एक खास सख्स एडोल्फ हिटलर' के बातों को याद करें तो स्पष्ट हो जाता है,जो है " समाज के बड़े तबके को बेवकूफ़ बनाना ज्यादा आसान है  किसी व्यक्ति विशेष के अपेक्षा "
ठिक हु-ब-हु ऐसा ही हुया भारत में ,और महात्मा गांधी का गलत प्रचार किया गया कि वो हिंदुओं के खिलाफ़ भुख हड़ताल कर रहे हैं.जबकि सच्चाई ये था कि वे जिस भारत को बनाने में अपनी ज़िंदगी गुजार दी और अपने तरिकों "सत्य,अहिंसा और सत्याग्रह " के माध्यम से 15 अगस्त,1947 को भाग्यवधू से मिलन करवाये ,आज वहीं भारत खुन की होली खेले ,यह उन्हें कतई मंजूर नहीं था.
वह अनशन किसी के खिलाफ़ या पक्ष में नहीं था बल्कि अपनी सिद्धांतों के लिये था,एक मजबुत भारत के निर्माण के लिये था ,भाईचारे के लिये था और उस सोच को कायम रखने के लिये था जिसे दशकों से हम उपयोग करते आ रहे थे (1915 - 1948) लेकिन अपने जेहन में उतार नहीं पाये थे.
अतः इन दो मामलों को लेकर की जा रही गांधी आलोचना बिल्कुल सही नहीं है.
          by - suresh kumar pandey

'गोडसे' शब्द अब असंसदीय नहीं रहा

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

1948 में नाथूराम गोडसे नेमहात्मा गांधी की हत्या कर दी थी.जिस कारण 1956 में उपसभापति सरदार हुकुम सिंह के निर्देश पर ईस शब्द पर पाबन्दी लगी थी.उन्होनों यह आदेश तब दिया था जब राज्य पुनर्गठन बिल पर बहस के दौरान दो सांसदों ने नाथूराम गोडसे का महिमामंडन किया था.हाल ही में जब संसद के शीत सत्र में माकपा नेता पी राजीव ने हिंदू महासभा द्वारा नाथूराम गोडसे की प्रतिमा स्थापित करने का मामला उठाया तो राज्यसभा के उपसभापति पीजे कुरियन ने
गोडसे शब्द को असंसदीय होने की बात कही थी.जिसकारण शिवसेना सांसद हेमंत तुकाराम गोडसे काफ़ी आहत हुये थे.इन्होंने लोकसभाध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर खेद जताया था.
महाराष्ट्र के एक खास इलाके में ईस समुदाय की संख्या ज्यादा है जो अपने आप को अपमानित महशुस कर रहे थे.
लेकिन अब लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने यह व्यवस्था दी है कि ' नाथूराम गोडसे ' के बारे में उल्लेख को छोड़कर ' गोडसे ' शब्द अब असंसदीय नहीं है.

Tuesday, 21 April 2015

Net neutrality (नेट निरपेक्षता ) :एक विश्लेषण :-

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

भारत में इन दिनों यह बहस का मुद्दा बना हुया है.मिडिया भी इसको लेकर काफ़ी सक्रिय नजर आयी,जो एक अच्छी पहल है."net neutrality" शब्द को चर्चा में रहने के दो कारण हैं -
a)एयरटेल द्वारा 'एयरटेल ज़ीरो' का प्रस्ताव लाना.जिसको लेकर लोग अपनी विरोध TRAI के सामने दर्ज करा रहे हैं और माध्यम बना - email,sms और पत्र.दबाव में आकर 'फ्लिपकार्ट' ने एयरटेल ज़ीरो से नाता भी तोड़ लिया जो online व्यापार करती है.
b)दूसरा कारण है - भारतीय दुरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) द्वारा इसी साल march के आखिर में ' over the top servive ' पर एक चर्चा पेश की थी.
Net neutrality क्या है -
'एयरटेल ज़ीरो' द्वारा जो प्रस्ताव लाया गया था, उसके तहत उपभोक्ताओं को 'डाटा पैक ' के लिये तय समय सीमा तक पैसा अदा करने के बाद उन websites के उपयोग के लिये अलग से पैसा देना पड़ता,जो कंपनी के करार के दायरे में नहीं.
इसको हम निम्नलिखित उदाहरण से समझ सकते है - फ्लिपकार्ट का जो समझौता एयरटेल से था,उसके कारण किसी उपभोक्ता द्वारा उसकी सुविधा उसके डाटा पैक में गिनी जायेगी .लेकिन अगर वह किसी दूसरे website का यूज करते हैं तो उन्हें अलग से रकम अदा करनी होती या उसकी बेहद धीमी गति से समझौता करना पड़ता.
इससे Net neutrality का अर्थ निकलता है - Internate पर मौजूद सारी websites और सामाग्री का एक ही शुल्क में इस्तेमाल करना.
Net neutrality के पक्ष में तर्क -
1.यह एक बंदिश है,जिसमें खास अवधि और डाटा के लिये रकम चुकाने के बावजूद इंटरनेट उपयोग के लिये कोई उपभोक्ता संबंधित कंपनी के रहमोकरम पर निर्भर हो जाये.एक तरफ़ कंपनी डाटा पैक के लिये उपभोक्ता से कीमत वसुलती है और फ़िर किसी वेबसाइट कंपनी से सौदा करती है.जो दोहरी मुनाफा को दिखाता है.
2.अमेरिका,ब्राजील और नीदरलैंड जैसे कई देशों में "Net neutrality" लागू है.
3.कई तरह की बुनियादि जानकारी आज बहुत जल्द इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त हो जाती है,जैसे - educational sites,social media,recepee site,blogs,you tube video,free app site,online marketing,result,online shopping,online chatting,talking.
ये सभी जरुरतें आज इंसान का अंग बन गया है.अगर अलग से कोई कीमत ली जाती है तो उपभोक्ताओं पर बोझ काफ़ी बढ जायेगा.
Net neutrality के खिलाफ़  तर्क -
1.टेलीकाम कंपनी ने दलील दी है कि Skype,whats app,massenger जैसे नई तकनीक की वजह से इंटरनेट के जरिये बात करने या संदेश भेजने के चलते उनके व्यवसाय पर काफ़ी नकरात्मक असर पड़ा है.
2.European union का मानना है कि Net neutrality बुनियादि सुविधाओं में निवेश को बाधित करती है.
3.Net neutraliry को अस्वीकार करने वालों लोगों का ये भी कहना है कि "टेलीकाम क्षेत्र में अगर अलग-अलग मूल्य की व्यवस्था पहले से ही लागू है.केबल सेवा में भी यह लागू है.अंतराषट्रीय call महंगी है,तो फ़िर डाटा के लिये ऐसा क्यों न हो?इसके अलावा इसके बुनियादि ढाँचा में निवेश को भी प्रोत्साहन मिलेगा.
अगर लाभ-हानि से उपर उठकर सोचे तो कई प्रश्न सामने आते हैं -
1.केबल सेवाओं में हमें Neutrality की जवाबदेही क्यों निभानी है ?जब Net neutrality पर बहस के लिये तैयार हैं तो केबल सेवाओं पर क्यों थोपा जा रहा है?
2.अगर application(ऐप) के पहुंच से एकाधिकार पैदा होती है तो neutrality समाप्त करना उचित नहीं है क्या ?
3.DTH के तर्ज पर प्राथमिकता वाली पहुंच का विचार कैसा है ?
निष्कर्ष (conclusion) -
1.ये बात सही है कि 2013 की तुलना में 2014 में डाटा उपयोग दुगुनी हुयी है.लोग skype,whats app आदि का उपयोग कर रहे हैं.लेकिन एक सर्वे से मालूम चला है कि नेटवर्क प्रोबलम के कारण आवाज का सही तरीके से नहीं आने के चलते और बिच में ही disconnect हो जाने के कारण लोग फ़िर से वापस call पर लौट रहे है.
2.हमारे यहां इंटरनेट की गति से लेकर इसके लिये वसूली जाने वाली राशि तक के मामलों में शिकायतें छिपी हुयी है.
3.नेट का केबल के साथ तुलना करने का कोई औचित्य नहीं है.केबल सेवा प्रदाताओं की संख्या ज्यादा नहीं है इसके उलट net neutraliry खत्म होने के बाद उपभोक्ताओं पर लागत का बोझ बहुत अधिक पड़गा.
इसके अलावा इंटरनेट पर मौजूद सूचना भी प्रसारकों और चैनलों की तुलना में बहुत ज्यादा है. ये सभी वजहें इंटरनेट को खुला और मुक्त रखने के लिये पर्याप्त है.
          

