Tuesday, 31 March 2015

योगेन्द्र यादव और प्रशांत भुषन समेत अन्य दो की विदाई :-



सुरेश कुमार पाण्डेय,
'एक सोच जो अलग हो' के लिए
केजरिवाल ने पहली बार यह संकेत दे दिये हैं कि उनकी राजनीति उस मध्यम वर्ग की नहीं है जहां घर के भीतर झगड़े को पत्नी,पति से पिटाई के बाद भी मेहमान के आते ही छुपा लेती है.
केजरिवाल की राजनीति तो उस झोपड़पट्टी की है जहां पति - पत्नी का झगड़ने का कार्यक्रम बस्ती में खुले तौर पर चलता है.और पत्नी भी पति को दो दो हाथ  लगाती है,और छुपाया किसी से नहीं जाता.
"बराबरी का हक,और बराबरी का व्यवहार"
इसमें गलती किसकी है सोचने वाली बात है,आखिर दिल्ली की झोपड़पट्टी में रहने वाले लोगों ने केजरिवाल को सत्ता जो दी है ,प्रभाव पड़ना तो लाजमी है.
अभी तक के घटनाक्रम से यह सामने आ चुका है कि केजरिवाल राजनेता नहीं है, इसका जीता जागता प्रमाण है कि 2013 में मुख्यमंत्री बनने के बाद भी मुख्यमंत्री की तरह नजर नहीं आते है जबकी लोकतंत्र में हर पद की एक गरिमा होती है.2014 में लोकसभा चुनाव हारकर सामाजिक तानों को सह नहीं पाते हैं और दिल्ली की गद्दी पाने के लिये तिकड़मो का जुगाड़ करते हैं और दिल्ली में एतिहासिक जीत हासिल करने के महीने भर के भीतर ही सत्ता को बिना अवरोध बनाने से हिचकते भी नहीं है.यानी राजनीतिक खेल का ऐसा खुलापन कोई नेता करेगा सोचा भी नहीं जा सकता है जो काम खामोशी से हो सकता था उसे
झोपड़पट्टी की तरह उजागर करने का क्या अर्थ है मतलब साफ़ है कि अपने को हमेशा सुर्खियों में रखने का यह उनका अगला कदम है.जो किसी भी नजरिये से सही नहीं कहा जा सकता.
आम आदमी पार्टी का प्रयोग तो राजनीतिक विचारधाराओं को तिलांजलि देकर पनपा है जहां राइट - लेफ्ट सोच हैं ही नहीं.तो फिर केजरिवाल अपना घर शुध्द रुप से ठीक करने के लिये क्यों सोच रहे है.
केजरिवाल की सोच केसे पूर्व की सत्ता से अलग होती है इसका इंतजार और फ़ैसला तो वाकई अब 2020 में ही होना है.
योगेंद्र,प्रशांत,अजित और प्रो आनंद के साथ साथ लोकपाल रामदास को हटाना ,स्पष्ट करता है कि आम आदमी पार्टी में भी personality cult(व्यक्ति पुजा) जैसा बुराई अपना पैर पसार रहा है,तानाशाही का रूप भी दिखाई दे रहा है.
पार्टी के कुछ लोगों का कहना है कि उनको  हटाने का फ़ैसला सर्वसहमति से लिया गया है,जब पार्टी ईस सहमति को लेकर आशावान थी तो secret voting द्वारा फ़ैसला क्यों नहीं किया गया.पार्टी या केजरिवाल को किस बात का डर था ??
पहली नजर में यह सुनियोजित और साजिष लगती है.
यह लगने लगा है कि केजरिवाल में राब्स्पियर जैसा चरित्र पनपने लगा है,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था जिसमें उसमें सबसे पहले अपने साथियों कोनिशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया.महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली.आज भी कुछ ऐसा ही हो रहा है.
यह सही है कि
"democrat is not always right,
dictators is not always wrong."
परंतु आज के जमाने में लोकतंत्र सबसे परिपक्व और अजमाया हुया शासन व्यवस्था है.लाख बुराई होने के बाद भी लोगों की आस्था इसमें अपने धर्म से भी ज्यादा है फिर दिल्ली में कुछ दिनों पहले लोकतंत्र का माखौल क्यों उडाया गया सोच से परे है,आज AAP वहीं खड़ी है जहां वर्षों पहले यूएसएसआर (USSR) की communist party थी.
जिस तरह योगेंद्र यादव अपनी बातों को मिडिया के सामने रख रहे थे उससे यह तो नहीं लग रहा था कि वे झूठ बोल रहे है,उसने यह बात बोल कर सभी को स्तब्ध कर दिया कि "पुरी घटनाक्रम लोकतंत्र की हत्या है" जो कहीं से गलत नजर नहीं आती.