Saturday, 18 April 2015

2. National Integration

The policy of divide and rule was adopted by the British in India as they wanted to manage and manipulate Indians to suit their political ends. They created a communal mind in India-Hindus,Muslims,Christians and Sikhs lived like brothers before the British came to India. The British planted the seed of separatism on the basis of language,religion and caste. Soon the Hindu began to feel different from his Muslim neighbour and this often led to a tendency to compare each other in terms of benefits from the government.
when India earned her Independence,she was able to drive away the British is but the damage done by them is almost permanent.They have managed to change the psyche of the Indian to such an extent that even today people belonging to different religions are struggling to be one up on the other.
Today the task before Indians is to unite India again.Political leaders have been harping on the need for national integration time and again.India has been declared a secular state in which all religions are encouraged and an Indian can follow any faith that he feels convinced by.
India is a country with myriad languges,cultures and religions.However,if we remain united we can overcome any sort of aggression from any quarter of world.The motto:-"united we stand,divided we fall" should always be remembered.Unfortunately,today India is burning with problems of communalism,regionalism,myltilinguism etc.Very few Indians think of themselves as Indians first and Hindus,Muslims or Christians later.This attitude has to be discouraged.
The political leaders today have continued the policy of the British and to secure their own seats in the elections they too manipulate sections of the society to their own advantage.They spread hatred between various communities and then support one of them as though they have become their messiahas.Communal riots have become a community and try to their advantage.
They support the members of any one community and try to influence them to create trouble in India.They supply arms and train some innocent Indians for their own motives they cannot see India strong and prosperous.They feel threatened and want to break us by encouraging this separatist consciousness.
We as Indians need to overcome these petty differences of caste,creed,religion,language and always remember that we are Indians first and we must be proud of our identity as Indians
              by - SHITA SHAH

इतिहास की समझ - 3, "घर वापसी जिसने बदल दी भारत की इतिहास"

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

1915 में एक भारतीय बैरिस्टर ने दक्षिण अफ़्रीका के अपने करियर को त्याग अपने देश वापस आने का फ़ैसला किया.जब मोहनदास करमचंद गांधी मुंबई के अपोलो बंदरगाह में उतरे तो न वो महात्मा थे और न ही बापू.फिर भी न जाने क्यों बहुतों को उम्मीद थी कि ये शख़्स अपने ग़ैर-परंपरागत तरीकों से भारत को अंग्रेज़ों की ग़ुलामी से आज़ाद करा लेगा.उन्होंने भारतवासियों को निराश नहीं किया. इसे इतिहास की विडंबना ही कहा जाएगा कि जब गांधी भारत लौटे तो एक समारोह में उनका स्वागत किया था बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने.दोनों बाद में अपने अपने देश के राष्ट्रपिता काहलाये.
एक स्वागत समारोह की अध्यक्षता फ़िरोज़ शाह मेहता ने की थी तो दूसरे समारोह में एक साल पहले जेल से छूट कर आए बाल गंगाधर तिलक मौजूद थे.
एक समारोह में जब गांधी की तारीफ़ों के पुल बांधे जा रहे थे तो उन्होंने बहुत विनम्रता से कहा था, "भारत के लोगों को शायद मेरी असफलताओं के बारे में पता नहीं है. आपको मेरी सफलताओं के ही समाचार मिले हैं. लेकिन अब मैं भारत में हूं तो लोगों को प्रत्यक्ष रूप से मेरे दोष भी देखने को मिलेंगें. मैं उम्मीद करता हूं कि आप मेरी ग़लतियों को नज़रअंदाज़ करेंगे. अपनी तरफ़ से एक साधारण सेवक की तरह मैं मातृभूमि की सेवा के लिए समर्पित हूं."
इसके बाद गांधी ने गोखले की सलाह का पालन करते हुए पहले भारत के लोगों को जानने की कोशिश शुरू की. उन्होंने तय किया कि वो पूरे भारत का भ्रमण करेंगे और वो भी भीड़ से भरे तीसरे दर्जे के रेल के डिब्बे से.
गांधी के एक और जीवनीकार लुई फ़िशर लिखते हैं कि लोगों के छूने से उनके पैर और पिंडली इतनी खुरच जाती थी कि वहां पर गांधी के सहायकों को वैसलीन लगानी पड़ती थी.
बाद में उनकी अंग्रेज़ साथी मेडलीन स्लेड ने, जिन्हें गांधी मीराबेन कहा करते थे ने कुछ पत्रकारों को बताया कि वो खुद गांधी के पैरों को हर रात शैंपू से धोया करती थीं.
भारत में गांधी के प्रयोग और आंदोलन :-
1.1916 के कांग्रेस अधिवेशन में वो पहली बार जवाहरलाल नेहरू से मिले. वहीं बिहार से राज कुमार शुक्ल आए हुए थे.
उन्होंने गांधी को चंपारण के नील पैदा करने वाले किसानों की व्यथा बताई और किसी तरह उन्हें वहां आने के लिए राज़ी कर लिया.
यह उनका भारत में सत्याग्रह से संबंधित पहला प्रयोग था.जिसे 1917 के चंपारण सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है.यह प्रयोग सफल हुया और अंग्रेजों को तीनकठिया प्रथा को समाप्त करना पड़ा.
2.इसके साथ ही इनके प्रयोग का सिलसिला भारत में चल पड़ा.1918 में गांधी ने मिल मजदूरों के हड़ताल के समर्थन में भूख हड़ताल की और खेड़ा में "कर नहीं आंदोलन "चलाया.
3.अंग्रेजों द्वारा 19 march,1919 को रौलट एक्ट लागू किया गया,इसके तहत किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जा सकता था लेकिन इन्हें बचाव का कोई अधिकार नहीं था.इसके विरोध में 6 april ,1919 को गांधी ने देशव्यापी हड़ताल करवायी.13 April,1919 को जालियाँवाला बाग कांड हुया.1000 से ज्यादा लोग मारे गये और गांधी ने " कैसर-ए-हिंद" की उपाधी लौटा दी.परंतु अंग्रेज झुकते नजर नहीं आ रहे थे फलस्वरुप इन्होनों 1 august,1920 को असहयोग आंदोलन प्रारम्भ किया.
4.अब आंदोलन की एक सिलसिला सी चल पड़ी.सविनय आंदोलन,भारत छोड़ों आंदोलन और इनकी आमरण अनशन ने भारत को भाग्य वधू से मिलन 15 august,1947 को करवा दिया.
1915 में इनके भारत आगमन और कांग्रेस से जुड़ने के बाद पुरी भारत का इतिहास ही अपनी करवट बदल ली.चारों तरफ़ गांधी की धूम मच गयी और लोग इन्हें मशीहा समझने लगे.
गांधी से संबंधित एक विवाद जो पूरे भारत में प्रचलित है - इन्होनों ने भगत सिंह को बचाने का कोई प्रयास नहीं किया.जिस कारण इनको निर्धारित तिथि से पूर्व ही फांसी दे दी गयी.यह तथ्य अब भी ब्रिटिश राज्य के दस्तावेजों में मौजूद है कि वे गांधी से भयभीत थे कि कहीं फ़िर वे अनशन शुरू न कर दे और इसलिये इन्होनों महात्मा के पत्र का उत्तर देने से पूर्व ही फांसी दे दी.
अगर प्रो. इरफान हबीब के बातों पर गौर किया जाये तो ,"गांधी इतिहास का विषय नहीं है."
अंत में हम गांधी के ही विचार को बतायेंगे जो उन्होनों अपनी पुस्तक " my experiments with truth (1929)" में कहा है - "गांधीवाद नाम की किसी विचारधारा का कोई अस्तित्व नहीं है,यह कोई वाद नहीं है बल्कि जीवन का एक अंग है."
हम गांधी को तब तक नहीं समझ सकेंगे जब तक गांधीवाद के तरीकों को अपने जीवन में नहीं उतारेंगे और उसपर अमल नहीं करेंगे.
source - 1.Political thought - Jp sud,op gauba
            2.modern india - Vipin chandra,sumit sarkar,ncert
           3.freedom struggle - Vipin chandra
            4.bbc,jansatta hindi news paper
next blog coming soon on
"गांधीवाद की आज के समय में प्रासंगिकता "
          By - सुरेश कुमार पान्डेय (suresh kumar pandey)

" मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है - अरस्तु " का अभीप्राय :-

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

युनानी नगर-राज्य(city-state) की गहरी छाप युनानियों के चिन्तन पर पड़ी है.यह आज के नगर से पुरी तरह भिन्न है.आज का नगर एक भौगोलिक इकाई है जबकि इसके ठीक विपरीत युनानी नगर-राज्य एक सामाजिक इकाई था.इसका एक सामान्य लक्ष्य और जीवन था.वहाँ के निवासी एक दूसरे के सामाजिक जीवन में भागीदार थे और उनमें एक प्रकार का सौहार्द्र था.
बार्कर के शब्दों में , " यह एक सामान्य जीवन का स्थान था.यह विभिन्न वर्गों का संघ था."(वर्ग - Class को समझना बहुत जरुरी है,जो आर्थिक स्थिति पर आधारित है न कि जातिगत)
आधुनिक नगर-राज्य केवल व्यापार और उद्योग-धन्धों के केंद्र हैं इनका कृषि से कोई संबंध नहीं है, जबकि युनानी नगर-राज्य में व्यापार,उद्योग,शिल्प-कला तथा कृषि सभी कुछ का समावेश था.
युनानी नगर-राज्य की जनसंख्या भी सीमित थी.प्लेटो ने 5040 रखने की सुझाव दी है तो वही अरस्तु ने 10000.
अरस्तु के विचार से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि राज्य में ही नागरिकों का समग्र सामुहिक जीवन निहित था,राज्य के बाहर तो नागरिकों की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी.
वहां धर्म एक सार्वजनिक कर्तव्य था और राज्य का अभिन्न अंग था.इसे धार्मिक उत्सव के रुप में नागरिक स्तर पर मनाया जाता था.जिसकि पुष्टी बार्कर ने अपनी किताब 'greek political theory ' में किये हैं.ईस पुस्तक का आदि वाक्य है - " राजनीतिक चिन्तन के जन्मदाता युनानी हैं.इसका मूल स्त्रोत युनानी मस्तिष्क का शांत एवं स्पष्ट बुद्धिवाद है."
उपर्युक्त सत्य को यह कहकर भी अभीव्यक्त किया जाता है कि " मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है." अर्थात सामाजिक जीवन से अलग और स्वतंत्र मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती.मनुष्य अपनी मानवता का विकास समाज में रहकर ही कर सकता है.समाज का सदस्य रहकर ही वह जीवित रह सकता है.समाज में ही वह जन्म लेता है,समाज ही उसका पालन पोषण करता है,समाज ही वह सामग्री और परिस्थितियाँ जुताता है जो उसके विकास के लिये परमाआवश्यक है.
अंत में हम कह सकते हैं - जीवन और राजनीति में वहाँ इतनी घनिष्ठता थी कि अरस्तु को कहना पड़ा - " मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है. " जिसका अभीप्राय था - "मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है."
       source -1.history of political thought - Jp sud
        2.western political thought - O p Gauba
      3.IGNOU STUDY MATERIAL
        BY - SURESH KUMAR PANDEY

Friday, 17 April 2015

कृषि ऋण की समस्या और समाधान

सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए

पिछले एक दशक में कृषि के लिये संस्थागत ऋण में काफ़ी तेजी आयी है लेकिन इसका लाभ किसानों को नहीं मिला है.ईस लाभ को उन लोगों ने उठाया है जो कृषि संबंधी गतिविधियों से जुड़े है अर्थात कृषि कारोबारी और कंपनी.
यह, आरबीआई(RBI) के आंकणों पर TATA INSTITUTE OF SOCIAL SCIENCE के शोध से प्रमाणित हो जाता है.इस शोध में पाया गया है-
1.कुल कृषि ऋण का 30% से भी कम बैंको के ग्रामिण शाखाओं द्वारा दिया जाता है जबकि शेष 70% ऋण माहानगरीय और शहरी शाखाओ द्वारा दिया जाता है.
2.कई ऋण का आकार तो 1 करोड़ से भी ज्यादा है लेकिन इनकी पहुंच उन सीमांत किसानों तक नहीं है जिनके पास एक हेक्टेयर से भी कम जमीन है.
यह तथ्य Dec 2013 में आया NSSO के ऋण और निवेश सर्वेक्षण संबंधी रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो जाता है.इसके अनुसार ग्रामीण परिवारों के कुल बकाया ऋणों का 44% असंगठित क्षेत्र के हैं और बाकी 33% साहुकारों से लिया गया ऋण है.
देश के 80% छोटे और सीमांत किसान आज भी वित्तीय जरुरतों के लिये असंगठित क्षेत्र के पास जाने को मजबूर है.
भारत में कृषि ऋण के दो स्त्रोत है-
a)गैर संस्थागत स्त्रोत - साहुकार,जमींदार,बड़े व्यवसायी आदि
b)संस्थागत स्त्रोत - वाणिज्यिक बैंक,सहकारी बैंक,सरकारी बैंक आदि
लेकिन आज भी अधिकांश किसान गैर संस्थागत स्त्रोत पर ही निर्भर है.इसका मुख्य कारण है बैंकों का ग्रामीण क्षेत्र तक विस्तार का न होना.
सरकार और आरबीआई(RBI) द्वारा इन  परेशानियों को दुर करने के लिये कई कदम उठाये गये हैं -
1. कृषि क्षेत्र के संस्थागत ऋण में वर्ष 2004 से ही तेजी देखने को मिली है जब यूपीए सरकार ने 3 वर्षों में उसे बढाकर दोगुना करने का फ़ैसला किया.यह लक्ष्य तो हासिल हो गया लेकिन कृषि ऋण के लिये वार्षिक लक्ष्य हर साल बढता गया.2015-16 में तो यह 8.5 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को छू गया.(economic survey 2015-16)
2. 2012 में RBI ने यह निर्देश दिया है कि बैंको द्वारा दिये जाने वाले कुल ऋण का 4.5% कृषि क्षेत्र को दिया जायेगा.
3.सरकार द्वारा ये भी कहा गया है कि जो किसान समय पर अपने ऋण का भुगतान कर देंगे उन्हें 3% की रियायत वार्षिक दर में मिलेगी.
4.सरकार द्वारा KCC SCHEME(किसान क्रेडिट कार्ड योजना) को 1998 से चलाया गया है,जिसके तहत किसानों को वाणिज्यिक बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक  से ऋण उपलब्ध कराया जाता है.

Thursday, 16 April 2015

1. Understanding of history

A  person who hates history, can never create history-Ishita shah
  Every time history is like a debate topic,mainaly to get it in mind.Due to that we dont get the real meaning of the word,many people,students and most importantly comman people take different n various contravention decision in their life.
Few days before one of my friend got angry by another person on saying'denominational' to 'Bal Gangadhar Tilak', but this thing should be take in consider that What is the basic or real meaning behind this statement said by him?
History of History :-
    It feels weird or strange to hear this but,it has very important place to study any important topic.
   Every subject,every topic and everything have their own different history behind it.If we see the taughts of 'freeman',we got the direct relation between the history and politics."History is the politics of past,politics is the history of present".
   On the subject of Revolution,aristotle's thinking was considerd idol by many people and on the basis of this only new laws are formed.
The thinking or thoughts of 'karl maxs' and 'mur'on revolution is like the cherry on the top.The real meaning of history was found in the thinking of 'marx',his historical materialism had given the another face to history even it has a story behind it.
     In todays world to write history is the biggest problem.The main thing of 'socialist' and 'historian' person is that to write history as it is,like a elite class people use to do.
If we started thinking n writing history frm base then we can analyse the importance and hardwork of poor farmers n workers/labours
There is one basic fault/default in Indian History Writing,in between soft and hard community their is nt any justice to the contribution of unknown community.When we try to understand history their are various puzzled problem which came into existance
1.Meaning of words-
      Meaning of words changes according to time and people started taking the various meaning of the same word.For example-'Hindu' word was firstly used by the 'Iranian people' for the people who lives on the bank of river 'Indus', but later the meaning changed of this word and a religious meaning was accepted.The word 'Hindustan' was now denoting to the whole country India(source-the wonder tht was India by A.L.basham) Incredible India!
2.In this way the real meaning of words changes but we should be very concise when we are reading or studing history.It is a simple problem in history to understand the simplicity of thoughts.
       3. It is a solution of the problem that historian should be concise about the past version (that means biased) or they should be worned or get stable before only.
This thing is known by us,tht without learning/reading history we cannot make our base strong if we memorize the thinking of 'Russou' that it is automatically proved tht,"A person who never think about the present n future,is a useless person and also known that the base of it is past only, without knowing the past we cannot create the faceline of present and future".
A person who hates history,can never create history. To create our own history it is necessary to develop maturity to understand history.
          -translated by Ishita shah
        

Thursday, 2 April 2015

धारा 66(A) की समाप्ती : कहां तक उचित ?

सुप्रिम कोर्ट का फ़ैसला सूचना प्रौद्योगिकी कानून 2000 (IT ACT 2000) के कुछ धाराओं पर आया है,जो है
1.धारा 66(A) की समाप्ती (असंवैधानिक घोसित कर दिया गया )
2.धारा 69 को बरकरार रखा गया है, जो सरकार को यह अधिकार प्रदान करती है कि वह website को गोपनीय रुप से सेंसर कर सके और जरुरत पड़ने पर block भी.
इसके तहत ऐसी कोई समीक्षा व्यवस्था नहीं है कि block करने से पहले मालिक को इसकी सूचना दिया जाये और block के बिरुध्द अपील की जाये.
3.धारा 79 में सुप्रिम कोर्ट ने कुछ ढील दी है.इसके तहत प्रवधान था - Internate सेवा प्रदाताओं को कोई भी नकरात्मक सामाग्री संबंधी नोटिस प्राप्त होने पर 36 घंटे के भीतर हटानी होती थी या फ़िर उसकी जवाबदेही बनती थी.
ईस मामले में मननाने तरिके से नोटिस भेजा जा सकता था,लेकिन कोर्ट ने कहा है कि कोई भी समाग्री हटाना तभी जरुरी होगा जब अदालत इसका आदेश दे या सक्षम सरकारी विभाग की ओर से ऐसा करने को कहा जाये.
66(A) को हटाने का कानूनी आधार :-
हमारे संविधान के भाग -3 में मुलाधिकार की व्याख्या की गयी है,जिसके तहत अनुच्छेद 19(1)(a) में सभी नागरिकों को बोलने की स्वतंत्रता और अभीव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है.
धारा 66(A) में प्रवधान था
(क) कोई भी जानकारी जो ठेस पहुंचाने वाली हो या जिसका स्वर धमकी भरा हो.
(ख) कोई भी जानकारी (जो वह शख्स जानता है कि झूठी है) पर असुविधा या ख़तरा पैदा करने, आहत करने, आपराधिक धमकी देने, शत्रुता, दुर्भावना या नफ़रत फैलाने या किसी को गुस्सा दिलाने के मकसद से डाली जाए.
(ग) ऐसी कोई भी इलेक्ट्रॉनिक मेल या इलेक्ट्रॉनिक मेल संदेश जो पाने वाले को नाराज़ करे, उस संदेश के मूल स्रोत को लेकर धोखा दे, गुमराह करे या असुविधा पैदा करे..
इसके तहत 3 साल की सजा हो सकती थी.सुप्रिम कोर्ट ने इसे निरस्त करते हुये निम्न तर्क दिया,
धारा 66(A) काफ़ी अस्पष्ट थी जिस कारण पुलिस को असीमित अधिकार मिले हुये थे और सोशल मिडिया पर आलोचना और असहमति का इजहार करने वालों को प्रताड़ित होने की आशंका बनी हुयी थी.जो भारतीय संविधान की अनुच्छेद 19(1)(a) के खिलाफ़ थी,जिसमें असहमति को भी अभीव्यक्ति का आजादी माना गया है.
IT ACT 2000, में एक संशोधन के जरिये धारा 66(A) ,2008 में जोड़ दिया गया था,जो संसद में बिना बहस के ही पास हो गया था,जिसके चलते कई लोग प्रताड़ित हो चुके है.
19(1) के तहत नागरिकों को जो भी अधिकार प्राप्त है,उसे 19(2) के जरिये सीमित कर दिया जाता है.
19(2) कहता है -अगर दिये गये अधिकारों के प्रयोग से भारत की संप्रभुता और अखंडता ,राज्य की सुरक्षा,विदेशी राज्यों के साथ संबंध,लोक व्यवस्था,न्यायलय अवमान,मानहानि या कोई अपराध होता है तो 19(1) के इस्तेमाल को राज्य द्वारा रोका जा सकता है साथ ही राज्य प्रतिबंध भी लगा सकता है.
जब ऐसी प्रावधान संविधान में ही निहित है तो 66(a) की क्या जरुरत है.
66(A) को लेकर राजनीतिक दलों का विचार :-
1. पिछले साल गोआ में देबु चोडानकर पर एक फेसबुक पोस्ट पर अपराधिक मामला दर्ज किया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि 'उन्हें डर है कि अगर मोदी प्रधानमंत्री बन जाते हैं तो 'हॉलोकास्ट' (नाजियों द्वारा यहुदियों की नरसंहार का समर्थन करना ) की स्थिति पैदा हो जाएगी.'
2.पुडुचेरी में रवि श्रीनिवासन को ये ट्वीट करने पर गिरफ्तार कर लिया गया कि ‘रिपोर्ट मिली है कि कार्ति चिदांबरम ने वाड्रा से ज़्यादा संपत्ति इकट्ठा कर ली है.’
3.कक्षा 11वीं के छात्र विकी ख़ान तब गिरफ़्तार किया गया जब उन्होंने एक कथन को ग़लती से समाजवादी पार्टीके नेता आज़म ख़ान के हवाले से लिख दिया.
4.कोलकाता के एक प्रोफ़ेसर अम्बिकेश महापात्रा पर आरोप लगा कि वे ममता बनर्जी के एक कार्टून का प्रचार कर रहे थे जो पुलिस के मुताबिक, अपमानजनक था.
5.महाराष्ट्र में बाल ठाकरे की मृत्यु पर टिप्पणी को लेकर दो किशोरियों की गिरफ्तारी.
विडम्बना ये है कि इनमें से कोई भी कथन उन वाजिब प्रतिबंधों के तहत नहीं आता जो कि संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार पर लगता है.
चाहे किसी भी राज्य में किसी भी पार्टी का सरकार रहा हो सभी ने ईस कानून का इस्तेमाल अपने मन मुताबिक किया हो.वह भाजपा हो या कांग्रेस या त्रिनमुल या सपा.
किसी के द्वारा इसे बदलने संबंधी कोई ब्यान नहीं आया था.
शुक्र है कि न्यायलय, "न्यायिक सक्रीयता" के अपने भूमिका को ईमानदारी से निभाता आ रहा है,मौजुदा फ़ैसला उसी की एक कड़ी है.
जब भी नागरिक अधिकारों को कुचलने का कदम उठाये गये है,न्यायपालिका ने नागरिकों का पक्ष लेकर इनके अधिकारों की रक्षा की है.
66(A) के समाप्ति से उत्पन्न परेशानियां : -
1.साइबर स्पेस पर किसी को परेशान करना,पीछा करना और बदनाम करना एक आम बात हो गयी है.66(A) के तहत इन पीड़ीतों को जो राहत मिलती थी वह जाती रही.
2.66A(c) के तहत स्पैम पर नियंत्रण का जो प्रावधान था वह खत्म कर दिया गया है.जबकि दुनिया में सबसे ज्यादा स्पैम भारत में ही बनते है लेकिन इसे रोकने का यहां कोई नियम नहीं है.
3.66ए के हटने से साइबर अपराधियों से निपटने में दिक्कत होगी.
4.डिजिटल दुनिया में दूसरों पर गलत तरिकों से हमले करने वालों को, जो कुछ थोरा बहुत डर होता था अब वह भी नहीं होगा.
66(A) की समाप्ति से सरकार को चेतावनी :-
1.सरकार ऐसा अब कोई कानून नहीं बनाये जो संविधान के मुख्य सिध्दान्त के खिलाफ़ हो.
2.IT ACT में संशोधन करते वक्त सरकार को ध्यान रखना होगा कि यह समय की जरुरतों और बदलती हुयी तकनिक के अनुरूप हो.
conclusion :-
कोर्ट का यह अच्छा पहल है,जिसके चलते 66(a) के तहत सजा पाये लोगों को अब राहत मिलेगी.
world wide wave पर लगाम लगाना उतना असान नहीं है जितनी आसानी से TRAI ने SMS पर रोक लगायी.कोई सरकार इसे नियंत्रिट नहीं कर सकती है.चीन कई साल तक इसके लिये कठिन मेहनत कर चुका है लेकिन अभी तक सब बेकार रहा है.
internet एक ऐसी चीज है जिसका हमारे जीवन की तमाम दृश्य और अदृश्य चिजों पर दखल रहा है.यह सबकुछ देखने और जानने में सक्षम एक ऐसी संस्था है जिसकी मौजूदगी तो घोर नास्तिक भी इंकार नहीं कर सकता.

जैन और बौध्द धर्म का भारतीय समाज पर प्रभाव

आज से 2500 साल पूर्व गौतम और वर्ध्दमान नाम के दो तेजस्वी बालक का जन्म शाक्य तथा वज्जि नामक गण में हुया था,दोनों के परिवार का इनसे काफ़ी उम्मीदें थी लेकिन अपनी रास्ते का चयन इनदोनों ने खुद किया.जिसके फलस्वरुप इतिहास में सदियों के लिये अमर हो गये.
गौतम बुध्द ने बौध्द धर्म तथा माहावीर ने जैन धर्म को काफ़ी उच्चाईयां दी (महावीर से पहले ही जैन धर्म का स्थापना हो चुका था जिसका श्रेय ऋषभदेव को दिया जाता है जो पहले उपदेशक थे)
दोनों ने अपनी शिक्षा प्राकृत भाषा में दी और दोनों ने ही पुर्वजन्म में विश्वास किया.बुध्द ने कहा की हमारे कष्ट और दुख का कारण है ,"हमारी इच्छा और लालसायें जो कभी पुरी नहीं हो सकती"
माहावीर भी इसी कथन से अपने उपदेश की शुरुआत करते हैं.इनदोनों का मुल ध्येय था - "किस प्रकार मनुष्य को जन्म -मरन के चक्र से मुक्त कराकर मोक्ष की प्राप्ति करवाया जाये."
ईस उद्देश्य प्राप्ति के लिये बुध्द ने मध्यम मार्ग अपनाने का विकल्प दिया जबकि माहावीर ने यति जीवन का(यानी जो अपने शरीर को जितना कष्ट देगा उसे मोक्ष की प्राप्ति उतना ही जल्दी होगी.)
इसका एक नकरात्मक(negative) पहलू जल्द उभरकर सामने आ गया.जैन धर्म से लोगों का जुड़ाव बौध्द धर्म के अपेक्षा धीरे धीरे कम होता चला गया.
तत्कालिक भारतीय समाज पर प्रभाव :-
1.दोनों ने वर्ण व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया,फलस्वरुप यह धीरे धीरे कमजोर होती गायी और भारतीय समाज में भ्रातृत्व अपना पैर तेजी से जमाने लगी.
2.ईस समय की समाज में वेदों की कर्मकांडीय परंपरा का उतना अधिक बोलबला नहीं रहा था,उपनिषदों ने जीवन के आधारभूत समस्या के बारे में चिंतन करने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी,परंतु मुख्य समस्या था - मोक्ष की विधि का पता लगाना.ईस समस्या को जैन और बौध्द धर्म ने दूर करने की सफल प्रयास किया .
3.यह वह समय था जब भारतीय समाज में कई संप्रदायों की स्थापना हुयी,भारत में ऐसा पहले कभी नहीं हुया था जिसने भारतीय समाज और संस्कृति को बहुत अधिक प्रभावित किया.
4.भारतीय समाज में एक नये विचार का जन्म हुया - शुध्द और नैतिक जीवन में विश्वास के साथ साथ ईश्वर के विचार की अस्वीकृति.
5.कर्म की प्रधानता तो पहले से ही चली आ रही थी लेकिन इनदोनों के प्रभाव में आकर और अधिक मजबूत हुआ.
6.ऐसा पहली बार देखने में आया कि कोई क्षत्रिय व्यापक बदलाव की स्थिति समाज में बना दिया.अर्थात अब कोई ऐसा संदेह नहीं रह गया कि ब्राह्मण के अलावा सामाजिक बदलाव का काम कोई दूसरा नहीं कर सकता.

Wednesday, 1 April 2015

इतिहास की समझ - 2,गांधी एक ब्रिटिश एजेंट ?

इन दिनों महात्मा गांधी को लेकर काफ़ी तेज बहस हो रही है,इनका व्यक्तित्व कैसा था खासकर तब से जब एक जज ने उनको ब्रिटिश एजेंट कहकर गंभीर आरोप लगाये.यह किसी को कोसने का वक्त नहीं है,वक्त है अपनी तर्क देकर दूसरे की बातों को गलत ठाहराने का.
हम भारतीय का सबसे गंभीर कमी है कि हम भावनाओं में बहकर अपनी तर्क करने की कसौटी को तिलांजलि दे देते हैं खासकर ईस दौर में जब समाज का बड़ा तबका में किसी भी कथन और बात को मानने के लिये प्रमाण की मांग करने की प्रवृति तेजी से बढी है.
गांधी बनाम गोडसे :-
जनवरी का महीना,गांधी के जीवन का एक अभिन्न हिस्सा माना जाता है.
यह वही महीना था जब वे भारत आये थे,और इनकी भारत वापसी का सदी के रूप में वर्ष 2015 को मनाया गया.इसी महीने गांधी के जीवन का अंतिम उपवास भी था,अंत होते होते इनकी जीवन लीला ही समाप्त कर दी गयी .(jan30,1948)
यह वह दौर था जब कम से कम भारत के बड़े हिस्से के हिंदू उनसे अधिक निराश हो चुके थे. उनके मुताबिक़ गांधी उनके लिए न सिर्फ़ ग़ैरज़रूरी हो गए थे, बल्कि उनको लगने लगा था कि गांधी का जीवित रहना भारत के लिए ख़तरनाक हो सकता था.
गांधी ने इन्ही दिनों दंगे को रोकने के उद्देश्य से उपवास की घोषणा कर दी और उपवास पर बैठ भी गये लेकिन नियति को कुछ और ही मंजुर था,
उपवास ख़त्म होने के बाद गाँधी की प्रार्थना सभा पर बम विस्फोट हुए और मदन लाल पहवा नाम का व्यक्ति गिरफ़्तार हुआ.
नाथूराम गोडसे, जो अपने दल के साथ दिल्ली में डेरा डाले हुए थे, इसके बाद यहाँ से निकल गए, लेकिन वह फिर लौटे.
30 जनवरी को वह प्रार्थना सभा की ओर जाते हुए गांधी के आगे रुके, उन्हें प्रणाम किया और फिर उनपर गोलियाँ दाग़ दीं.
ईस दर्द भरी घटना के बाद , एक तरफ़ तो कई घरों में चूल्हा नहीं जला, लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्यों और समर्थकों ने मिठाइयाँ बांटी और दीवाली मनाई.
आज जब वह संघ भारत की सत्ता पर क़ाबिज़ है. तो यह एक मौक़ा हो सकता है यह विचार करने का कि क्या अंतिम रूप से गाँधी के विचारों को विदाई दे दी गई है.
यहा सोचने वाली बात है,आरएसएस(RSS) की क्या मजबूरी रही होगी?
अगर राम मनोहर लोहिया के एक कथन पर ध्यान दिया जाये तो यह स्पष्ट हो जाता है ,"तत्कालिक कोई भी घटना गलत या सही नहीं होती क्योंकि किसी भी घटना पर कोई भी विचार तब प्रमाणित हो जाती है जब उसकी समीक्षा 100 वर्षों बाद किया जाये ,तब तक इतिहास उसका निष्पक्ष समालोचना कर चुका होता है."
परंतु मशहूर ब्रिटिश विचारक टामस पेन को याद किया जाये ,तब यह स्पष्ट होता है कि "कोई भी विचारधारा समाज में तब तक जीवित रहती है जब तक समाज की उसे स्वीकृति प्राप्त हो अन्यथा गर्त में खो जाती है."पेन के कथन का दूसरा पक्ष है " कोई भी विचारधारा समाज में जीवित रहती है जब वह समयअनुकूल हो.
उस समय संघ अपनी शुरुआति अवस्था में था और अपनी साख बनाने के लिये कोई तो विचारधारा होना ही चाहिये था और इसने हिंदु हित को पुरा करने का जो अजेंडा चलाया उसमें मैं कहीं गलती नहीं देखता क्योंकि इतिहास गवाह है बहुसंख्यवाद का पैरोकार करने वाला कोई न कोई संगठन पैदा हो ही जाता है.कोई भी संगठन चलाने की बुनियादि आधार होती है - लोगों का समर्थन जो कि उसे प्राप्त था और आज भी है. तो दूसरे नजरिये से कहा जा सकता है कि इसमें संघ की नहीं हमारी गलती थी.
आखिर गोडसे ने गांधी की हत्या क्यों की?
गिरफ़्तार होने के बाद गोडसे ने गांधी के पुत्र देवदास गांधी (राजमोहन गांधी के पिता) को तब पहचान लिया था जब वे गोडसे से मिलने थाने पहुँचे थे. इस मुलाकात का जिक्र नाथूराम के भाई और सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने अपनी किताब गांधी वध क्यों, में किया है.
गोपाल गोडसे को फांसी नहीं हुई, क़ैद की सजा हुई थी. जब देवदास गांधी पिता की हत्या के बाद संसद मार्ग स्थित पुलिस थाने पहुंचे थे, तब नाथूराम गोडसे ने उन्हें पहचाना थानाथूराम ने देवदास गांधी से कहा, "मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूं. हिंदी अख़बार हिंदू राष्ट्र का संपादक. मैं भी वहां था (जहां गांधी की हत्या हुई). आज तुमने अपने पिता को खोया है. मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुंचा है. तुम पर और तुम्हारे परिवार को जो दुख पहुंचा है, इसका मुझे भी बड़ा दुख है. कृप्या मेरा यक़ीन करो, मैंने यह काम किसी व्यक्तिगत रंजिश के चलते नहीं किया है, ना तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और ना ही कोई ख़राब भाव."
देवदास ने तब पूछा, "तब, तुमने ऐसा क्यों किया?"
जवाब में नाथूराम ने कहा, "केवल और केवल राजनीतिक वजह से."
नाथूराम ने देवदास से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. अदालत में नाथूराम ने अपना वक्तव्य रखा था, जिस पर अदालत ने पाबंदी लगा दी.
गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक के अनुच्छेद में नाथूराम की वसीयत का जिक्र किया है. जिसकी अंतिम पंक्ति है- "अगर सरकार अदालत में दिए मेरे बयान पर से पाबंदी हटा लेती है, ऐसा जब भी हो, मैं तुम्हें उसे प्रकाशित करने के लिए अधिकृत करता हूं."
पहली बात, वह गांधी का सम्मान करता था. उसने कहा था, "वीर सावरकर और गांधीजी ने जो लिखा है या बोला है, उसे मैंने गंभीरता से पढ़ा है. मेरे विचार से, पिछले तीस सालों के दौरान इन दोनों ने भारतीय लोगों के विचार और कार्य पर जितना असर डाला है, उतना किसी और चीज़ ने नहीं."
दूसरी बात, जो नाथूराम ने कही, "इनको पढ़ने और सोचने के बाद मेरा यकीन इस बात में हुआ कि मेरा पहला दायित्व हिंदुत्व और हिंदुओं के लिए है, एक देशभक्त और विश्व नागरिक होने के नाते. 30 करोड़ हिंदुओं की स्वतंत्रता और हितों की रक्षा अपने आप पूरे भारत की रक्षा होगी, जहां दुनिया का प्रत्येक पांचवां शख्स रहता है. इस सोच ने मुझे हिंदू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम के नज़दीक किया. मेरे विचार से यही विचारधारा हिंदुस्तान को आज़ादी दिला सकती है और उसे कायम रख सकती है."
इस नज़रिए के बाद नाथूराम ने गांधी के बारे में सोचा. "32 साल तक विचारों में उत्तेजना भरने वाले गांधी ने जब मुस्लिमों के पक्ष में अपना अंतिम उपवास रखा तो मैं इस नतीजे पर पहुंच गया कि गांधी के अस्तित्व को तुरंत खत्म करना होगा. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों को हक दिलाने की दिशा में शानदार काम किया था, लेकिन जब वे भारत आए तो उनकी मानसिकता कुछ इस तरह बन गई कि क्या सही है और क्या गलत, इसका फैसला लेने के लिए वे खुद को अंतिम जज मानने लगे. अगर देश को उनका नेतृत्व चाहिए तो यह उनकी अपराजेयता को स्वीकार्य करने जैसा था. अगर देश उनके नेतृत्व को स्वीकार नहीं करता तो वे कांग्रेस से अलग राह पर चलने लगते."
महात्मा पर आरोप
इस सोच ने नाथूराम को गांधी की हत्या करने के लिए उकसाया. नाथूराम ने भी कहा, "इस सोच के साथ दो रास्ते नहीं हो सकते. या तो कांग्रेस को गांधी के लिए अपना रास्ता छोड़ना होता और गांधी की सारी सनक, सोच, दर्शन और नजरिए को अपनाना होता या फिर गांधी के बिना आगे बढ़ना होता."
तीसरा आरोप ये था कि गांधी ने पाकिस्तान के निर्माण में मदद की. नाथूराम ने कहा, "जब कांग्रेस के दिग्गज नेता, गांधी की सहमति से देश के बंटवारे का फ़ैसला कर रहे थे, उस देश का जिसे हम पूजते रहे हैं, मैं भीषण ग़ुस्से से भर रहा था. व्यक्तिगत तौर पर किसी के प्रति मेरी कोई दुर्भावना नहीं है लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि मैं मौजूदा सरकार का सम्मान नहीं करता, क्योंकि उनकी नीतियां मुस्लिमों के पक्ष में थीं. लेकिन उसी वक्त मैं ये साफ देख रहा हूं कि ये नीतियां केवल गांधी की मौजूदगी के चलते थीं."
नाथूराम के तर्कों के साथ समस्याएं थीं. मसलन, उसकी सोच थी कि गांधी देश के बंटवारे के प्रति उत्साहित थे, जबकि इतिहास के मुताबिक मामला बिलकुल उल्टा था. उन्होंने कहा कि कांग्रेस में गांधी तानाशाह थे, लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि कांग्रेस के अंदर अपनी बात मनवाने के लिए गांधी को भूख हड़ताल करनी पड़ती थी. किसी तानाशाह को आदेश देने के सिवा कुछ करने की जरूरत क्यों होगी?
यह गोडसे के निजी विचार है,यहा इसे केवल इसलिये डाला गया है ताकि समझा जा सके कि सच्चाई क्या है और उसके मन में चल क्या रहा था.
अगले आलेख में बाकी पहलू  को क्लियर किया जयेगा.
स्त्रोत्र - Bbc,
         फ्रीडम स्ट्रगल by vipin chandra,
         india after independence by vipin chandra,
         modern india by sumit sarkar,vipin chandra and ncert.
         -SURESH KUMAR PANDEY